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गंगूबाई हंगल
05-Mar-2021 1:53 PM 71
गंगूबाई हंगल

गंगूबाई हंगल  (जन्म- 5 मार्च 1913 - मृत्यु- 21 जुलाई 2009) भारत की प्रसिद्ध खयाल गायिका थीं। भारतीय शास्त्रीय संगीत के किराना घराने का प्रतिनिधित्व करने वाली गंगूबाई हंगल ने जातीय बाधाओं को पार कर संगीत क्षेत्र में आधे से अधिक सदी तक अपना योगदान दिया। उत्तरी कर्नाटक के धारवाड़ जिले ने हिन्दुस्तानी संगीत के क्षेत्र में देश को कई नामी गिरामी नाम दिए। इनमें भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी, पंचाक्श्री गवई, पंडित पुत्तराजू गवई, पंडित सवई गंधर्व तथा पंडित कुमार गंधर्व शामिल हैं। 

गंगूबाई का जन्म 5 मार्च 1913 को कर्नाटक के धारवाड़ शहर में एक देवदासी परिवार में हुआ। उनके पिताजी चिक्कुराव राव नादिगर एक कृषक थे तथा मां अम्बाबाई कर्नाटक शैली की शास्त्रीय गायिका थीं।  हुबली  के  कृष्णाचार्य संगीत अकादमी  में उनकी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्रारम्भ हुई। गंगूबाई 1929 में 16 वर्ष की आयु में देवदासी परम्परा के अंतर्गत अपने यजमान गुरुराव कौलगी के साथ बंधन में बंध गईं। परंतु गुरुराव का साथ उनके भाग्य में अधिक समय के लिए न रहा। 4 वर्ष बाद ही गुरुराव की मृत्यु हो गई तथा वे अपने पीछे गंगुबाई के साथ 2 सुपुत्र और 1 सुपुत्री छोड़ गए।   गंगूबाई  ने  गुरु सवाई गंधर्व से संगीत की शिक्षा ली।  गंगूबाई को भैरव, असावरी, तोड़ी, भीमपलासी, पुरिया, धनश्री, मारवा, केदार और चंद्रकौंस रागों की गायकी के लिये सबसे अधिक वाहवाही मिली।  1945 के पश्चात उन्होंने उप-शास्त्रीय शैली में गाना बंद कर केवल शुद्ध शास्त्रीय शैली में रागों को ही गाना जारी रखा। गूबाई हंगल को कर्नाटक राज्य से तथा भारत सरकार से कई सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए। वर्ष 1962 में कर्नाटक संगीत नृत्य अकादमी पुरस्कार, 1971 में पद्मभूषण, 1973 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1996 में संगीत नाटक अकादमी की सदस्यता, 1997 में दीनानाथ प्रतिष्ठान, 1998 में मणिक रत्न पुरस्कार तथा वर्ष 2002 में उन्हें पद्मविभूषण से सम्मनित किया गया। वे कई वर्षों तक कर्नाटक विश्वविद्यालय में संगीत की प्राचार्या रहीं।
 वर्ष 2006 में उन्होंने अपने संगीत के सफऱ की 75वीं वर्षगांठ मनाते हुए अपनी अंतिम सार्वजनिक प्रस्तुति दी तथा 21 जुलाई 2009 को 96 वर्ष की आयु में वे हृदय का दौरा पडऩे से अनंत में विलीन हो गईं। 
 
चूड़ाकरण
शिशु के बाल जब सर्वप्रथम काटने का आयोजन किया जाता था, तब यह संस्कार चूड़ाकरण या चूड़ाकर्म कहा जाता था। इसे मुंडन भी कहा गया है।

चूड़ा का अर्थ चूड़ी अथवा शिखा है, इसमें शिखा को छोडक़र गर्भनाल के सिर के सभी बाल और नख कटवा दिए जाते थे। ऐसी मान्यता रही है कि चूड़ाकरण से दीर्घायु और कल्याण प्राप्त होता है। इसे संपन्न न करने से व्यक्ति की आयु क्षीण होती है। मनु के अनुसार सभी द्विजाति बालकों का चूड़ाकरण संस्कार वेद और धर्मसम्मत रूप में पहले या तीसरे वर्ष में कराया जाता था।

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