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कंगना रनौत को वाई प्लस सुरक्षा देना एक राजनीतिक कदम से अधिक कुछ नहीं
17-Sep-2020 9:05 AM 2
कंगना रनौत को वाई प्लस सुरक्षा देना एक राजनीतिक कदम से अधिक कुछ नहीं

- Eesha 

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले पर अभिनेत्री कंगना रनौत शुरू से ही काफ़ी मुखर रही हैं। मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर बेहद आपत्तिजनक और विवादित बयान देने के साथ-साथ उन्होंने बॉलीवुड के कई अभिनेता और अभिनेत्रियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। साथ ही उन्होंने यह दावा किया है कि वह फ़िल्मी दुनिया के कई बड़े राज़ जानती हैं। सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद कंगना ने कई वीडियो जारी किए जहां उन्होंने कई आपत्तिजनक बयान दिए। अपने एक ट्वीट में उन्होंने यह तक कहा था कि उन्हें मुंबई और ‘पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर’ में कोई फ़र्क नज़र नहीं आ रहा।

कंगना रनौत के इस बयान की कठोर निंदा हुई। कई लोगों का कहना रहा कि इस तरह उन्होंने मुंबई शहर का अपमान किया है। महाराष्ट्र सरकार के प्रवक्ता संजय राउत ने भी कंगना की बातों पर आपत्ति जताई और उनके लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। कंगना ने ट्विटर पर यह कहा कि उन्हें खास सुरक्षा की ज़रूरत है क्योंकि वे मुंबई पुलिस और सरकार पर भरोसा नहीं कर सकतीं, जिसके बाद केंद्र सरकार ने उनके लिए ‘वाई-प्लस’ सुरक्षा के प्रबंध के लिए अनुमति दी। ट्विटर पर कंगना ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को धन्यवाद दिया है और यह कहा है कि अब कोई ‘फ़ासीवादी’ किसी देशभक्त की आवाज़ नहीं दबा पाएगा।

हाल ही में मुंबई की सड़कों पर एक कलाकार ने ‘वॉक ऑफ़ शेम’ नाम की ‘स्ट्रीट आर्ट’ पेंटिंग भी बनाई थी, जिसमें उन सभी लोगों के नाम दिए गए जो सुशांत की मौत को सनसनीखेज बनाकर सुर्खियां बटोर रहे हैं। कई राजनेताओं और पत्रकारों के साथ इसमें कंगना का भी नाम था। कंगना रनौत ने इस पर यह प्रतिक्रिया दी कि उनका चरित्र हनन किया जा रहा है, जिसकी वजह से वे अब मुंबई में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहीं। कला, ख़ासकर स्ट्रीट आर्ट या ग्रैफिटी, समकालीन परिस्थितियों के बारे में कलाकार के विचार व्यक्त करने और विरोध प्रकट करने का एक साधन मात्र है। ‘वॉक ऑफ़ शेम’ चित्रकला के निर्माता ने भी इसके माध्यम से कंगना रनौत जैसे लोगों द्वारा सुशांत की मृत्यु पर पब्लिसिटी लूटने पर आपत्ति जताई है। इसमें कोई अश्लीलता नहीं थी, न ही किसी तरह की हिंसात्मक भाषा का प्रयोग किया गया। कंगना को किसी धमकी या शारीरिक और मानसिक हमले का भी सामना नहीं करना पड़ा है। सिर्फ़ निंदा और आलोचना से बचने के लिए एक व्यक्ति को सरकार से सुरक्षा की मांग करनी पड़ी यह सोचकर आश्चचर्य होता है। ऐसे में यह सवाल पूछना लाज़मी है कि कंगना को इतने ऊंचे दर्जे की सिक्योरिटी क्यों दी जा रही है?

‘वाई-प्लस’ सिक्योरिटी फोर्स 11 से 22 सुरक्षा कर्मियों से बना होता है, जिनमें से एक या दो कमांडो भी होते हैं। कंगना रनौत की सुरक्षा के लिए जिन्हें तैनात किया गया है, वे सब सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स यानी सीआरपीएफ़ के जवान हैं। इससे पहले कभी किसी बॉलीवुड कलाकार की निजी सुरक्षा के लिए अर्धसैनिक बलों की ज़रूरत नहीं पड़ी है। आमतौर पर इस तरह की सुरक्षा मंत्रियों और विदेशी अतिथियों को दी जाती है। वह भी यह तय करने के बाद कि उन्हें किस तरह का खतरा होने की संभावना है।

देशभर में ऐसी हज़ारों औरतें हैं जिनके पास कंगना रनौत की तरह विशेषाधिकार नहीं हैं और न वे संभ्रांत हैं, जिनके लिए उनकी रोज़ की ज़िंदगी एक संघर्ष से कम नहीं है।

जहां लगभग हर सेलेब्रिटी के पास उसके निजी बॉडीगार्ड्स होते हैं, क्या सचमुच एक अभिनेत्री की सुरक्षा के लिए कमांडो और सीआरपीएफ तैनात करने की ज़रूरत है? इससे भी ज़रूरी सवाल यह है कि क्या देश की बाकी औरतों को इसकी आधी सिक्योरिटी भी मिलती है? कंगना रनौत को वह सिक्योरिटी दी गई है जो पूरे देश में सिर्फ़ 15 लोगों के पास है। देशभर में ऐसी लाखों औरतें हैं जिनके पास कंगना रनौत की तरह विशेषाधिकार नहीं हैं और न वे सभ्रांत हैं, जिनके लिए उनकी रोज़ की ज़िंदगी एक संघर्ष से कम नहीं है। ‘वाई-प्लस’ तो छोड़ो, क्या सरकार उन्हें न्यूनतम सुरक्षा और संसाधन दिलाने में सक्षम रही है? 

हमारे देश में औरतों की एक बड़ी संख्या अपने ही घरों में सुरक्षित नहीं हैं। इन औरतों के लिए शोषण, बलात्कार, हिंसा हर रोज़ की बात है और कई क्षेत्रों में सारी ज़िंदगी अपने उत्पीड़कों के साथ गुज़ारनी पड़ती है क्योंकि कहीं और जाने का विकल्प उनके पास नहीं रहता। कानून व्यवस्था भी उनका साथ नहीं देती और कई बार उन्हें अपने ही शोषण के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। ऐसे में एक संभ्रांत सेलेब्रिटी को अगर ‘वाई-प्लस’ सिक्योरिटी सिर्फ़ आहत भावनाओं के आधार पर दी जाए तो यह हर उस औरत के साथ नाइंसाफी है जिसे हिंसा और उत्पीड़न से न्यूनतम सुरक्षा भी नहीं मिलती। यहां इस बात पर गौर करना भी ज़रूरी है कि कंगना वर्तमान केंद्र सरकार की समर्थक हैं और उनका प्रचार करने में काफ़ी सक्रिय रही हैं। यह कहना ज़रूरी इसलिए है क्योंकि पिछले छह सालों में हर महिला, जिसने सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई हो, मानसिक उत्पीड़न, यौन शोषण, और कई क्षेत्रों में हत्या की शिकार हुई हैं।

पिछले ही हफ़्ते 5 सितंबर में पत्रकार गौरी लंकेश की पुण्यतिथि मनाई गई। आज से तीन साल पहले साल 2017 में गौरी लंकेश की आवाज़ दबाने के लिए उनकी हत्या कर दी गई थी। उनकी तरह ऐसी कई महिला पत्रकार और हैं जिन्हें वर्तमान सरकार की निष्पक्ष आलोचना के लिए भद्दी भाषा में धमकियां दी गई हैं और सोशल मीडिया के जरिए जिन पर रोज़ आक्रमण किया जाता है। पत्रकारों के अलावा तमाम महिला छात्र नेताओं, कलाकारों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं इत्यादि ने भी खुलेआम सरकार का विरोध किया है जिनके लिए उन पर हर तरह का हमला किया गया है।

क्यों इन सबके बावजूद भी इन महिलाओं को सरकार की तरफ़ से कोई सुरक्षा या आश्वासन नहीं मिलता, बल्कि अक्सर सरकार उन पर बेबुनियाद आरोप लगाकर उनके ही खिलाफ़ कार्रवाई करती है? क्यों कुछ मामूली टिप्पणियों की वजह से सरकार समर्थक कंगना की सुरक्षा के लिए कमांडो रखे जाते हैं? इसके पीछे सिर्फ़ राजनीति के अलावा और कुछ नहीं है। सुरक्षा इस देश के हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। किसी एक व्यक्ति को सिर्फ़ सेलेब्रिटी होने और सरकार के पक्ष में बोलने के लिए तथाकथित रूप से विशेष सुरक्षा और सुविधाएं दी जाएं तो यह एक तरह से असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है।

(यह लेख पहले फेमिनिज्म इन इंडिया की वेबसाइट पर प्रकाशित हुआ है.) 

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