संपादकीय

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : एक कतरा सच, सच तो है, पर वह पूरा सच न भी हो..
'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : एक कतरा सच, सच तो है, पर वह पूरा सच न भी हो..
20-May-2020

एक कतरा सच, सच तो है, 
पर वह पूरा सच न भी हो..

जब कोई बड़ी त्रासदी होती है, तो उसके बहुत से शिकार होते हैं जिनमें से एक मीडिया भी होता है। भोपाल गैस त्रासदी हो, 1984 के दंगे हों, 2002 के गुजरात दंगे हों, या अभी लॉकडाऊन हो, ऐसी व्यापक त्रासदी पर लिखना आसान नहीं होता। किसी किताब के लेखक के लिए तो इनमें से किसी पर भी लिखना बहुत मुश्किल नहीं होता है क्योंकि इनकी रिपोर्टिंग के गट्ठे मौजूद रहते हैं, जिन्हें पढ़कर रिसर्च किया जा सकता है, और लिखा जा सकता है। लेकिन जब ये घटनाएं होती हैं, खासकर व्यापक त्रासदी से भरी ऐसी घटनाएं जिनमें लाखों लोग प्रभावित हैं, और किसी भी मीडियाकर्मी के लिए उनमें से बस कुछ गिने-चुने लोगों से बातचीत मुमकिन रहती है। ऐसी रिपोर्टिंग अगर महज तथ्यों पर आधारित एक सीमित रिपोर्टिंग है, तब तो ठीक है, लेकिन ऐसे सीमित तथ्यों पर आधारित किसी विश्लेषण से पत्रकारिता का कोई निष्कर्ष भी निकाला जा रहा है तो खतरा वहां से शुरू होता है। 

अंग्रेजी में ऐसे संदर्भ में एक लाईन कही जा सकती है, एनेकडोटल रिपोर्टिंग, या एनेकडोटल विचार-लेखन। इसका मतलब कुछ चुनिंदा मामलों को लेकर एक व्यापक निष्कर्ष निकालने जैसा काम। होता यह है कि ऐसी विशाल, विकराल, और बड़े पैमाने की त्रासदी के कुछ कतरे जब लोगों के सामने आते हैं तो लोग उन्हीं को सब कुछ मान बैठते हैं। अब जैसे आज के लॉकडाऊन को ही लें, तो किसी एक शहर से मानो रोज सौ बसों में लोगों को भेजा जा रहा है, सौ-दो सौ ट्रकों पर भी चढ़ाया जा रहा है जो कि बहुत कानूनी बात तो नहीं है, लेकिन लोगों को जल्द से जल्द उनके गृह प्रदेश, और उनके गांव तक पहुंचाने की नीयत से, या फिर अपने प्रदेश से बला टालने की नीयत से, जो भी बात हो, लोगों को आज देश भर में ट्रकों पर भी चढ़ाकर भेजा जा रहा है, और जो प्रदेश जितनी दिलचस्पी ले रहे हैं, जिसकी जितनी क्षमता है, उतनी बसों में भी भेजा जा रहा है। ऐसे में किसी भी वक्त वहां पहुंचने वाले रिपोर्टर-फोटोग्राफर को, सामाजिक कार्यकर्ता को, या कि आम लोगों को कई तरह के नतीजे निकालने का मौका मिल सकता है। बसों में जा चुके 4 हजार लोग तो नजरों से दूर जा चुके हैं, लेकिन जो 4 सौ लोग बाकी हैं, उन 4 सौ में से 40 लोगों का रोना, और सचमुच की तकलीफ से रोना, सामने मौजूद रह जाता है। इसलिए मीडिया में भी ऐसी ही कहानियां अधिक आती हैं, और चूंकि चौबीसों घंटे ये घटनाएं चल रही हैं इसलिए यह समझ पाना कुछ मुश्किल रहता है कि अनुपात क्या है। तस्वीर अनुपातहीन ढंग से अधिक नकारात्मक, या अनुपातहीन अधिक सकारात्मक दिख सकती है। जब तस्वीर ऐसी दिखेगी तो उस पर आधारित नतीजे भी उससे प्रभावित होंगे। 

हम आज हिन्दुस्तान को एक देश मानकर कम से कम दो दर्जन राज्यों में बिखरी दुख-तकलीफ की हजारों कहानियों के आधार पर जो निष्कर्ष निकाल रहे हैं वह निर्विवाद रूप से घनघोर सरकारी नाकामयाबी का, और अभूतपूर्व मानवीय त्रासदी का है। लेकिन यह नतीजा निकालना कम कहानियों के आधार पर नहीं हो सकता था, न ही कुछ सीमित प्रदेशों की ऐसी हालत को एक राष्ट्रीय त्रासदी कहा जा सकता था। आज जब निर्विवाद रूप से यह नौबत दिखाई पड़ रही है कि देश में बेदखली से तकलीफ ही तकलीफ है, और देश की तैयारी करोड़ों लोगों को तकलीफ में डालने के पहले शून्य थी, इस बेदखली का या तो अंदाज नहीं था, और या अंदाज था तो उसके मुताबिक तैयारी शून्य थी। लेकिन ऐसे नतीजे पूरी तरह से एकतरफा त्रासदी के नजारों से आसान हो जाते हैं। अगर यह तस्वीर मिलीजुली होती, तो यह आसान नहीं होता। इसलिए जब किसी प्रदेश में, किसी शहर में, किसी एक क्वारंटीन सेंटर में हो रही घटनाओं को व्यापक तस्वीर का एक छोटा हिस्सा मानने के बजाय व्यापक तस्वीर मानकर उसे ही सब कुछ गिन लिया जाता है, तो निष्कर्ष बहुत गलत साबित होते हैं। 

दिक्कत यह है कि अखबारनवीसी में जितने शिक्षण-प्रशिक्षण की जरूरत है, उससे गुजरे बिना भी अखबारों में लिखने का हक मिल जाने भर से लोग विश्लेषक भी हो जाते हैं, और विचार लेखक भी। उनके निष्कर्षों की बुनियाद न गहरी होती है, न ही पर्याप्त चौड़ी होती है। ऐसे में वह उथली जमीन पर खड़ा हुआ एक ऐसा निष्कर्ष रहता है जो कि विपरीत तथ्यों से पल भर में धड़ाम हो सकता है, हो जाता है। अब बात जब अखबारों से बढ़कर टीवी और ऑनलाईन मीडिया तक आती है, तब तो बुनियाद इतनी भी गहरी नहीं बचती, इतनी भी चौड़ी नहीं बचती। कई बार तो इन नए मीडिया में निष्कर्ष जमीन पर ही टिके हुए नहीं होते, हवा में तैरते होते हैं। ऐसे में जब इनको कुछ बिखरी हुई खुशियां दिख जाती हैं, या कुछ बिखरे हुए दुख दिख जाते हैं, तो उन्हें ही सब कुछ मान लेने, और सब कुछ को वैसा ही मान लेने का एक बड़ा खतरा हाल के बरसों में मीडिया में हो गया है। 

अपने देखे को सच मान लेने तक तो ठीक है, क्योंकि इससे बड़ा सच और क्या हो सकता है, लेकिन आज बहुत से लोग ऐसे व्यापक और जटिल मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हुए अच्छी या बुरी नीयत से, जैसा भी हो, एक यह बड़ी चूक कर रहे हैं कि वे अपने देखे हुए को ही संपूर्ण सत्य मान रहे हैं। उनकी बात में बार-बार अपने देखे का दंभ एक आत्मविश्वास और एक सुबूत की तरह सामने आता है। उनका देखा सच है, लेकिन हर सच सम्पूर्ण सत्य नहीं होता। सच का एक कतरा किसी संदर्भ से परे उठाकर दुनिया के महानतम व्यक्ति को निष्कृष्टतम साबित करने का हथियार बन सकता है। किसी बहुत ही अप्रत्याशित और जटिल खतरे के बीच बड़े से बड़ा इंतजाम भी बड़ी आसानी से नाकाफी साबित किया जा सकता है, और कुछ छोटी-छोटी मिसालों को देकर, लोगों के कहे हुए सच को एक सम्पूर्ण सत्य की तरह पेश करके उन्हें काफी और कामयाब भी साबित किया जा सकता है। एनेकडोटल रिपोर्टिंग ऐसी ही होती है जिनमें लोग किसी एक मामले, अपनी देखी हुई किसी एक घटना, अपने को सुनाई पड़े किसी एक बयान पर आधारित एक व्यापक निष्कर्ष निकाल लेते हैं। 

अखबारनवीसी आसान काम नहीं है। एक तो इसकी शुरूआत में ही एक शब्द से बड़ी गलतफहमी पैदा होती है। पब्लिक इंटरेस्ट। इन शब्दों के दो मायने होते हैं, जनहित में क्या है, और जनरूचि का क्या है। अब इन दोनों के बीच फासले को समझना तो आसान है, लेकिन जब न समझना नीयत हो, तो इन दोनों में घालमेल उससे भी ज्यादा आसान है। किसी बात को जनरूचि का बनाने के लिए उसे जनहित का साबित करना जरा भी मुश्किल नहीं रहता। और खासकर ऐसे वक्त जब एक कतरा सच का सहारा भी मिला हुआ हो, जो कि व्यापक सच बिल्कुल भी न हो, लेकिन एक कतरा सच जरूर हो। आज मीडिया में अखबारनवीसी के दौर की गंभीरता और ईमानदारी दोनों ही चल बसे हैं। फिर भी अखबारों से परे की मीडिया की एक मौजूदगी एक हकीकत है जिसे अनदेखा करना मुमकिन नहीं है। लेकिन ऐसे में यह भी याद रखना चाहिए कि जो मीडिया हर पल की हड़बड़ी में हो, उसके पास चौबीस घंटों में एक बार छपने वाले अखबारों जितना न सब्र हो सकता, न ही चीजों को कुछ घंटों के व्यापक कैनवास पर देखने जितनी समझ ही हो सकती। यह वक्त जिस किस्म की आपाधापी का है, जिस किस्म से न्यूजब्रेक करने का है, जिस किस्म से सिर्फ और सिर्फ सबसे पहले रहने के दुराग्रह का है, उस वक्त में विश्लेषक और विचार-लेखक भी धैर्य खो चुके हैं। अब साप्ताहिक कॉलम जैसी कोई बात किसी को नहीं सुहाती। आमतौर पर तो जब घटना घटती रहती है, तो उसे टीवी पर तैरते देखकर, या इंटरनेट पर उसकी पल-पल जानकारी पाकर उस पर विचार लिखना भी शुरू हो जाता है। कई बार हम भी ऐसा करते हैं, और उसके खतरों को झेलते भी हैं। तैरती हुई घटनाओं पर निष्कर्ष और विचार लिखते हुए साल में एकाध मौका ऐसा भी आता है कि वे तथ्य जो कि लिखते वक्त तथ्य थे, वे बाद में जाकर गलत साबित होते हैं। इसलिए आज जब सदी की एक सबसे महान त्रासदी पर लिखने की बात आती है, तो दो चेहरों की मुस्कुराहट, और चार चेहरों पर आंसू को आधार बनाना ठीक नहीं है। कोई निष्कर्ष निकालने के पहले ठीक उसी तरह पूरी तस्वीर को कुछ दूर हटकर, कुछ ऊपर जाकर एक व्यापक नजर से देखना चाहिए जिस तरह शवासन करने वालों को सिखाया जाता है कि ऐसी कल्पना करें कि वे ऊपर से अपने खुद के शरीर को देख रहे हैं। जो मीडिया में हड़बड़ी में ताजा घटनाओं को दर्ज कर रहे हैं, वे जब तक शवासन की तरह ऊपर उठकर व्यापक नजरिए से देख न सकें, तब तक उन्हें अपने देखे हुए को सच मानने के बजाय सच का एक कतरा मानना चाहिए, अपना देखा हुआ। और इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि सच के ऐसे और भी बहुत से कतरे हो सकते हैं जो कि उनके अनदेखे हों, और जो नतीजों को पूरी तरह बदलने की ताकत रखते हों। क्या ऐसे व्यापक नजरिए की मेहनत करने के लिए मीडिया के लोग तैयार हैं? या क्या ऐसी मेहनत की पाठक, दर्शक, श्रोता में कोई कद्र है?

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