संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय  22 अप्रैल : कितने अच्छे, कितने बुरे ?
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 22 अप्रैल : कितने अच्छे, कितने बुरे ?
22-Apr-2020

कितने अच्छे, कितने बुरे ?
कोरोनाग्रस्त हिंदुस्तान में देश भर से दिल दहलाने वाली खबरें आ रही हैं, कुछ खबरें संघर्ष की हैं, कुछ त्याग की, और कुछ उस हैवानियत की जिसे इंसान अपने से परे मानते हैं, हालाँकि जो है उनके भीतर की ही। बहुत सी जगहों पर हिन्दुओं का अंतिम संस्कार मुस्लिम कर रहे हैं, कहीं घर वाले अंतिम संस्कार को तैयार ना हुए तो एक तहसीलदार ने अंतिम संस्कार किया। कई जगहों पर कोरोना से मरीजों को बचाते हुए मरने वाले डॉक्टरों को उनके धर्म के कब्रिस्तान में दफनाने से समाज के लोग रोक रहे हैं, तो ताबूत को लिए हुए सरकारी कर्मचारी एक से दूसरे कब्रिस्तान भटक रहे हैं। डॉक्टरों, नर्सों, और पायलटों से मकान खाली करवाने के भी बहुत से मामले हो गए हैं, अभी मध्यप्रदेश में 13 सामानों की सरकारी मदद-किट में कुल दो सामान निकल रहे हैं। ऐसे में ही बहुत से भले लोग दूसरों की सेवा करते-करते जान भी दे-दे रहे हैं। रात दिन मदद करने में लगा एक सिक्ख नौजवान इसी दौरान सड़क-हादसे में मारा गया है। छत्तीसगढ़ के रायपुर में ही सरकारी राहत शिविर में लोगों की सेवा में एक सामाजिक कार्यकर्ता मंजीत कौर बल अपने दर्जनों साथियों के साथ रात-दिन लगे हुए हैं, और सैकड़ों किलोमीटर के पैदल सफर पर निकले गरीबों को सड़क से मनाकर राहत शिविर में लाकर ठहरा रही हैं। 

एक ईसाई डॉक्टर के कोरोना-मोर्चे पर लड़ते हुए शहीद हो जाने पर जो ईसाई समुदाय अपने कब्रिस्तान में दफनाने नहीं दे रहा, वह ईसाई समुदाय कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए जाना जाता था, और मदर टेरेसा जैसे लोग इस समुदाय में हुए थे। कहने को यह धर्म पड़ोसी से प्रेम करने को कहता है, लेकिन आज उसके कब्रिस्तान के दिल में भी समाज के एक हीरो के ताबूत के लिए जगह नहीं बची ! बुरा वक्त अच्छे लोगों की खूबियों और बुरे लोगों की खामियों के उजागर होने का बड़ा अच्छा वक्त होता है, और वही हो भी रहा है। देश, काल, और धरम से परे, सिक्ख सेवा में लगे हैं, तो लगे हैं। ऐसे वक्त उत्तर प्रदेश का एक निजी अस्पताल इश्तहार छपवाकर मुस्लिम मरीजों को आने से मना करता है, और देश में बढ़ाई जा रही सांप्रदायिक नफरत में अब अस्पताल भी अगर इश्तहार छपवाकर पेट्रोल डाल रहे हैं, तो फिर अब बचता क्या है?

देश की बहुत सी सरकारों में यह सोच दिख रही है कि ताकतवर और पैसेवाले तबकों को बचा लिया जाए, और मजदूर तो बिना छत के रहने के आदी ही हैं, इसलिए उन्हें खुले में छोड़ दिया जाए। यह सोच भी सरकारों में तथाकथित इंसानियत की कमी बताती है, और सरकार का अपना कोई दिल-दिमाग तो होता नहीं है, इसलिए यह सरकार चलाने वाले लोगों की संवेदनशून्यता है। देश के पैसे वालों में कितनी हमदर्दी है, यह उनके दिए दान से दिख चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कारोबारियों के सीएसआर की रकम को प्रधानमंत्री के नए बनाये कोष में देने की तो छूट दे दी है, लेकिन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के राहत कोष में उसे नहीं दिया जा सकता। यह बहुत ही बेतुका फैसला है, कोरोना से निपटने की सीधी जिम्मेदारी तो राज्य सरकारों की है, उनका तो अपने राज्य के कारोबार के सीएसआर पर पहला हक होना चाहिए। इस तरह इस बुरे वक्त में सरकार और समाज, दोनों की अच्छी सोच खुलकर सामने आ रही है। फिर यह भी समझ लेने की जरूरत है कि आज हिंदुस्तान पर कोरोना का कहर दुनिया से सबसे बुरे कहर वाले देशों के आस-पास भी नहीं है। अगर यहां भी सड़कों में लाशें गिरती होतीं तो क्या होता? यहाँ भी बुलडोजर से लाशों को कब्रिस्तान में भरना होता तो क्या होता? किसी दिन अगर कोरोना से बचने का टीका बाजार में आएगा और गिना-चुना आएगा तो ताकतवर लोग अपने परिवार के लिए उसे झपटने के लिए क्या करेंगे? क्या लोग एक-दूसरे का गला काटने को तैयार नहीं हो जायेंगे? बहुत सी टुकड़ा-टुकड़ा बातें हैं सोचने के लिए, आज से बहुत अधिक बुरे वक्त की कल्पना करके उसमें अपने-आपको रखकर देखें, कि हम कितने अच्छे, कितने बुरे हो सकते हैं?
-सुनील कुमार

अन्य खबरें

Comments