संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : ..अब जब सावधानी से थकान होने लगी है तब
01-Sep-2020 5:20 PM 11
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय  : ..अब जब सावधानी से  थकान होने लगी है तब

कोरोना के आंकड़ों के साथ-साथ जो दूसरी जानकारी आती है वह पॉजिटिव लोगों के पतों और नाम की वजह से यह साफ कर देती है कि वे एक ही परिवार के लोग हैं। हम रोजाना ऐसे सैकड़ों लोगों के नाम देख रहे हैं जिनमें से एक-एक घर के पांच-दस लोग भी हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक परिवार के एक चूल्हे पर पका खाना खाने वाले करीब दो दर्जन लोग अब तक पॉजिटिव हो चुके हैं। इनमें से हर किसी को अलग-अलग बाहर से संक्रमण नहीं हुआ होगा, बाहर से तो कोई एक-दो लोग ही कोरोना लाए होंगे, लेकिन इसके बाद घर के भीतर ही बाकी लोगों को इनसे संक्रमण पहुंचा होगा। इस खतरे पर हम चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि जो लोग घर के भीतर हैं, जिनका काम बाहर निकले बिना चल जा रहा है, वे लोग अपने आपको महफूज मान लेते हैं, जबकि ऐसा है नहीं। 

जो लोग घर के बाहर जाते हैं वे लोग तो एक बार थोड़ी-बहुत सावधानी बरत भी लेते हैं, मास्क लगा लेते हैं, चीजों को बिना जरूरत छूने से परहेज कर लेते हैं, और हाथों को सेनेटाइज भी कर लेते हैं। लेकिन जब लोग परिवार के बीच घर में रहते हैं, तो बच्चे-बड़े, तमाम लोग एक-दूसरे के साथ संपर्क में आते ही हैं। जब कोरोना फैलना शुरू हुआ तभी डॉक्टरों ने इस बारे में सचेत कर दिया था कि छोटे बच्चे खतरनाक साबित हो सकते हैं क्योंकि एक कोरोना पॉजिटिव हो जाएंगे, तो भी उनमें प्रतिरोधक क्षमता अच्छी रहने की वजह से उनमें कोई लक्षण नहीं दिखेंगे, और वे ऐसे बुजुर्ग दादा-दादी, नाना-नानी, को संक्रमित करने का खतरा बन सकते हैं जो कि अपनी उम्र, कम प्रतिरोधक क्षमता, और कई किस्म की बीमारियों की वजह से अधिक नाजुक रहेंगे। अब यह बात परिवारों के बीच कहने-सुनने में अच्छी नहीं लगती है क्योंकि दादा-दादी, नाना-नानी को तो अपनी जिंदगी ही परिवार के छोटे बच्चों के लिए बची हुई लगती है। उन्हें वे गोद में रखते हैं, साथ खिलाते हैं, साथ सुलाते हैं, और सिर चढ़ाए रखते हैं। 

आज जिस तरह थोक में अनगिनत परिवार कोरोना पॉजिटिव हो रहे हैं, उनमें परिवार के ही कुछ लोग बाहर से खतरा लाकर बाकी लोगों के लिए खतरा बने होंगे। तमाम लोगों को इस नजरिये से भी परिवार के भीतर बहुत बड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है। यह कॉलम आमतौर पर विचारोत्तेजक-विचारों का है, लेकिन हम बहुत किस्म के खतरों के बारे में इसी जगह पर सावधानी सुझाने का काम भी करते रहते हैं। यह लिखा हुआ पढऩा उतना विचारोत्तेजक नहीं होगा, लेकिन यह जिंदगी के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि हम समय-समय पर ऐसे कुछ मुद्दों को इसी जगह उठाते हैं। कोरोना के बारे में घर के बाहर बरती जाने वाली सावधानियों पर तो दर्जन भर से अधिक बार हम लिख चुके हैं, लेकिन परिवार के भीतर आपस में भी लोगों को बहुत सावधान रहने की जरूरत है। यह बात लिखते हुए हमें अच्छी तरह मालूम है कि देश की तीन चौथाई आबादी के पास तो ऐसी सावधानी बरतने की अधिक गुंजाइश नहीं है क्योंकि वे बहुत छोटे-छोटे घरों में रहते हैं, और वहां एक-दूसरे से परहेज की गुंजाइश बड़ी सीमित रहती है। लेकिन वहां पर भी यह सावधानी बरती जा सकती है कि एक से अधिक लोग एक वक्त में आसपास बैठकर न खाएं, क्योंकि खाते हुए मास्क तो उतरना ही है, और आपस में बातचीत करते हुए मुंह से खाने और थूक के छींटे तो उड़ते ही हैं। रसोई में एक घड़े में या एक फ्रिज में, खाने-पीने के दूसरे सामानों में हाथ लगते ही हैं। एक टॉवेल या एक नेपकिन, एक सिंक या एक नल को कई लोग छूते हैं। छोटे घरों में यह खतरा और अधिक रहता है। 
आज ही एक खबर आई है कि 80 बरस से अधिक उम्र के 17 लोग एक जगह अपने एक साथी का जन्मदिन मनाने इक_ा हुए, वे लोग वैसे तो मास्क लगाए हुए थे, लेकिन उन्होंने खाते-पीते वक्त मास्क हटा दिए थे। अब ये सारे के सारे 17 बुजुर्ग कोरोना पॉजिटिव निकले हैं। अब आज ऐसे वक्त में क्यों तो इतने लोगों को किसी दावत में शामिल होना चाहिए, और क्यों एक साथ खाना-पीना चाहिए? लेकिन कोरोना को लेकर जो दहशत थी, वह अब धीरे-धीरे डर में बदली, और उसके बाद अब वह लापरवाही में बदल रही है। लोगों को लग रहा है कि डर-डरकर क्या जीना। लोग अब धीरे-धीरे साफ-सफाई, और सावधानी से थकते चले जा रहे हैं, और उसे फिजूल का मान रहे हैं। हर किसी के आसपास कुछ ऐसी मिसालें हैं कि बिना किसी बाहरी संपर्क वालों को भी कोरोना हो गया, ऐसे में सावधानी रखकर क्या फायदा? यह तर्क कुछ इसी तरह का है कि सिगरेट-तम्बाकू से परे रहने वाले लोगों को भी कैंसर हो गया है, तो फिर सिगरेट से परहेज से क्या फायदा? 

ऐसे लापरवाह दौर में लोगों को बहुत अधिक सावधानी बरतने की जरूरत इसलिए भी है कि दुनिया भर के बहुत से विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि हिन्दुस्तान में कोरोना अभी और आगे बढ़ेगा। मतलब यह कि अभी तक जो खतरे नहीं आए हैं, वे खतरे और भी आ सकते हैं। अस्पतालों में बिस्तर नहीं बचे हैं,  और सच तो यह है कि अगर निजी अस्पतालों में जाने की नौबत आई, तो इस देश के 99 फीसदी लोगों की क्षमता भी पूरे परिवार के निजी इलाज की नहीं है। ऐसे में बचाव ही अकेला इलाज है, और बचाव से परे सिर्फ खतरा ही खतरा है। अपने लिए न सही तो घरबार के दूसरे लोगों के लिए, अपने दफ्तर और कारोबार के दूसरे लोगों के लिए सावधानी बरती जाए। अब जब सावधानी से थकान बढ़ती जा रही है, तो खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं, और यही वजह है कि हिन्दुस्तान में कल एक दिन में 80 हजार से अधिक कोरोना पॉजिटिव निकले, जो कि दुनिया में एक रिकॉर्ड रहा। 

हम यहां कोई भी ऐसी बात नहीं लिख रहे हैं जो लोगों को खुद होकर न मालूम हो, हम बस लोगों को अधिक सावधान भर कर रहे हैं, और उन्हें अपने दायरे के बारे में सोचने कह रहे हैं कि वे संक्रमण से बचने के कौन से तरीके इस्तेमाल कर सकते हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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