संपादकीय

दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जितनी बड़ी आपदा, उसमें छुपा उतना बड़ा अवसर...
15-Dec-2020 3:29 PM 200
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जितनी बड़ी आपदा, उसमें छुपा उतना बड़ा अवसर...

कोरोना के चलते अचानक होने वाली बहुत सी मौतों की बात न भी करें, तो भी बीच-बीच में कमउम्र के लोगों की, बिना दुर्घटना की, ऐसी मौतें सामने आती रहती हैं जो हक्का-बक्का कर देती हैं। दारू या सिगरेट न पीने वालों, तंबाकू-गुटखा न चबाने वालों को भी कमउम्र में कैंसर होता है, वे तो चल बसते हैं, बाकी लोगों के सामने लापरवाही के लिए एक मिसाल छोड़ जाते हैं कि सिगरेट न पीने वाले क्या कैंसर से मरते नहीं हैं? यह लापरवाही और बहुत सी मौतों को बढ़ावा देती है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि अभी कोरोना की वजह से लोगों में सिगरेट-गुटखा कम होने से मौतें घटी भी हैं। बहुत सी मौतों को लेकर दूसरे लोग कुछ देर की फिक्र भी करते हैं, और फिर श्मशान वैराग्य से उबरकर अपनी लापरवाह जिंदगी जीने लगते हैं।

कोरोना ने जिस तरह अचानक बहुत से लोगों को खत्म कर दिया, सोशल मीडिया पर वैसे जवान लोगों की तस्वीरें देख-देखकर अटपटा लगता है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर ही बहुत से बुजुर्ग एक दहशत में जीते दिखते हैं क्योंकि उनकी उम्र के लोग अधिक खतरे में हैं, और मरने वालों में सबसे बड़ा हिस्सा साठ बरस से अधिक के लोगों का है। किसी के गुजर जाने पर उसकी खबरों को देख-देखकर बहुत से लोग अपनी सेहत के बारे में एक तनाव में रहते हैं, इसमें बस तनाव गैरजरूरी है, लेकिन उससे सबक लेकर सावधान रहना उतना ही जरूरी है।

एक महामारी, कोरोना, की वजह से लोगों में आई अतिरिक्त सावधानी कोई बुरी बात नहीं है। इसी सावधानी के चलते लोगों की जिंदगियां भी बचेंगी, और लोगों का घर भी बिकने से बचेगा। आज जो लोग सरकारी इलाज को नाकाफी पाते हैं और बेहतर लगने वाले महंगे निजी इलाज की तरफ जाते हैं, वे एक लंबे खर्च में फंस जाते हैं। अब उस परिवार की सोचें जिसमें पहले कोरोनाग्रस्त को महंगा निजी इलाज दिलवाया गया, और फिर एक-एक करके दो-चार और लोग परिवार में कोरोनाग्रस्त निकल गए। बाद के सदस्यों को क्या कहकर सरकारी अस्पताल ले जाया जा सकता है? अभी छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ चिकित्सक ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि किस तरह उनके एक मरीज बच्चे के परिवार में पांच लोग कोरोना पॉजिटिव हो गए जिनमें दो बच्चे भी हैं, और इन्हें सीटी स्कैन की जरूरत भी है। अब बहुत रईस लोगों को छोडक़र और कौन हो सकते हैं जो इस तरह का खर्च उठा सकें?

ऐसे में एक बड़े कामयाब वकील रहे एक संपन्न बुजुर्ग अचानक दहशत में आकर सोशल मीडिया पर अपनी सेहत को लेकर लोगों से तरह-तरह की राय लेने में लग गए हैं। राय लेने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया इसके लिए सही जगह नहीं है क्योंकि अधकचरी जानकारी वाले लोग भी वहां रायबहादुर बन जाते हैं। दहशत से परे उनकी सावधानी अच्छी चीज है क्योंकि यह सावधानी बाकी जिंदगी बड़े काम आती है। कोरोना ने यह नौबत पैदा की है, और इसके चलते हुए लोगों को न सिर्फ अपनी सेहत के लिए, बल्कि अपनी बाकी तमाम जिम्मेदारियों और अधिकारों के लिए भी सचेत हो जाना चाहिए। जो लेना है उसे लेने की कोशिश करनी चाहिए, जो देना है उसे देने की तैयारी करनी चाहिए। और अपने वारिसों के लिए इस तमाम जानकारी को कानूनी कागजात की शक्ल में छोडऩा भी चाहिए। कोरोना ने जितनी जिंदगियां दुनिया में खत्म की हैं, हो सकता है कि उससे अधिक जिंदगियां उसने बचाई भी हों। लोग जब सावधानी के साथ जीने लगेंगे, साफ-सफाई के लिए फिक्रमंद रहेंगे तब वे मौत को टालने में कामयाब भी होंगे। लोग आज अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए जागरूक हुए हैं, और ऐसा होने से उनकी जिंदगी लंबी हो सकती है, सेहतमंद हो सकती है। इसी तरह गैरजरूरी भटकना कम होने से लोग हादसों में कम मर रहे हैं, और बहुत सी जिंदगियां बच रही हैं। लोग तरह-तरह की जांच करवा रहे हैं जिनसे उन्हें ऐसी बीमारियों की खबर लग रही है जिसका उन्हें अंदाज नहीं रहा होगा, और यह बात भी दुनिया में मौतों को घटाने वाली है।

हर आपदा में एक अवसर छुपा होता है यह बात सदियों पहले से चली आ रही है। कोरोना की आपदा भी ऐसे अवसर लेकर आई है जब लोग सेहत के लिए एक नई जागरूकता पा रहे हैं, काम-धंधों को लेकर, रोजगार को लेकर लोग जिस भरोसे में बेफिक्र जी रहे थे, उससे उबरकर वे अब चौकन्ने होकर जिंदा रहने की लड़ाई के लिए बेहतर तैयार हो रहे हैं। कोरोना के इस दौर में जितना नुकसान हुआ है उसकी भरपाई तो नहीं हो सकती, लेकिन लोग बेहतर तैयारी से उससे उबर सकते हैं, हो सकता है कि आने वाले कुछ बरसों में लोग अधिक काबिल हो जाएं, और अगली मुसीबत को झेलने के लिए अधिक तैयार रहें।
 
कतरा-कतरा इन बातों को आज यहां लिखने का मकसद यही है कि कोरोना को रोकना न तो कुदरत के हाथ था, और न ही विज्ञान के। साल गुजरते-गुजरते इससे लडऩे के लिए एक वैक्सीन के आसार दिख रहे हैं, और लोग जिंदगी पर आई मुसीबत से निपटने के लिए कुछ बेहतर तैयार दिख रहे हैं। जो चले गए उनका तो कुछ नहीं हो सकता, लेकिन जो रह गए वे अगर श्मशान वैराग्य जैसी क्षणिक सावधानी के शिकार न रहे, और लंबे समय तक के लिए सावधान रहे तो उनका भला जरूर हो सकता है। दुनिया के तरह-तरह के कारोबार ने भी इस दौरान किफायत के कुछ नए सबक लिए हैं, कामगारों ने भी अपने काम को बेहतर बनाना सीखा है, और लोगों ने नए-नए हुनर भी सीख लिए हैं। इन सब बातों को मिलाकर देखें तो लगता है कि कोरोना जैसी इस विकराल आपदा में भी एक अवसर है कि लोग आगे की जिंदगी के लिए हर किस्म से बेहतर तैयार हो सकें। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
 

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