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गोरखा
गोरखा
03-Jun-2020 12:38 PM

हिमालय की तलहटी में बसे नेपाल में एक जिला है गोरखा। वह आज भी अपने मशहूर योद्धाओं के लिए विख्यात है। गोरखा किसी एक जाति के योद्धा नहीं, बल्कि उन्हें पहाड़ों में रहने वाले सुनवार, गुरंग, राय, मागर और लिंबु जातियों से भर्ती किया जाता है। आयो गुरखाली के युद्धनाद और कायरता से मरना अच्छा  के नारे के साथ उन्होंने खौफ पैदा करने वाली ख्याति पाई है।  कहते हैं कि जब गोरखा अपनी खुखरी निकाल लेता है तो वह खून बहाए बिना मयान में नहीं जाती। 
ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से पहले विश्वयुद्ध में नेपाल के दो लाख गोरखा सैनिकों ने भी हिस्सा लिया। यह दक्षिण एशिया से बाहर उनकी पहली लड़ाई थी लेकिन उनकी बहादुरी के किस्से आज भी कहे सुने जाते हैं।  मौजूदा समय में गोरखा सैनिक भारत की आजादी के समय में किए गए एक समझौते के तहत नेपाल की सेना के अलावा भारत और ब्रिटेन की सेनाओं में काम करते हैं। भारतीय सेना में 1 लाख 20 हजार गोरखा सैनिक हैं तो ब्रिटिश सेना में उनकी तादाद साढ़े 3 हजार है। 
गोरखा सैनिकों का पश्चिम के साथ पहला संपर्क 1814-16 में तब हुआ जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने नेपाल के खिलाफ लड़ाई लड़ी। हालांकि इस लड़ाई का अंत अंग्रेजों की जीत के साथ हुआ लेकिन गोरखा जवानों ने उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया।  
अपने दुश्मनों की युद्ध क्षमता से इस तरह प्रभावित अंग्रेजों ने नेपाल के राजा के साथ हुई शांति संधि में यह भी जोड़ दिया कि वे गोरखा जवानों की भर्ती ब्रिटिश सेना में कर सकेंगे। यह समझौता उसके बाद दोनों पक्षों के बीच 200 साल से ज्यादा से चल रहे सैनिक रिश्तों का आधार बन गया । हालांकि उस समय किसी ने नहीं सोचा था कभी उन्हें अपने देश से हजारों किलोमीटर दूर यूरोप में पहले विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से लडऩा होगा। कुल मिलाकर दो लाख गोरखा सैनिकों ने पहले विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस से लेकर फारस तक की खाइयों में लड़ाई लड़ी। वर्ष 1914 से 1918 तक पहले विश्व युद्ध के दौरान गोरखा सैनिकों के 33 राइफल बटालियन थे। 
यूरोप के युद्ध ने गोरखा सैनिकों के लिए ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश भारत की सारी टुकडिय़ों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दीं।  
1915 में तुर्की के प्रायद्वीप पर उन्होंने बहुत कम नुकसान के साथ तुर्की के अति सुरक्षित चौकी पर कब्जा कर लिया। यह अभियान बाद में गोरखा ब्लफ के नाम से विख्यात हुआ। फ्रांस के लूस में हुई लड़ाई में एक गोरखा बटालियन अंतिम समय तक लड़ती रही। गोरखा बटालियनों को पहले विश्व युद्ध में करीब 2 हजार  वीरता पुरस्कारों से नवाजा गया।  िअनुमान के अनुसार पहले विश्व युद्ध के दौरान गोरखा रेजीमेंटों के करीब 20 हजार सैनिक मारे गए।
यह दक्षिण एशिया से बाहर उनकी पहली लड़ाई थी। उसके बाद से नेपाली सैनिकों ने दुनिया के कई हिस्सों में ब्रिटेन और संयुक्त राष्ट्र की ओर से लड़ाई लड़ी है, जिनमें द्वितीय विश्व युद्ध और फाल्कलैंड युद्ध के अलावा इराक और अफगानिस्तान की तैनाती शामिल है। ब्रिटिश सेना के लिए इतना बलिदान के बावजूद लंबे समय तक उन्हें ब्रिटेन में बसने का अधिकार नहीं दिया जाता था। सैनिक सेवा के बाद उन्हें तुरंत नेपाल भेज दिया जाता था। इसके अलावा उन्हें साथी ब्रिटिश सैनिकों की तुलना में कम पेंशन मिलती थी। 2007 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 1997 से समान पेंशन देने का फैसला किया । दो साल बाद सभी पेंशनयाफ्ता गोरखा सैनिकों को ब्रिटेन में रहने का भी अधिकार मिला।
 

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