संपादकीय

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : मजाक से परे गोबर की  अर्थव्यवस्था गांवों को कर सकती है मदद...

गोबर से कमाई की योजना को किसी को नजर न लग जाए इसलिए बिलासपुर के फोटोग्राफर सत्यप्रकाश पाण्डेय ने यह तस्वीर गढ़ी है।

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : मजाक से परे गोबर की अर्थव्यवस्था गांवों को कर सकती है मदद...
28-Jun-2020 6:31 PM

छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के तौर-तरीके कांग्रेस की आम राज्य सरकारों से कुछ हटकर हैं। यह सरकार इस राज्य में प्रचलित जनमान्यता के मुताबिक राम वनगमन पथ को पर्यटन के लिए विकसित करने की बात कर रही है, गांव-गांव में उसने पशुओं, जिनमें अधिकतर गायें ही हैं, उनके लिए दिन में रहने और खाने-पीने के इंतजाम में बड़ी रकम खर्च की है, अब वह गोबर खरीदने जा रही है जिससे पशु आधारित अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम मिल सकता है। अब राम से लेकर गाय तक, और गोबर तक, ये तमाम तो  भाजपा के पसंदीदा भावनात्मक-प्रतीक रहे हैं, और इन्हें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एक बड़े पैमाने पर काम में ला रहे हैं। इस सिलसिले में पिछली भाजपा सरकार में लंबे समय तक ताकतवर मंत्री रहे हुए, आज के राज्य के गिने-चुने भाजपा विधायकों में से एक, अजय चंद्राकर ने गोबर को लेकर अटपटा हमला किया है, जो गौभक्त पार्टी से निकला हुआ नहीं दिख रहा। 

सरकार का गोबर खरीदना एक मजाक जैसा भी लग सकता है, लेकिन गांधी से लेकर आरएसएस तक, ऐसी एक लंबी सोच रही है कि गाय आधारित, पूरी तरह स्वदेशी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था बहुत सी दिक्कतों का हल हो सकती है। अभी हम सरकारी गोबर खरीद के कारोबारी पहलू का अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार की इस योजना से कुल मिलाकर गांव और गरीब इन दो का फायदा होगा। अब फायदा इन तक पहुंचते हुए बीच में लोग उसका बड़ा हिस्सा रख लें, तो उस पर निगरानी रखना एक बड़ा मुश्किल काम होगा, लेकिन गोबर शब्द को लेकर अजय चंद्राकर के बयान से चाहे जितनी ही हिकारत निकली हो, गोबर शब्द इस देश के गांवों का एक प्रतीक है, और आज जब शहरों से करोड़ों मजदूर अपने गांवों को लौटे हैं, तो गांव आधारित अर्थव्यवस्था पर फिर से सोचने, और गंभीर कोशिश करने की जरूरत है। हमने इसी जगह पिछले तीन महीनों में दो-चार बार इस बात पर जोर दिया है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कुटीर उद्योग, गांव आधारित कृषि से जुड़े दूसरे कई तरह के काम, फल-फूलों की खेती, रेशम के कीड़ों से लेकर लाख के कीड़ों तक, और मधुमक्खियों तक को पालने की तकनीक, ऐसी सैकड़ों बातें हैं जो लोगों को गांव में जिंदा रहने में मदद कर सकती हैं, और जो उनकी जिंदगी को बेहतर भी बना सकती हैं। छत्तीसगढ़ जैसा राज्य तो भरपूर खेतिहर-मजदूरी वाला राज्य है, इसने मनरेगा जैसी मजदूरी-योजना में भी अच्छा काम किया है, गांव-गांव में गोठान बनाने में भी लोगों को काम मिला है, और अब अगर गोबर को हम एक प्रतीक के रूप में मानें, तो इसे भी आर्थिक रूप से मुमकिन बनाना सरकार के लिए एक अच्छी चुनौती हो सकती है। यह समझना चाहिए कि आज शहर केन्द्रित अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन लॉकडाऊन में फ्लॉप साबित हो चुके हैं, अमानवीय साबित हो चुके हैं, और करोड़ों लोग गांवों तक वापिस आए हैं। इसे हम कोई स्थायी व्यवस्था नहीं मानते क्योंकि लोग फसल के बाद शहरी, कारोबारी और औद्योगिक रोजगार में लौटने भी लगेंगे, क्योंकि गांव में मजदूरी उतनी नहीं मिलेगी। इसके बावजूद सरकार को मजदूरी से परे भी गांवों में ऐसे आर्थिक अवसर उपलब्ध कराने चाहिए जिससे लोग अगर चाहें तो वे गांव में रहकर कमा-खा सकें, और मनरेगा की मजदूरी से बचे हुए दिनों का भी इस्तेमाल कर सकें।
 
हिन्दुस्तान में परंपरागत रूप से इतने ग्रामीण उद्योग, और ग्रामीण-काम चलते आए हैं कि वे खेती के साथ मिलकर गांवों को आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रहे थे। लेकिन शहरी जिंदगी की चकाचौंध और वहां आगे बढऩे के मौकों ने गांवों से लोगों को शहर की तरफ दौड़ा दिया था, आज भी यह सिलसिला चल रहा है। गांव आज भी सामाजिक अन्याय का डेरा हैं, वे अभी भी छुआछूत और जात-पात, लैंगिक असमानता का केन्द्र हैं। ऐसे में शहर से आए हुए लोगों को गांवों में बांधकर रखना आसान तो नहीं होगा, लेकिन यह एक ऐसा मौका है जब दूसरे प्रदेशों में अधिक मेहनत करके जीने वाले मजदूरों को अपने ही गांवों में जिंदा रहने का एक मौका दिया जा सकता है, और इसके साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विकसित भी किया जा सकता है। इस देश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा लंबा इतिहास अच्छी तरह दर्ज है, इसलिए हम उसे यहां अधिक खुलासे से गिनाना गैरजरूरी समझते हैं, लेकिन सरकार को इसे बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाना चाहिए। देश में ग्रामीण विकास के, डेयरी के बहुत से संस्थान हो गए हैं। देश में लाखों एनजीओ भी इस काम में लगे हैं। आईआईटी से लेकर आईआईएम तक तकनीक विकसित करने का काम हुआ है जिनसे हाथों का काम करने के औजार, गांवों की उपज, फसल में वेल्यूएडिशन के लिए फूड प्रोसेसिंग जैसे काम की अपार संभावना है। आज छत्तीसगढ़ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर धान की सरकारी खरीदी में मिलने वाले मोटे बोनस पर आधारित हो गई है, इसके साथ-साथ गरीब की जिंदगी रियायती चावल से चल रही है। इन दो किस्मों की रियायतों को अनंतकाल तक चलाने के बजाय लोगों की कमाई बढ़ाना एक बेहतर रास्ता है, और गोबर कामयाब हो या न हो, सरकार का रूझान गरीब और ग्रामीण के भले के लिए रहना चाहिए, और इसके कई दूसरे तरीके भी निकाले जा सकते हैं। यह भी समझने की जरूरत है कि गोबर से बनने वाले छेना और कंडे का बड़ा इस्तेमाल हिन्दू अंतिम संस्कार में किया जा सकता है। इसी राज्य में राजनांदगांव में सारे अंतिम संस्कार सिर्फ छेने से होते हैं, और लकड़ी का जरा भी इस्तेमाल नहीं होता। सरकार की दखल से ऐसा इस्तेमाल बढ़ सकता है, और खेतों में भी गोबर की खाद काम आ सकती है। आगे देखना है कि सरकार इसमें कितनी कामयाब होती है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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