विचार / लेख

डंडे से अर्थव्यवस्था नहीं खोली जा सकती
डंडे से अर्थव्यवस्था नहीं खोली जा सकती
12-May-2020

डंडे से अर्थव्यवस्था नहीं खोली जा सकती

-नवीन अग्रवाल
इतने लंबे लॉकडाउन में जो सबसे बड़ी समस्या उभरकर आई है वो है प्रवासी मजदूरों की घर वापसी। इतने बड़े पैमाने पर और इस तरह घर वापिसी की कल्पना किसी भी सरकार ने नहीं की होगी, केंद्र सरकार हो, राज्य सरकार हो या उद्योगपाति हो मजदूर को रोकने में सभी विफल हो गए। घर वापिसी के दौरान मजदूरों से जैसा बर्ताव हो रहा है, जैसा कष्ट वो सह रहे हैं, लगता नहीं कि आसानी से फैक्टरियां चालू हो जाएगी। 

सरकार को लगा कि तुरंत लॉक डाउन नहीं किया गया तो न जाने क्या हो जाएगा और आनन-फानन में सब कुछ बंद कर दिया गया। सरकार ने ये नहीं सोचा कि अचानक देश बंद करने का क्या परिणाम होगा। कोरोना पीडि़तों की संख्या जरूर नियंत्रित हो गई, लेकिन भय का वातावरण निर्मित हो गया, इस वातावरण में कोई भी हो अपने घर तो जाना ही चाहेगा , खासतौर पर प्रवासी मजदूर जो रोज कमाता-खाता है वो कैसे रुक सकता है, एक तरफ महामारी का भय दूसरी तरफ भूखे मरने का भय।  ऐसे में सरकार ने तुरंत  भेजने का निर्णय नहीं लिया  तो स्वाभाविक तौर पर मजदूरों का सरकार से विश्वास उठ गया, और वे पैदल निकल पड़े। समझ में नहीं आता इन सरकारों की इंसानियत कहाँ गई, या इंसानियत इनमें है ही नहीं। छोटे-छोटे बच्चों को सैकड़ों किलोमीटर भूखे-प्यासे नंगे पांव चलते देखकर भी किसी का दिल न पसीजे तो उसके लिए संवेदनहीन और बेरहम शब्द भी छोटा है।

ये विश्वास का संकट तो सरकार ने ही पैदा किया है, पुलिस ने जगह-जगह परेशान करके उनका सफर और कठिन कर दिया । एक तो ट्रेन चलाने में इतनी देर कर दी, ऊपर से प्रक्रिया मजदूरों की समझ के बाहर, उसके बाद पैसे को लेकर खींचातानी। क्या हमारी सरकारें और रेलवे विभाग इतना सक्षम नहीं है कि इस संकट के दौर में निशुल्क ट्रेन चला दे और मजदूरों को जाने दे। सरकार रोकने में तो फेल हो ही गई अब घर पहुंचाने में भी फेल हो गई। ऐसा लगता है रेलवे विभाग इस दौर में भी पैसा कमाना चाहता है। एक तरफ कॉर्पोरेट घराने केयर फण्ड में पैसा दे रहे हैं , वहीं रेलवे विभाग निर्दयता दिखा रहा है। इस समय किसी भी मजदूर का पैसा मांगना, संवेदनहीनता ही कहा जाएगा।

यहाँ ये भी सोचना चाहिए कि रेलवे विभाग क्या निजी संस्थान है, है तो सरकारी उपक्रम ही न, उसका यदि घाटा हो जाए तो क्या वह अपनी प्रॉपर्टी बेचकर भरता है, आखिर ये घाटा तो सरकार ही पूरा करती है न, अर्थात टैक्सपेयर्स के पैसे से ही चलती है न ,  तो फिर ये कहाँ की कॉर्पोरेट सोच ले आया रेलवे विभाग। कॉरपोरेट घराने भी सोशल रेस्पॉसबिलिटी के तहत कई सामाजिक कार्य करते है, खाली जेब मजदूर को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझ कर ही निशुल्क पहुँचा दीजिये, आज तो ऐसा लगता है सरकार व्यापारी हो गई है, और उसका एक विभाग इसमें कमाई के अवसर खोज रहा है।

एक मुख्यमंत्री आदेश करता है कि छत्तीसगढ़ के अंदर से गुजरते हुए मजदूर को ससम्मान प्रदेश की सीमा तक पहुंचाया जाए हालांकि इस आदेश का भी पूरी तरह पालन नहीं हो रहा है, फिर भी इस तरह का फैसला सभी मुख्यमंत्री कर लें तो ट्रेन की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। कहाँ सरकार हवाई चप्पल वालों को हवाई जहाज में बैठाने का सपना देखती थी, उसका सपना टूटा तो मजदूर के पैर में हवाई चप्पल भी नहीं थी और वो पैदल चलकर रास्ता तय कर रहा था।

अभी समय सरकार का है, मजदूर कुछ बोल नहीं सकते। अभी तो उसे घर जाना है, मरते-कटते ये दौर भी कट जाएगा। लेकिन याद रखना ये आप बहुत ही बुरा कर रहे हैं इनके बिना आप अर्थव्यवस्था को खोल नहीं पाएंगे। डंडे से सिर्फ दहशत पैदा की जा सकती है, अर्थव्यवस्था नहीं खोली जा सकती।

अन्य खबरें

Comments