संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : आजादी के जलसे की तैयारी के बीच दलित बच्ची की ऐसी रेप-हत्या
16-Aug-2020 4:17 PM 4
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय  :  आजादी के जलसे की  तैयारी के बीच दलित बच्ची की ऐसी रेप-हत्या

दो दिन पहले आजादी की सालगिरह के जलसे की तैयारी के बीच हमने देश के ऐसे कुछ तबकों को याद किया था जिनके लिए आजादी आज भी नहीं है। जिस 14 अगस्त की दोपहर हम यह लिख रहे थे, और इसके साथ गुजरात के उना में दलितों के साथ हुई हिंसा की तस्वीरों से तिरंगा बना रहे थे, ठीक उसी समय उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खीरी में दिल दहलाने वाली एक और हिंसा दलितों के साथ हो रही थी। तेरह बरस की एक बच्ची दोपहर शौच के लिए गन्ने की खेतों की तरफ गईं, और उसके साथ दो युवकों ने बलात्कार किया, उसकी जीभ काट ली, उसकी आंखें निकाल लीं, और उसके गले में फंदा डालकर खेत में घसीटा, और फिर उसे मार डाला।  गांव के ही संतोष यादव और संजय गौतम पर रेप का आरोप लगा है, और पुलिस ने पोस्टमार्टम में गैंगरेप पाए जाने के बाद इन दोनों को रेप-हत्या में गिरफ्तार कर लिया है। 

हिन्दुस्तान में परिवार और जान-पहचान से परे जितने बलात्कार होते हैं, उनके पीछे एक बात खुलकर दिखती है कि वे समाज में ऊंची समझी जाने वाली जातियों के लोगों द्वारा उनसे नीची समझी जाने वाली जातियों के लोगों पर किए जाते हैं। ऐसा ही कुछ हत्या या हिंसा के दूसरे मामलों में भी होता है कि अपने से कमजोर जाति पर हिंसा के मामलों में दिखता है, हालांकि प्रदेशों की सरकारें और भारत सरकार के आंकड़े ऐसी व्यक्तिगत हिंसा के पीछे जाति के आधार पर विश्लेषण करके सामने रखते नहीं हैं, लेकिन आए दिन आने वाली ऐसी खबरों को देखें तो यह बात साफ दिखती है कि सबसे अधिक निजी हिंसा इस देश में दलितों के खिलाफ होती है, उसके बाद आदिवासियों के खिलाफ, और उसके बाद दूसरी कमजोर जातियों के खिलाफ। जो लोग जातिवादी व्यवस्था के अस्तित्व को मानना नहीं चाहते, वे इसके खिलाफ कुछ तर्क आसानी से ढूंढकर निकाल सकते हैं कि ऐसी हिंसा किसी जाति के आधार पर नहीं होती, बल्कि संपन्नता के आधार पर होती है, और संपन्न लोग विपन्न लोगों के साथ ऐसी ज्यादती इसलिए अधिक करते हैं क्योंकि वे प्रतिरोध करने की हालत में नहीं रहते। हो सकता है कि ऐसा हो, लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि दलित आबादी का अधिकांश हिस्सा सबसे गरीब है, उसके बाद आदिवासियों का अधिकांश हिस्सा गरीब है। लेकिन आदिवासियों के साथ एक बात रहती है कि उन्हें हिन्दू समाज का सवर्ण हिस्सा अछूत नहीं मानता, और उनके साथ उतने जुल्म उन्हें जरूरी नहीं लगते जितने कि दलितों के साथ लगते हैं। मध्यप्रदेश में आज भी बहुत से इलाकों के किसी भी गांव में कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर चढक़र नहीं निकल सकता, और हर बरस ऐसे में हिंसा की कई वारदातें सामने आती हैं, पुलिस की सुरक्षा में ऐसी बारात निकाली जाती है, और अभी कुछ समय पहले की तस्वीरें याद पड़ती हैं जिनमें घोड़ी पर चढ़ा दलित दूल्हा, और हिफाजत करते चल रही पुलिस सवर्ण पत्थरों से बचने के लिए हेलमेट लगाए हुए थे। 

लेकिन उत्तरप्रदेश में अभी जिस दलित बच्ची के साथ यह बलात्कार और हिंसा हुई है, उसे देखकर कुछ और बातों पर भी सोचने को दिल करता है। पहली बात तो यह कि क्या ऐसे जुर्म देखते हुए भी हमें मौत की सजा के खिलाफ अपनी सोच को बदल नहीं देना चाहिए? हमारी सोच महज सोच है, देश का कानून तो ऐसे बलात्कारी-हत्यारों को मौत की सजा दे ही सकता है क्योंकि आज उसका प्रावधान है। बच्ची से सामूहिक बलात्कार, उसके बाद उसकी जीभ काटना, उसकी आंखें निकालना, उसे खेत में घसीटना, और उसे मार डालना, ये सारे काम मौत की सजा से कम किसी लायक नहीं हैं, और जब कभी इस पर फैसला आएगा, हमारा अंदाज है कि मौत की सजा ही होगी। लेकिन उससे कमजोर तबकों पर, कमजोर जातियों पर, बच्चियों पर खतरा कम नहीं हो जाता। उत्तर भारत और मध्यप्रदेश ऐसी दलित ज्यादतियों की अधिक वारदातों वाले राज्य हैं। उत्तरप्रदेश के बारे में यह कहा जाता है कि वहां पुलिस का साम्प्रदायीकरण भी हुआ है, और जातिकरण भी हुआ है। समाजवादी पार्टी के मुलायम-अखिलेश की सरकारों के चलते वहां की पुलिस का यादवीकरण लिखा जाता था। अभी पुलिस की धर्मान्ध और जातिवादी सोच के चलते अल्पसंख्यक तबके, और दलित लगातार समाज और पुलिस दोनों के निशानों पर बने हुए हैं। यह सिलसिला खत्म करने की नीयत उत्तरप्रदेश की किसी पार्टी में नहीं दिखती है, और कमोबेश यही हाल मध्यप्रदेश में भी है। 

दलितों और आदिवासियों की हिफाजत के लिए अलग से कानून बने हुए हैं, और अभी कुछ समय पहले उसके कुछ प्रावधानों की धार भोथरी करने की कोशिश की गई थी, लेकिन पूरे देश में उसका जमकर विरोध हुआ, और वह सिलसिला वापिस लेना पड़ा। दिक्कत यह है कि सरकार, संसद, और न्यायपालिका, मीडिया और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं में अगर इन कमजोर तबकों के लोग भी बैठे हुए हैं, तो भी वे खुद ताकत पाकर सत्ता की एक सोच से लैस हो जाते हैं, और जिन तबकों से वे आते हैं, उनके वर्गहित के खिलाफ काम करने लगते हैं।
 
पिछले दो दिनों से देश में आजादी के बहुत गीत गाए जा रहे हैं, प्रधानमंत्री ने भी कल आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास का सबसे लंबा भाषण दिया है। लेकिन देश में दलितों की जो हालत है, उन पर हिंसा की वारदातों के चलते हुए भी प्रधानमंत्री सहित बहुत से नेताओं के मुंह नहीं खुलते हैं। गुजरात के उना में दलितों पर जुल्म के जो नजारे सामने आए, उन्होंने पूरी दुनिया में हिन्दुस्तान के लिए शर्मिंदगी पैदा की थी। लेकिन इस देश में फैसले लेने की ताकत रखने वाले तबकों को कोई शर्म नहीं आती, उन्हें आजादी के जलसे मनाने में फख्र जरूर होता है।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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