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कृष्णा सोबती से खटास और मिठास
कृष्णा सोबती से खटास और मिठास
29-Jun-2020 6:13 PM

पहले ही स्वीकार करूँ, मैं कृष्णा सोबती के नजदीकियों में कतई नहीं था मगर उनके साथ कुछ खट्टे-मीठे अनुभवों का साझीदार रहा हूँ। खट्टे इतने खट्टे भी नहीं थे कि उनमें आम जैसी मिठास न घुली हो और रिश्तों में हमेशा के लिए कड़ुवाहट पैदा हो जाए।

यूँ तो मेरी पीढ़ी का साहित्य का कौन सा गंभीर पाठक उन्हें बहुत शुरू से न जानता रहा हो, उसने उन्हें पढ़ा न हो। मैंने भी छात्र जीवन से ही उन्हें पढऩा शुरू किया था।दिल्ली आया तो जब नौकरी की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था तो कुछ तो उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट करने के लिए और कुछ नौकरी में सहायक बन सकने की व्यर्थ आशा इधर- उधर भटकाती रहती थी, उस आशा में भी उनसे मिला था, हालांकि याद आता है, मैंने इसका जिक्र उनसे नहीं किया था। तब वह दिल्ली के पुराने सचिवालय के परिसर में बैठती थीं। फिर यदाकदा उनसे नमस्कार, कैसी हैं, कैसे हैं, होता रहा।फिर संयोग कि वह हमारे पड़ोस में ही रहने आ गईं। पहले हिन्दुस्तान टाइम्स अपार्टमेंट में और बाद में पूर्वाशा अपार्टमेंट में। वह शाम के समय बाजार में कुछ सौदासुलूफ लेती दिख जाती थीं। कभी हम पति-पत्नी होते और कभी पत्नी अकेली जातीं तो उनसे भी बहुत मजे- मजे से बात करतीं। हमें घर भी बुलातींं। हम दोनों दो-तीन बार उनके यहाँ गए भी। उन्होंने खूब बातें कीं। मैं भी अलग से गया हूँ। हर बार खानेपीने की बढिय़ा चीजें पेश की जातीं। अकेले गया तो रसरंजन भी करवाया।उनके यहाँ खानेपीने की उम्दा चीजें ही होती थीं। धीमे सुर में बातें करने का उनका अंदाज़ था। संस्मरणों का उनके पास खजाना था। हाँ कभी इतने धीमे बोलती थीं कि बीच में कुछ ऐसा भी रह जाता था,जो पूरी तरह समझ में नहीं आता था। वह बीच- बीच में खुलकर ठहाका भी लगातीं मगर ऐसा नहीं कि पूरा घर ठहाकों से गूँज जाए। घंटे -दो घंटे मजे से बीतते। ऐसा शायद कभी नहीं हुआ कि उन्होंने खुद अपनी रचनाओं की बात की हो। अंत के कुछ महीनों में उनसे मुलाकातें नहीं हुईं। कभी पता चलता, वह अस्पताल में हैं, कभी उनका स्वास्थ्य साथ नहीं देता था कि मुलाकात हो सके।

उन्होंने आज की स्थिति पर दो लंबे आलेख लिखे थे,जो ओम थानवी के संपादन में, जनसत्ता,  में बहुत सम्मान के साथ खबर की तरह महत्व देते हुए पहले पृष्ठ पर छपे थे। ये आलेख उन्होंने पूरे साहस के साथ लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष मूल्योंं की हिफाजत में लिखे थे। अशोक वाजपेयी-थानवी के संयुक्त आयोजन में मावलंकर हाल में जो दो विशाल सभाएँ हुईं, उसमें से एक में उन्हें तिपहिया साइकिल से मंच पर ले जाया जाते देखा था। वहाँ से उन्होंने अपना लिखित वक्तव्य पढ़ा। इसके समाप्त होने के बाद खचाखच भरे हाल में लोगों ने खड़े होकर करतलध्वनि से बड़ी देर तक उनका जो स्वागत और सम्मान किया, वह अप्रतिम था। मैंने कभी किसी भी लेखक का इस तरह का सम्मान नहीं देखा।वे कुछ मिनट हमेशा यादगार रहेंगे।

अब कुछ खट्टे अनुभव, उनकी मिठास के साथ।तब मैं हुआ करता था, कादम्बिनी, का कार्यकारी संपादक मगर मेरी संपादक मृणाल पांडेय ने पहले ही दिन से यह स्पष्ट कर दिया था कि आप समझिए कि आप ही इसके संपादक हैं। खैर मैंने सोबतीजी से एक बार कहा कि आप हमारे लिए कोई संस्मरण लिखिए। वह राजी हो गईं।उसे अगले ही अंक में जाना है, इस आग्रह के साथ उनसे लिखने के लिए कहा था और वह तारीख भी बताई थी, जब तक वह लिख सकें तो आगामी अंक में हम छाप सकेंगे। जहाँ तक याद आता है 17 तारीख तक अगला अंक तैयार होकर संपादकीय विभाग की ओर से प्रेस में चला जाता था और उसी महीने की 25-26 तारीख तक छपकर बाजार में आ जाता था। मैंने अंदाजन कुछ पेज सोबती जी के संस्मरण के लिए छोड़ रखे थे मगर उनका संस्मरण मिला-अंक छूट जाने के बाद।

व्यावसायिक पत्रिकाओं की अपनी मजबूरियाँँ होती हैं, वह संस्मरण उस अंक में न जा सका और मुझसे यह चूक हुई कि मैं सोबती जी को यह बता न सका। बता देता तो शायद मामला सुलझ जाता या संभव है, तब भी न सुलझता।जब अंक उनके पास गया तो उन्होंने देखा, वह संस्मरण नदारद है। शाम को उनका फोन आया कि वह छपा नहीं। मैंने कारण समझाया और कहा कि विलंब से मिला, इसलिए अगले अंक में छपेगा। काफी समझाने पर वह मान गईं, हालांकि अमृता प्रीतम से उपन्यास के नाम में,  जिंदगीनामा, शब्द के इस्तेमाल पर लंबी कानूनी लड़ाई में उलझीं सोबतीजी को आशंका यहाँ तक थी कि इसे अमृताजी ने रुकवाया होगा।मेरी अमृता जी से न जीवन में कभी मुलाकात हुई, न उन्हें देखा कभी। इच्छा ही पैदा नहीं हुई। न अमृता जी के पास ऐसा जासूसी तंत्र रहा होगा कि वह जान सकें कि कादम्बिनी में क्या छपने जा रहा है। यह बात सोबती जी को बताई भी। यह लंबा-खर्चीला मुकद्दमा लडऩे से पैदा हुई थकावट और खीज रही होगी कि सोबती जी ने इस तरह भी सोचा।

खैर उस समय तो मान गईं, मैं उस रात चैन की नींद सोया। सुबह फिर उनका फोन आया,नहीं वह नहीं छपेगा। उन्हें फिर से समझाना व्यर्थ साबित हुआ। दुख तो बहुत हुआ मगर मैं बेबस था।वह छपा नहीं।

दूसरा वाकया तब हुआ, जब मैं, शुक्रवार, में था।मेरे पास एक फ्रीलांसर यह सुझाव लेकर आए कि वह लेखकों से बात कर एक सीरीज लिखना चाहेंगे कि इन दिनों वे क्या लिख -पढ़ रहे हैं। मैंने कहा, बढिय़ा है, लिखिए लेकिन हमारे एक पेज से अधिक नहीं, चूँकि यह बुनियादी रूप से राजनीतिक -सामाजिक पत्रिका है। शीर्षक और फोटो के बाद करीब आठ सौ शब्दों की गुंजाइश बचती है। वे लाए भी एक- दो लिखकर दूसरे कुछ लेखकों के बारे में मगर मैंने कहा कि पहले दो- तीन वरिष्ठ लेखकों से बात करके लिखकर लाइए, फिर हम इन्हें भी छाप देंगे।

उन्होंने सोबतीजी से संपर्क किया,वह राजी हो गईं। बहुत से लोग जानते हैं कि सोबती जी मुँहजबानी कुछ कह कर साक्षात्कारकर्ता पर सबकुछ नहीं छोड़ती थीं। फुलस्केप कागज पर बड़े-बड़े अक्षरों में खुद लिख कर देती थीं।उन्होंने लिखा, जो शुक्रवार, के तीन पेज का था। यह मेरी गलती ही थी मगर मैंने कहा इतना लंबा छापना तो मुश्किल है। शायद सोबती जी इसे छोटा कर दें। वैसे भी मुझे वह कुछ उलझा हुआ सा लगा था।वे हाँ करके गए मगर कुछ ऐसा हुआ कि सहयोगी, बिंदिया, पत्रिका की संपादक के पास गए तो उन्होंने वह आलेख पूरा छापना स्वीकार कर लिया और छाप दिया।वह अंक जब सोबती जी के पास पहुँचा तो वह मुझ पर आगबबूला हुईं कि मैंने तुम्हारी पत्रिका के लिए दिया था, तुमने, बिंदिया, पत्रिका को कैसे सौंप दिया? यह तुमसे किसने कहा था फिर सफाई दी कि इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं है, मुझे स्वयं छपने पर पता चला है लेकिन वह विश्वास करें, तब तो!

उनके साथ हुई खटास कभी लंबी नहीं चली। पता नहीं कैसे और कब मिठास फिर लौट आई। उनसे मिलना होता रहा।उन्होंने राजकमल प्रकाशन से, जनसत्ता, में प्रकाशित आलेखों की दो पुस्तिकाएँ छपवाने से पहले उनके संपादन का दायित्व एक-एक कर मुझे सौंपा। मैंने यह काम स्वीकार तो कर लिया मगर बेहद डरते- डरते, बहुत जरूरी होने पर ही कलम चलाई, ताकि फिर कोई समस्या पैदा न हो मगर यह सच उन्हें बताया नहीं। बाद में एक बार मिलने पर उन्होंने किसी संदर्भ में कहा कि मैं जिसे संपादन का दायित्व देती हूँ, उसे पूरी स्वतंत्रता देती हूँ। मन ही मन मैं पछताया मगर मैंने उन्हें नहीं बताया कि मैं कितना डरा हुआ था।

एक बार, हंस, में विश्वनाथन त्रिपाठी और मेरी बातचीत छपी। उसके बाद उन्होंने मेरे घर दो टेबललैंप भिजवाए। एक मेरे लिए, एक त्रिपाठी जी के लिए।बिस्तर पर अधलेटा होकर देर रात को उसी की रोशनी में कई बार कुछ लिखता - पढ़ता रहता हूँ।

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