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चीन की लेखिका जिन्हें लॉकडाउन के अनुभव लिखने के कारण देशद्रोही बताया गया
27-Nov-2020 6:43 PM 46
चीन की लेखिका जिन्हें लॉकडाउन के अनुभव लिखने के कारण देशद्रोही बताया गया

चीन , 27 नवम्बर | कोरोना वायरस महामारी के शुरुआती दिनों में चीन के शहर वुहान के हालात अपने लेखन से ज़ाहिर करने के चलते उन्हें देशद्रोही बना दिया गया, उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलीं और उनकी किताबें छपनी बंद हो गईं.

लेकिन, फिर भी चीनी लेखिका फांग फांग कहती हैं कि वो चुप नहीं रहेंगी.

फांग फांग ने बीबीसी से कहा, ''जब आप तबाही का सामना कर रहे हों तो अपने विचार और सलाह ज़ाहिर करना ज़रूरी होता है.''

जनवरी के आख़िर में वुहान दुनिया का पहला ऐसा जगह बन गया था जहां पूरी तरह लॉकडाउन था. उस समय इस शहर के एक करोड़ दस लाख लोगों को फांग फांग की ऑनलाइन डायरी से ढांढस मिल रहा था.

उन्हें फांग फांग की लेखनी से सबसे पहले वायरस का कहर झेलने वाले शहर की झलक मिल रही थी.

65 साल की फांग फांग का असली नाम वांग फांग है.

वह अपने वीबो अकाउंट (चीन में ट्विटर के समकक्ष) पर लॉकडाउन के दौरान अकेले बिताए हर दिन को शब्दों में उकेरती थीं. वह अपने कुत्ते के साथ अकेले रहती थीं और उस मुश्किल दौर को डायरी के ज़रिए लोगों तक पहुँचा रही थीं.

साथ ही उन्होंने अपने लेखन से प्रशासन की कमियों को भी उभारा.

शुरुआत में अपनी पहल के लिए उन्हें काफ़ी सराहना मिली लेकिन बाद में कई लोगों को उनकी बातें देशद्रोह लगने लगीं और लोग उनकी आलोचना करने लगे.

बीबीसी 100 वीमन सीज़न के तहत फांग फांग ने बीबीसी को बताया कि क्यों इतने विरोध के बावजूद भी उन्हें अपनी आवाज़ उठाने का कोई अफ़सोस नहीं है.

पहले सराहना फिर आलोचना

फांग फांग कहती हैं कि उन्होंने डायरी इसलिए लिखी ताकि वो अपने दिमाग़ को सक्रिय रख सकें और लॉकडाउन में आसपास जो हो रहा है उसे दर्शा सकें.

उन्होंने अपनी डायरी के ज़रिए बताया कि पूरी दुनिया से कटकर अकेले रहना कैसा होता है. लोगों को मरते देखने का सामूहिक दर्द और तकलीफ़ कैसी होती है और जब स्थानीय अधिकारी संकट की स्थिति को ठीक से ना संभाले तो कितना ग़ुस्सा आता है.

शुरुआत में उनकी डायरी की काफ़ी तारीफ़ की गई. सरकारी मीडिया 'चाइना न्यूज़ सर्विस' ने उनकी पोस्ट को ''ज्वलंत कहानी, वास्तविक भावनाओं और एक स्पष्ट शैली के साथ'' प्रेरणादायक बताया.

लेकिन, स्थितियां पूरी तरह तब बदल गईं जब फांग फांग की डायरी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया.

लोग उनके लेखन का विरोध करने लगे. ये विरोध तब चरम पर पहुँच गया जब पता चला कि उनकी डायरी का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया जाएगा और अमेरिकी प्रकाशक हार्परकोलिन्स ने इसमें रुचि दिखाई है.

किताबें छापने पर लगी पाबंदी

फांग फांग कहती हैं, ''मैंने महामारी के दौरान जो 60 डायरियां लिखीं उसके कारण प्रशासन मुझे दुश्मन की तरह देखने लगा.''

उन्होंने बताया कि चीनी मीडिया को उनका कोई लेख प्रकाशित ना करने के आदेश दिए गए. चीन में प्रकाशकों ने उनकी नई और पुरानी किताबों को छापना बंद कर दिया.

फांग फांग ने बीबीसी से कहा, ''एक लेखक के साथ ये बहुत ही क्रूर व्यवहार है. हो सकता है कि ये इसलिए किया गया क्योंकि मैंने सरकार की तारीफ़ करने की बजाय आम लोगों के लिए सहानुभूति ज़ाहिर की. मैंने सरकार की चापलूसी या प्रशंसा नहीं की इसलिए मैं दोषी हूं.''

धमकियों की बौछार

फांग फांग कहती हैं कि उनका विरोध सरकारी स्तर तक सीमित नहीं रहा बल्कि उन पर गालियों और धमकियों की बौछार होने लगी.

वह कहती हैं कि उन्हें अपशब्दों से भरे हज़ारों मैसेज आए जिसमें उन्हें जान से मारने की धमकियां भी थीं. उन्हें सोशल मीडिया पर देशद्रोही क़रार दे दिया गया, पश्चिमी देशों के साथ मिलकर चीन के ख़िलाफ़ साज़िश रचने का आरोप लगाया गया और कुछ लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि उन्होंने अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए से पैसे लेकर डायरी लिखी है.

फांग फांग ने बताया कि इन भयानक हमलों को देखकर वो हैरान हो गईं और उलझन में पड़ गईं.

वह कहती हैं, ''अपने लिए उनकी नफ़रत को समझना मेरे लिए बहुत मुश्किल था. जबकि मेरी लिखी बातें बहुत निष्पक्ष और हल्की-फुल्की थीं.''

वह कहती हैं कि इन हमलों ने उन्हें 1966-1976 की सांस्कृतिक क्रांति की याद दिला दी. जब हिंसक भीड़ ने बुद्धिजीवियों और दुश्मनों का सफ़ाया कर दिया था जिनमें पश्चिमी देशों से संबंध रखने वाले लोग भी शामिल थे.

उन्होंने बताया, ''सांस्कृतिक क्रांति के दौरान ख़ासतौर पर ये शब्द इस्तेमाल किए जाते थे, जैसे 'वर्ग संघर्ष' और 'सर्वहारा वर्ग की तानाशाही' फिर से आ गई है. इसका मतलब है कि चीन में हुए सुधार विफलता के रास्ते पर हैं.''

लॉकडाउन की ज़रूरत

दुनिया के हर कोने तक कोरोना वायरस के पहुँचने के बाद फांग फांग कहती हैं कि वुहान में 76 दिनों तक लॉकडाउन लगाने का चीन का फ़ैसला सही था. उनकी डायरी में भी यही विचार व्यक्त किया गया था.

वह कहती हैं, ''वुहान में बिना वायरस के आज़ादी से घूमने के एवज़ में हमने लॉकडाउन के तौर पर एक भारी क़ीमत चुकाई थी.''

वुहान में अप्रैल के बाद से कोरोना वायरस का कोई स्थानीय मामला सामने नहीं आया है.

फांग फांग ने कहा, ''अगर कड़े क़दम ना उठाए गए होते तो वुहान के हालात क़ाबू से बाहर हो जाते. इसलिए मैं बीमारी को नियंत्रित करने के लिए अपनाए गए लगभग सभी तरीक़ों का समर्थन करती हूं.''

वह कहती हैं कि दूसरे देश भी चीन के नज़रिए से सीख ले सकते हैं.

उन्होंने कहा, ''महामारी के दौरान सभी तरह के समारोहों और सभाओं पर रोक लगा दी गई थी. सभी के लिए मास्क पहनना ज़रूरी था और हाउसिंग कॉम्प्लेक्स में प्रवेश करने के लिए एक हेल्थ क्यूआर कोड की ज़रूरत होती थी. मुझे लगता है कि इन सभी उपायों से चीन को वायरस को नियंत्रित करने में मदद मिली.''

क्या मिली सीख

लेकिन, वह कहती हैं कि भले ही वायरस पर क़ाबू पाने में चीन को अंत में सफलता मिली हो लेकिन इससे शुरुआत में महामारी से निपटने के प्रशासन के तरीक़ों की जाँच करने की ज़रूरत ख़त्म नहीं हो जाती.

फांग फांग ने कहा, ''इस बात की गहन जाँच की ही नहीं गई कि महामारी पर क़ाबू पाने में इतना लंबा समय क्यों लग गया.''

वह सवाल करती हैं कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग ने पहले ये क्यों कहा था कि वायरस को 'रोका और नियंत्रित' किया जा सकता है.

लेकिन, फांग फांग का ये भी कहना है कि चीन ही नहीं पूरी दुनिया को महामारी से सीखने की ज़रूरत है.

फांग फांग की डायरी का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने वाले प्रोफ़ेसर माइकल बेरी का मानना है कि ''उनकी दृढ़ता की वजह ये है कि उन्हें पता है कि वो सही हैं.''

वह कहते हैं, ''वह विरोधी नहीं हैं. वह सरकार को उखाड़ फेंकने की बात नहीं करतीं. वह मात्र एक व्यक्ति हैं जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान जो देखा, महसूस और अनुभव किया उसे बस दर्ज कर दिया.''

प्रोफ़ेसर माइकल बेरी फांग फांग को लेकर कहते हैं कि अपनी बात कहते हुए वो कुछ बड़े सवाल भी उठाती हैं. ये सवाल सिर्फ़ ''महामारी से निपटने को लेकर नहीं हैं बल्कि ये भी हैं कि चीन के लोग अपने लिए किस तरह के समाज का निर्माण करना चाहते हैं.''

फांग फांग के जीवन में एक दुख भरी घड़ी वो भी आई जब लॉकडाउन में उनके साथी रहे उनके 16 साल के कुत्ते की अप्रैल में मौत हो गई.

इन सभी घटनाओं से फांग फांग बिखरी नहीं बल्कि फिर उठ खड़ी हुईं.

वह इस उम्मीद के साथ अब भी लिख रही हैं कि उनके विचार उनके अपने देश में फिर से छपेंगे और वो कहती हैं कि उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है.

फांग फांग ने कहा, ''ये तय है कि मैं कोई समझौता नहीं करूंगी और मुझे चुप रहने की भी कोई ज़रूरत नहीं है.''(https://www.bbc.com/hindi)

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