सेहत / फिटनेस

फ़िटनेस के लिए क्या वर्जिश ही जरूरी है?

Posted Date : 16-Apr-2018



क्लाउडिया हैमंड

अगर आप खुद को फ़िट रखना चाहते हैं और आपकी पिछली कोशिशें फेल हो चुकी हैं तो आपको एक्सरसाइज़ से जुड़ी अपनी सोच पर ध्यान देने की ज़रूरत है.
अमरीका की स्टेनफ़र्ड यूनिवर्सिटी के एक शोध में सामने आया है कि एक्सरसाइज़ को लेकर लोगों की सोच और उनकी सेहत के बीच गहरा संबंध होता है.
मन में छुपा है तंदरुस्ती का राज
अमरीका की स्टेनफ़र्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने 21 साल के समय में 61 हज़ार व्यस्क लोगों की मौत से जुड़े आंकड़ों पर शोध किया.
इसमें इन लोगों की एक्सरसाइज़ के आंकड़े, विशेषकर उनका अपनी एक्सरसाइज़ और अपने साथियों द्वारा की गई एक्सरसाइज़ को लेकर नज़रिये पर ध्यान दिया गया. और ये भी देखा गया कि ऐसे लोगों की मौत उम्र के किस पड़ाव में हुई.
रिसर्च के नतीजे बेहद हैरान करने वाले थे. अपने हमउम्रों के मुकाबले कम एक्सरसाइज़ करने की सोच रखने वाले लोगों की मौत अपने हमउम्रों से पहले हुई जबकि दोनों बराबर ही एक्सरसाइज़ करते थे.
ये असर तब भी दिखा जब वैज्ञानिकों ने इन लोगों की सेहत और सिगरेट पीने जैसी चीजों को शामिल कर लिया.
एक्सरसाइज़ है दवा जैसी लेकिन
इसमें कोई दो राय नहीं कि एक्सरसाइज़ करने से उम्र में इज़ाफ़ा होता है. लेकिन एक्सरसाइज़ को लेकर हमारी सोच बड़ा फ़र्क़ पैदा कर देती है.
इस मुद्दे पर रिसर्च करने वाली ऑक्टेविया ज़ाहर्ट कहती हैं कि जब वो अपनी पढ़ाई के सिलसिले में कैलिफॉर्निया पहुंची तो वहां उन्होंने देखा कि हर व्यक्ति एक्सरसाइज़ कर रहा है. हालांकि, ऑक्टेविया ख़ुद भी एक्सरसाइज़ पर काफ़ी ध्यान देती थीं. लेकिन अचानक उन्हें लगने लगा कि वो दूसरों के मुक़ाबले कम सेहतमंद हैं. क्योंकि, वो उतनी एक्सरसाइज़ नहीं करती जितनी उनके आसपास के लोग कर रहे हैं. इसका असर उनकी सेहत पर पड़ने लगा.
फिटनेस से जुड़े मैसेज़ देते हैं तनाव
आज हर चीज़ का बाज़ारीकरण हो गया है. फ़ोन और ईमेल पर हेल्थ से जुड़े इतने मैसेज आते हैं कि लोगों को लगने लगता है कि हम तो ख़ुद को फिट रखने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं.
जबकि हम मामूली और ज़रूरत के मुताबिक़ कसरत कर रहे होते हैं. इस तरह के मैसेज दिमाग़ के किसी कोने में फ़िक्र और तनाव को जन्म देते हैं. इसका सीधा असर सेहत पर पड़ता है.
तोंद निकल आई है, ज़रूर कुछ गड़बड़ है
किसी भी काम में कामयाबी के लिए सकारात्मक सोच रखना पहली शर्त है.
आप जितनी भी एक्सरसाइज़ करें उसे सकारात्मक सोच के साथ करें.
जिम में पसीना बहाने से बनेगी सेहत?
कसरत शरीर के लिए दवा का काम करती है. अगर ये मान लिया जाए कि फलां दवा से हमें फ़ायदा होगा ही नहीं, तो यक़ीनन उसका फ़ायदा हमें कभी नज़र ही नहीं आएगा.
इसी तरह अगर हम हमेशा यही सोचते रहेंगे कि हम दूसरों के मुक़ाबले कम कसरत करते हैं या उस तरह नहीं कर रहे हैं जैसा कि हमारे साथी करते हैं तो यक़ीनन हमारी कसरत का हम पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
जिम में जाकर पसीना बहाना ही मेहनत या कसरत में शामिल नहीं होता. हम दिन भर बहुत से ऐसे काम करते हैं, जिसमें अच्छी ख़ासी मेहनत लगती है.
लेकिन हम उसे कसरत की फ़ेहरिस्त में शामिल नहीं करते. मिसाल के लिए किसी होटल में रख-रखाव का काम करने वाला शख्स दिन भर सीढ़ियां चढ़ने, साफ़-सफ़ाई करने जैसे कामों में मसरूफ़ रहता है.
इस मेहनत से उसके शरीर को फ़ायदा भी पहुंचता है. लेकिन 2007 में की गई रिसर्च के मुताबिक़ इसे वर्ज़िश नहीं कहा जा सकता.
होटल में काम करने वाले ऐसे ही मुलाज़िमों पर एक रिसर्च की गई. उन्हें समझाया गया कि उनकी मेहनत जिम में जाकर पसीना बहाने वाली मेहनत से कम नहीं है. चार हफ़्ते बाद जब उनका मुआएना किया गया, तो पता चला कि उन कर्मचारियों का ना सिर्फ़ वज़न कम हो गया बल्कि ब्लड प्रेशर भी नॉर्मल हो गया. यानी उन्होंने अपनी सोच बदली. उन मुलाज़िमों ने अपने ज़हन में ये बात बैठाई कि वो भी जिम में जाने वालों की तरह ही कसरत करते हैं.
बुढ़ापा है एक मानसिक सोच
इसी तरह की सोच का ताल्लुक़ उम्र से है. बहुत से लोग कहते हैं बुढ़ापा 60 की उम्र में शुरू होता है.
ऐसे लोग अपनी सेहत की हालत मद्देनज़र रखते हुए ये बात कहते हैं. और इसीलिए वो एक्सरसाइज़ भी कम कर देते हैं.
उनके दिमाग़ मे ये सोच घर कर लेती है कि वो अब बुढ़ापे की ओर चल पड़े हैं. जबकि जो लोग नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करते हैं, वो खुद को ज़्यादा फिट महसूस करते हैं और इसीलिए वो ख़ुद को कभी बूढ़ा नहीं मानते. दरअसल ये सब सिर्फ़ समझ का फेर है.
अच्छी बात है कि इंसान को अपनी सोच का दर्ज़ा ऊंचा रखना चाहिए. लेकिन कभी तुलना नहीं होनी चाहिए.
हर इंसान अपनी कुव्वत के मुताबिक़ ही काम करता है, और कर सकता है.
कसरत सेहत के लिए ज़रूरी है. इसे अपनी आदत बनाइए. लेकिन, ये सोचे बग़ैर कि आपके दोस्त कहीं आपसे ज़्यादा कसरत तो नहीं कर रहे. (बीबीसी)




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