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वेबक्लूजिव :  आर्थिक पैकेज में राहत की तलाश
वेबक्लूजिव : आर्थिक पैकेज में राहत की तलाश
18-May-2020

वेबक्लूजिव : 
आर्थिक पैकेज में राहत की तलाश

-राजू पाण्डेय

प्रधानमंत्री ने जब राष्ट्र को 12 मई को संबोधित किया तब उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं एकदम स्पष्ट कर दी थीं। अपनी घर वापसी के लिए व्याकुल लाखों मजदूरों की अंतहीन व्यथा का कोई उल्लेख प्रधानमंत्री के भाषण में नहीं था। पहले से ही बदहाली की मार झेल रहे और अब भुखमरी की ओर अग्रसर किसानों की पीड़ा भी प्रधानमंत्री को जिक्र करने के काबिल नहीं लगी। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि इस विपत्ति काल जब में सहानुभूति और संवेदना राष्ट्र के प्रशासन के संचालन के आधारभूत तत्व होने चाहिए तब हम एक ऐसे प्रजातंत्र को रूपाकार लेते देख रहे हैं जिसमें कष्ट सहना प्रजा का आधारभूत गुण माना जा रहा है। 

प्रधानमंत्री देश की गरीब जनता के त्याग का जिक्र करना नहीं भूले। उनकी भाषा और भाव भंगिमा शोषण को चिरकालिक बनाए रखने के लिए अत्यंत कुशलतापूर्वक गढ़े गए धर्म के विमर्श से आयातित लगती है। पौराणिक देवता अपने भक्तों की कठिन परीक्षा लेते थे और इस दौरान उन्हें अभावों और कष्टों में धकेल देते थे। वे उन्हें मानसिक दासता के उस बिंदु तक पहुंचा देते थे जब भक्त यह मान बैठते थे कि उनका आराध्य ही उनके हित अनहित और अस्तित्व का निर्धारक होगा। विवेक शून्यता, चरम समर्पण के पर्याय के रूप में प्रस्तुत की जाती थी। धैर्य और आस्था की कमी देवता की कृपा से वंचित कर देती है। जैसा सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा भी कि सरकार मजदूरों की घर वापसी के लिए ट्रेनें चला तो रही है। अब यदि कोई व्यक्ति सरकार पर विश्वास नहीं करता और अधीर होकर घर के लिए पैदल ही निकल पड़ता है तो इसमें सरकार क्या कर सकती है और फिर वह जब थक कर पटरियों पर सो जाता है तब तो उसे उसकी जानलेवा भूल की सजा मिलेगी ही। यह तर्क अचंभित करने की सीमा तक अमानवीय था किन्तु सबसे बड़ा आश्चर्य अभी आना शेष था-  माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी इस तर्क से सहमत हुआ। अपना रोजगार और रहने का आश्रय गंवा बैठे दाने दाने को मोहताज मजदूर इस भीषण गर्मी में लू, भोजन और पानी की कमी, कोरोना संक्रमण एवं दुर्घटनाओं के फलस्वरूप यदि मारे जा रहे हैं तो इसका केवल एक ही कारण है- वे अविवेकी एवं धैर्यहीन हैं और इसीलिए शासक की कृपा नहीं कोप उनके भाग्य में लिखा है।

जब भविष्य में आज के समय का इतिहास लिखा जाएगा तब यह तय करना कठिन न हो जाए कि वैश्विक महामारी कोरोना अधिक विनाशक थी या इस महामारी के प्रति प्रतिक्रिया में सरकार के आम जन विरोधी निर्णयों के कारण उत्पन्न राज्य निर्मित आपदा अधिक भयंकर थी। कहीं यह काल इतिहास में मानवीय करुणा के स्थान पर अमानवीय क्रूरता के लिए तो स्मरण नहीं किया जाएगा। 

प्रधानमंत्री अपने भाषण के दौरान निश्चिंत और आनंदित लगे। कोई आश्चर्य नहीं कि भाषण के कुछ हिस्सों में वे मुस्कराए भी होंगे और बाद में लोकापवाद के भय से उन हिस्सों को पुन: रिकॉर्ड करना पड़ा होगा। सचमुच कोरोना ने इतना बड़ा अवसर प्रधानमंत्री जी को उपलब्ध करा दिया है जब वे कॉरपोरेट हितों के लिए खुल कर काम कर सकते हैं, अंधाधुंध निजीकरण को बढ़ावा दे सकते हैं, रक्षा जैसे क्षेत्र को विदेशी कंपनियों के लिए खोल सकते हैं, पीएसयूज को निजी हाथों में सौंप सकते हैं, श्रम कानूनों से मनचाहा खिलवाड़ कर सकते हैं और अमेरिका आदि देशों से अपना कारोबार समेटने के लिए मजबूर हो रहे अपने प्रबल समर्थक अनिवासी भारतीयों को केंद्रीय भूमिका प्रदान कर सकते हैं। 

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में लोकल उत्पादों की महत्ता का जिक्र किया। उनके कुछ उत्साही समर्थक इसे गांधी के स्वदेशी आंदोलन के समतुल्य आह्वान का दर्जा दे रहे हैं। प्रधानमंत्री जी और संघ प्रमुख ने उत्तर कोरोना भारत को आत्मनिर्भर बनाने की चर्चा अवश्य की है। यह भी कहा है कि हमें ऐसा जतन करना होगा कि हर गांव आत्मनिर्भर हो, हर शहर और हर राज्य आत्मनिर्भर हो। किन्तु ग्राम स्वराज्य की अवधारणा के जनक महात्मा गांधी का नाम लेने से उन्होंने परहेज किया है। इसके दो कारण हो सकते हैं। 

प्रथमत: प्रधानमंत्री जैसे मौलिक चिंतक अपनी क्रांतिकारी योजनाओं के लिए अन्य  किसी महापुरुष से आईडिया उधार लें यह उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं है भले ही वह विभूति महात्मा गांधी ही क्यों न हों। 

द्वितीयत: मोदी जी का आत्मनिर्भर भारत गांधी जी के स्वावलंबी ग्राम प्रधान भारत से बिल्कुल भिन्न है। यह भारत विश्व भर के पूंजीपतियों को खुला निमंत्रण दे रहा है कि वे यहां आएं और हमारे प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों का मनमाना दोहन करते हुए अंतहीन मुनाफे की चाह में अपने उत्पाद यहीं तैयार करें एवं हमें विनष्ट पर्यावरण में निवास करने वाली गरीब जनता उपहार में दे जाएं। यह उत्पाद उपभोक्ता संस्कृति की तमाम कृत्रिम और गैर जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक होंगे और भारत के आम नागरिक के लिए इनका प्रभाव हमेशा की तरह विनाशक होगा। यह भी संभव है कि कुछ विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियां देशी पूंजीपतियों के साथ गठबंधन कर लें और हमें यह मानने को विवश किया जाए कि उनके उत्पादों से अब भारत की मिट्टी की सुगंध आने लगी है। यदि प्रधानमंत्री जी सचमुच लोकल को सचमुच ग्लोबल बनाने में कामयाब हो भी जाते हैं तो भी इसका अर्थ यह होगा कि भारत वैश्विक शोषण तंत्र में शोषित से शोषक का, शिकार से शिकारी का दर्जा प्राप्त कर लेगा। 

महात्मा गांधी वह अंतिम व्यक्ति होते जो नव उपनिवेशवादी तथा नव साम्राज्यवादी युद्ध प्रिय भारत को स्वीकार कर पाते। गांधी संभवत: इस सत्य तक पहुंच गए थे कि विश्व के महाशक्तिशाली शोषक देशों का मेहनतकश आम आदमी वैसा ही दमित और शोषित रहता है जैसे इन देशों के शोषण के शिकार देशों का कोई मजदूर। बहरहाल नवउपनिवेशवाद शोषित को इस तरह प्रशिक्षित कर देता है कि वह स्वयं को शोषित मानने से इनकार कर देता है और छोटी-छोटी परितुष्टियों की भूल भुलैया में उलझकर हमेशा इस मिथ्या विश्वास से ग्रस्त रहता है कि यह व्यवस्था उसे नौकर से मालिक बनाने की असीमित संभावनाएं स्वयं में समेटे है। 

हम अपने देश में ही देख रहे हैं कि किस प्रकार संकीर्ण राष्ट्रवाद, बहुसंख्यकवाद आदि का प्रयोग कर जन आक्रोश को वास्तविक शत्रुओं से कृत्रिम शत्रुओं की ओर स्थानांतरित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री जी इस रणनीति के एक सिद्धहस्त और अनूठे जानकार हैं। हो सकता है कि सरकार कोरोना से उत्पन्न अफरातफरी का फायदा उठाकर अपने कॉरपोरेट एजेंडे के क्रियान्वयन में कुछ हड़बड़ी करे और उसे थोड़े बहुत जन प्रतिरोध का सामना करना पड़े। तब अवश्य उसे गांधी को सामने लाना होगा। आखिर गांधी विश्व के एकमात्र ऐसे महापुरुष हैं जिन्हें आवरण के रूप में प्रयुक्त कर सर्वाधिक ऐसी गतिविधियां की गई हैं जो उनके ही सिद्धांतों और आदर्शों के सर्वथा विपरीत थीं।

आवरण तो वैश्विक महामारी कोविड-19 का भी था जिसकी ओट में प्रधानमंत्री अपने मन की बात कर रहे थे। इसलिए उन्होंने फरवरी 2020 में प्रस्तुत अपनी सरकार के बजट की पुनर्प्रस्तुति को कोरोना आर्थिक पैकेज का नाम दिया। आदरणीया वित्त मंत्री लाल सिल्क के कपड़े में लपेटकर बजट प्रस्तुत करने का नया प्रयोग पहले ही कर चुकी थीं। अब बजट की इस पुनर्प्रस्तुति के लिए कोरोना राहत पैकेज का आवरण ही शायद फिट बैठता था। 

यह आर्थिक पैकेज दर दर की ठोकरें खा रहे मजदूरों और अपना सर्वस्व गंवा चुके किसानों के साथ एक कू्रर और भद्दा मजाक कहा जा सकता है। लेकिन इतने से ही सरकार को संतोष नहीं हुआ। इस कथित राहत पैकेज की विशेषताओं की धारावाहिक प्रस्तुति का निर्लज्ज प्रहसन भी लगातार आयोजित किया जा रहा है। सरकार समर्थक मीडिया अपने कला कौशल से भूख से मर रहे लोगों को यह विश्वास दिलाने में लगा है कि सरकार उनके लिए बहुत चिंतित है। जबकि वित्त मंत्री खुद बड़ी साफगोई से कह रही हैं कि सरकार भूख से मर रहे लोगों की मदद बहुत जरूरत पडऩे पर करेगी। 

वित्त मंत्री के अनुसार इस पैकेज का केंद्रीय भाव लोगों को आत्मनिर्भर बनाना है। यह लोगों को मुफ्त राशन और आर्थिक मदद की आदी बनाने वाली सरकार नहीं है। सरकार लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती है। वह सिर्फ उनकी मदद (उधार के रूप में, नकद सहायता के रूप में नहीं) करेगी। 

सरकार के आर्थिक पैकेज के आकलन के लिए हमें कुछ बुनियादी मापदंड तय करने होंगे। क्या यह पैकेज आकस्मिक रूप से लागू किए गए और अप्रत्याशित रूप से लंबे लॉक डाउन के कारण किसानों और मजदूरों को हुए नुकसान की भरपाई करने में सक्षम है? क्या इसमें घर वापसी के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाकर सड़कों पर भटकते मजदूरों को सुरक्षित घर तक पहुंचाने के लिए प्रावधान किया गया है? क्या इस पैकेज में हर निर्धन व्यक्ति के लिए पर्याप्त राशन और आवश्यक धन मुहैया कराने का प्रबंध है? क्या इसमें उन किसानों और दुग्ध उत्पादकों के लिए मुआवजे की व्यवस्था की गई है जिनके उत्पाद (फल, सब्जी, अनाज, दूध) आदि लॉक डाउन के कारण बाजार तक नहीं पहुंच पाए और नष्ट हो गए? क्या इस पैकेज में जो प्रावधान किए गए हैं उनके लिए फरवरी 2020 में पेश किए गए बजट के अलावा अलग से अतिरिक्त धन उपलब्ध कराया गया है? 

पैकेज 20 लाख करोड़ का बताया गया है। इस धन राशि में से कितना खर्च सरकार सीधे सीधे स्वयं अपने खाते से वहन करेगी? इस बीस लाख करोड़ रूपए में से कितनी राशि प्रत्यक्ष रूप से लॉक डाउन प्रभावित निर्धन की जेब तक पहुंचेगी? इस पैकेज में की गई कितनी घोषणाएं दीर्घकालिक और नीति निर्धारण से संबंध रखती हैं? कितनी घोषणाएं ऐसी हैं जो इस आपात स्थिति में तात्कालिक राहत दे सकती हैं? क्या इस पैकेज में की गई घोषणाओं के क्रियान्वयन के लिए कोई समय सीमा निर्धारित की गई है?

ज्यां द्रेज और योगेंद्र यादव जैसे विश्लेषकों ने सरकार के आर्थिक पैकेज के विश्लेषण द्वारा सिद्ध किया है कि यह पैकेज वास्तविक राहत देने से अधिक आंकड़ों के सजावटी प्रस्तुतिकरण पर आधारित है।

वित्त मंत्री ने पहले ही 26 मार्च को एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए की राहतों की घोषणा कर दी थी जो इस 20 लाख करोड़ के  पैकेज का एक हिस्सा हैं। इन राहतों में पीडीएस के जरिए 3 माह तक अतिरिक्त 5 किलो अनाज और 1 किलो दाल देने का प्रावधान किया गया था, इस पर आने वाला कुल 45000 करोड़ का खर्च सरकार को वहन करना है। मनरेगा की मजदूरी में होने वाली वार्षिक वृद्धि को भी वित्त मंत्री ने कोविड राहत पैकेज का एक हिस्सा बना दिया। यद्यपि इसके लिए नोटिफिकेशन 23 मार्च को जारी कर दिया गया था। इस मद में व्यय 5600 करोड़ रुपए है जो सरकार स्वयं उठाएगी। वित्त मंत्री ने उज्ज्वला योजना के तहत 3 माह तक एलपीजी सिलिंडर मुफ्त देने की घोषणा की एवं इसके लिए 13000 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया। यह खर्च भी सीधे सरकार ही वहन करेगी। यद्यपि लॉक डाउन की बाधाओं के बीच कितने लोगों तक यह मुफ्त सिलिंडर पहुंचा है इसका आकलन होना अभी शेष है। वित्त मंत्री ने दिव्यांगों, विधवाओं और वृद्धों को 1000 रुपए की एक्सग्रेशिया राशि देने की घोषणा की। यह 3000 करोड़ की रकम भी स्वयं सरकार ही व्यय करेगी। 

वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार जनधन खातों में 500 रुपए की राशि जमा करेगी और इसके लिए 10000 करोड़ का प्रावधान किया। 26 मार्च को वित्त मंत्री ने घोषणा की कि लॉक डाउन पीरियड हेतु छोटी कंपनियों के कर्मचारियों के ईपीएफ की राशि का कर्मचारियों एवं कंपनियों दोनों द्वारा दिया जाने वाला अंशदान सरकार खुद वहन करेगी और इसके लिए 2500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। पुन: 13 मई से 17 मई के दौरान हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार ने कहा कि वह यह अंशदान अगले 2 माह तक जारी रखेगी और इसके लिए पुन: 2500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। सरकार ने यह भी घोषणा की कि वह प्रवासी मजदूरों को 5 किलो अनाज और 1 किलो दाल देगी। इसके लिए 3500 करोड़ रुपए का प्रावधान है। 

योगेंद्र यादव जैसे विशेषज्ञों के अनुसार यह घोषणा अमूर्त है क्योंकि इसमें प्रवासी मजदूरों पर स्वयं को प्रवासी सिद्ध करने का उत्तरदायित्व रहेगा और इन तक राशन पहुंचाने के लिए कोई मैकेनिज्म भी नहीं है। लॉक डाउन के पहले 50 दिनों में तो इस संबंध में कुछ किया नहीं गया। जबकि ज्यां द्रेज जैसे अर्थशास्त्री पीडीएस को 6 माह के लिए यूनिवर्सलाइज करने की बात प्रारंभ से कर रहे हैं। सरकार अभी उन ग्रामीण लोगों के विषय में मौन है जिनके पास राशन कार्ड नहीं हैं।  बहरहाल यदि यह 3500 करोड़ खर्च होते हैं तो यह खर्च विशुद्ध रूप से सरकार को ही करना होगा। 

सरकार 50000 रुपये से कम का अर्थात शिशु लोन लेने वाले लोगों से लिए जाने वाले ब्याज की दर में 2 प्रतिशत की कटौती करेगी। इसके लिए 1500 करोड़ रुपए का प्रावधान है जो सीधे सरकार का खर्च है। सरकार ने 17 मई को मनरेगा के लिए अतिरिक्त 40000 करोड़ रुपए का आबंटन किया जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मिल सके। यह एक अच्छा कदम है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए। सरकार ने वाएबलिटी गैप फंडिंग के लिए 8100 करोड़ रुपए का फण्ड दिया है। यह खर्च भी सरकार के खाते में ही जाएगा।

वित्त मंत्री ने बताया कि सरकार एमएसएमई सेक्टर की सहायता के लिए 50000 करोड़ रुपए का फण्ड ऑफ फंड्स बनाएगी इसमें सरकार का योगदान 10 हजार करोड़ रुपए का ही होगा। वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि सरकार ऐसी कंपनियों की सहायता करेगी जो ऋण देती तो हैं किंतु जिनकी स्थिति अच्छी नहीं है। इस हेतु 20000 करोड़ का प्रावधान किया गया है किंतु इसमें सरकार का खर्च केवल 4000 करोड़ का है। सरकार ने एनबीएफसी(गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां) को सहायता देने के लिए 45000 करोड़ का फण्ड स्थापित किया है किंतु इसमें सरकार का योगदान 9000 करोड़ रुपये का ही होगा। सरकार ने यह भी कहा कि वह वर्तमान में टीडीएस नहीं लेगी किन्तु यह बाद में आगामी मार्च के महीने में लिया जाएगा। इस हेतु 50000 करोड़ का आबंटन है। टीडीएस की राशि अंतत: सरकार लेगी ही, केवल फौरी राहत दी गई है। सरकार ने यह घोषणा भी की है कि उन एमएसएमई को जिनकी स्थिति अच्छी है और जिन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया है, सरकार बिना कोलैटरल के लोन देगी और इसके लिए 3 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इस घोषणा के क्रियान्वयन में सरकार का तत्काल कोई खर्च नहीं होगा। सरकार ने राज्यों के खस्ताहाल इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड्स की सहायता करने का निर्णय किया है। इसके लिए सरकार की पीएसयूज बांड जारी करेंगी और इस प्रकार जनता से जो धन एकत्रित होगा वह इन घाटे में चल रहे इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड्स को लोन के रूप में दिया जाएगा। इस लोन की गारंटी राज्य सरकारों को लेनी होगी। यह राशि भी 90000 करोड़ रुपए की है और आश्चर्यजनक रूप से पैकेज का हिस्सा है।  

सरकार ने क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी स्कीम के लिए 70000 करोड़ का प्रावधान किया है किंतु इसमें भी सरकार का अपना वास्तविक खर्च 5000 करोड़ अनुमानित है। सरकार ने स्ट्रीट वेंडर्स के लिए 5000 करोड़ की लोन स्कीम प्रस्तावित की है किंतु इसमें भी सरकार का अपना कोई व्यय नहीं है। बैंकिंग सिस्टम इन स्ट्रीट वेंडर्स के साथ कैसा व्यवहार करेगा यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा। सरकार ने फरवरी के बजट की अपनी दो घोषणाओं को दुहराया है। एक तो यह कि नाबार्ड ग्रामीण बैंकों को तीस हजार करोड़ का ऋण देगा ताकि ये किसानों को लोन दे सकें। नाबार्ड बांड जारी कर जनता से धन एकत्रित करता है और इसमें सरकार को कुछ भी खर्च नहीं करना है। दूसरे सरकार ने किसान सम्मान निधि पाने वाले उन किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड का लाभ देने का निर्णय किया है जो अब तक यह लाभ पाने से वंचित रहे थे। इस प्रकार कुल 2 लाख करोड़ का खर्च प्रस्तावित है। इसमें भी तत्काल सरकार को कुछ नहीं देना है। वैसे भी सूदखोरों से कर्ज लेने वाले करोड़ों किसान बैंकिंग सिस्टम से अब भी दूर हैं।  

वित्त मंत्री ने फरवरी के बजट की कुछ घोषणाओं को यथावत दुहराया और इन्हें पैकेज का एक भाग बताया- आपरेशन ग्रीन (500 करोड़) हनी बी कीपिंग (500 करोड़) पशुओं के रोगों के टीकाकरण हेतु 13343 करोड़ का प्रावधान, मत्स्य संपदा के प्रोत्साहन हेतु 20000 करोड़ का फण्ड, इसी प्रकार की घोषणाएं हैं। वित्त मंत्री ने स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा कि इन योजनाओं के लिए बजटीय आबंटन के अतिरिक्त कोई आबंटन किया गया है। वित्त मंत्री ने कुछ नई घोषणाएं भी कीं- हर्बल कल्टीवेशन के लिए 4000 करोड़ और माइक्रो फ़ूड इंटरप्राइज हेतु 10000 हजार करोड़ का आबंटन वित्त मंत्री ने दिया।
 
एनिमल हसबेंडरी के इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 15000 करोड़ का फण्ड नाबार्ड प्रदान करेगा जो मार्केट के जरिए बांड के माध्यम से जनता से एकत्रित किए जाएंगे। नाबार्ड ही एग्रीकल्चरल इंफ्रा फण्ड हेतु 1 लाख करोड़ देगा। यह सारी राशियां तत्काल खर्च होने वाली नहीं हैं। इस प्रक्रिया में वर्षों लग सकते हैं। 

सरकार ने राज्यों से कहा कि वे कोविड-19 की चिकित्सा के लिए 25000 करोड़ रुपए के डिस्ट्रिक्ट मिनरल का उपयोग कर सकते हैं। सरकार ने कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर फण्ड के 35000 करोड़ रुपए का उपयोग करने के लिए राज्य सरकारों को निर्देशित किया। सरकार द्वारा पहले से ही प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि देने की योजना चलाई जा रही है, इस मद के 16000 करोड़ रुपए भी इस कोविड राहत पैकेज का एक हिस्सा हैं। यह डीएमएफ और कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर फण्ड की राशि तो पहले से ही राज्यों के पास मौजूद थी। और प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना के लिए फण्ड का आबंटन भी प्रत्याशित ही था।

रिज़र्व बैंक द्वारा भी कुछ घोषणाएं की गईं। रिवीजन ऑफ लिक्विडिटी रेश्यो हेतु आरबीआई ने एक लाख सैंतीस हजार करोड़ का प्रावधान किया, पुन: सीआरआर में कटौती के मद में पुन: इतनी ही अर्थात एक लाख सैंतीस हजार करोड़ की राशि निर्दिष्ट की गई। टार्गेटेड लांग टर्म रेपो आपरेशन के लिए आरबीआई द्वारा तीन लाख चौहत्तर हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। इन घोषणाओं में न तो सरकार को न ही आरबीआई को अपनी तिजोरी से कुछ भी खर्च करना है। यदि बैंक आरबीआई द्वारा अधिक ऋण देने हेतु अधिकृत किए जाते हैं तो संभव है कि बाजार को इससे लाभ हो और गति मिले। किन्तु जब लॉक डाउन के कारण उद्योग धंधे और कारोबार ठप हैं और कोविड-19 के प्रसार को लेकर अनिश्चितता है तो क्या बैंक ऋण देने का साहस करेंगे? रिज़र्व बैंक सिडबी और नाबार्ड की रीफाइनेंसिंग करेगा और इसके लिए एक लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। यह कार्य भी न तो तत्काल होगा न ही इसका असर तुरंत दिखाई देगा। म्यूच्यूअल फंड्स को आरबीआई ने 50000 करोड़ रुपए की लिक्विडिटी दी है। यह पांचों घोषणाएं पैकेज का हिस्सा हैं।

सरकार के इस कोरोना राहत पैकेज का कोविड-19 और उसके कारण उत्पन्न आपात स्थितियों से कोई विशेष संबंध नहीं लगता। आपात दशाओं में संशोधित बजट पेश किए जाते हैं किंतु यह पैकेज वैसा भी नहीं है। इस पैकेज का एक बड़ा भाग बजट में किए गए प्रावधानों की पुनर्प्रस्तुति है। जो नीति संबंधी फैसले लिए गए हैं, उनमें निजीकरण को सभी समस्याओं का हल मानने की धारणा केंद्र में है। पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स को उस कॉरपोरेट सेक्टर के हवाले किया जा रहा है जिसकी स्थिति 10-15 बड़े घरानों को छोड़कर खुद खस्ताहाल है। आशंका इस बात की है कि कहीं अपने चहेते पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने का कोई खेल तो नहीं खेला जा रहा है। 

नाओमी क्लेन ने बहुत विस्तार से यह सिद्ध किया है कि सरकारें आपात स्थितियों का उपयोग अपने कॉरपोरेट एजेंडे को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए करती हैं और जनता में व्याप्त अस्थिरता और भय का लाभ उठाकर ऐसे आर्थिक परिवर्तन करती हैं जिनका सामान्य दशाओं में घोर विरोध होता। हमारे देश में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। 20 लाख करोड़ के पैकेज में सरकार का वास्तविक खर्च लगभग एक लाख पचहत्तर हजार करोड़ के आसपास है जो कुल पैकेज के 8 से 9 प्रतिशत के बराबर है। सरकार का जोर गरीबों को अन्न और अर्थ की मदद करने के बजाए ऋण उपलब्ध कराने पर है। प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों की जैसी मनोदशा है उसे देखते हुए मजदूरों और किसानों के लिए पैकेज से बहुत ज्यादा उम्मीदें भी नहीं थीं। सरकार जिस वर्ग के लिए काम कर रही है वह स्पष्ट है। सरकार द्वारा इसे छिपाने का कोई विशेष प्रयत्न भी नहीं हो रहा है। अब बहुत कुछ उन करोड़ों मेहनतकश लोगों पर निर्भर है जो इस लॉक डाउन से सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। क्या वे अपने आक्रोश की राजनीतिक अभिव्यक्ति कर पाएंगे?
रायगढ़, छत्तीसगढ़

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