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वाराणसी की Gyanvapi मस्जिद, जिसके नीचे हिंदू मंदिर का विवाद चला आ रहा है?
10-Apr-2021 8:18 AM (32)
वाराणसी की Gyanvapi मस्जिद, जिसके नीचे हिंदू मंदिर का विवाद चला आ रहा है?

काशी विश्वनाथ मंदिर और उसी परिक्षेत्र में स्थित ज्ञानवापी मस्जिद मामले पर राजनीति शुरू हो चुकी है. दरअसल वाराणसी की एक स्थानीय अदालत ने गुरुवार को आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को इस जगह के सर्वेक्षण के लिए खुदाई का काम सौंपा है. कोर्ट ने निर्दश दिया है कि केंद्र के पुरातत्व विभाग के 5 लोगों की टीम बनाकर पूरे परिसर का अध्ययन किया जाए.

क्या रहा है विवाद 
मस्जिद काफी समय से विवादित रही है. हिंदू पक्ष का कहना है कि मस्जिद के नीचे असल में मंदिर है, जिसे औरंगजेब के समय में नष्ट कर दिया गया था. इसी बात को कहते हुए सबसे पहले साल 1991 में वाराणसी सिविल कोर्ट में स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर की ओर से ज्ञानवापी में पूजा-अर्चना की अनुमति के लिए याचिका दायर की गई थी. इसके बाद से मस्जिद विवादों में आ गई. याचिका तीन पंडितों ने लगाई थी. इसके बाद साल 2019 में वकील विजय शंकर रस्तोगी ने सिविल कोर्ट में आवेदन किया. इसमें अनुरोध था कि ज्ञानवापी परिसर का सर्वे किया जाए ताकि इसके बारे में सच्चाई सामने आ सके.

इन रिपोर्ट्स में मुगल शासक के हमले का उल्लेख

याचिकाकर्ता समेत कई हिंदू संगठनों का मानना है कि इस जगह पर लगभग 2,000 साल पुराना मंदिर था, जिसे औरंगजेब ने 1669 में नष्ट करवा दिया था और इसके अवशेषों का इस्तेमाल मस्जिद बनाने के लिए हुआ. द वायर की रिपोर्ट में इसका जिक्र हुआ है. इसके मुताबिक याचिकाकर्ता ने कहा कि औरंगजेब, एक के बाद एक लगातार कई स्कूल और मंदिर इस आरोप के साथ ध्वस्त करवा रहा था कि वहां तंत्र-मंत्र जैसी शिक्षा दी जाती है. एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल से छपी किताब Maasir-I-'Alamgiri में भी इस बात का उल्लेख मिलता है, जो औरंगजेब पर लिखी गई थी.

वाराणसी की इस जगह का जिक्र ब्रिटिश सैलानी रेगिनेल्ड हेबर ने भी साल 1824 में किया था. उन्होंने कई रिपोर्ट्स में कहा कि जैसा कि मस्जिद निर्माण में लगी और दिखती सामग्री से पता लगता है कि इस जगह हिंदू मंदिर रहा होगा, जो बाद में मस्जिद बन गया.

क्या मंदिर के अवशेषों से बनी मस्जिद 
पुरातत्व विशेषज्ञ और लेखक एडविन ग्रीव्स ने भी अपनी किताब Kashi the city illustrious में इसका जिक्र किया है कि मस्जिद में कई चीजें ऐसी दिखती हैं, जो किसी हिंदू मंदिर की झलक देती हैं. यहां बता दें कि ज्ञानवापी मस्जिद के बाहर नंदी की विशाल मूर्ति है. ये शिव का वाहन कहा जाता है. नंदी की दिशा मस्जिद की ओर होना भी हिंदू याचिकाकर्ताओं के लिए बहस की एक वजह रही.

काफी पुराना रहा है मंदिर का इतिहास 
वैसे ज्ञानवापी का इतिहास 11वीं सदी से शुरू हुआ माना जाता है. कहा जाता है कि राजा हरीशचंद्र ने इसका जीर्णोद्धार कराया था. जिसके बाद से लगातार हिंदू शासक इस मंदिर की देखभाल और सौंदर्यीकरण करवाते रहे. हालांकि मंदिर के निर्माण के समय के बारे में एकमत नहीं है. कहीं-कहीं ये जिक्र भी मिलता है कि इसका निर्माण राजा विक्रमादित्य ने करवाया था, जो बाद में कई बार मुगल आक्रांताओं के हमले का शिकार होता और बनता-बिगड़ता रहा. हालांकि औरंगजेब के मंदिर को तुड़वाकर मस्जिद बनाने की बात कई बार कही जाती है.

रानी अहिल्याबाई ने बनवाया नया मंदिर 
बाद में साल 1780 में मालवा की शासक रानी अहिल्याबाई ने ज्ञानवापी परिसर के बगल में ही एक मंदिर बनवा दिया. यही वो मंदिर है, जिसे आज काशी विश्वनाथ मंदिर कहा जाता है. आज यही मंदिर हिंदू श्रद्धालुओं को दुनियाभर से आकर्षित कर रहा है. वैसे इसी बीच ये ज्ञानवापी मस्जिद विवाद को एक बार फिर से हवा मिली, जब विश्वनाथ कॉरिडोर की बात हुई. इस विश्वनाथ कॉरिडोर के कारण वाराणसी में आए श्रद्धालु आसानी से मंदिर जाकर दर्शन कर सकेंगे, ऐसी योजना है. लगभग 5.3 लाख वर्गफुट में बन रहे इस कॉरिडोर के लिए कई निर्माण कार्य होने हैं.

कॉरिडोर को लेकर जताई आशंका 
इस बीच कई मुस्लिम संगठनों ने आशंका जताई कि कॉरिडोर बनने से ज्ञानवापी मस्जिद को नुकसान हो सकता है. इसे ही देखते हुए मस्जिद की देखरेख करने वाली कमिटी अंजुमन इंतजामिया मसाजिद ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका डाल दी. हालांकि याचिका वहां से ये कहते हुए खारिज हो गई कि महज संदेह की बिना पर कॉरिडोर की योजना या निर्माण कार्य नहीं रोका जा सकता.

लगभग 350 साल पुराने दस्तावेज सौंपे गए
ज्ञानवापी की सच्चाई और दोनों पक्षों के साथ इंसाफ के लिए फिलहाल मामला ASI के पास जा चुका है. वो अपने सर्वेक्षण से समझने की कोशिश करेगी कि किसके दावे में दम है. वैसे कहा जाता रहा है कि अपने पक्ष में सबूत के तौर पर हिंदू याचिकाकर्ताओं ने एक साढ़े 3 सौ साल पुराना दस्तावेज जमा कराया है, जो कथित तौर पर औरंगजेब के दरबारी के यहां से 18 अप्रैल 1669 को जारी किया गया था.

डीएनए की एक रिपोर्ट में इसका जिक्र है. दस्तावेज फारसी भाषा में है, जिसके हिंदी अनुवाद में औरंगजेब को जानकारी दी जा रही है कि उनके आदेश के मुताबिक 2 सितंबर 1669 को काशी विश्वनाथ मंदिर (प्राचीन) को ध्वस्त कर दिया गया. हकीकत जो भी हो, ये तो तय है कि फिलहाल इस मस्जिद का इतिहास रहस्यों के घेरे में है और सर्वेक्षण के बाद ही इस बारे में कुछ पुख्ता कहा जा सकेगा. (news18.com)

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