संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 अप्रैल : दलित-आदिवासी आरक्षण से  क्रीमी लेयर तुरंत खत्म हो
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 26 अप्रैल : दलित-आदिवासी आरक्षण से क्रीमी लेयर तुरंत खत्म हो
26-Apr-2020

दलित-आदिवासी आरक्षण से 
क्रीमी लेयर तुरंत खत्म हो 

दलित-आदिवासी आरक्षण हिंदुस्तान में अलग-अलग वजहों से तनाव का कारण बने ही रहता है, फिर हाल के बरसों में सुप्रीम कोर्ट के बड़े साफ-साफ रूख की वजह से एक नयी बेचैनी खड़ी हुई है। बात दलित-आदिवासी आरक्षण कम करने की नहीं है, बल्कि इन तबक़ों के भीतर मलाईदार तबक़ों को कम करने की है। हम बरसों से इस बात को लिखते आ रहे हैं, कि इन तबक़ों से क्रीमी लेयर को हटाने की जरूरत है क्योंकि अपनी बेहतर सामाजिक, आर्थिक स्थिति की वजह से इन समुदायों का यह हिस्सा ही सारे फायदों पर एकाधिकार जमा बैठता है, ओर इन्हीं तबकों के गरीब वंचित ही रह जाते हैं। 

अब चार दिन पहले, 22 अप्रेल को सुप्रीम कोर्ट (उच्चतम न्यायालय) में संविधान पीठ की ये टिप्पणी कि सरकार एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू करे, सरकार के लिए एक बार फिर से दिक्कत बन गई है। साल 2018 में सप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा जरनैल सिंह केस में की गईं टिप्पणियां अभी फैसले से हटी नहीं हैं कि अब दूसरी संविधान पीठ ने यही टिप्पणियां फिर से कर दी हैं। अदालत ने इस बार कहा है-एससी-एसटी वर्ग के जो लोग आरक्षण का लाभ लेकर धनी हो चुके हैं, उन्हें शाश्वत रूप से आरक्षण देना जारी नहीं रखा जा सकता है। कल्याण के उपायों की समीक्षा करनी चाहिए ताकि बदलते समाज में इसका फायदा सभी को मिल सके। ताजा टिप्पणियां कोर्ट ने आंध्र व तेलंगाना के अनुसूचित क्षेत्रों में एसटी वर्ग को 100त्न आरक्षण देने के आदेश को रद्द करते हुए 22 अप्रैल को की हैं।

इस बारे में एक समाचार का हिस्सा कहता है- वर्ष 2018 में की गई क्रीमी लेयर की टिप्पणियों के दलित वर्ग में कड़े विरोध के बाद केंद्र ने दिसंबर 2019 मे शीर्ष कोर्ट में याचिका दायर कर टिप्पणियों को फैसले से हटाने का आग्रह किया था। सरकार ने कहा था ये मामला सात जजों की बेंच को भेजा जाए क्योंकि एससी-एसटी वर्ग में क्रीमी लेयर नहीं लागू की जा सकती। उनका आर्थिक रूप से सशक्त होना भी उनसे दलित होने का दाग नहीं मिटा पा रहा है। सरकार की यह याचिका शीर्ष कोर्ट में लंबित है। मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने उसे सात जजों की बड़ी बेंच को भेजने पर विचार करने की सहमति दी है। अब तक क्रीमी लेयर का सिद्धांत अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी में ही लागू होता है।
केंद्र सरकार 2018 के अदालती फैसले के खिलाफ 2019 में सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी कि अदालत के पिछले बरस के एक फैसले को एक बड़ी बेंच सुने। सर्वोच्च न्यायालय में पांच जजों की बेंच ने अनुसूचित जाति-जनजाति के पदोन्नति में भी मलाईदार तबके को फायदे से बाहर करने का फैसला दिया था, और केंद्र सरकार पिछले बरस एक बार फिर अदालत के फैसले को पलटवाने के लिए इस मामले को सात जजों की बेंच को भेजने की अपील की थी। सरकार के वकील ने अदालत को कहा था कि यह एक भावनात्मक मामला है और सरकार चाहती है कि अधिक बड़ी बेंच इसे सुने। सुप्रीम कोर्ट में इसके पहले 2006 में पांच जजों की एक बेंच प्रमोशन से एसटी-एससी के मलाईदार तबके को बाहर कर चुकी थी, और 2018 में भी एक दूसरी बेंच ने ऐसा ही आदेश दिया था।

हमने उस वक्त भी लिखा था- केंद्र सरकार की यह अपील पूरी तरह नाजायज है, और एसटी-एससी तबकों की क्रीमीलेयर को पदोन्नति से बाहर तो रखना ही चाहिए, इसके साथ-साथ देश के आरक्षण कानून में भी इन तबकों के मलाईदार हिस्से को तमाम फायदों से बाहर करना जरूरी है। हम इसके बारे में पहले भी दर्जनभर बार लिख चुके हैं कि इन तबकों को जिस आधार पर आरक्षण दिया गया था, वे आधार आज भी जारी हैं, इसलिए आरक्षण जारी रहना चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात यह है कि दलित-आदिवासी तबकों के भीतर भी आरक्षण का फायदा पाने वाली पीढ़ी सरकारी नौकरियों से लेकर संसद और विधानसभा तक पहुंच चुकी है, और ऐसी ताकत पाने वाली पीढ़ी की संतानों को अतिरिक्त फायदे की जरूरत नहीं रहनी चाहिए। ऐसे मलाईदार तबके का बड़ा सहज तर्क यह रहता है कि वे आज भी सामाजिक भेदभाव के शिकार हैं, और इसलिए उन्हें आरक्षण का फायदा जारी रहना चाहिए, यह बात कुछ हद तक अगर सही भी है, तो भी इन तबकों के भीतर इनसे कमजोर नौबत वाली एक बहुतायत वाली आबादी है जो कि किसी फायदे तक नहीं पहुंच पाई है। इन तबकों के भीतर ताकतवर हो चुकी पीढ़ी के बच्चे संपन्नता और पढऩे-लिखने की सहूलियत, कोचिंग के चलते हुए इतने ताकतवर हो जाते हैं कि उनके स्वजातीय या स्वधर्मी बच्चे उनके आसपास भी नहीं फटक पाते। ऐसे में इस मलाईदार तबके को इन तबकों के ऊपर से ठीक उसी तरह हटाने की जरूरत है जिस तरह कढ़ाई में खौलते दूध के ऊपर से मलाई को किनारे किया जाता है, तब नीचे का दूध औंट पाता है। इन तबकों के लिए आरक्षित अवसरों और इनकी आबादी के बीच कोई अनुपात नहीं है। ऐसे में आरक्षण के फायदे घूम-फिरकर अगर उन्हीं सीमित लोगों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलते चले जाएंगे, तो वह एक असंतुलित तबका बनने के अलावा और कुछ नहीं होगा। यह सामाजिक हकीकत समझना चाहिए कि क्रीमी लेयर को बाहर किए बिना उसी समाज के सबसे कमजोर लोगों की कोई संभावना नहीं बनती। जिस तरह और जिस तर्क के आधार पर ओबीसी के भीतर क्रीमी लेयर को फायदे से परे किया गया है वह तर्क एसटी-एससी पर भी लागू होता है और इसे अनदेखा करना सत्ता पर काबिज एसटी-एससी लोगों के पारिवारिक हित में जरूर है, लेकिन इन तबकों के बाकी गैरमलाईदार बहुतायत लोगों के हितों के ठीक खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट के सामने अभी यह व्यापक मुद्दा गया नहीं है, लेकिन इसके बारे में  दलित-आदिवासी तबकों के गरीब-कमजोर लोगों को जाना जरूर चाहिए।

ऊपर की बात हमने पिछले बरस लिखी थी, हम आज भी उसी पर कायम हैं, इसलिए उस बात को यहाँ दुबारा दिया है। सरकारों में फैसले लेने वाले तमाम दलित-आदिवासी लोगों के बच्चे इस फैसले को अमल में लाने से फायदों से बाहर हो जाएँगे, इसलिए अब इसके खिलाफ रास्ता ढूँढा जाएगा, और दलित-आदिवासी वंचित तबका वंचित ही रह जाएगा। 
-सुनील कुमार

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