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5 साल में भीतर की सारी सरसता सूख गई...
17-Jun-2020 10:18 PM 8
5 साल में भीतर की सारी सरसता सूख गई...

अमिता नीरव

मैं लगभग हर दिन खुद से सवाल पूछती हूँ कि मुझे इस सरकार से क्या दिक्कत है और मैं इसका विरोध क्यों करती हूँ?
बीते पांच सालों में एक-एक करके सारे रिश्तेदार दूर होते चले गए हैं। बचपन के दोस्तों ने ब्लॉक कर दिया कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दोस्तों ने कन्नी काटनी शुरू कर दी है। दफ्तर के साथी राजेश की लिस्ट में हैं मेरी नहीं। जो लोग मेरी नॉन पोलिटिकल पोस्ट के प्रशंसक थे, उनमें से कई मुझे अनफ्रेंड कर चुके हैं, कइयों ने अनफॉलो किया हुआ है।
मेरा शहर मुझे नहीं जानता है और जो जानता है वो मानता नहीं है। शहर में तमाम आयोजन होते हैं, कहीं से मुझे कोई बुलाता नहीं है।
अब तो हाल ये हो गए हैं कि कई बार राजेश भी चिढ़कर कह देते हैं कि तुम भयानक पॉलिटिकल हो रही हो।
मैं हर दिन खुद से सवाल पूछती हूँ कि मैं सरकार का विरोध क्यों करती हूँ?
मेरी प्रतिबद्धता किसी विचारधारा के प्रति नहीं, किसी दल और किसी व्यक्ति के प्रति भी नहीं है।
मेरी प्रतिबद्धता बेंथम के अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख के प्रति है।
गाँधी के अंतिम व्यक्ति के प्रति है।

नेहरू की धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिकता के आग्रह के प्रति है।
अंबेडकर के सामाजिक न्याय और मार्क्स की आर्थिक समानता के प्रति है।
मिल की स्वतंत्रता के प्रति है। एवलिन की इक्वेेलिटी इन डिग्निटी के प्रति है।
मेरी प्रतिबद्धता, नदी-पहाड़-हवा-पंछी के प्रति है। आदिवासियों और उनकी संस्कृति के प्रति है। सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और दार्शनिक विरासत के प्रति है। इस देश की विविधता के प्रति है। परंपरा, संस्कृति, दर्शन, समाज के प्रति है।
नहीं जानती कि कौन-सी विचारधारा इसे समेटे हैं। यह भी नहीं जानती कि कौन-सा दल या कौन-सी व्यवस्था इसे पूरा कर पाएगी। आपको ये यूटोपिया लग रहा होगा, मुझे भी लगता है। मगर ये मेरा चुनाव नहीं है। यदि मुझे चुनने का मौका मिलता तो मैं भी सत्ता के साथ खड़ा होना ही चुनती, क्योंकि उसमें ही सबसे ज्यादा सुविधा है। उसमें सारे मौके मिलते हैं, बहुत सारे अवसर और बहुत सारी प्रतिष्ठा। प्रतिरोध में लगातार अकेले पड़ते जाते हैं।
मैं लगातार अकेली होती जा रही हूँ।
अभी जब मैं अपनी ही लिखी प्रेम कहानियों को या फिर दार्शनिक पीसेस को पढ़ती हूँ तो यकीन नहीं कर पाती हूँ कि ये मैंने ही लिखे हैं। इन पांच सालों में मेरे भीतर की सारी सरसता सूख गई है। अब ये कल्पना भी नहीं कर पाती कि कभी कोई प्रेम कहानी लिख पाऊँगी। कभी प्रकृति को लेकर मीठा और सरस पीस लिख पाऊँगी। अजीब-सी नकारात्मकता में रहने लगी हूँ।
इस प्रतिरोध में जितना परिश्रम और जितनी ऊर्जा खर्च हो रही है उसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। मेरी अपनी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है। कोई आए, रहे ज्यादा फर्क नहीं।
फिर भी क्यों विरोध करती हूं!
क्योंकि मेरी प्रतिबद्धता मेरा चुनाव नहीं है, मेरी आंतरिक मजबूरी है। (फेसबुक पोस्ट)

-अमिता नीरव

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