संपादकीय

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : इन सरकारों को क्यों कोसना? लोगों का खुद का जिम्मा नहीं है क्या अपने-आपको बचाना?
21-Apr-2021 7:40 PM (115)
'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : इन सरकारों को क्यों कोसना?  लोगों का खुद का जिम्मा नहीं है क्या अपने-आपको बचाना?

लगातार इस कॉलम में सरकारों को कोसने के कई दिन निकल चुके हैं कि वे किस तरह कोरोना से जूझने में नाकामयाब रही हैं, और किस तरह सरकार के अफसरों ने पिछले पूरे एक बरस में न तो जरूरत के लायक कल्पनाशीलता दिखाई, न कोई जीवनरक्षक योजना बनाई। लेकिन आज हिंदुस्तान सहित दुनिया के कुछ और देशों में कोरोना का खतरा जिस हद तक मंडरा रहा है और खतरे के इस पैमाने पर हिंदुस्तान जिस तरह से अव्वल (लीडरशिप में नहीं, खतरे और मरने में) बना हुआ है, ऐसे में सरकारों से परे भी कुछ सोचने की जरूरत है। यह जरूरत इसलिए भी है कि लोगों को सरकारों के खिलाफ पढ़कर, लिखकर, भड़ास निकालकर ऐसा लगने लगता है कि मानव कोरोना से बचना उनकी कोई निजी जिम्मेदारी है ही नहीं। और अगर कोरोना से लडऩे को सिर्फ सरकारी जिम्मेदारी मान लिया जाएगा, तो यह करोना कभी जाने वाला नहीं है। इसलिए सरकार को कई दिनों तक लगातार कोस लेने के बाद आज हम इस मुद्दे पर चर्चा करना चाहते हैं कि लोगों को खुद भी कोरोना से बचने के लिए क्या करना चाहिए था, और चाहिए है ।

दरअसल देश में सरकारी नेताओं ने लोगों के सामने बड़ी बुरी मिसाल पेश की है कि वे खुद तो हर सार्वजनिक मौके पर बिना मास्क लगाए सामने आते हैं, और लोगों को मास्क लगाने की नसीहत देते हैं। लेकिन यह पसंद तो जनता की है कि वह नेताओं की मनमानी की बराबरी करते हुए खुद भी बिना मास्क अपना चेहरा दिखाते हुए घूमे या फिर उन डॉक्टरों की सलाह माने जो कि आज के वक्त में समाज के एक बेहतर नेता हैं, और मास्क लगाएं। नेताओं की लापरवाही और मनमानी का यह जवाब नहीं होना चाहिए कि आम जनता भी बिना मास्क लगाए घूमे, जब शहरों में चारों तरफ कोरोना का संक्रमण फैला हुआ है तब सड़क किनारे ठेलों पर खड़े खाए, तरह-तरह की दूसरी लापरवाही दिखाए, किसी तरह की सावधानी ना बरते।  नेताओं की लापरवाही का ऐसा जवाब ठीक नहीं है। यह जवाब कुछ उसी किस्म का है कि पड़ोसी अपने घर का कचरा सड़क पर डालता है इसलिए हम भी अपना कचरा उसके जवाब में सड़क पर ही डालेंगे। 

कल से छत्तीसगढ़ में एक वीडियो तैर रहा है कि किस तरह राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के, राजधानी के मेयर का भतीजा लॉकडाउन के बीच बिना मास्क स्कूटर पर घूम रहा है, और  रोकने वाले पुलिस सिपाही को सस्पेंड करवाने की धमकी दे रहा है। अब ऐसे नेताओं की बराबरी करते हुए खुद को खतरे में डालने के बजाय बेहतर यह है कि किसी शरीफ डॉक्टर की नसीहत मानकर अपने को बचाया जाये। आम लोगों के पास न तो नेताओं जितना पैसा होता, न ही उनकी तरह आनन-फानन इलाज ही आम लोगों को मिल सकता, इसलिए अपने को बचाकर चलने में ही समझदारी है। आज हिंदुस्तान में राजनीतिक नेता अच्छे रोल मॉडल नहीं रह गए हैं, इसलिए लोगों को अपनी जिंदगी बचाने के लिए अपने परिवार की जिंदगी बचाने के लिए डॉक्टरों की दी गई सलाह को मानना चाहिए जो कि आज जान जाने का खतरा झेलते हुए भी मरीजों को देख रहे हैं, इलाज कर रहे हैं, रात-दिन अस्पतालों में पड़े हुए हैं, और मर भी रहे हैं। यह एक अलग बात है कि केंद्र सरकार ने पिछले मार्च के महीने में कोरोना से मरने वाले स्वास्थ्य कर्मचारियों का बीमा जारी नहीं करवाया, और उन्हें पिछले बरस तक 50 लाख रुपए का जीवन बीमा हासिल था, जो कि आज नहीं है। इसलिए राजनेताओं को आदर्श मानकर चलना छोड़ देना चाहिए और लोगों को राजनीति में जवाब देने के बजाय दुनिया में डॉक्टरों के प्रति अपनी जवाबदेही रखनी चाहिए जो कि नेताओं की तमाम लापरवाही के बावजूद लोगों की जिंदगी को बचाने में लगे हुए हैं।

यह समझने की जरूरत है कि देश की राजनीति कितनी भी अच्छी या बुरी हो, सरकारें कितनी भी भ्रष्ट हों, कोरोना से लडऩे में कितनी भी लापरवाह क्यों ना हो, जो जिंदगी दांव पर लगी हैं वे आम लोगों की हैं। वे हिंदुस्तान के नागरिक बाद में हैं, सबसे पहले वे खुद का शरीर हैं, लोगों को किसी भी सरकारी नसीहत से परे, किसी भी सरकारी लापरवाही से परे अपने आपको बचाकर रखना चाहिए। किसी निकम्मी सरकार को भी हटाने के लिए अगले चुनाव तक आपका जिंदा रहना जरूरी है। अगर आप सरकार से खुश हैं तो उसे दोबारा मौका देने के लिए, और अगर सरकार से नाखुश हैं तो उसे हटाने के लिए अगले वोटिंग के दिन तक अपने-आपको जिंदा रखना आपकी जिम्मेदारी है। अभी एक महीने के इस वक्त में ही हिंदुस्तान में लोगों ने देख लिया है कि क्या तो केंद्र सरकार, और क्या तो राज्य सरकारें, लोगों की जिंदगी बचाने में इनकी क्षमता बहुत सीमित है, और उनकी जवाबदेही भी बहुत कम है। ऐसे में अपने परिवार को, अपने दफ्तर और कारोबार को, वहां काम करने वाले लोगों को महफूज रखना खुद की जिम्मेदारी है, सरकार की नहीं। सरकार को तो हराने का मौका भी हो सकता है कि कुछ वर्ष बाद आए,  लेकिन मौत तो अगले 2 दिनों में भी आ सकती है, और आज जिस तरह चारों तरफ लोग बिना दवाई के बिना अस्पताल के, बिना ऑक्सीजन के, और बिना वेंटीलेटर के मर रहे हैं, उसके बाद अंतिम संस्कार की बारी पाने के लिए मरने के बाद भी वे लड़ रहे हैं, यह सारी लड़ाई तो खुद ही लडऩी है इसमें सरकार कहीं भी आपका साथ देने वाली नहीं है। 

इसलिए लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस तरह पहाड़ या जंगल पर अकेले जीने वाले इंसान अपने दम पर जीना सीखते हैं, चकमक पत्थर को रगड़ कर आग लगाना सीखते हैं, जानवरों का शिकार करते हैं और कंदमूल ढूंढकर उसे खाकर भी जिंदा रहते हैं, जिस तरह जंगल में रहने वाले लोग बात-बात पर सरकार का चेहरा नहीं देखते और खुद अपनी ताकत पर जिंदा रहना जानते हैं, शहरी या ग्रामीण लोगों को भी इसी तरह खुद अपना बचाव करना सीखना होगा क्योंकि उन्होंने यह देख लिया कि मुसीबत के इस वक्त पर अधिकतर सरकारें जिम्मा छोड़ चुकी हैं, और लोग अपने जिंदा और अपने मुर्दा को ढूंढने के लिए अपनी खुद की ताकत पर निर्भर हो गए हैं. लोगों को यह समझ लेना चाहिए क्यों अपने आपको बीमारी से बचाना है, उससे लडऩे की तैयारी खुद कर रखनी है, अगली किसी बीमारी के पहले अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर रखनी है, साफ-सफाई की अपनी आदतें ऐसी डालनी हैं कि आने वाली कई पीढिय़ां तक सुरक्षित रहें। और इन सबसे बढ़कर यह तो है ही कि अगला मौका मिलने पर यह याद रखा जाए कि किस नेता ने, और किस पार्टी ने मुसीबत के समय आपका कितना साथ दिया था। वही एक तरीका है जिससे आप अपनी मेहनत के बाद भविष्य में सरकारी हिफाजत भी पा सकेंगे। इसलिए आज से ही अपनी और अपने परिवार की, अपने कारोबार आदतों को सेहतमंद बनाना शुरू करना चाहिए क्योंकि सरकारें भरोसे के लायक है नहीं।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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