संपादकीय

दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : खरीद-फरोख्त वाली भारतीय चुनावी राजनीति के सुधरने की जरूरत...
21-Jan-2021 4:38 PM 190
दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : खरीद-फरोख्त वाली  भारतीय चुनावी राजनीति  के सुधरने की जरूरत...

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अमरीका में नई सरकार के काम सम्हालने के साथ हिन्दुस्तान के लोग भी बड़ी दिलचस्पी से इस देश को देख रहे हैं क्योंकि वहां उपराष्ट्रपति बनी कमला देवी हैरिस की मां भारत से अमरीका गई थीं। इसके अलावा भी नए राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपनी टीम में बहुत से भारतवंशियों को रखा है, हालांकि इसलिए नहीं रखा है कि वे भारत से वहां गए हैं, या उनके मां-बाप भारत से वहां गए थे, इसलिए रखा है कि वे काबिल हैं।

लेकिन अमरीकी राजनीति और सरकार की चर्चा के साथ-साथ जब लोग भारत की राजनीति और सरकार को देखते हैं, तो लगता है कि भारत के संसदीय लोकतंत्र को कई बातें सीखने की जरूरत है। इनमें से एक तो यह है कि किस तरह एक नंबर के पैसे से चुनाव जीतकर संसद में पहुंचा जाता है। अमरीकी राजनीति में सारा खर्च लोगों से बैंक खातों में मिले राजनीतिक-दान से चलता है, और राष्ट्रपति के चुनाव अभियान से लेकर सांसदों के चुनाव अभियान तक कहीं कालेधन की चर्चा सुनाई भी नहीं पड़ती है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में विधानसभाओं से लेकर संसद तक लोगों का संसदीय जीवन झूठे हलफनामे के साथ शुरू होता है कि उन्होंने चुनाव में चुनाव आयोग की तय की गई सीमा के भीतर खर्च किया है। वामपंथी दलों को छोड़ दें, तो शायद ही कोई दल ऐसे हों जिनके उम्मीदवार चुनावी खर्च सीमा के भीतर रहकर चुनाव जीत पाते हों। जीतना तो दूर रहा, हारने वाले एक से अधिक उम्मीदवार ऐसे रहते हैं जो कि खर्च सीमा के कई गुना खर्च के बाद भी हारते हैं। लोकसभा चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक और म्युनिसिपल-पंचायत चुनावों में वार्ड से लेकर गांव तक निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक खर्च इतनी आम बात है उम्मीदवार और पार्टियां अपने खर्च के हिसाब-किताब को छुपाए रखने के लिए टैक्स के जानकार पेशेवर लोगों की मदद लेते हैं।

जहां राजनीति कालेधन की गंदगी से शुरू होती है, जहां टैक्स चोरी के पैसों के दलदल पर नेतागिरी की इमारत खड़ी होती है, वहां पर आगे सत्ता या विपक्ष की राजनीति में, सरकार में ईमानदारी कैसे निभ सकती है? कहने के लिए कभी-कभी राजनीतिक विश्लेषक वामपंथी दलों और भाजपा, दोनों को ही कैडर-आधारित पार्टियां बता देते हैं। लेकिन एक तरफ बंगाल की एक ही लोकसभा सीट से 9-9 बार चुनाव जीतने वाले अन्नान मोल्ला कभी भी चुनावी खर्च सीमा को छू भी नहीं सके क्योंकि न तो उनके पास उतना पैसा रहा, न ही उनकी पार्टी के ढांचे को उतने पैसे की जरूरत रही। यह हाल वामपंथियों जगह-जगह रहा, और शायद ही कहीं चुनाव आयोग की सीमा को तोड़ा गया हो। दूसरी तरफ बाकी तमाम राष्ट्रीय दलों से लेकर क्षेत्रीय पार्टियों तक को कालेधन पर आधारित राजनीति करते देखा जाता है, और इन पार्टियों को अंधाधुंध कालाधन जुटाते भी देखा जाता है।

अमरीकी चुनाव से भारत को कम से कम यह तो सीखना चाहिए कि किस तरह चुनावी राजनीति को कालेधन से दूर रखा जा सकता है, और पार्टियां या उम्मीदवार अपने खर्च को किस तरह पारदर्शी रख सकते हैं। आज हालत यह है कि हिन्दुस्तान में सत्ता में आने का भरोसा दिलाकर पार्टियां और उनके उम्मीदवार लोगों से पूंजीनिवेश के अंदाज में उगाही करते हैं, और सत्ता में आने पर अपने उन दोस्तों को मुनाफे सहित कमाई के रास्ते भी जुटाकर देते हैं। नतीजा यह निकलता है कि देश के अधिकतर राज्यों में, या केन्द्र सरकार में जो भी पार्टी, या जो भी गठबंधन जीतकर सरकार बनाते हैं, वे कालेधन के अहसानों से इतने लदे रहते हैं कि लोगों के नाजायज काम, गैरकानूनी काम, सरकार को नुकसान पहुंचाकर चंदादाताओं को फायदा पहुंचाने के काम करने पर मजबूर भी रहते हैं, और ऐसा करते हुए अपनी खुद की कमाई करना भी उन्हें मजे का काम लगता है। जब पार्टी की तरफ से भ्रष्टाचार की छूट मिलती है, तो फिर किसी और से चेहरा छुपाने की नौबत नहीं रह जाती, जरूरत नहीं रह जाती।

भारतीय चुनावी राजनीति में कालेधन के पूंजीनिवेश का यह सिलसिला खत्म करना चाहिए। हम इसके कोई आसान समाधान नहीं देखते क्योंकि बरसों से लोग सरकारी खर्च पर चुनाव की बात करते आए हैं, और उस पर कोई एक मत नहीं हो पाया है। फिर भी देश की कुछ एक कंपनियां ऐसी हैं जो कि चेक से राजनीतिक चंदा देती हैं। और दोनंबर की तमाम चर्चाओं के बीच भी पिछले बरसों में जिन पार्टियों को बैंक खातों में जितना दान मिला है, वह भी हक्का-बक्का करने वाला है। इसलिए भारत की राजनीति से इस बुनियादी गंदगी को खत्म करने का रास्ता ढूंढना चाहिए। जहां पर पार्टी की टिकट के लिए करोड़ों रूपए देने की चर्चा हो, जहां एक-एक संसदीय सीट जीतने के लिए दसियों करोड़ खर्च की चर्चा हो, और जहां पर जीते हुए सांसद या विधायकों को खरीदने के लिए दर्जनों करोड़ रेट की चर्चा हो, वहां पर लोकतंत्र की कोई गुंजाइश नहीं रहती है। आज ऐसे बिकने वाले लोकतंत्र से पारदर्शी लोकतंत्र की तरफ बढऩे की जरूरत है और अमरीकी चुनाव इसकी एक अच्छी मिसाल हिन्दुस्तान के सामने है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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