संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : गंदे पानी को छुपाने के लिए जलकुंभी से सतह को पाट देना आसान
24-Aug-2020 8:49 PM 6
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : गंदे पानी को छुपाने के  लिए जलकुंभी से सतह  को पाट देना आसान

जिस तरह पानी की सतह पर जब जलकुंभी फैल जाती है, और उसके नीचे यह भी नहीं दिखता कि पानी है कि कोई और कचरा है। यह तो दूर की बात है कि उस पानी के नीचे तलहटी में कोई मोती हैं और वे दिख जाएं। ठीक उसी तरह आज हिन्दुस्तान में खबरों का हाल है। कल से देश का मीडिया टूट पड़ा है कि मोदी जिस मोर को दाना खिला रहे हैं, उस वक्त मोदी के बाल इतने कम क्यों दिख रहे हैं? प्रधानमंत्री निवास से बनकर जो वीडियो बाहर आया है, वह वीडियो कैसे बना, उसने मोदी ने कितनी पोशाकें बदलीं, प्रधानमंत्री निवास के भीतर मोरों का दिखना कोई नियम तोड़ रहा है या नहीं, ऐसी कई बातें कल से चारों तरफ छाई हुई हैं। कार्टूनिस्ट भी जमकर पिल पड़े हैं, और सोशल मीडिया पर लोग इसी पर बहस कर रहे हैं। इससे परे देश के वित्तमंत्री बनने की हसरत लिए हुए दुनिया के हर मुद्दे पर अपनी जानकार राय वाले हमलों के योद्धा सुब्रमण्यम स्वामी अब सुशांत राजपूत की मौत पर टूट पड़े हैं, और जांच करती सीबीआई को शर्मिंदा करने लायक जांच कर रहे हैं, जानकारियां ट्विटर पर पोस्ट कर रहे हैं। फिर मानो यह भी काफी न हो तो बलात्कार का एक आरोपी नित्यानंद जिसने कि देश से फरार होकर कहीं एक टापू खरीदकर कैलाश नाम का एक देश बनाने की घोषणा की थी, वह अब वहां अपनी करेंसी के बाद अपनी हिन्दू संसद बनाने की घोषणा कर चुका है। पूरा देश हर किस्म की गैरजरूरी खबरों में डूब गया है, जितने गहरे पानी में बिहार की गरीब जनता डूबी हुई है, उससे बहुत अधिक गहरे इस देश की जनता गैरजरूरी अफवाहों और गॉसिप में डूबी हुई हैं। 

दरअसल एक वक्त अखबारों का जो मीडिया लोगों तक समाचार, और समाचार से जुड़े विचार पहुंचाने का जरिया था, उसकी जगह को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, और डिजिटल मीडिया ने ऐसा अवैध कब्जाया है कि अब चतुर और धूर्त नेताओं और पार्टियों के परसेप्शन मैनेजमेंट के लिए प्रिंट की जरूरत नहीं पड़ती, टीवी चैनलों के गलाकाट मुकाबले में जितनी भी अधिक बेबुनियाद बात उछाली जाए, वह उतनी ही तेजी से लपकी जाती है, और फिर डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया भी चैनलों के किए शिकार में से हड्डियों में चिपके मांस को नोचने के लिए तैयार रहते हैं। कभी-कभी उल्टा भी होता है कि सोशल मीडिया या डिजिटल मीडिया शिकार करते हैं, और टीवी चैनल उसके कंकाल में चिपके कुछ टुकड़ों को नोंचते रह जाते हैं। अखबारों को समझ ही नहीं पड़ता कि ऐसे मुकाबले में वे कहां खड़े रहें, क्या करें, और ऐसे में कई बार वे प्रिंट की परंपरागत जिम्मेदार सोच को छोडक़र शिकार की लाश में मुंह मारने में लग जाते हैं। अब यह मुकाबला इस दर्जे का हो गया है कि इसमें पानी में डूबे हुए लोग, बिना इलाज मरते हुए लोग, बिना पीपीई किट के अस्पतालों में ड्यूटी करते डॉक्टर-नर्स, नौकरी खो चुके लोग, बिना मजदूरी भूखों मरने के करीब लोग किनारे बैठे या लेटे हुए यह देख रहे हैं कि इस देश का तथाकथित मीडिया, और सोशल मीडिया किस किस्म की मुद्दों पर गलाकाट मुकाबले में लगे हुए हैं। इसके बीच कुछ-कुछ देर के लिए खबरें ऐसी आती हैं कि दस कदम पीछे उनका खंडन भी दौड़ते हुए आते ही रहता है। दाऊद पाकिस्तान में है, और नहीं है, इन दोनों को मिलाकर आधा-एक घंटा गुजर जाता है। राहुल गांधी ने चि_ी लिखने वालों को भाजपा के साथ मिला हुआ कहा, और नहीं कहा, इन दोनों के बीच कपिल सिब्बल जैसे लोग राहुल पर टूट पड़े, अपना राजनीतिक-धर्मनिरपेक्ष जनेऊ निकालकर दिखाने लगे, और बिहार की बाढ़ में इतनी देर में और कुछ हजार लोग बेघर हो गए। 

किसी देश में वहां के लोगों की जिंदगी से जुड़े हुए असल मुद्दे किस तरह धकेलकर हाशिए पर कर दिए जाते हैं, उसकी आज के हिन्दुस्तान से बेहतर मिसाल मिलना मुश्किल है। जाने महीना हुआ है, या दो महीने, सुशांत राजपूत की मौत के बाद यह देश उसे राष्ट्रीय मौत साबित करने में जुट गया, केन्द्र और राज्य के संबंध कसौटी पर चढ़ा दिए गए, राज्यों के आपसी संबंध सरहद पर जंग करते खड़े हो गए, और ऐसा लगा कि मीडिया बॉलीवुड के तमाम गंदे कपड़े धोने का धोबीघाट बन गया है। मीडिया में उन सवालों की फेहरिस्त सिलसिलेवार छपने लगी कि सुशांत राजपूत से जुड़े और जुड़ी किन-किन लोगों से पुलिस या सीबीआई, ईडी या मुम्बई पुलिस ने क्या-क्या पूछताछ की है। इस मौत से जुड़े हुए लोगों के बीच आपस में निजी मैसेंजरों पर क्या-क्या बात हुई वह हैरानी की हद तक खुलासे के साथ जांच एजेंसियों से निकलकर मीडिया में छा गई, और देश सुशांत राजपूत की मौत के समारोह में डूब गया। मीडिया के तकरीबन तमाम लोगों ने इस बात की परवाह नहीं की कि निजी बातचीत को क्यों नहीं छापना चाहिए, क्योंकि न छापें तो गंदगी के गलाकाट मुकाबले में बहुत पीछे रह जाएंगे। इसलिए देश कीचड़ फेंकने के इस मुकाबले की रनिंग कमेंटरी करने वाले मीडिया को देखते रह गया, पढ़ते रह गया। 

कहने वाले लोग इसे बहुत पहले से जानते हैं, और कहते हैं कि जब कभी देश के सामने जलते-सुलगते मुद्दे रहते हैं, किस तरह एक पड़ोसी दुश्मन देश से आए कुछ आतंकी पकड़ाते हैं, किस तरह वे बयान देते हैं कि वे हिन्दुस्तान के किन बड़े लोगों को मारने आए थे, किन बड़े शहरों की कौन सी धार्मिक जगहों पर हमले करने वाले थे, और दो-चार दिन मीडिया उसी में डूब जाता है। यह जनधारणा प्रबंधन गजब का है, और मीडिया की इस अघोषित साजिश में भागीदारी करने की बेसब्र और बेचैन हसरत भी गजब की है। देश के जलते-सुलगते असल मुद्दे फुटपाथों पर इंतजार करते हुए बुझे हुए चूल्हों सरीखे हो जाते हैं, और झूठ, अफवाहें, और इन सबसे बढक़र अर्धसत्य, गैरजरूरी सत्य, ये सब उसी तरह धूम-धड़ाके के साथ सडक़ पर से परेड करते निकलते रहते हैं जैसे कि ब्राजील में चकाचौंध मादकता वाली सांबा नर्तकियां सालाना जलसे में निकलती हैं। अब मीडिया और सोशल मीडिया, और मैसेंजर सर्विसों के बीच की विभाजन रेखा झाड़ू लेकर मिटा दी गई है, और इन सारे औजारों का इस्तेमाल परसेप्शन मैनेजमेंट में गजब की पेशेवर खूबी से हो रहा है। इसलिए जिस बिहार में लोग, दसियों लाख लोग बाढ़ से बेघर हैं, उस बिहार को खुश करने के लिए आज यह काफी साबित किया जा रहा है कि सुशांत राजपूत की मौत की जांच मुम्बई पुलिस से छीनकर सीबीआई को दी जा रही है। ऐसे ही तमाम और मुद्दे हैं जो लोगों को असल जलती हुई हकीकत की जमीन पर पांव भी नहीं रखने देंगे क्योंकि उतने सुलगते पैरों के साथ लोग अगर संसद और अदालत की ओर बढ़ चले, तो फिर बगावत सी हो जाएगी। उसके मुकाबले एक मौत का राष्ट्रीयकरण अधिक आसान और अधिक सहूलियत का है।  

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