विचार / लेख

आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास, साथ-साथ : प्रकाश दुबे
आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास, साथ-साथ : प्रकाश दुबे
19-May-2020

भामाशाह के खिताब की पात्रता साबित करने के लिए वित्त मंत्री को परीक्षा से गुजरना होगा। पहला तो यह कि देश का पुंजा भील जैसा श्रमिक-सैनिक समुदाय आशावान रहे।  जीवित रहे। किसान उस दौर की तरह सुरक्षित हो और किलों में जमा खजाना चुनिंदा साहूकारों की पहुंच से दूर रहे। देश के हित में खर्च हो। देश हित का ध्यान रखने वाली किसी मंत्री या सरकार के लिए यह कठिन नहीं। अग्नि परीक्षा तो कतई नहीं है।

कोरोना- कहर झेल रहे  भारतवासी से पूछिए-तालाबंदी यानी घर में रहते हुए कितने दिन हुए? अचकचा जाएगा। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू था। इसे जोडऩे पर हर भारतीय 56 इंच के सीने पर अब तक करीब छप्पन दिन झेल चुका है। नागरिकों की पिघलती सहनशक्ति को बनाए रखने तथा तकलीफ कम करने केन्द्र सरकार ने पिछले सप्ताह एक के बाद एक  पैकेज की घोषित किए।

केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन यह दायित्व निभा रही हैं। 444 वर्ष पुराना प्रसंग है। हल्दी घाटी में दिल्ली के बादशाह अकबर की सेना का नेतृत्व मानसिंह ने किया। मेवाड़ के महाराणा  प्रताप की सेना में हकीम खान सूरी मोर्चा संभाल रहे थे। किस्से बदल कर किसी राजा की जीत-हार प्रमाणित करने वालों पर ध्यान देने की बजाय इस किस्से की प्रासंगिकता पर ध्यान दें। 18 जून 1576 के एक दिन के युद्ध में हल्दी घाटी में  हजारों सैनिकों की मौत हुई। स्वमिभक्त चेतक ने स्वामी के प्राण बचाने बलि दी। आर्थिक संकट में फंसे महाराणा राजपाट छोडक़र वर्तमान गुजरात की ओर चल दिए। उनके बालसखा और प्रशंसक भामाशाह को खबर लगी। भामाशाह ने कहा-खम्मा घणी। महाराणा घोड़े की बाग मेवाड़ की ओर मोड़ो। इतना धन दिया ताकि 25 हजार सैनिकों का 12 वर्ष तक गुजारा हो सके।

निराशा छंटी। महाराणा का आत्मविश्वास वापस लौटा। सैनिकों के गुजारे के लिए पर-निर्भरता का संकट टल चुका था। कोरोना की आपदा से घिरे आम लोगों को वित्त मंत्री किश्तों में 20 लाख करोड़ रुपए का पैकेज देकर भामाशाह की भूमिका निभाने का प्रयास कर रही हैं।  इतिहास में दर्ज आंकड़ों के अनुसार 20 हजार स्वर्ण और 20 लाख अन्य मुद्राएं समर्पित कर भामाशाह ने कहा-और भी जरूरत पड़ेगी तो मैं प्रबंध करूंगा। 20 हजार और बीस लाख मात्र आंकड़े हैं। 444 वर्ष पहले दो राजाओं के बीच युद्ध था। अब लोकतंत्र है। सवा अरब से अधिक आबादी अदृश्य शत्रु से बचने के लिए सहमी-दुबकी घर में कैद है। महाराणा प्रताप के लिए पुंजा भील ने युद्ध में प्राणों की बलि दी थी। पुंजा भील के कई वंशज महाराष्ट्र के औरंगाबाद के निकट रेल की पटरी पर कट गए। विंध्य अंचल के गोंड आदिवासी अपनी मेहनत से रोटी कमाते थे। देश संवारते थे। वे भी पुंजा भी और उनके साथियों की तरह शूरवीर थे और एक आर्थिक युद्ध के सैनिक थे। हल्दीघाटी के युद्ध में आहत महाराणा प्रताप ने दो वर्ष बाद फिर मोर्चा संभाला।

आर्थिक मोर्चे पर

प्रधानमंत्री राहत कोष नाम की तिजोरी में देश के छोटे बड़े भामाशाहों के साथ ही सार्वजिनक उपक्रमों ने करोड़ों रुपए जमा किए हैं। साढ़े चार सदी पहले मेवाड़ के प्रताप ने निजी संपत्ति बेचने या गिरवी रखने की पहल नहीं की। कोयला कंपनियों या सार्वजिनक उपक्रमों का निजीकरण या बिक्री की नौबत आ चुकी है तो आम आदमी का आत्मविश्वास टूटेगा।

भामाशाह के खिताब की पात्रता साबित करने के लिए वित्त मंत्री को परीक्षा से गुजरना होगा। पहला तो यह कि देश का पुंजा भील जैसा श्रमिक-सैनिक समुदाय आशावान रहे।  जीवित रहे। किसान उस दौर की तरह सुरक्षित हो और किलों में जमा खजाना चुनिंदा साहूकारों की पहुंच से दूर रहे। देश के हित में खर्च हो। देश हित का ध्यान रखने वाली किसी मंत्री या सरकार के लिए यह कठिन नहीं। अग्नि परीक्षा तो कतई नहीं है।

(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

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