संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय :  आज की हिन्दुस्तानी त्रासदी समकालीन इतिहास लेखन का एक ऐतिहासिक मौका, ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी..
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : आज की हिन्दुस्तानी त्रासदी समकालीन इतिहास लेखन का एक ऐतिहासिक मौका, ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी..
11-May-2020

आज की हिन्दुस्तानी त्रासदी समकालीन इतिहास लेखन

का एक ऐतिहासिक मौका, ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी..

आज पूरे हिन्दुस्तान के गांव-गांव से लॉकडाऊन की वजह से जनता की त्रासदी की जो खबरें आ रही हैं, उनके लिए मीडिया में जगह नहीं बची है। ईश्तहारों के बिना अखबारों की हालत अकाल और भुखमरी से जूझ रहे किसी देश के इंसानों सरीखी हो गई है। पन्ने घटते चले गए हैं, खबरें बढ़ती चली गई हैं। नतीजा यह हुआ है कि मीडिया का जो बड़ा सा हिस्सा गैरखबरों को खबर बनाकर जगह बर्बाद करता था, वह घट गया है। मीडिया की अपनी कंगाली और किफायत ने मिलकर वह कर दिखाया है जो कि संपादक नहीं कर पा रहे थे, अब अखबारों में खबरें काम की रह गई हैं, और अखबार रद्दी वाले का सपना नहीं रह गया है। कमोबेश ऐसा ही हाल कुछ बेईमान और घटिया टीवी चैनलों का भी हुआ है जो कि नफरत की आग उगलने वाले, अलग-अलग धर्मों का चेहरा बने हुए, धरती के सबसे घटिया और कमीने इंसानों को अपने स्टूडियो में बिठाकर देश में नफरत का लावा फैलाने में लगे रहते हैं। अब उनके दर्शक या तो घटते चले गए हैं, या लोगों को यह समझ आ रहा है कि खून न हिन्दू होता है न मुस्लिम, और भूख का अकेला धर्म खाना होता है, उससे परे कुछ नहीं। अब हार मानकर सबसे घटिया समाचार चैनलों को भी कम से कम कुछ समय असल जिंदगी की असल त्रासदी को देना पड़ रहा है, इससे उनके जुर्म घटते चल रहे हैं। 

 

लेकिन आज दो बातों को समझने की जरूरत है। एक तो यह कि हिन्दुस्तान में करीब पौन सदी बाद इस किस्म की त्रासदी आई है, छाई है, और जारी है जिसे पिछली बार भारत-पाकिस्तान विभाजन के वक्त देखा गया था। विभाजन का इतिहास तो बहुत लिखा हुआ है, लेकिन आज वक्त है भारत के समकालीन इतिहास को अच्छी तरह दर्ज करने का जो कि इतिहास की किताबों को देखकर नहीं लिखा जा सकेगा जिनके लिए आज सड़कों पर जो मजदूर हैं, जो बेघर हैं, उनसे बात करके, उनकी बातचीत को रिकॉर्ड करके, उनके सफर को रिकॉर्ड करके ही किया जा सकता है। एक भूतपूर्व पत्रकार और फिल्मकार विनोद कापरी ने अभी मजदूरों के एक जत्थे के साथ दिल्ली से लेकर बिहार के सहरसा तक 1232 किलोमीटर का साइकिल सफर किया, और अब वे इसी नाम से एक फिल्म बनाने जा रहे हैं। आज देश में हजारों ऐसे छोटे-बड़े पत्रकार हैं जो लगातार प्रवासी मजदूर कहे जाने वाले जिंदगी के योद्धाओं से बातचीत रिकॉर्ड कर रहे हैं, और सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर रहे हैं। ऐसे वीडियो, ऐसे ऑडियो, नाम-पते और नंबर सहित ऐसी तस्वीरें उस तरह छा गई हैं जिस तरह आम के पेड़ों पर बौर छा जाते हैं, या गर्मी में गुलमोहर के सुर्ख लाल फूल छा जाते हैं। 

 

आज जरूरत इतिहास, राजनीति शास्त्र, समाज विज्ञान, पत्रकारिता, और लोक प्रशासन के प्राध्यापकों और छात्रों की है जो कि ऐसी तमाम कहानियों का दस्तावेजीकरण कर सकें, उन्हें संदर्भ और जानकारी सहित लिख सकें, फोटो, वीडियो, और ऑडियो को सम्हालकर रख सकें क्योंकि सोशल मीडिया की चीजें वक्त के साथ गुम होने लगती हैं। देश भर में जगह-जगह सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनसंगठनों, और स्वयंसेवियों के जत्थे अलग-अलग स्तर पर लोगों की मदद कर रहे हैं, और उनसे बातचीत दर्ज भी कर रहे हैं। जगह-जगह मौतें दर्ज हो रही हैं, सड़क किनारे बच्चों के जन्म दर्ज हो रहे हैं, और खुद मरियल सी कद-काठी वाले गरीब-मजदूर कहीं गर्भवती पत्नी को उठाकर सैकड़ों किलोमीटर जा रहे हैं, तो कहीं बूढ़े मां-बाप को। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र के लिए एक बुरे सपने की तरह है, लेकिन एक कड़वी हकीकत भी है। हिन्दुस्तान के छात्र-छात्राओं और उनके प्राध्यापकों के लिए सोवियत संघ के विघटन के इतिहास से लेकर प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के इतिहास तक को पढऩे के लिए अगले हजार-पांच सौ साल का वक्त रहेगा। लेकिन आज हिन्दुस्तान के भीतर इतने बड़े पैमाने पर ऐसी बेरहम और अलोकतांत्रिक बेदखली जो हुई है, उसके अध्ययन का वक्त यही है। आज हिन्दुस्तान में कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं होगा जहां पर बाहर से लौटकर आए हुए मजदूर न पहुंचे हों, जहां से न गुजरे हों, या जहां से मजदूर छोड़कर न आए हों। ऐसे तमाम छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों के लिए यह जिंदगी का सबसे तकलीफदेह और सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन भी हो सकता है कि वे समकालीन इतिहास दर्ज करते हुए, दर्ज करने के लिए ऐसे तमाम लोगों से मिलें, बात करें, उनके इंटरव्यू रिकॉर्ड करें। 

 

दुनिया में वे ही देश पढ़ाई-लिखाई में आगे बढ़ते हैं जो कि अपने कभी न हुए अतीत पर एक झूठा गौरव करते हुए, उसका झूठा दंभ न भरते हुए विषय की ईमानदारी पर मेहनत करते हैं, ईमानदार शोध करते हैं, ईमानदार दस्तावेजीकरण करते हैं। आज इस देश में स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालय बंद हैं। अगले कई हफ्ते या कुछ महीने बंद रह सकते हैं। अगर इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, भारतीय मजदूरों का अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, ऐसे विषयों के जानकार अपने आसपास के बड़े स्कूली बच्चों, या कॉलेज के बच्चों, या समाज के बेरोजगारों को मजदूर-त्रासदी की ऐसी कहानियां दर्ज करने में लगा सकें, तो वह इस देश की एक तकलीफदेह हकीकत का दस्तावेजीकरण होगा। और यह मौका अगर एक बार निकल जाएगा, तो दुबारा फिर आएगा भी नहीं। 

इसी तरह सोशल मीडिया, और डिजिटल मीडिया के जानकार लोगों के एक समर्पित समूह को देश भर के मीडिया से इस दौर की कहानियों को इक_ा करना चाहिए, सोशल मीडिया से जानकारी दर्ज करनी चाहिए, मजदूरों के जितने नंबर सरकारों के पास आ रहे हैं उनको इक_ा करना चाहिए ताकि आगे-पीछे उनसे फोन से बात करके भी उनके तजुर्बे को लिखा जा सके। इस देश में पढ़ाई-लिखाई वाला तबका अगर जिम्मेदार होगा, तो आज की इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराएगा। आज हिन्दुस्तान के पिछले दो सौ बरस के, या उससे भी अधिक के, गजेटियर मौजूद हैं, तो अंग्रेजों के वक्त मेहनत से किए गए दस्तावेजीकरण की वजह से हैं। आज भी इस देश में प्रशासनिक प्रशिक्षण के नाम पर छांटे गए बड़े अफसरों का जो प्रशिक्षण होता है, उसमें कमरों के भीतर के काम से हटाकर उन तमाम लोगों को सड़कों पर झोंक देना चाहिए ताकि वे कम से कम इतना तो देख और सीख सकें कि शासन-प्रशासन कैसा नहीं होना चाहिए। जो लोग इस दौर में सीखना नहीं चाहते, समकालीन इतिहास दर्ज करना नहीं चाहते, उनका सारा शिक्षण-प्रशिक्षण बकवास से अधिक कुछ नहीं रहेगा। किसी भी देश-प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था सामाजिक जिम्मेदारी और सरोकार से परे नहीं होनी चाहिए, वरना विज्ञान एक बम बनाना जानता है, उसे हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराकर तबाही करने के नुकसान नहीं जानता। आज भारतीय लोकतंत्र की विफलता को लेकर एक व्यापक अध्ययन की जरूरत है। किसी भी समस्या के समाधान की पहली सीढ़ी यह होती है कि समस्या को समस्या माना जाए। उसे मानने के बाद ही उसका विश्लेषण करके जवाबदेही देखकर, उसका समाधान ढूंढा जा सकता है, भविष्य में उससे बचने का रास्ता ढूंढा जा सकता है। 

 

हिन्दुस्तान आज जिस दौर से गुजर रहा है, अगर लोकतंत्र कामयाब रहेगा, तो दुबारा ऐसी नौबत नहीं आएगी। लेकिन लोकतंत्र कामयाब तभी रहेगा जब उसकी आज की नाकामयाबी का अच्छी तरह अध्ययन करके आगे का रास्ता तय किया जाएगा। जो लोग सरकारिया कमीशन के पहले से भारत के संघीय ढांचे में केन्द्र और राज्यों के संबंधों को लेकर फिक्र में दुबले होते आए हैं, उनके लिए केन्द्र-राज्य संबंधों के अध्ययन का इससे बड़ा कोई मौका आजाद भारत में तो नहीं आया था, और लोकतंत्र दुबारा ऐसा मौका आने भी न दें। जिन सैकड़ों लोगों ने केन्द्र-राज्य संबंधों को लेकर फर्जी और कागजी शोध किए हुए हैं, उन सबको रद्दी की टोकरी में डालते हुए आज ईमानदार शोधकर्ताओं को इस लॉकडाऊन को लेकर केन्द्र-राज्य के संबंधों, जिम्मेदारियों और अधिकारों पर नया अध्ययन करना चाहिए, और जिनकी दिलचस्पी इस या ऐसे विषय में हो, उनको भी मेहनत करने के लिए जुट जाना चाहिए। 

कुल मिलाकर बात को खत्म करते हुए हम अगर कुछ लिखें तो वह यह है कि समकालीन भारतीय इतिहास का ईमानदार और गंभीर दस्तावेजीकरण करने की जरूरत है, लोगों के बयान, उनकी त्रासदी की असल जिंदगी की कहानियां दर्ज करने की जरूरत है, आदमियों से परे औरतों से भी अलग से बात करके उसे रिकॉर्ड करने की जरूरत है क्योंकि भारतीय समाज में एक त्रासदी का आदमी पर असर अलग होता है, और औरत पर असर अलग होता है। ऐसी गरीब, मजदूर, ग्रामीण, और मजबूर महिलाओं से बात करने के लिए महिला कार्यकर्ताओं और छात्राओं के भी बहुत बड़े-बड़े जत्थों की जरूरत पड़ेगी। इस देश की सरकारों में इतिहास लेखन के लिए जो संस्थाएं हैं, जो लोग हैं, वे कभी नहीं चाहेंगे कि ऐसा कोई समकालीन इतिहास लेखन हो, लेकिन लोकतंत्र का तकाजा है कि यह हो। 

-सुनील कुमार

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