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कांवर
कांवर
09-Aug-2020 12:26 PM

कांवर बांस का वह मोटा व लम्बा डण्डा, जिसके सिरे पर बंधे छींकों में वस्तुएं रखी जाती हैं तथा जिसे कन्धे पर रखकर वस्तुएं ढोते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि वह डण्डा जिसके सिरों पर टोकरियां बांधते हैं तथा विशेष पर्वों पर उनमें गंगाजल आदि रखकर तीर्थयात्री ले जाते हैं।  
ऐसी मान्यता है कि भारत की पवित्र नदियों के जल से अभिषेक किए जाने से शिव प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं। कांवर संस्कृत भाषा के शब्द कांवांरथी  से बना है। यह एक प्रकार की बहंगी है, जो बांस की फट्टी से बनाई जाती है। माना जाता है कि पहला कांवरिया  रावण था। श्रीराम ने भी भगवान शिव को कांवर चढ़ाई थी। 
कांवर उठाने वाले भगवान शिव के भक्तों को कांवरिया  कहते हैं। कांवरियों के कई रूप और कांवर के कई प्रकार होते हैं। उनके तन पर सजने वाला  गेरुआ मन को वैराग्य का अहसास कराता है। ब्रह्मचर्य, शुद्ध विचार, सात्विक आहार और नैसर्गिक दिनचर्या कांवरियों को हलचल भरी दुनिया से कहीं दूर भक्ति-भाव के सागर किनारे ले जाते हैं।
कांवर के प्रकार
सामान्य कांवर - सामान्य कांवरिए कांवर -यात्रा के दौरान जहां चाहे रुककर आराम कर सकते हैं। आराम करने के दौरान कांवर स्टैंड पर रखी जाती है, जिससे कांवर जमीन से न छुए।
डाक कांवर- डाक कांवरिया कांवर यात्रा की शुरुआत से शिव के जलाभिषेक तक लगातार चलते रहते हैं, बगैर रुके। शिवधाम तक की यात्रा एक निश्चित समय में तय करते हैं। यह समय अमूमन 24 घंटे के आसपास होता है। इस दौरान शरीर से उत्सर्जन की क्रियाएं तक वर्जित होती हैं।  डाक कांवड़ जाने वाली टोली में शामिल एक या दो सदस्य लगातार जल हाथ में लेकर दौड़ते रहते हैं। एक सदस्य के थक जाने पर दूसरा सदस्य जल लेकर दौड़ता है। टोली में शामिल कुछ सदस्य बाइकों पर सवार होकर रास्ता साफ कराते चलते हैं।
खड़ी कांवर- कुछ भक्त खड़ी कांवरर लेकर चलते हैं। इस दौरान उनकी मदद के लिए कोई-न-कोई सहयोगी उनके साथ चलता है। जब वे आराम करते हैं, तो सहयोगी अपने कंधे पर उनकी कांवर लेकर कांवर को चलने के अंदाज में हिलाते-डुलाते रहते हैं। 
दांडी कांवर - ये भक्त नदी तट से शिवधाम तक की यात्रा दंड देते हुए पूरी करते हैं। मतलब कांवर पथ की दूरी को अपने शरीर की लंबाई से लेटकर नापते हुए यात्रा पूरी करते हैं। यह बेहद मुश्किल होता है और इसमें एक महीने तक का वक्त लग जाता है। 
झांकी कांवर- समय में परिवर्तन के साथ कांवड़ यात्रा में बदलाव आ रहा है। कांवड़ यात्रियों में आजकल झांकी कांवड़ भी चलन में है। शिव भक्त 70 से 250 किलो तक की कांवड़ लाते हैं। झांकियों को लाइटों व आर्टिफिशियल फूलों से सजाया जाता है। झांकियों में शिवलिंग बनाया जाता है और बच्चों को शिव बनाकर झांकी तैयार की जाती है। रोड पर जब शिव भक्त झांकी कांवड़ लेकर गुजरते हैं तो इनको देखने के लिए भीड़ भी जुट जाती है।
दंडवत कांवर- शिव भक्त मनोकामना पूर्ण होने या फिर मनोकामना के पूर्ण होने के उद्देश्य को लेकर दंडवत कांवर भी लाते हैं। इसमें भक्त नदी तट से शिवधाम तक की यात्रा दंड देते हुए पूरी करते हैं। यानी कांवर पथ की दूरी को अपने शरीर की लंबाई से लेट कर नापते हुए यात्रा पूरी करते हैं। यह बेहद मुश्किल होता है और इसमें एक महीने तक का वक्त लग जाता है। 
 

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