संपादकीय

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय - जिसे आधी सदी बाद भी हिन्दुस्तानी बहू मानने से इंकार, उसी ने की सबसे बेबस हिन्दुस्तानी की फिक्र
'छत्तीसगढ़' का संपादकीय - जिसे आधी सदी बाद भी हिन्दुस्तानी बहू मानने से इंकार, उसी ने की सबसे बेबस हिन्दुस्तानी की फिक्र
04-May-2020

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,
4 मई 2020


जिसे आधी सदी बाद भी हिन्दुस्तानी
बहू मानने से इंकार, उसी ने की
सबसे बेबस हिन्दुस्तानी की फिक्र


पिछले चार-पांच दिनों में केन्द्र सरकार ने अपनी जो दुर्गति करवाई है, उसने लॉकडाऊन के बाद से अपनी नाकामयाबी को भी पीछे छोड़कर एक नया रिकॉर्ड बनाया है। अचानक एक सुबह देश को पता लगा कि तेलंगाना से झारखंड के लिए एक मजदूर-ट्रेन रवाना हुई है। फिर दोपहर शाम तक खबर आई कि कुछ और राज्यों के लिए भी श्रमिक-स्पेशल नाम की गाडिय़ां चलने वाली हैं। कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने प्रदेश के लोगों के वापिस आने के लिए ऐसी गाडिय़ों की मांग भी की थी, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य ने तो प्रदेश के बाहर अपने एक-सवा लाख मजदूरों के रिकॉर्ड देखते हुए 28 गाडिय़ों की मांग की है जिस पर अभी तक कोई जवाब मिला नहीं है। लेकिन इस बीच रेलवे ने लिखित आदेश में यह साफ किया कि अपने मजदूरों के लिए ट्रेन मांगने वाले राज्य को ही ट्रेन का भुगतान करना होगा। फिर दिन गुजरा नहीं था कि ऐसी खबरें आईं कि रेलवे मजदूरों से ही किराया धरवा रहा है, और वह आम रेल टिकट से अधिक भी है। इन दोनों बातों को लेकर देश में खूब बवाल हुआ, सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल किए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कोरोना फंड, पीएम केयर्स, का इस्तेमाल अगर इन मजदूरों को इनके प्रदेश तक छोडऩे के लिए नहीं हो रहा, तो फिर वह आखिर बना किस काम के लिए है? बहुत से लोगों ने यह सवाल भी किए कि जिन मजदूरों के पास सवा महीने से बिना काम बाहर बैठे खाने तक का पैसा नहीं है, उन्हें रेलवे स्टेशनों से टिकट न होने पर लौटाया जा रहा है, तो यह कहां की इंसानियत है? देश पर अचानक लाद दिए गए लॉकडाऊन के फैसले के बाद इस तरह से भाड़ा वसूली का सिलसिला लोग भूल नहीं पाएंगे।  

हैरानी इस बात की है कि मोदी सरकार प्रधानमंत्री के कड़े कामकाज के लिए जानी जाती है। जब लॉकडाऊन हुआ, तो अब उजागर हो रहा है कि उस वक्त कोई तैयारी नहीं थी, कोई योजना नहीं थी, राज्यों की कोई भागीदारी नहीं थी। जब लॉकडाऊन का पहला दौर निकल गया, तब दूसरे दौर के पहले मुख्यमंत्रियों से और विपक्षी दलों से कुछ चर्चा की गई। लेकिन रेलवे को केन्द्र सरकार का अपना विभाग है, और अभी तो सवा महीने से रेलवे बंद ही है, इसलिए मंत्री से लेकर अफसरों तक तो किसी भी योजना के लिए वक्त ही वक्त था। फिर रेलवे को किसी न किसी दिन शुरू होना ही था, हर कुछ दिनों में रेलवे कभी रिजर्वेशन शुरू कर देता था, तो कभी बंद कर देता था, मतलब यह कि रेलवे जिंदा था, और रेलवे एयर इंडिया की तरह अपने बिकने का इंतजार भी नहीं कर रहा है। ऐसे में क्या रेलवे को यह नहीं मालूम था कि जिस दिन मजदूरों को राज्य वापिस भेजने की नौबत आएगी, उस दिन भाड़ा वसूलने या न वसूलने का सवाल भी खड़ा होगा। आज पूरे देश में रेलवे बिना काम है, कर्मचारियों की तनख्वाह का मीटर घूम रहा है, उसका पूरा ढांचा बिना इस्तेमाल पड़ा है। ऐसे खाली पड़े हुए अमले और ढांचे को अगर हजार-पांच सौ रेलगाडिय़ां चलाकर मजदूरों को उनके प्रदेश पहुंचाना ही है, तो भी इसमें रेलवे को कोई बड़ा खर्च तो आ नहीं रहा था। देश की किसी भी राष्ट्रीय आपदा में इतिहास की हर केन्द्र सरकार राज्य को आर्थिक सहयोग करते आई है। हम सोच-समझकर मदद शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं क्योंकि देश के संघीय ढांचे में यह राज्य का हक है कि अपनी मुसीबत के वक्त वह केन्द्र से अतिरिक्त आबंटन पाए। कहीं सूखा हो, कहीं बाढ़ हो, कहीं ओले बरसे हों, केन्द्र सरकार राज्यों को अतिरिक्त बजट देती ही है। फिर यह लॉकडाऊन तो पूरे की पूरी केन्द्र सरकार की लादी हुई मानव निर्मित विपदा है, और इसमें तो बिन मांगे, बिन बोले कोई भी समझदार केन्द्र सरकार लोगों को ट्रेन से, बस से उनके प्रदेश तक पहुंचाती और अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी निभाती। लेकिन जिस तरह एक भीड़ का बर्ताव होता है, जितने मुंह उतनी बातें, केन्द्र सरकार हर दिन इन मजदूरों की टिकट-वसूली के लिए अलग-अलग किस्म की बात कर रही है, और अभी सुनाई पड़ रहा है कि केन्द्र सरकार टिकट का 15 फीसदी राज्य सरकारों से लेगी, और 85 फीसदी खर्च खुद उठाएगी। यह बात कुछ वैसी लग रही है कि कहीं पर आग लगी हुई हो, और दमकलकर्मी मौके पर हिसाब गिनाए कि कितना पानी खर्च होने पर कितना भुगतान करना पड़ेगा। यह सिलसिला जरा भी समझदार केन्द्र सरकार के रहते शुरू ही नहीं हुआ रहता। एक तरफ तो रेलवे स्टेशनों पर टिकट का पैसा न होने पर मजदूरों को भगा देने की खबरें आ रही हैं, दूसरी तरफ एयरफोर्स के विमान गैरजरूरी उड़ान भरकर अस्पतालों पर फूल बरसा रहे हैं। कुछ लोग सोशल मीडिया पर यह हिसाब लगाने में भी लगे हैं कि ऐसी गैरजरूरी उड़ानों का खर्च कितने हजार करोड़ रूपए आया होगा, और उस खर्च से कितने वेंटिलेटर खरीदे जा सकते थे, डॉक्टरों के लिए नामौजूद मास्क और पोशाक कितने आ सकते थे। यह पूरा सिलसिला देश को भावनाओं के एक सैलाब में भिगाकर रख देने का है, और सरकार की सोच और उसके कामों के बीच एक बड़ा विरोधाभास साफ दिख रहा है। डॉक्टरों की हिफाजत के लिए जरूरी सामान नहीं हैं, करोड़ों मजदूर देश भर में बेघर हैं, सड़कों पर हैं, तेलंगाना से मजदूरी करके लौटती हुई बारह बरस की एक मजदूर बच्ची तीन दिन पैदल चलने के बाद दम तोड़ देती है, तो कुछ फूलों पर तो उसका भी हक बनता था।

खैर, आज सुबह एक अच्छी खबर लेकर आई जब कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने यह घोषणा की कि पूरे देश से मजदूरों की घरवापिसी की ट्रेन का भाड़ा कांग्रेस पार्टी मोदी सरकार को देगी। कांग्रेस आज अच्छी हालत से नहीं गुजर रही है, फिर भी कल कर्नाटक कांग्रेस ने वहां की भाजपा सरकार को एक करोड़ रूपए का चेक दिया था ताकि राज्य की सरकारी बसों में घर लौटते मजदूरों से टिकट न वसूली जाए। आज सोनिया गांधी की यह घोषणा देश के करोड़ों लोगों के लिए राहत की बात तो है ही, भारतीय राजनीति और शासन व्यवस्था में पिछले कई हफ्तों में यह अकेली बात सबसे अधिक इंसानियत की बात भी है। जो नेता रात-दिन सोनिया गांधी को इटली की करार देते हैं, और दशकों पहले की भारतीय बन चुकी एक बहू को इंसान भी मानने से इंकार करते हैं, उस महिला का यह फैसला मोदी सरकार पर बहुत भारी पड़ा है जो कि एक सूदखोर साहूकार के अंदाज में बेघर मजदूरों की देह टटोलकर उस पर गोश्त का अंदाज लगा रही थी, कि उससे कितनी टिकट वसूली जा सकती है।

भारतीय राजनीति में भावनाओं की अपनी एक जगह है, लेकिन वे भावनाएं कब खोखली होती हैं, और कब ठोस होती हैं, यह जनता को समझ आ जाता है। थाली-ताली, दीया-मोमबत्ती, और अस्पतालों पर फूलों की बारिश, इन सबको मिला लें, इन तमाम प्रतीकों को गूंथ लें, तो भी एक मजदूर के लिए एक रोटी भी नहीं बन सकती। राष्ट्रीय स्तर पर किसी पार्टी ने अगर अब तक की सबसे बड़ी घोषणा की है, तो वह सोनिया गांधी ने की है, और यह बात तो जाहिर है ही कि इस पार्टी के पास भाजपा के मुकाबले दस फीसदी भी पैसा नहीं है। ऐसे में बिना रकम भरे दस्तखत करके दिए गए कांग्रेस पार्टी के ऐसे चेक की बात लोग भूलेंगे नहीं। दूसरी बात यह कि मोदी सरकार को वैसे तो दुनिया में किसी सलाहकार की जरूरत है नहीं, फिर भी आने वाले कई महीने उसके लिए कई ऐसे नाजुक फैसलों के होंगे जिनसे जनता का हित जुड़ा रहेगा, इसलिए उसे यह भी देखना चाहिए कि रेलगाडिय़ों की ऐसी इंसानियत से परे की गफलत हुई कैसे? क्या पूरी सरकार में एक भी समझ ऐसी नहीं है कि सवा महीने की बेरोजगारी-बेकारी के बाद जब लोग सड़क पर बांटे जा रहे खाने को खाकर जिंदा हैं, तब उन्हें घर पहुंचाने के लिए टिकट वसूली का मोलभाव करना एक जुर्म से कम नहीं है? समझ की यह कमी इतिहास में एक बड़ी नाकामयाबी, और एक बड़े बेरहम फैसले के रूप में दर्ज हो रही है। लेकिन हम मोदी सरकार के इतिहास और भविष्य से परे आज करोड़ों भूखे हिन्दुस्तानियों की भूख को लेकर, उनकी जिंदगी पर छाए हुए खतरे को लेकर, उनकी अनिश्चितता को लेकर फिक्रमंद हैं, और महज इसी वजह से मोदी सरकार को आत्मविश्लेषण की एक निहायत गैरजरूरी और बिनमांगी सलाह दे रहे हैं। साथ ही हम सोनिया गांधी को उनकी संवेदनशीलता और उनकी दरियादिली के लिए देश के करोड़ों भूखे, बेघर, बेबस, बेजुबान, बेरोजगार मजदूरों की तरफ से शुक्रिया भी कह रहे हैं।
-सुनील कुमार

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