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परवेज और शादाब भाई की घर जल्दी पहुंचाने वाली पर्चियाँ! : सचिन जैन
परवेज और शादाब भाई की घर जल्दी पहुंचाने वाली पर्चियाँ! : सचिन जैन
20-May-2020

कोरोना ने कोविड-19 महामारी को तैयार किया है। बीमारी कोई भी हो डराती तो है। और जब यह पता हो कि ये लाइलाज है, तब तो सांस हलक में अटक जाए।

हम सब देख रहे हैं कि जीवन में अपने गाँव, अपने मूल यानी जड़ों का कितना महत्व होता है। एक तरफ बीमारी का संक्रमण काल है, तो वहीं दूसरी तरफ चिंताएं हैं। डर, असुरक्षा और चिंता के बीच व्यक्ति ने तय किया कि वो अपने घर-गाँव-जड़ों की तरफ लौटेगा। उसे कोई वाहन नहीं मिला रहा है, पर फिर भी वह चल पड़ रहा है। उसे अपने पैरों पर विश्वास है, उसे अपने कन्धों पर विश्वास है। उसे अपनी उम्मीदों पर विश्वास है। उसने अपनी उम्मीदों को कंधे पर टांगा, हिम्मत की उंगली पकड़ी और अपने आप को पैरों के हवाले कर दिया और हल पड़ा।

इस पूरी तैयारी में उसने पेट की सबसे ज्यादा उपेक्षा की। उसने भूल जाना बेहतर समझा कि उसके शरीर में एक अदद पेट भी है। ये घर लौटने की जिद नहीं थी। उसे ये अहसास था कि पता नहीं इस संकट का अंत क्या हो, अपन तो चलो ताकि यदि मरना भी पड़ा तो कम से कम अपनी मिटटी, अपने आँगन में तो मृत्यु होगी। कम से कम मृत्यु तो हमें लावारिस नहीं कर पाएगी।

हम सब जानते हैं कि लाखों लोग भोपाल के रास्ते से गुजरे हैं। उनमें से कईयों का सफर पूरा हो गया और कई लोगों का सफर स्थाई रूप से अधूरा रह गया।

हम (गगन नायर, राकेश दीक्षित और मैं) मुबारकपुर पुल के नीचे (जो इंदौर से झांसी, सागर, इलाहाबाद आदि की तरफ जाने की मुख्य भी है) भोपाल के कोहेफिजा क्षेत्र में रहने वाले परवेज और शादाब खान मिले। जानते हैं अपनी गाड़ी में क्या भर कर लाये थे; बच्चों की मुरादें। बच्चों के ढेर सारे बिस्किट और चालकेट। साथ में केले और नमकीन के पैकेट। चूंकि सुबह सुबह यहाँ से सबसे ज्यादा प्रवासी लोग गुजर रहे थे, तो वे हर दिन सुबह यहीं आ जाते हैं।

अपनी गाड़ी का दरवाजा खोलते हैं और सडक़ से गुजर रहे हर वाहन हर पैदल व्यक्ति को रोकते हैं। उन्हें पानी, केले, बिस्किट और नमकीन का पैकेट देते हैं। बिना मांगे! यदि गाड़ी चल रही होती है, तो पीछे बैठे नागरिकों की तरफ उछाल देते हैं। फिर जो भी बच्चे हैं वहां, उन्हें पास जाकर चाकलेट और बिस्किट देते हैं। यदि कोई गाड़ी गुजरती है तो उसमें बच्चों को तलाशते हैं।

लेकिन एक बात आपको बताना जरूरी है। परवेज भाई और शादाब भाई के हाथ में छोटी-छोटी पर्चियों की गड्डी भी है। वे गाड़ी चलाने वाले व्यक्ति से, ऑटो वाले से, दोपहिया चलाकर आ रहे व्यक्ति को रोककर पूछते-कहाँ जायेंगे? यदि वो कहता कि इलाहाबाद, तो उसे एक पर्ची सौंप देते, यदि वह कहता कि सागर-छतरपुर तो दूसरी पर्ची सौंप देते। इस तरह ये दोनों लगभग 500 पर्चियां बांट रहे थे।

परवेज भाई ने कहा कि लोग यहाँ से निकलते समय रास्ता पूछते हैं। हम बता भी दें, तो लोग याद नहीं रख पाते हैं। हमने यह देखा कि लोग किस किस तरफ जा रहे हैं। हमने उन स्थानों का रास्ता बताने वाले पर्चियाँ छाप लीं। और लोगों की दिशा के मुताबिक हम उन्हें ये पर्ची दे देते हैं।

इसका महत्व समझते हैं आप? इससे लोग रास्ता नहीं भटकेंगे। रास्ता नहीं भटकेंगे तो समय बचेगा। यदि रास्ता भटकेंगे तो गाँव-घर देर से पहुंचेंगे। परवेज भाई और शादाब भाई की ये पर्चियां इन बेदखल लोगों को उनके मुकाम तक पहुंचाने में बहुत मदद करती हैं। ये पर्चियां घर जल्दी पहुंचाती हैं।

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