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कोरोना महामारी से पीड़ित लोग हो रहे हैं डिप्रेशन के शिकार
06-Nov-2020 5:59 PM 98
कोरोना महामारी से पीड़ित लोग हो रहे हैं डिप्रेशन के शिकार

भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय का कहना है कि कोरोना महामारी के दौरान इस बीमारी से पीड़ित 30 फ़ीसद लोग अवसाद या डिप्रेशन का शिकार हुए हैं.

स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना महामारी की वजह से तनाव के बढ़ते मामलों को देखते हुए दिशानिर्देश जारी किए हैं. दिशानिर्देश कई शोध रिपोर्ट के आधार पर तैयार किए गए हैं.

कोरोना वायरस महामारी ने दुनिया भर में लोगों की मानसिक स्थिति पर गहरा असर डाला है.

इस बीमारी ने स्वास्थ्य सेवाओं पर ज़बरदस्त दबाव तो डाला ही है साथ ही मेंटल हेल्थ केयर व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां पेश की हैं.

स्वास्थ्य मंत्रालय और मेंटल हेल्थ इंस्ट्टीयूट ऑफ़ न्यूरोसाइंस की गाइडलाइन्स ने कोविड महामारी में मानसिक रूप से प्रभावित होने वाले लोगों के तीन समूहों का ज़िक्र किया है .
पहले समूह में वो लोग है जों कोरोना-19 से पीड़ित हुए हैं. इसके मुताबिक़ जो मरीज़ कोविड-19 से संक्रमित हुए थे उन्हें मानसिक दिक्क़तें आ सकती हैं. कोविड से पीड़ित होने वालों में 30 फ़ीसद लोगों में अवसाद या डिप्रेशन और 96 प्रतिशत में पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसआर्डर (PTSD) जैसी समस्या देखी जा रही है, और ये समस्या बढ़ भी सकती है.

दूसरे समूह में वो मरीज़ हैं जो पहले से ही मानसिक रोग से पीड़ित हैं या थे. इनमें कोविड की वजह से वे पुरानी स्थिति में लौट सकते हैं. इतना ही नहीं इस समूह के मरीज़ों की स्थिति और ख़राब होने के साथ-साथ वे नई मानसिक समस्या से भी ग्रसित हो सकते हैं.

तीसरा समूह आम लोगों का है. आम लोग अलग-अलग तरह की मानसिक समस्या जैसे तनाव, चिंता, नींद की कमी, हैल्यूस्लेशन या अजीब ख्याल आना जिनका सच्चाई से कोई वास्ता न हो जैसी समस्याएं झेल रहे हैं. इस समूह के लोगों में आत्महत्या तक के ख्याल भी आ रहे हैं.

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली (एम्स) में मनोचिकित्सक श्रीनिवास राजकुमार कहते हैं कि ये शोध काफ़ी चिंताजनक है क्योंकि आम मानसिक बीमारियों के मुक़ाबले ये आंकड़ा कहीं ज्यादा हैं. लेकिन शोध के लिए आंकड़े कहां से लिए गए हैं, वो स्पष्ट नहीं है. वो कहते है कि एम्स कोविड ट्रामा सेंटर में काफ़ी बंदोबस्त किए गए हैं जहां मनोचिकित्सक लागातार मरीज़ों से बातचीत कर रहे हैं और जैसी शोध में बातें आई हैं वैसी ही समस्याएं अस्पताल में भर्ती मरीज़ के साथ भी हैं.

उनके अनुसार,''कोविड के मरीज़ों में असुरक्षा की भावना रहती है कि वे अपने परिवार के पास लौट पाएंगे या नहीं. नींद नहीं आने की शिकायत भी आम है. वहीं ये भी देखा गया है जो मरीज़ ठीक होकर जा चुके हैं वे डिप्रेशन, एंग्जाइटी और पैनिक एटैक की समस्याओं के साथ हमारे पास वापस आ रहे है. वे कहते हैं कि नींद में उन्हें लगता है कि वे आईसीयू में हैं और बीप की आवाज़े सुन रहे हैं या लोगों से घिरे हुए हैं. ऐसी समस्या लेकर आने वालों की उम्र 20- 40 के बीच है. ऐसे में जहां ज़रूरत हैं, वहां दवाईयां दे रहे है और इनका इलाज कर रहे हैं''.

दिल्ली की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. पूजाशिवम जेटली का कहना है कि कोविड के दौरान लोगों का मानसिक स्वास्थ्य एक चिंता का विषय है और उनके पास क़रीब 50-60 प्रतिशत ऐसे मामले आ रहे हैं जहां लोग अकेलापन, एंगज़ाइटी, मूड में उतार-चढ़ाव और एकाग्रता की कमी महसूस कर रहे हैं.

वे कहती हैं कि कोविड की वजह से अनिश्चितता का माहौल है. रोज़ नए आंकडे आते हैं, नए मामले सामने आ रहे है और अभी तक इसका कोई पुख़्ता इलाज सामने नहीं आया है, तो लोगों के मन में दहशत बैठी हुई है.

उनके अनुसार, ''लोगों की रोज़ की ज़िंदगी में बदलाव आया है, उसका असर भी मानसिक सेहत पर पड़ा है. लोगों की नौकरियां चली गईं हैं, अस्थिरता का माहौल है, वर्क फ्रॉम होम की वजह से घर में अलग तरह की डिमांड बढ़ गई है जिसमें बच्चों, बुज़ुर्गों की देखरेख करने के साथ-साथ घर संभालना शामिल है. लोग आपस में मिल नहीं पा रहे हैं, बाहर जाकर रिलेक्स करने या मनोरंजन के ज़रिए बंद हो गए हैं, हालांकि अब अनलॉक हुआ है चीज़ें खुली हैं लेकिन फिर भी लोगों में डर है और ऐसे में मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर के लिए एक माहौल बन रहा है.''

हालांकि सरकार ने मानसिक स्थिति से निपटने के लिए कई दिशानिर्देश जारी किए जिनमें कहा गया है कि कोरोना के मरीज़ों के इलाज करने वाले अस्पतालों में एक मनोचिकित्सक शारीरिक रूप से या टेलीफ़ोन के ज़रिए कंसल्टेंसी के लिए मौजूद रहेगा. एनजीओ जो मेडिकल के क्षेत्र में काम कर रहे हैं, उनसे मदद ली जाएगी. कोविड का कोई मरीज़ अगर मानसिक रोगी है तो उसे भर्ती होने के 24 घंटे के भीतर मनोचित्सिक देखेगा.

डॉ. श्रीनिवास राजकुमार कहते हैं कि सरकार ने दिशानिर्देश तो जारी किए हैं लेकिन जैसे पूरी दुनिया में अब केवल मनोचिकित्सकों पर निर्भरता को छोड़ कर दूसरे डॉक्टरों को भी मेंटल हेल्थ केयर के मामलों से निपटने के प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं, वैसे ही प्रशिक्षण अब भारत में डॉक्टरों को दिए जाने की ज़रूरत हैं.

वो कहते हैं कि भारत में मेंटल हेल्थ से जुड़े क़ानून है लेकिन अब इस क्षेत्र में निवेश करने की ज़रूरत है क्योंकि मनोरोगियों से निपटने के लिए मनोचिकित्सकों की संख्या पर्याप्त नहीं है.

डॉ पूजाशिवम जेटली कहती है कि जिस तरह से कोविड के दौरान लोगों में डिप्रेशन या एंगजाइटी के मामले आ रहे हैं, इससे भविष्य में भयावह स्थिति बन सकती है. क़दम नहीं उठाए गए तो ऐसे मामले बढ़ेंगे ही क्योंकि लोग इसे एक समस्या के तौर पर समझ नहीं पा रहे हैं और मदद भी नहीं ले रहे हैं.

वे मानती है कि सरकार के साथ-साथ सोसायटी एक बड़ी भूमिका निभा सकती है. यहां समुदाय के लोग अपनी दिक्क़तें साझा कर सकते हैं क्योंकि ये सिर्फ़ किसी व्यक्ति या परिवार की समस्या नहीं है बल्कि कई लोग ऐसी ही समस्याओं से जुझ रहे हैं. एक दूसरे से समाधान पर चर्चा करना मददगार साबित हो सकता है.(https://www.bbc.com/hindi)

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