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रेणु के साहित्य में जाति, जमात और समाज
15-Jun-2020 8:18 PM 18
रेणु के साहित्य में जाति, जमात और समाज

फणीश्वरनाथ रेणु के बाद की पीढ़ी के वरिष्ठ कथाकार चन्द्रमोहन प्रधान द्वारा युवा दिनों में बनाया और रेणु द्वारा हस्ताक्षरित उन्हीं का स्केच (साभार : मैला आंचल, फेसबुक ग्रुप)

रेणु के साहित्य में सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, लैंगिक न्याय, क्षेत्रीय न्याय और जातीय, वर्गीय तथा क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल मुखर हुए हैं। मसलन, ‘मैला आँचल’ की कथा जनेऊ आन्दोलन, चंपारण आन्दोलन, छोटानागपुर आन्दोलन, किसान आन्दोलन, तेलंगाना आन्दोलन, समाजवादी आन्दोलन, पूर्णिया का संथाल आन्दोलन, त्रिवेणी संघ का आन्दोलन, पिछड़ा वर्ग आन्दोलन, बंगाल के भू-श्रमिक आन्दोलन आदि की सामूहिक अभिव्यक्ति है। बता रहे हैं युवा समालोचक अनंत

हिंदी साहित्य में दलित-बहुजन विमर्श को केंद्रीय विषय बनाने वाले साहित्यकारों में फणीश्वरनाथ रेणु अग्रणी रहे। उनकी रचनाओं को द्विज साहित्यकारों ने आंचलिक साहित्य कहकर सीमित करने का प्रयास किया। उनके जन्म शताब्दी वर्ष के आलोक में फारवर्ड प्रेस उनकी रचनाओं और विमर्शों पर आधारित लेखों का प्रकाशन कर रहा है। 

हिंदी साहित्य में फणीश्वरनाथ रेणु का एक ऐसा नाम है जिन्होंने स्थानीयता और यथार्थवाद को स्थापित किया। काल, स्थान और परिस्थितियों के हिसाब से ऐसी रचनाएं रचीं कि ये साहित्य से अधिक समय से संवाद करते दस्तावेज बन गए। वैसे स्थानीयता और यथार्थवाद यूरोपीय साहित्य की देन है। यूरोपीय साहित्य में भी आंचलिक साहित्यकारों की लंबी फेहरिस्त है। सोवियत रूस के लेखक मिखाइल शोलोखोव की कृति “वर्जिन ऑफ सायल अपटर्न्ड” में दन अंचल के ग्रेमियाची लंग कागासी गाँव का चित्रण है। नार्वे के उपन्यासकार हैमसुन की रचना “ग्रोथ ऑफ सायल” में नार्वे के उत्तरांचल के एक खंड का चित्रण है। नोबेल पुरस्कार विजेता (1949) विलियम फकनर के उपन्यासों का कथांचल संयुक्त राज्य अमेरिका का दक्षिणांचल है। नोबेल विजेता युगोस्लावी लेखक ईवो आन्द्रिच ने द्रिना नदी के कगार पर बसे प्रांत के हर्जेगोविना और बोस्निया अंचल का चित्रण किया है। तुर्की लेखक स्वात दरवेश का उपन्यास “अंकारा का बंदी” जैसी कृति को रेणु ने स्वयं आंचलिक उपन्यास माना है (रेणु रचनावली V:-281-282)। थॉमस हार्डी ने अपने उपन्यासों के लिए शाश्वत क्षेत्र “वेस्सेक्स” की रचना की है। हार्डी का वेस्सेक्स खुद में एक किरदार बन गया। ठीक रेणु के “मैला आँचल” के “मेरीगंज” और “परती परिकथा” के “परानपुर” की तरह। 

दरअसल विश्व के रचनाकारों के अंचल की तरह ही रेणु का भी अंचल है। अब प्रश्न उठता है कि मेरीगंज और परानपुर अंचल के कथानक को केन्द्र में रखकर रची गयी रचनाओं के कथ्य की दृष्टि, राष्ट्रीय नीति और वैश्विक प्रगतियों के परिप्रेक्ष्य में है या अंचल के संकुचित दायरे में क्यों कैद है।

बतौर उदाहरण 1954 में प्रकाशित “मैला आँचल” को ही लेते हैं जिसमें मेरीगंज अंचल पर चित्रित कथा है। मेरीगंज हिन्दी साहित्य में देशज दुनिया का पहला अंचल है। रेणु ने मेरीगंज को भारतीय गांवों का प्रतीक माना है। या यूँ कहें कि मेरीगंज-रूपी रूपक में रेणु ने इंसान की आजादी, न्याय और अस्मिता के प्रश्नों की पड़ताल एवं विवेचना कथात्मक शैली में की है। गांधी की हत्या के पूर्व और उसके बाद के कालखंड में समाज में उपजे सामाजिक-राजनीतिक अंतर्विरोध का यथार्थ चित्रण है। 1946 से 1948 के तात्कालिक परिवेश में आजादी पाने की कशमकश करती जनता की मानसिक स्थितियों का आईना है “मैला आँचल”। 

आंचलिकता के गहरे रंगों में रंगे “मैला आँचल” में समय का बोध और राष्ट्रीय जीवन से लोकजीवन का एकीकरण तथा वैश्विक वैज्ञानिक प्रगतियों के लोकसंस्कृति पर पड़ने वाले प्रभावों का पक्का सबूत भी है। जन-जीवन के सवाल पर अंचल में धड़कते जीवन के दबाव में मानव मुक्ति संग्राम की कथा है। अंचल और आन्दोलनों के इतिहास से हाशिये के समाज के बनते-बिगड़ते रिश्ते के बीच रेणु ने बुर्जुआ, पेटी बुर्जुआ, पूंजीवाद, पूंजीपति, जालिम जमींदार, मार्क्सवाद, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, कमाने वाला खायेगा, राम राज्य जैसे वैचारिक नारों को परिभाषित किया है। विश्व साहित्य के इतिहास से प्रेरित स्थानीयता और यथार्थवाद की कसौटी पर रेणु की आंचलिकता हिन्दी कथा साहित्य की टटका प्रवृत्ति है और “मैला आँचल” मानवीय संवेदना की धरातल पर खड़ा शब्द शिल्प हिन्दी का पहला आधुनिक औपन्यासिक शीशमहल, जिसकी दरो-दीवारों में नवसृजित लोकतंत्र में समाजवाद की परिकल्पनाओं की इबारत लिखी है।  
रेणु कभी भी समाज में व्याप्त जातिवाद और वर्ण व्यवस्था को ढंकने की कोशिश नहीं करते। यह कहना अधिक तर्कसंगत है कि उन्होंने इन सभी को समाज के समक्ष बेपर्दा कर दिया। जैसे उनका मेरीगंज का देशज समाज जातीय टोलों में बंटा है। यहां बारहों बरन के लोग रहते हैं। कायस्थ टोली के मुखिया विश्वनाथ प्रसाद मल्लिक एक हजार बिगहा के काश्तकार और तहसीलदार हैं। राजपूत टोली के मुखिया रामकिरपाल सिंह साढ़े तीन सौ बिगहा के जोतदार हैं। यादव टोली के मुखिया रामखेलावन यादव दूध-घी बेचकर डेढ़ सौ बिगहा के जोतदार बने हैं। अन्य ग्रामीण गरीबी और जहालत में फंसे हैं। कायस्थ टोली को मेरीगंज के लोग मालिक टोला कहते हैं। राजपूत लोग कायस्थ टोली को “कैथ टोली” कहते हैं। राजपूत टोला को कायस्थ लोग “सिपैहिया टोला” और यादव टोला को “गुअर टोली” कहते हैं। व्यंग्य की यह भाषा मनुवादी संस्कृति से उत्पन्न श्रेष्ठताबोध की प्रवृत्ति का ऐतिहासिक नमूना है। यादव बहुल मेरीगंज में यादव ही हाशिये पर हैं। यादव जनेऊ धारण करते हैं तो ब्राह्मणों ने कहा- “जब-जब धर्म की हानि हुई है राजपूतों ने ही उनकी रक्षा की है” (रेणु रचनावली, II:29)। 

राजपूतों और यादवों में धर्मयुद्ध की स्थिति पैदा होती है। कायस्थ टोली के मुखिया यादवों को मदद करने का भरोसा देते हैं। यादवों के शक्ति प्रदर्शन से सिर्फ धर्मयुद्ध ही नहीं टला, बल्कि श्रेष्ठजन यादव टोला को “गुअर टोली” कहने से भी डरने लगे।

                                            

                फणीश्वरनाथ रेणु और नागार्जुन की दुर्लभ तस्वीर। इस तस्वीर में दोनों धान के पौधे बो रहे हैं। ((साभार : मैला आंचल, फेसबुक ग्रुप))

इस प्रकार रेणु ने वर्णाश्रम व्यवस्था में व्याप्त श्रेष्ठता-बोध और वर्चस्ववादी प्रवृत्ति का सूक्ष्म विश्लेषण कर शूद्रों, अतिशूद्रों में विकसित हो रही चेतना और अस्मिता को रेखांकित किया है। पिछड़ी जातियों में विकसित अस्मिता और चेतना ब्राह्मणवादी प्रवृत्तियों का ही शूद्रीकरण हैं। कई मायने में यह नव ब्राह्मणवादी प्रवृत्ति का जन्म भी है। ब्राह्मण टोली के ज्योतिषी जी कहते हैं- “यह राजपूतों के चुप रहने का फल है कि आज चारों ओर हर जाति के लोग गले में जनेऊ लटकाये फिर रहे हैं” (रेणु रचनावली II:29)। इस बयान से स्पष्ट है कि ब्राह्मणवाद के लठैत राजपूत रहे हैं। यादवी शक्ति से भयभीत राजपूत चुप्पी साध लेते हैं, लेकिन जनेऊ पहनने से यादवों को क्षत्रिय का दर्जा नहीं मिलता है। यादवी अस्मिता जागृत होने से यादवों को समानता के अधिकार की जगह यादवी वर्चस्व को स्वीकृति मिलती है। यहां सम्मान और समानता की जगह भय से प्रीत और वर्चस्व की प्रवृत्ति पनपती हुई दिखाई पड़ती है।

रेणु ने मैला आंचल में तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्यों और संभावनाओं पर विस्तार से अपने पात्रों के जरिए लिखा है। ऐसा करते समय वे न केवल उस समय जो कि 1950 का दशक है, की राजनीति को सामने लाते हैं बल्कि आने वाले युग की राजनीतिक भविष्यवाणी भी करते हैं। मसलन, 1990 में मंडल कमीशन के लागू होने के बाद देश में पिछड़ों की राजनीतिक हिस्सेदारी की झलक भी उनकी रचनाओं में अनायास देखी जा सकती है। इसी प्रकार वे उस समय बीज से पौधा बने वामपंथ को बढ़ते हुए देखते हैं तो इसके अंतर्विरोधों को भी सामने लाते हैं। जैसे बालदेव, चुन्नी गोंसाई और बावनदास सुराजी आन्दोलन के दौर के कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं। बालदेव की संगत में कालीचरण और बासुदेव ने राजनीति शुरू की। कालीचरण और बासुदेव, पार्टी के कामरेड बन जाते हैं। हरगौरी सिंह जनसंघ का झंडा उठा लेता है। चरित्तर कर्मकार कम्युनिस्ट पार्टी का पताका लेकर मेरीगंज की राजनीति में सक्रिय हैं। कांग्रेस, सुशलिंग, कम्युनिस्ट और जनसंघ जैसे प्रमुख राष्ट्रीय दलों के कार्यकर्ताओं की सक्रियता मेरीगंज के समाज में व्याप्त सामाजिक द्वंद्व और अन्तर्विरोध का प्रमाण है। 

यह आईना है पराधीन भारत में 24 अगस्त 1946 को बनी कांग्रेस की पहली अंतरिम सरकार के वक्त की सामाजिक गतिशीलता का; जिसमें भारतीय लोकतंत्र के रूप-स्वरूप और उसकी दिशा एवं दशा प्रदर्शित होती है। मेरीगंज जैसे गतिशील कथानक में लेखक की अनुभूति भी निहित है। स्वतंत्रता आन्दोलन, किसान आन्दोलन, समाजवादी आन्दोलन, और नेपाल की क्रांति में सक्रिय रहे रेणु ने राजनीतिक अनुभूतियों को पिरोकर “मैला आँचल” के कथानक को रचा है। अंचल विशेष के कथानक पर केन्द्रित कथा में राष्ट्रीय नीति-राजनीति और वैश्विक-वैज्ञानिक प्रगतियों का भी पर्यवेक्षण और मूल्यांकन निहित है। ग्लोबलाइजेशन के दौर में मेरीगंज के लिए “अंचल” के बजाय “ग्लोबल रीजन” कहना उपयुक्त है। -अनंत (www.forwardpress.in)
 

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