विचार / लेख

तुलसी के राम, और कबीर के राम...
21-Apr-2021 12:52 PM (66)
तुलसी के राम, और कबीर के राम...

-आनंद बहादुर 

आज रामनवमी है, आज मैं दिन भर राम के बारे में सोचता रहता हूं। वैसे तो मैं हमेशा उनके बारे में सोचता रहता हूं- वो कौन हैं, हमारे कौन लगते हैं, हम उनके कौन हैं, वो हमारी फिक्र करते हैं कि हम उनकी फिक्र करते हैं, हम उनके लिए लड़ते हैं कि वे हमारे लिए लड़ते हैं, सबसे अधिक, उन्हें हमारी जरूरत है कि हमें उनकी जरूरत है? वे मनुष्य हैं कि ईश्वर, अगर वे मनुष्य हैं तो हम इतनी शिद्दत से उनकी पूजा क्यों करते हैं, यदि वे ईश्वर हैं तो फिर उनका जन्म कैसे हो सकता है? ईश्वर तो अनादि अनंत हैं! मेरे सामने हमेशा राम नाम के अनेक माडल उपस्थित रहते हैं। वे अक्सर परस्पर विरोधी भी होते हैं। सबको एक साथ स्वीकार करना असम्भव है। इनमें से कौन माडल मेरे चित्त को भाता है, मैं किसे आत्मसात करूं, किसे त्यागूं? 

मुख्यतः मेरे सामने राम के दो मॉडल हैं- एक तुलसी के राम दूसरे कबीर के राम। मैं हमेशा कबीर के राम और तुलसी के राम की तुलना करता रहता हूं। सारे जगत में तुलसी के राम ख्यात हैं। वे, "धर्म धुरीन धीर नयनागर, सत्य सनेह सील सुखसागर/ देसकाल लखि साम समाजू, नीति, प्रीति पालक रघुराजू" हैं। वे, "कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुंदरम/ पट पीट मानहु तड़ित रुचि शुचि नामि जनकसुता वरम्" हैं। वे सारे जगत में विख्यात राम हैं, आज पूरी दुनिया में उन्हीं का डंका बज रहा है, लोग जोर जोर से जय श्रीराम कहकर उन्हीं को पुकारते हैं। घर-घर में, गांव-गांव में, नगर नगर में, जिस नाम को भजा जा रहा है वह तुलसी के राम का नाम ही है, शायद ही कोई हो जो कबीर के राम को भज रहा हो। यहां तक कि कबीर के अनुयायी होने की घोषणा करते रहने वाले भी अधिकांश घोर कर्मकांडी, अवतारवादी, पुनर्स्थापनावादी हो गए हैं, और ऐसा होना कबीर से विमुख होना है। 

तो एक तरफ वे राम हैं जिनकी नवमी हो सकती है। दूसरी तरफ कबीर के राम हैं। कबीर के राम और ही हैं।  वे खुद कहते हैं-  'दसरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम के मरम है आना।' 

कबीर के राम दसरथ सुत नहीं हैं, उनका तो मरम ही कुछ और है। अपने राम के बारे में वे कहते हैं-- 
सगुण राम और निर्गुण रामा, इनके पार सोई मम नामा। 
सोई नाम सुख जीवन दाता, मैं सबसों कहता यह बाता।। 

ताही नाम को चेन्नहु भाई, जासो आवागमन मिटाई।
पिंड ब्रह्मांड में आतम राम, तासु परें परमातम नाम।। 

इसीलिए कबीर के राम को लेकर कहीं कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं है। उनका कोई भवन कहीं नहीं बनाया जाना है। उनको कोई भेंट उपहार नहीं चढ़ाना है। उनके नाम पर कहीं कोई शोर नहीं मचाना है। उनके नाम को चिल्लाते हुए किसीसे डरने-डराने की जरूरत नहीं है। उनका कोई अपमान नहीं होता है। वे मान अपमान के परे हैं क्योंकि वे परमेश्वर हैं, जो घट घट में बसते हैं और जिनको दुनिया भूल गई है-- दुनिया देखै नाहीं। 

कबीर मुझे तत्व मीमांसा की परंपरा के साधक लगते हैं। तत्व मीमांसा और अर्थ मीमांसा प्राचीन भारत में बहुत प्रचलित थे। मुझे लगता है यह मीमांसा की शक्ति ही रही होगी जिसने हमें प्राचीन काल में, खासकर पूर्व वैदिक काल तक सोचने विचारने तथा अर्थ की प्रतिछायाओं को ढूंढने वाली सभ्यता बनाया था। इसी परम्परा ने हमें विश्वगुरु बनाया होगा। कबीर इसी परंपरा की उपज हैं, जैसे काकभुशुण्डी, कुम्भकर्ण, रैदास आदि भी हैं। फिर धीरे-धीरे इस विवेकवादी तर्कशील परंपरा का क्षरण होने लगता है और हम स्थूल ऐन्द्रिक मूर्तियों की पूजा करने वाले पैसिव लोगों की सभ्यता में बदल कर रह जाते हैं। हम तर्क करने, सवाल पूछने की अपनी क्षमता को खो बैठते हैं। कबीर हमेशा प्रश्न पूछते हैं। पत्थर पूजने से क्या मिलेगा? वह पूछते हैं। ऊंची मीनार पर चढ़कर चिल्लाने से क्या खुदा सुन लेगा? वे पूछते हैं। वे शिकायत करते रहते हैं-- दुनिया देखै नाही! इस मामले में जो व्यक्ति मुझे कबीर के सबसे निकट लगता है वह हैं गालिब। "वो हर इक बात पर कहना, कि यूं होता तो क्या होता!" 

तो कहना ना होगा कि कबीर और तुलसी दो अलग-अलग परंपराओं के वाहक हैं। देश की ज्ञानात्मक परंपरा, उसके अंतर्गत बाह्य रूप को वेध कर तत्व को देखने की क्षमता पर भरोसा किया गया है। कबीर वहीं से आते हैं। यह देश जो अतीत में इसी परंपरा का उज्जवल और प्रवहमान स्रोत था, जाने कैसे एक बंद तोता रतंटवादी परंपरा के घेरे में आ गया, जो सवालों से कतराता है। जो यथास्थिति को अपना पाथेय मानता है। जो चंद नामों को रट भर लेने को धर्म और आध्यात्म का केंद्र बताता है। जो मानता है कि पाप और पुण्य गणित के जोड़-घटाव जैसे होते हैं। दस पाप कर लिए तो एक बार कथा करा लो, पाप कट जाएगा। यह नहीं सोचता कि हृदय में पछतावा या अफसोस उत्पन्न हुए बिना, आत्मग्लानि पैदा हुए बगैर, सिर्फ तथाकथित पवित्र नदियों का स्नान कर लेने और ढेर सारे कर्मकांडों को कर लेने से पाप कैसे कट सकता है? कबीर ऐसे लोगों के गुरु कतई नहीं हो सकते हैं कबीर तो ऐसे ही लोगों के गुरु हो सकते हैं जो बाह्य आवरण को फाड़कर अंतरात्मा में झांकने के लिए लालायित हैं। वहां, उस घट घट में जहां कबीर के राम रहते हैं। कबीर में गमन तुलसी से पलायन है। 

तो मित्रो, रामनवमी की शुभकामना। मैं अपने राम को भजता हूं, आप भी अपने राम को भजिए। सभी अपने अपने राम को भजें। साथ में सीता मइया को भी भजें। 'जय श्री राम' कहना चाहें तो कहें, या फिर 'सियाबर रामचंद्र की जय!' बोलें।

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