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नैनी झील
29-Nov-2020 12:17 PM 29
नैनी झील

नैनीताल का मुख्य आकर्षण यहां की नैनी झील है। स्कंद पुराण में इसे त्रिऋषि सरोवर भी कहा गया है। कहा जाता है कि जब अत्री, पुलस्त्य और पुलह ऋषि  को नैनीताल में कहीं पानी नहीं मिला तो उन्होंने एक गड्ढा खोदा और मानसरोवर झील से पानी लाकर उसमें भरा। इस झील में बारे में कहा जाता है यहां डुबकी लगाने से उतना ही पुण्य मिलता है जितना मानसरोवर नदी में नहाने से मिलता है। यह झील 64 शक्ति पीठों में से एक है।
 नैनीताल में पिछले कुछ समय से बढ़ती जनसंख्या और पर्यटकों की भारी भीड़ ने नैनी झील को प्रदूषित कर पारिस्थितिक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न कर दी है।  
उत्तराखंड की कुमाऊं कमिश्नरी का मुख्यालय नैनीताल ब्रिटिशकाल से ही अपनी खूबसूरती और प्राकृतिक सौन्दर्य से पयर्टकों की पसंद रहा है। इसी से प्रभावित होकर ब्रिटिश नौकरशाहों ने इसे प्रशासनिक कामकाज चलाने का केन्द्र भी बनाया। समय के साथ अपनी जरूरत के मुताबिक उन्होंने इसका विकास भी किया। इसे ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाकर पर्यटन के नक्शे में लाने की कोशिश हुई। आजादी के बाद भी प्रशासकों की यह पहली पसंद रही।  
आज यहां की प्रमुख नैनी झील में फैलती गंदगी किसी बड़े संकट को जन्म दे सकती है। नैनीताल में स्थित प्रसिद्ध नैनी झील तीन ओर से पर्वत श्रृंखलाओं से घिरी तथा किडनी का स्वरूप लिए हुए है। लगभग 1500 मीटर लंबे तथा 450 मीटर चौड़े क्षेत्रफल में फैली यह मनोहारी झील प्रतिवर्ष न केवल दुनिया के लाखों पर्यटकों को आकर्षित करती है बल्कि क्षेत्र की एक बड़ी जनसंख्या को आजीविका के साधन भी उपलब्ध कराती है। लेकिन दुखद यह है कि अपनी सुन्दरता के लिये मशहूर नैनी झील का जल निरंतर प्रदूषित होता जा रहा है। प्रतिवर्ष झील में 0.021 मिलियन क्यूबिक मीटर मलबा तथा अन्य सामग्री समा रही है। 
नैनी झील में पोषक तत्वों की अधिकता होने से पादप प्लवक की प्रचुरता भी अधिक है। इस कारण झील में शैवालीय प्रदूषण की समस्या बनती जा रही है। इसके चलते झील में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने लगी है एवं गैसों की आर्द्रता बढऩे लगी है। जीव-जंतुओं के लिये भी खतरा पैदा होता जा रहा है। मछलियां असमय मर जाती हैं। भारतीय मूल की मछली विलुप्त हो गयी है। झील के प्रदूषित हुये जल को पुन: जीवित करने एवं इसमें ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने की योजना के अंतर्गत दो प्रमुख कार्य प्रस्तावित हैं, जिनकी अब तक केवल रूपरेखा ही तैयार की जा सकी है। ये दोनों कार्य झील विकास प्राधिकरण के जिम्मे हैं। पहला कार्य झील की ऊपरी सतह से 15 मीटर नीचे की सतह में हाइपोलिमिनियम प्रक्रिया के कारण दूषित हुये पानी को साइफन विधि के माध्यम से बलिया नाले में निकाला जाना है।
 

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