संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कुदरत से ख्याल रखने की इतनी उम्मीदें बेबुनियाद...
11-Feb-2021 7:03 PM 93
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कुदरत से ख्याल रखने की  इतनी उम्मीदें बेबुनियाद...

उत्तराखंड और उत्तर भारत के कुछ और राज्यों में कुदरत के कहर को लेकर चल रही बहस में अधिक गंभीर लोग पर्यावरण को इंसानों द्वारा पहुंचाए गए नुकसान को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। यह नुकसान लंबे समय में पहुंचाया जाता है, और उससे बहुत लंबे समय के लिए कुदरती कहर झेलना भी पड़ता है, शायद हमेशा के लिए। लेकिन इस नजरिए को ही सब कुछ मान लेने से एक नुकसान यह होगा कि पर्यावरण को बचाने को एक पूरा इलाज मान लिया जाएगा, वह भी सही नहीं होगा।
 
यह भी समझने की जरूरत है कि धरती, या धरती से परे की बाकी दुनिया भी, एक चट्टान की तरह की स्थायी व्यवस्था नहीं है। धरती अपने आपमें इंसानों के आने के पहले से कई तरह के फेरबदल देखती आई है, और इस पर ज्वालामुखियों का, भूकंप का, बाढ़ का इतिहास इंसानों के और लाखों बरस पहले का रहा है। मतलब यह कि जब इंसान नहीं थे, जब उन्होंने धरती को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था, उस वक्त भी धरती में ऐसे बदलाव आते थे कि उनके आसपास अगर उस वक्त भी इंसान बसे होते, तो वे थोक में मारे गए होते। आज की एक दिक्कत यह है कि किसी इलाके की सीमाओं को समझे बिना, या उनको अनदेखा करके, उन इलाकों की सरकारें वहां की संभावनाओं के नगदीकरण में जुट जाती हैं। नतीजा यह होता है कि कुदरत की सीमाएं इतनी लांघी जाती हैं, कि उसके खतरे इंसानों पर छाने लगते हैं। हर बार ऐसा भी नहीं होता कि कुदरत कोई बदला निकालती हो। लेकिन कुदरत किसी फौलाद का ढांचा नहीं है कि हावड़ा ब्रिज की तरह उस पर सैकड़ों बरस के लिए भरोसा किया जा सके। दुनिया के किसी हिस्से में ज्वालामुखी से, कहीं पर भूकंप से, कहीं पर बाढ़ से, कहीं पर सुनामी से, कहीं पर तूफान और चक्रवात से, कहीं पर आसमानी बिजली से, और कहीं पर सूखे से, तबाही आती है, और यह तबाही रूकने लायक नहीं होती। इंसानों के पहुंचाए नुकसान से यह तबाही बढ़ती है, लेकिन धरती और दुनिया का इतिहास ऐसे नुकसान के बिना भी आने वाली कुदरती तबाही को देखते आया है। इंसानों ने तो धरती को जितना भी नुकसान पहुंचाया हो, वह तो पिछले कुछ सौ बरस की ही बात है। लेकिन धरती का इतिहास तो लाखों-करोड़ों बरस पुराना है, और जमीन के नीचे जब चट्टानें खिसकती हैं तो बड़े-बड़े इलाके तबाह हो जाते हैं। आज  इसलिए कि ऐसे इलाकों में लोग बसे हुए हैं, ढांचे खड़े हुए हैं, इसलिए तबाही अधिक दिखती है।

लोग कहीं पर मंदिर-मस्जिद बनाएं, या गुरुद्वारे और चर्च, कहीं पर सैर-सपाटे की जगहें बनाएं, या पहाड़ के ऊपर और समंदर के करीब रहने की जगह, उनको धरती की सीमाओं को भी समझना होगा कि उसमें फेरबदल कभी भी आ सकता है, इंसानों के पहुंचाए जख्मों से परे भी धरती कराह सकती है, आसमान का लहू बरस सकता है। प्रकृति की इन सीमाओं के खतरों को समझे बिना अगर किसी इलाके में लाखों तीर्थयात्री या सैलानी इस तरह जाएंगे, और वहां पर मौसम की कोई मार पड़ेगी, तो उसे न तो सिर्फ मानवनिर्मित विनाश कहना ठीक होगा, और न ही ऐसी किसी जगह की सरकारों को उसके लिए जिम्मेदार ठहराना ठीक होगा। ऐसी तबाही में उनका हिस्सा इसे बढ़ाने वाला तो हो सकता है, लेकिन इसे खड़ा करने वाला नहीं हो सकता। कुदरत के कहर की मार तो इंसानों के कुकर्मो से बढ़ सकती है, लेकिन कुदरत का अपना मिजाज ऐसे फेरबदल का है जो कि धरती, समंदर, आसमान और दूसरे ग्रहों पर होते चलता है, और वह इंसान को देखकर नहीं होता। कुदरत को जो लोग मां मान लेते हैं, वे यह समझने की चूक कर बैठते हैं कि जिस तरह कोई मां अपने बच्चों का ख्याल रखती है, उसी तरह कुदरत भी इंसानों का ख्याल रखती है। कुदरत का इंसानों से ऐसा कोई रिश्ता नहीं है, और उससे ऐसी उम्मीद एक ऐसी नाउम्मीदी और सदमे की गारंटी कर देगी जैसी कि आज उत्तराखंड में लोगों को हो रही है, या जैसी कि अमरीका में पिछले बरसों में तकरीबन हर महीने-दो महीने में लोगों को किसी तूफान या बवंडर से हो रही है।

इसलिए प्राकृतिक विपदाओं को सिर्फ इंसानों की खड़ी की हुई, या बढ़ाई हुई मान लेना गलत होगा। इंसानों के किए हुए से परे भी, कुदरत ने धरती के हर हिस्से को ऐसा नहीं बनाया है कि उन जगहों पर मनचाही गिनती में लोग बसें या पहुंचें, और मनचाहे काम करें। लोगों को धरती और आसमान के, समंदर और नदियों के, खतरों को समझते हुए ही उन जगहों पर रहना या आना-जाना तय करना पड़ेगा। आज इंसानों ने अपने सुख के लिए, शौक के लिए, या रोजगार के लिए ऐसी जगहों पर ऐसे-ऐसे काम शुरू किए हैं, जो कि कभी भी खतरों से खाली नहीं रहेंगे। और इसे कुदरत की मार कहना भी इसलिए गलत होगा कि कुदरत सोच-समझकर वार या मार करने वाली ताकत नहीं है। उसमें अपने आपमें जो तब्दीलियां आती हैं उन पर उसका अपना कोई बस नहीं रहता। आज उत्तराखंड के बहुत ही कमजोर, नाजुक, और अविश्वसनीय प्राकृतिक ढांचे पर इस कदर का भरोसा कर लिया गया है, कि उसका किसी भी दिन टूट जाना हैरानी की बात नहीं होता। और वही हुआ। जिस तरह लोग आग के करीब पेट्रोल नहीं रखते, बिजली के तारों के नीचे खुद नहीं बसते, उसी तरह धरती के खतरनाक हिस्सों के खतरों को समझकर उनसे दूर रहना, दूर बसना ही बेहतर होगा। आज उत्तराखंड में अनगिनत ऐसी शहरी इमारतें बह गई हैं, या गिर गई हैं, जो कि नदी के किनारे गैरकानूनी बनी हुई थीं। ऐसी सड़कें बह गई हैं, या गिर गई हैं, जो कि पहाड़ को चीरकर बनाई गई थीं। ऐसे खतरे खुद खड़े करके इंसान अगर उनके बीच जिएंगे, वहां घूमने जाएंगे, तो वह खतरे का काम तो रहेगा ही।  आज का विज्ञान, आज का सरकारी इंतजाम, ऐसे कुदरती खतरों के बाद होने वाले नुकसान को कम करने का काम ही कर सकते हैं, उसे रोक नहीं सकते।

एक वक्त था जब ऐसे तीर्थों पर जाते हुए लोग यह मानकर चलते थे कि वहां से पता नहीं लौटें, या न लौटें। साल-छह महीने न लौटने वालों के श्राद्ध भी कर दिए जाते थे। तब से अब तक वहां की धरती की हालत पहले से खराब ही हुई है, पहले से अच्छी नहीं हुई, लेकिन वहां जाने वाले लोग अब शायद लाखों गुना अधिक बढ़ गए हैं। ऐसे में एक नाजुक इलाके में इतना ही ढांचा विकसित हो सकता है, जो कि कुदरत के किसी बड़े फेरबदल के पहले तक लोगों का साथ दे दे। लोग जिसे प्रकृति की विनाशलीला या कुदरत का कहर कहते हैं, वह कुदरत का एक मामूली और नियमित-अनियमित फेरबदल अधिक है, इंसानों का खरीदा हुआ कहर कम है। इसलिए लोगों को धरती और आसमान की सीमाओं को समझकर अपनी हिफाजत खुद करनी होगी। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमरीका में ही बवंडर से आने वाली तबाही को रोकने का कोई जरिया नहीं है, तूफान से अपने लोगों को बचाने का कोई जरिया नहीं है। बचाव की सीमा है, कुदरत की सीमा है, इंसानों की हसरत असीमित है, इसलिए लोग अधिक खतरे झेल रहे हैं। यह लोगों को खुद समझना है कि वे कितने खतरे झेलकर अपने शौक, अपने सुख, या अपने आस्था को पूरा करना चाहते हैं।

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