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नेपाल क्या फिर से करवट लेने जा रहा है? भारत पर भी उठ रहे हैं सवाल
28-Jan-2021 12:51 PM 105
नेपाल क्या फिर से करवट लेने जा रहा है? भारत पर भी उठ रहे हैं सवाल

-रजनीश कुमार

नेपाल की राजधानी काठमांडू के कमलपोखरी में सोमवार दोपहर सैकड़ों की संख्या में वृहद नागरिक आंदोलन के लोग जुटे. यहाँ लोगों ने कमलपोखरी तालाब की मिट्टी का तिलक लगाया और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के आवास बालुवाटार की तरफ़ मार्च करने लगे.

सभी प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री ओली के 20 दिसंबर को संसद भंग करने के फ़ैसले का विरोध कर रहे थे. पुलिस ने इन्हें बीच में ही रोकने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारी नारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे थे. पुलिस ने बल का प्रयोग किया और कई लोग ज़ख्मी हो गए.

इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे कांतीपुर अख़बार के पूर्व संपादक नारायण वाग्ले को भी पुलिस ने लाठी से मारा. लेकिन वाग्ले ने प्रदर्शनकारियों को वहीं संबोधित करते हुए कहा कि ओली ने संविधान की धज्जियाँ उड़ा दी हैं.

नारायण वाग्ले ने कहा, ''हमलोग शांतिपूर्ण आंदोलन चला रहे थे. पुलिस को इस आंदोलन को लेकर सूचित भी कर दिया था. हम निहत्थे हैं. लेकिन पुलिस ने दमन किया. अब तीसरे जनआंदोलन की शुरुआत हो चुकी है.'' इस आंदोलन में केपी ओली मुर्दाबाद के नारे भी लगे.

इस आंदोलन में शामिल युग पाठक ने कहा कि यहाँ सत्ता पक्ष और विपक्ष अप्रासंगिक हो चुके हैं. उन्होंने कहा कि अब नागरिक आंदोलन से ही उम्मीद बची है.

युग पाठक ने कहा कि जब सरकार मनमानी करती है तो संवैधानिक संस्थाओं से उम्मीद होती है, लेकिन वे भी ख़ामोश हैं. मामला सुप्रीम कोर्ट में है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में भी कछुए की गति से सुनवाई चल रही है. सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि संसद भंग करना संवैधानिक है या नहीं लेकिन अब तक कुछ भी नहीं हो पाया है.

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी दो फाड़ हो गई है. पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल दावा कर रहे हैं कि नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की कमान उनके पास है और वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली कह रहे हैं कि पार्टी के अध्यक्ष वो हैं. अब निर्वाचन आयोग को तय करना है कि पार्टी किसकी है. ओली की या प्रचंड की. पार्टी निशान सूर्य किसे मिलेगा? लेकिन निर्वाचन आयोग भी अनिर्णय की स्थिति में है.

जनता की उम्मीदें
नेपाल के राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट और निर्वाचन आयोग से बहुत उम्मीद नहीं है. नेपाल के विदेश मंत्री और पीएम ओली गुट के प्रवक्ता प्रदीप ज्ञवाली से पूछा कि अभी सुप्रीम कोर्ट और निर्वाचन आयोग को निर्णायक भूमिका अदा करनी चाहिए थी लेकिन यहाँ भी चुप्पी है. नेपाल की जनता अब किससे उम्मीद करे?

इस पर प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है और उम्मीद है कि अप्रैल में चुनाव से पहले कुछ फ़ैसला आ जाएगा. निर्वाचन आयोग भी चुनाव से पहले कोई फ़ैसला दे देगा. मुझे लगता है कि चुनाव का मार्ग ही प्रशस्त होगा.''

अगर चुनाव होता है, तो नेपाल में दो साल के भीतर फिर से चुनाव होगा. ओली सरकार ने 20 दिसंबर को संसद भंग करने के बाद 30 अप्रैल और 10 मई को चुनाव की घोषणा की है.

नवंबर 2017 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल यानी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनाइटेड मार्क्सवादी लेनिनवादी और प्रचंड की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) मिलकर चुनाव लड़ी थी.

फ़रवरी 2018 में ओली पीएम बने और सत्ता में आने के कुछ महीने बाद प्रचंड और ओली की पार्टी ने आपस में विलय कर लिया. विलय के बाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनी. संसद में इनका दो तिहाई बहुमत था. लेकिन ओली और प्रचंड के बीच की यह एकता लंबे समय तक नहीं रही.

जब पार्टी का विलय हुआ था, तो यह बात हुई थी कि ओली ढाई साल प्रधानमंत्री रहेंगे और ढाई साल प्रचंड. लेकिन ढाई साल होने के बाद ओली ने कुर्सी छोड़ने से इनकार कर दिया. इसके बाद से प्रचंड बनाम ओली का खेल शुरू और संसद तक भंग कर दी गई. पिछले रविवार को प्रचंड गुट ने ओली को नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी से निकालने की घोषणा की.

क्या अब प्रतिक्रिया में ओली गुट भी प्रचंड को पार्टी से निकालेगा? इस सवाल के जवाब में प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ''इसकी ज़रूरत ही नहीं है. पार्टी के पहले अध्यक्ष प्रधानमंत्री ओली हैं और वे जो फ़ैसला लेंगे वही आख़िरी होगा. निर्वाचन आयोग ने भी कह दिया है कि संसद भंग होने के बाद पार्टी के भीतर लिया गया कोई भी फ़ैसला मान्य नहीं होगा. हमें कॉमरेड प्रचंड को निकालने की ज़रूरत नहीं है. पार्टी हमलोग के पास है और इसमें कोई गुट नहीं है.''

जब ढाई-ढाई साल प्रधानमंत्री रहने की बात थी तो ओली ने कुर्सी क्यों नहीं छोड़ी? इस सवाल के जवाब में प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ''ये सही बात है कि ढाई-ढाई साल प्रधानमंत्री रहने की बात हुई थी. लेकिन पार्टी के भीतर इस बात पर भी सहमति बनी थी कि कोई फ़ैसला करने से पहले संसदीय समिति के भीतर औपचारिक प्रस्ताव लाया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं किया गया. संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात होने लगी, जबकि इस तरह का प्रस्ताव पहले संसदीय समिति में लाना होता है. ऐसे में अगर उनके पास ज़्यादा संख्या बल भी है तो कोई मायने नहीं रखता.''

प्रचंड और ओली के टकराव से क्या नेपाल के किशोरावस्था वाले लोकतंत्र को नुक़सान नहीं हो रहा? प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ''मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ. अभी नेपाल के प्रजातंत्र को सहेजने की ज़रूरत है. परिपक्व बनाने की ज़रूरत है, लेकिन सत्ताधारी पार्टी में इस तरह के मतभेद से ऐसा नहीं होगा. एकता बहुत ज़रूरी है. लोगों को यहाँ के प्रजातंत्र से बहुत उम्मीद है और हमें इस इस उम्मीद पर खरा उतरना है.''

ओली के संसद भंग करने के फ़ैसले का नेपाल में चौतरफ़ा विरोध हो रहा है. सारी विपक्षी पार्टियाँ खुलकर विरोध कर रही हैं. पूर्व प्रधानमंत्री और जनता समाज पार्टी के अध्यक्ष बाबूराम भट्टाराई का कहना है कि ओली ने पूरी तरह से असंवैधानिक और फासीवादी फ़ैसला किया है.

बाबूराम भट्टराई ने बीबीसी हिन्दी से कहा कि यह नेपाल के प्रजातंत्र को मिट्टी में मिलाने वाला फ़ैसला है. यहाँ के आम लोग भी ओली के फ़ैसले को तानाशाही फ़ैसला कह रहे हैं.

फिर से आंदोलन की राह पर नेपाल?
प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं कि सारी पार्टियाँ इसलिए विरोध कर रही हैं क्योंकि उन्हें विरोध करना है. हालाँकि नेपाल के राजनीतिक विश्लेषक हरि शर्मा कहते हैं कि नेपाल फिर से करवट ले रहा है और एक बार फिर से आंदोलन के ज़रिए सब कुछ सेट करेगा.

वे कहते हैं, ''जिस दिन ओली ने लिपुलेख और कालापानी को लेकर नया नक्शा जारी किया उसी दिन लग गया था कि ये आदमी मोदी सरकार से कुछ सौदा करने वाला है और यही हुआ. अब ये मोदी सरकार के साथ खड़े हैं. जिस तरह से मोदी भारत में संवैधानिक लोकतंत्र को बदले लोकप्रिय लोकतंत्र चला रहे हैं उसी तरह से ओली भी संवैधानिक लोकतंत्र के बदले लोकप्रियतावाद की तरफ़ बढ़ रहे थे. प्रचंड ने रोका तो संवैधानिक लोकतत्र को ख़ारिज कर दिया.''

हरि शर्मा कहते हैं कि ओली अब नेपाल की राजनीति में अप्रासंगिक हो गए हैँ और आने वाले वक़्त में वो भी इस बात को समझ जाएंगे. हरि शर्मा कहते हैं, ''ओली ने भले संप्रभुता के नाम पर लिपुलेख और कालापानी को नक्शे में शामिल किया, लेकिन संप्रभुता केवल ज़मीन से नहीं बल्कि लोगों के मन से होती है. यह भारत से सौदे के लिए क़दम था और अब साफ़ दिखने लगा है.''

नेपाल प्रदर्शन
अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र विद्यार्थी यूनियन के नेता रहे गणेश प्रसाद मैनाली कहते हैं कि ओली ने संसद भंग कर संविधान और लोकतंत्र के ख़िलाफ़ काम किया है. मैनाली कहते हैं, ''नेपाल में अभी ग़रीबी और महंगाई को लेकर काम करने की ज़रूरत है लेकिन ये लोग आपस में ही लड़ रहे हैं. इससे केवल कम्युनिस्ट मास बेस में ही निराशा नहीं है, बल्कि आम लोग भी आक्रोशित हैं. यह नेपाल के मज़बूत वामपंथी एकता और लोकतंत्र का बहुत दुखद चैप्टर है.''

त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में राजनीतिक शास्त्र के प्रोफ़ेसर हरि रोका कहते हैं कि नेपाल का मौजूदा संविधान फेल हो गया है. हरि रोका के अनुसार, ''इस संविधान से लोकतंत्र नहीं चलेगा. ओली ने जिस तरह से फ़ैसला किया, उसे रोकने के लिए नए संविधान की ज़रूरत है. मौजूदा संसद समावेशी के लिहाज से लाजवाब थी. इसमें मुसलमान, दलित और महिलाओ की मज़बूत भागीदारी थी लेकिन ओली ने चलने नहीं दिया.''

भारत पर उठते सवाल
हरि रोका कहते हैं, "ओली पर भारत की सत्ताधारी पार्टी और वहाँ के अभिजात्य तबके का भी दबाव था. इसके अलावा अमेरिका का भी दबाव था. ओली इसके सामने झुक गए. हालाँकि ओली को झुकने से उन्हें कोई फ़ायदा नहीं मिलने जा रहा. उनकी राजनीति अब ख़त्म हो चुकी है."

"दरअसल, ओली को प्रचंड ठीक से समझ नहीं पाए. उनका आकलन बिल्कुल ग़लत साबित हुआ. अब नेपाल नए आंदोलन की तरफ़ बढ़ रहा है. अब नया नेतृत्व पैदा होगा. प्रचंड, बाबूराम भट्टाराई और माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व का वक़्त अब ख़त्म हो चुका है. अब कोई नया नेतृत्व उभरेगा और वही नेपाल को मज़बूत लोकतंत्र की राह पर लाएगा. अब इस सविंधान से काम नहीं चलने वाला है."

ओली
नेपाल में संसद भंग होने से भारत को क्या फ़ायदा होगा? हरि रोका कहते हैं कि वो भारत की बात नहीं कर रहे बल्कि भारत की उस ताक़त की बात कर रहे हैं, जो हिंदू राष्ट्र की बात करता है. रोका कहते हैं, ''भारतीय जनता पार्टी अपने मुल्क को हिंदू राष्ट्र नहीं बना पा रही है, लेकिन नेपाल में ऐसा करना चाहती है और ओली उसी के शिकार हुए हैं.''

हालाँकि बाबूराम भट्टराई इस बात बात से सहमत नहीं हैं कि संविधान फेल हो गया है. उन्होंने बीबसी से कहा कि संविधान का ओली ने उल्लंघन किया है और सुप्रीम कोर्ट की ज़िम्मेदारी है कि जवाबदेही तय करे.

नेपाल में जब भी कोई राजनीतिक अस्थिरता होती है तो भारत का नाम ज़रूर आता है. इस बार भी नेपाल के कई राजनीतिक विश्लेषक भारत पर उंगली उठा रहे हैं. क्या वाक़ई भारत की कोई भूमिका है?

भारत में 1996-97 में नेपाल के राजदूत रहे लोकराज बराल कहते हैं, ''नेपाल में विदेशी हस्तक्षेप ख़ुद से नहीं आता. हम इसे इन्वाइटेड हस्तक्षेप कहते हैं. यानी आमंत्रित हस्तक्षेप. ये आज की बात नहीं है. ऐसा नेहरू के ज़माने से हो रहा है. हर बार यहाँ की राजनीतिक पार्टियाँ अपनी सत्ता बचाने के भारत या चीन का सहारा लेती हैं और कहती हैं कि बाहरी हस्तक्षेप हो रहा है.''

पीएम ओली ने जब लिपुलेख और कालापानी को शामिल करते हुए नेपाल का नया नक्शा जारी किया, तो उन्हें भारत विरोधी के तौर पर भारतीय मीडिया में रेखांकित किया गया. लेकिन संसद भंग किए जाने के बाद नेपाल में कहा जा रहा है कि ओली को भारत की शह मिली हुई है इसलिए अड़े हुए हैं. हालाँकि प्रदीप ज्ञवाली इन बातों को बकवास बताते हैं.

प्रदीप ज्ञवाली पिछले हफ़्ते भारत के तीन दिवसीय दौरे पर आए थे. उन्होंने विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाक़ात की थी. प्रदीप ज्ञवाली से पूछा कि उनका भारत दौरा कैसा रहा है? ज्ञवाली ने कहा, ''बहुत ही अच्छा रहा. सारे मुद्दों पर बात हुई. सीमा विवाद पर भी बात हुई. पहले भारत इस पर बात करने को तैयार नहीं होता था, लेकिन अब बात कर रहा है. अब वो मान रहा है कि सीमा विवाद है. हालाँकि अब भी दोनों पक्षों के बीच मतभेद हैं.''

प्रदीप ज्ञवाली कहते है कि इस बार भारत का रुख़ सकाराकत्मक रहा है. नेपाल के राजनीतिक हलकों में भारत के वर्तमान विदेश मंत्री एस जयशंकर को लेकर लोग हमलावर रहते हैं. 2015 में जब नेपाल ने अपना नया संविधान बनाया, तो भारत ने मधेसियों को लेकर इस संविधान को नहीं लागू करने का दबाव डाला था.

तब एस जयशंकर विदेश सचिव थे और वही भारत का पक्ष लेकर आए थे. यहाँ के लोग बताते हैं कि जयशंकर ने बहुत ही आक्रोश के साथ इस संविधान को रोकने के लिए कहा था. लेकिन तब नेपाल की सारी पार्टियाँ एकजुट हो गई थीं और भारत की आपत्ति को किनारे रखते हुए वही संविधान लागू किया था. उसके बाद भारत की तरफ़ से अघोषित नाकाबंदी हुई और नेपाल के आम लोगों को भारी मुश्किलों का सामान करना पड़ा था. तब से नेपाल में एक तरह का भारत विरोधी भावना भी बढ़ी है.

लोकराज बराल कहते हैं कि तब एस जयशंकर का तरीक़ा सही नहीं था. उन्हें अपना पक्ष रखना चाहिए था, लेकिन नरम तेवर से. बराल कहते हैं कि नेपाल पहली बार संविधान बना रहा था और भारत को इसका स्वागत करना चाहिए था, क्योंकि संविधान में कमियाँ वक़्त के साथ दूर की जा सकती थीं.

पिछले एक साल में नेपाल के प्रधानमंत्री ओली ने भारत को लेकर कई तीखे बयान दिए और भारत में मुख्यधारा के मीडिया में यह छवि पेश की गई कि ओली चीन परस्त हैं. जब ओली ने संसद भंग किया तो कॉम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना का एक प्रतिनिधिमंडल भी नेपाल आया. इस प्रतिनिधिमंडल के बारे में कहा गया कि वो नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में प्रचंड बनाम ओली के बिखराव को रोकना चाहता था. इस प्रतिनिधिमंडल ने दोनों धड़ों से मुलाक़ात भी की, लेकिन ओली के बारे में कहा गया कि वो नहीं माने.

इसके बाद अचानक से ओली ने एक भारतीय चैनल को इंटरव्यू दिया. यह चैनल उन भारतीय चैनलों में शामिल था, जिसे एक कुछ महीने पहले ही नेपाल बैन किया था. इन चैनलों पर नेपाल में चीन की राजदूत और ओली के हनी ट्रैप की मनगढ़ंत कहानियाँ चलाई जा रही थीं.

नेपाली मीडिया में इस इंटरव्यू को ओली और मोदी की दोस्ती से जोड़ा जाने लगा. चीन के मनाने पर भी ओली के नहीं मानने को भारत की जीत की रूप में देखा जाने लगा.

इसी हफ़्ते ओली पशुपतिनाथ मंदिर में दर्शन करने गए तो नेपाल के पत्रकार कहने लगे कि नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में एक राइट विंग पैदा हो चुका है और ओली उसका नेतृत्व करेंगे.

लेखक और प्रकाशक मणि शर्मा ने ट्वीट कर कहा, ''पशुपतिनाथ मंदिर में ओली के जाकर पूजा करने से साफ़ हो गया है कि नेपाल में धर्मनिरपेक्षता को ख़ारिज करने की पूरी तैयारी हो चुकी है. आने वाले दिनों में ओली अभी और ऐसे क़दम उठाएँगे, जिसे नेपाल को भुगतना होगा.''  (bbc.com)

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