विचार / लेख

मजदूरों का मौत का सफर : डॉ. संजय शुक्ला
मजदूरों का मौत का सफर : डॉ. संजय शुक्ला
16-May-2020

मजदूरों का मौत का सफर : डॉ. संजय शुक्ला

कोरोना संक्रमण के रोकथाम के लिए देश में जारी लॉकडाउन के बीच विभिन्न महानगरों एवं शहरों में फंसे प्रवासी मजदूरों का घरों की ओर जारी पैदल मार्च अब मौत के सफर में तब्दील होने लगा है। सडक़ों, रेल पटरियों में हो रहे हादसों के कारण लगातार प्रवासी मजदूरों की मौत हो रही है। ताजा खबर उत्तरप्रदेश के औरैया से है जहाँ बिहार-झारखंड के मजदूरों से भरे ट्रक के दूसरे ट्रक से हुए टक्कर होने के कारण 24 मजदूरों की मौत हो गई वहीं इस हादसे में घायल 15 मजदूर अस्पताल में जिंदगी और मौत का जंग लड़ रहे हैं। प्रवासी मजदूरों के घरों की ओर सडक़ों, रेल पटरियों, जंगलों और नदियों के बरास्ते पैदल वापसी के दौरान हादसों में मौत और घायल होने की सिलसिला बदस्तूर जारी है। बीते 8 मई को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मालगाड़ी के चपेट में आने पर 16 मजदूरों की दर्दनाक मौत हो गई थी। ये मजदूर पैदल रेल पटरी के किनारे-किनारे मध्यप्रदेश के शहडोल वापसी कर रहे थे, थकान से चूर होकर वे पटरियों पर गहरी नींद में सो गए थे।

मध्यप्रदेश के ही गुना जिले में 9 तथा नरसिंहपुर में 5 मजदूरों की मौत सडक़ हादसे में हुई है, इसी प्रकार उत्तरप्रदेश में सायकल से वापसी कर रहे छत्तीसगढ़ के मजदूर दंपत्ति की मौत वाहन के चपेट में आने पर हो गई वहीं मुजफ्फरनगर में 6, गुडग़ांव में 5 तथा तेलंगाना में 6 प्रवासी मजदूरों की मौत अनियंत्रित वाहनों के चपेट में आने से हुई है। बहरहाल प्रवासी मजदूरों के पैदल वापसी के दौरान सडक़ हादसों, थकान और अन्य बीमारियों के कारण मौत का सिलसिला लगातार जारी है। ऐसी दर्दनाक हादसों में मर्माहत करने वाली खबर छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले की थी जिसमें तेलंगाना से पैदल वापसी के दौरान एक आदिवासी दंपत्ति के 12 साल की नाबालिक बेटी जमलो मडकामी की मौत पैदल चलने के कारण थकान और डिहाइड्रेशन से हो गई। देश में सक्रिय सेव लाइफ फाउंडेशन के आंकड़ों के मुताबिक लॉकडाउन के शुरुआती दौर से लेकर 15 मई तक देश में कुल 1176 सडक़ हादसे हुए हैं जिसमें 321 लोगों की मौत हुई है जिसमें 111 प्रवासी मजदूर थे वहीं  530 घायलों में से 384 मजदूर हैं।

बहरहाल इन आंकड़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मजदूरों की मौत कोरोना से ज्यादा बेबसी भरे पैदल मार्च के दौरान अनेक हादसों में हो रही है।

इस बीच महाराष्ट्र के औरंगाबाद में रेल हादसे में प्रवासी मजदूरों के मौत के मद्देनजर मजदूरों के पैदल वापसी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर कोर्ट ने प्रवासी मजदूरों के पैदल वापसी पर रोक लगाने के लिए इंकार करते हुए तंज कसा है कि कोई रेल की पटरियों पर सोएगा तो उसे कोई कैसे रोक पाएगा। बहरहाल प्रवासी मजदूरों के बेबसी और हादसों में होने वाले मौतों पर मजदूरों के प्रति संवेदनाशून्यता भरी प्रतिक्रिया सोशल मीडिया में लगातार दिखाई दे रहा है। पैदल हादसों में मजदूरों के मौत पर सोशल मीडिया यूजर्स इसे मजदूरों के धैर्य खोने का परिणाम बता रहे हैं।

कुछ यूजर्स ने रेल हादसे में मारे गए मजदूरों को शराब के नशे में धूत होकर पटरी पर लेटने का अपराधी बता दिया तो कुछ ने इसे साजिश बताते हुए सामूहिक आत्महत्या करार दे दिया। कतिपय यूजर्स ने यह भी नसीहत दे डाली कि जानवरों को भी पता है कि पटरियों पर नहीं चलना है तब मजदूर इतना नासमझ कैसे हो गए?

इन प्रतिक्रियाओं के परिप्रेक्ष्य में शायद ऐसी नसीहत देने वालों को मजदूरों के पेट में रोटी और हाथ से रोजी छीन जाने के असहनीय वेदना का अंदाजा नहीं है। बहरहाल यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कोरोना काल में सबसे ज्यादा मजदूर वर्ग ही छला जा रहा है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच समन्वय का आभाव और राजनीतिक दलों के बीच जारी सियासी घमासान के बीच मजबूर प्रवासी मजदूरों के सकुशल घर वापसी का अब तक कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हो पाया है फलस्वरूप मजदूर जेठ की भरी दुपहरी और तपती सडक़ों व बेमौसम बारिश के बीच सैकड़ों-हजारों किलोमीटर का रास्ता पैदल या सायकल के ही सहारे नापने के लिए विवश होना पड़ रहा है। भूखे-प्यासे और थकान से बेहाल मजदूरों के इस पैदल कारवां में बुजुर्ग और छोटे बच्चे जवानों के कंधे पर है तो गर्भवती महिलाएं गोद में बच्चे उठाए मीलों पैदल चल रहे हैं। अनेक गर्भवती महिलाओं के पैदल मार्च के दौरान प्रसव की खबरें भी मीडिया में हैं। विडंबना यह कि सैकड़ों मील पैदल चलने अथवा पुलिस द्वारा खदेड़े जाने के कारण मजदूरों के चप्पल-जूते घिस जाने, टूट जाने या छूट जाने के कारण मजदूरों को नंगे पांव ही सडक़ नापने के लिए विवश होना पड़ रहा है। धधकती सडक़ों पर नंगे पांव चलने के लिए मजबूर इन मजदूरों ने पानी की बोतलों को पैरों में बांधकर चप्पल बना लिया है। गौरतलब है कि मजदूरों के पांव के छाले का असहनीय दर्द उनके पेट की आग और बेबसी के आगे सहनशील हो चुका है। गौरतलब है कि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इन पैदल मजदूरों की बेबसी और त्रासदी दायक खबरों को दिन-रात प्रसारित कर अपने टीआरपी की भूख भले ही शांत कर ली हो लेकिन भूखे-प्यासे मजदूरों की अंतहीन संघर्षयात्रा अब भी जारी है। बहरहाल प्रवासी मजदूरों के पैदल वापसी का यह मंजर 1947 के देश की आजादी के बाद की पलायन और त्रासदी की याद ताजा कर रही है।

विडंबना है कि लॉकडाउन के बाद प्रधानमंत्री और राज्य सरकारों के तमाम आश्वासनों, दावों और राहत योजनाओं के बावजूद देश के महानगरों और शहरों के आर्थिक विकास और सूरत बदलने वाले मजदूरों को दो वक्त की रोटी और दैनंदिन खर्चों के लिए चंद रूपयों का भरोसा दिलाने में नाकाम रही। दु:खद यह कि इन मजबूर और भविष्य के प्रति आशंकित मजदूरों के सकुशल वापसी पर भी सरकारों ने वैसी संवेदनशीलता और तत्परता नहीं दिखाई जैसे उन्होंने विदेशों में फंसे भारतीयों और देश के विभिन्न शहरों के पांच सितारा कोचिंग संस्थानों में फंसे अभिजात्य वर्गों के बच्चों के वापसी में दिखलाई। जब मजदूरों का सब्र का बांध टूट गया और सडक़ों पर उनका सैलाब उमड़ा तब जाकर देश के नीति-नियंताओं को मजदूरों की मजबूरी दिखाई दी और सरकारों ने प्रवासी मजदूरों के घर वापसी के लिए विशेष रेल गाडिय़ों के परिचालन का निर्णय लिया लेकिन तब तक दर्जनों मजदूरों की बलि चढ़ चुकी थी। बहरहाल राज्य सरकारों के तमाम दावों के बावजूद अभी मजदूरों की सुरक्षित वापसी संभव नहीं हो सकी है और सडक़ों पर भूखे-प्यासे पैदल मजदूरों का अंतहीन कारवां अभी भी दिखाई दे रहा है। यह भीड़ यह भी प्रश्न पैदा कर रहा है कि क्या मजदूरों का सरकार और प्रशासन पर एतबार खत्म हो चुका है?

दरअसल इसके पृष्ठभूमि में हमारे देश के राजनेताओं में आपदा और विपरीत परिस्थितियों में भी सियासत को परे नहीं रखने की मनोवृत्ति है। मजदूरों के घर वापसी के लिए श्रमिक स्पेशल रेलगाडिय़ों के परिचालन में केंद्र और राज्य सरकारों का अंतर्विरोध और सियासत भी नजर आ रहा है। एक तरफ देश के रेलमंत्री विपक्ष शासित राज्य सरकारों पर आवश्यकता और उपलब्धता अनुसार विशेष ट्रेनों की मांग नहीं करने का आरोप लगा रहे हैं तो वहीं ये राज्य सरकारें केंद्र सरकार और रेल मंत्रालय पर उनके प्रस्ताव के अनुसार ट्रेनें उपलब्ध नहीं कराने और असहयोग का आरोप लगा रही हैं। दूसरी ओर राज्य सरकारों द्वारा की जा रही विशेष रेल गाडिय़ों की समुचित सूचना के आभाव और आनलाइन पंजीयन की अव्यवहारिक व्यवस्था के कारण भी मजदूरों को पैदल घर वापसी के लिए विवश होना पड़ रहा है।

बहरहाल मजदूरों के साथ बीत रही त्रासदी के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच समन्वय का आभाव और बीते दिनों में प्रवासी मजदूरों के सकुशल घर वापसी के लिए प्रभावी कार्ययोजना तैयार नहीं होना ही प्रमुख कारण है मजदूरों के पैदल मार्च के पृष्ठभूमि में सरकार और प्रशासन से राहत व रास्ता की उम्मीद खत्म होने और लॉकडाउन की अनिश्चितता, कारखानों और निर्माण कार्यों में तालाबंदी, नियोजकों द्वारा आवास खाली कराए जाने के साथ अपने और परिजनों के दो वक्त के रोटी की चिंता और आर्थिक तंगी प्रमुख मजबूरी रही है। विचारणीय है कि हर पेट को भोजन और हर हाथ को काम जैसे सरकारी नारों के बावजूद देश के ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी और भूखमरी की समस्या विकट है जिसके कारण गांवों का एक बड़ा तबका रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन के लिए मजबूर है। कोरोना काल की त्रासदी के चलते भले ही घरों की ओर वापसी करने वाले मजदूर दोबारा पलायन से तौबा कर रहे हैं लेकिन अपने वचनों पर वे कितना अडिग रहेंगे इसका अंदाजा इस त्रासदी के बाद ही लगेगा।

दरअसल ग्रामीण गरीब परिवारों की बढ़ती जनसंख्या, सीमित खेती की जमीन, सूखा-बाढ़, अन्य आपदाओं, रोजगार के सीमित संसाधनों और परिवार की बढ़ती जरूरतों के कारण इन परिवारों के लिए पलायन एक अनिवार्य मजबूरी बनते जा रही है। विचारणीय है कि कोरोना त्रासदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व नुकसान पहुंचाया है जिसका दुष्परिणाम मजदूरों के रोजगार पर पडऩा अवश्यंभावी है। इन परिस्थितियों में सरकार से अपेक्षा है कि इन श्रमवीरों के बेहतर और सुरक्षित भविष्य के लिए लागू किए जाने वाले आर्थिक पैकेज और रोजगार योजनाओं की सुगम पहुँच इन मजदूरों तक सुनिश्चित किया जावे ताकि इनके पांव के छालों पर राहत भरा मरहम लग सके।

(लेखक शासकीय आयुर्वेद कालेज रायपुर में सहायक प्राध्यापक हैं।)

 

 

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