विचार / लेख

Date : 05-Aug-2019

जम्मू-कश्मीर में जारी सरगर्मी के बीच कहा जा रहा है कि भारत सरकार कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को हटा सकती है। 

भारत के पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कश्मीर को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर हमला बोला था। जेटली ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर का अनुच्छेद 35-ए  संवैधानिक रूप से दोषपूर्ण है और राज्य के आर्थिक विकास की राह में रोड़ा बन रहा है। अरुण जेटली ने एक ब्लॉग लिखा था जिसका शीर्षक था- ‘कानून और जम्मू-कश्मीर’। उन्होंने ब्लॉग में लिखा था कि जम्मू-कश्मीर का सात दशक का इतिहास बदलते भारत के साथ कई सवालों का सामना कर रहा है।
जेटली ने लिखा था कि ज़्यादातर भारतीयों का मानना है कि कश्मीर मामले में नेहरू का अपनाया रास्ता ‘ऐतिहासिक ग़लती’ थी।
जेटली ने पूछा था, क्या हमारी नीतियां दोषपूर्ण नजरिए के हिसाब से चलनी चाहिए या लीक से हटकर जमीनी हकीकत के मुताबिक?
जेटली ने जम्मू-कश्मीर में लागू अनुच्छेद 35-ए की पृष्ठभूमि के बारे में भी लिखा था। अनुच्छेद 35-ए के मुताबिक़ जम्मू-कश्मीर के बाहर का कोई शख्स राज्य में कोई संपत्ति नहीं खरीद सकता। जेटली ने अपने ब्लॉग में लिखा था कि इस अनुच्छेद को साल 1954 में राष्ट्रपति की ओर से जारी की गई एक अधिसूचना के जरिए ‘गुप्त रूप से’ संविधान में शामिल कर दिया गया।
जेटली ने कहा था कि अनुच्छेद 35-ए कभी संविधान सभा द्वारा बनाए गए मौलिक संविधान के खाके का हिस्सा था नहीं। उन्होंने कहा था कि इसे संविधान के अनुच्छेद-368 के मुताबिक  इसे संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से पारित भी नहीं कराया गया था।
सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 35-ए के खिलाफ कई याचिकाएं दाख़िल की गई हैं। ‘वी द सिटिज़न्स’ नाम के एक एनजीओ ने भी एक याचिका दाखिल की है।
35-ए से जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार मिला हुआ है। जम्मू-कश्मीर से बाहर का कोई भी व्यक्ति यहां अचल संपत्ति नहीं खरीद सकता है। इसके साथ ही कोई बाहरी व्यक्ति यहां की महिला से शादी करता है तब भी संपत्ति पर उसका अधिकार नहीं हो सकता है।
1954 में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के आदेश से अनुच्छेद 35-ए को भारतीय संविधान में जोड़ा गया था। ऐसा कश्मीर के महाराजा हरि सिंह और भारत सरकार के बीच हुए समझौते के बाद किया गया था। इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल करने से कश्मीरियों को यह विशेषाधिकार मिला कि बाहरी यहां नहीं बस सकते हैं।
राष्ट्रपति ने यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 370 (1) (स्र) के तहत दिया था। इसके तहत राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर के हित में कुछ ख़ास ‘अपवादों और परिवर्तनों’ को लेकर फैसला ले सकते हैं। इसीलिए बाद में अनुच्छेद 35-ए जोड़ा गया ताकि स्थायी निवासी को लेकर भारत सरकार जम्मू-कश्मीर के अनुरूप ही व्यवहार करे।
जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय
भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय में ‘द इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ को कानूनी दस्तावेज़ माना जाता है। तीन जून, 1947 को भारत के विभाजन की घोषणा के बाद राजे-रजवाड़ों के नियंत्रण वाले राज्य निर्णय ले रहे थे कि उन्हें किसके साथ जाना है।
उस वक्त जम्मू-कश्मीर दुविधा में था। 12 अगस्त 1947 को जम्मू-कश्मीर महाराज हरि सिंह ने भारत और पाकिस्तान के साथ ‘स्टैंड्सस्टिल अग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर किया। स्टैंड्सस्टिल अग्रीमेंट मतलब महाराजा हरि सिंह ने निर्णय किया जम्मू-कश्मीर स्वतंत्र रहेगा। वो न भारत में समाहित होगा और न ही पाकिस्तान में।
पाकिस्तान ने इस समझौते को मानने के बाद भी इसका सम्मान नहीं किया और उसने कश्मीर पर हमला कर दिया। पाकिस्तान में जबरन शामिल किए जाने से बचने के लिए महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर, 1947 को ‘इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर किया।
‘इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा होगा लेकिन उसे ख़ास स्वायत्तता मिलेगी। इसमें साफ़ कहा गया है कि भारत सरकार जम्मू-कश्मीर के लिए केवल रक्षा, विदेशी मामलों और संचार माध्यमों को लेकर ही नियम बना सकती है।
अनुच्छेद 35-ए 1954 में राष्ट्रपति के आदेश के बाद आया। यह ‘इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ की अगली कड़ी थी। ‘इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेश’ के कारण भारत सरकार को जम्मू-कश्मीर में किसी भी तरह के हस्तक्षेप के लिए बहुत ही सीमित अधिकार मिले थे।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने द हिन्दू में लिखे एक आलेख में कहा है कि इसी कारण अनुच्छेद 370 लाया गया। अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया। इसमें कहा गया है कि संसद के पास जम्मू-कश्मीर के लिए संघीय सूची और समवर्ती सूची के तहत क़ानून बनाने के सीमित अधिकार हैं।
जमीन, भूमि पर अधिकार और राज्य में बसने के मामले सबसे अहम हैं। भूमि जम्मू-कश्मीर का विषय है। प्रशांत भूषण का कहना है कि अनुच्छेद 35-ए भारत सरकार के लिए जम्मू-कश्मीर में सशर्त हस्तक्षेप करने का एकमात्र ज़रिया है। इसके साथ ही यह भी साफ़ कहा गया है कि संसद और संविधान की सामान्य शक्तियां जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होंगी।
हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी कानून है कि कोई बाहरी यहां सीमित जमीन ही खरीद सकता है। प्रशांत भूषण मानते हैं कि हिमाचल और उत्तराखंड के ये कानून पूरी तरह से असंवैधानिक और देश के किसी भी हिस्से में बसने के मौलिक अधिकार का हनन है।
प्रशांत भूषण ने अपने आलेख में कहा है कि चूंकि जम्मू-कश्मीर भारत में इसी शर्त पर आया था इसलिए इसे मौलिक अधिकार और संविधान की बुनियादी संरचना का हवाला देकर चुनौती नहीं दी जा सकती है। उनका मानना है कि यह भारत के संविधान का हिस्सा है कि जम्मू-कश्मीर में भारत की सीमित पहुंच होगी।
प्रशांत भूषण का मानना है कि जम्मू-कश्मीर का भारत में पूरी तरह से कभी विलय नहीं हुआ और यह अर्द्ध-संप्रभु स्टेट है। यह हिन्दुस्तान के बाक़ी राज्यों की तरह नहीं है। अनुच्छेद 35-ए ‘इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ का पालन करता है और इस बात की गारंटी देता है कि जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता बाधित नहीं की जाएगी।
कई लोग मानते हैं कि अनुच्छेद 35-ए को संविधान में जिस तरह से जोड़ा गया वो प्रक्रिया के तहत नहीं था। बीजेपी नेता और वकील भूपेंद्र यादव भी ऐसा ही मानते हैं। संविधान में अनुच्छेद 35-ए को जोडऩे के लिए संसद से क़ानून पास कर संविधान संशोधन नहीं किया गया था।
संविधान के अनुच्छेद 368 (द्ब) अनुसार संविधान संशोधन का अधिकार केवल संसद को है। तो क्या राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का यह आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर का था? भूपेंद्र यादव मानते हैं कि राष्ट्रपति का यह फैसला विवादित था।  तो क्या अनुच्छेद 35-ए निरस्त किया जा सकता है क्योंकि नेहरू सरकार ने संसद के अधिकारों की उपेक्षा की थी? 1961 में पांच जजों की बेंच ने पुरानलाल लखनपाल बनाम भारत के राष्ट्रपति मामले में अनुच्छेद 370 के तहत राष्ट्रपति के अधिकारों पर चर्चा की थी।
कोर्ट का आकलन था कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 370 के तहत उसके प्रवाधानों में परिवर्तन कर सकता है। हालांकि इस फ़ैसले में इस पर कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा गया है कि क्या राष्ट्रपति संसद को बाइपास कर ऐसा कर सकता है। यह सवाल अब भी बना हुआ है। (बीबीबी टीम)


Date : 05-Aug-2019

ऋतुपर्ण दवे

यकीनन खबर छोटी जरूर है लेकिन बेहद चिन्ताजनक है। बेहिसाब एंटीबायोटिक्स सेवन के चलते 60 फीसदी मरीजों पर प्रायमरी और सेकेंडरी लाइन के एंटीबायोटिक नाकाम हो रहे हैं। सिर्फ इतना ही नहीं आईसीयू में भर्ती 80 फीसदी मरीजों पर 18 से 20 प्रकार के खास एंटीबायोटिक्स भी असर नहीं कर रहे हैं। गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज कानपुर से संबद्ध तमाम मेडिकल कॉलेजों द्वारा जुटाए गए यह हालिया आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। निश्चित रूप से पूरे देश और दुनिया में एंटीबायोटिक के दुरुपयोग के बढ़ते आंकड़े चिकित्सा जगत की बड़ी चुनौती बनने वाले हैं।
इतना तो समझ आता है कि अब शुरुआती दौर में लिखी जाने वाली दवाएं मरीजों पर असर नहीं दिखाती हैं जिसके चलते बहुतेरे चिकित्सक भी अक्सर एडवांस स्टेज की दवा शुरू में ही लिख देते हैं। बाद में इसके परिणाम बेहद  घातक होते हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह भी है कि सिरदर्द, पेटदर्द या बुखार होने पर बिना एक्सपर्ट की सलाह के कोई भी एंटीबायोटिक ले लेने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बुरी तरह से प्रभावित होती है। 
अक्सर बेवजह और लगातार सेवन से भी शरीर में मौजूद परजीवी सूक्ष्म जीव यानी माइक्रोब्स या बैक्टीरिया इनसे प्रतिरोधक क्षमता पैदा खुद को बदल लेते हैं। जिसका नतीजा यह निकलता है कि दवा, केमिकल या संक्रमण हटाने वाले इलाज पर एंटीबायोटिक का असर या बिल्कुल नहीं या ना के बराबर हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी मानता है कि बिना जरूरत के एंटीबायोटिक दवाओं से शरीर में इसका असर घटने लगता है और इसके आदी हो चुके बैक्टीरिया का घातक प्रभाव रुकता नहीं है और मरीज की मृत्यु तक हो जाती है।
दरअसल एंटीबायोटिक्स को आम दवा समझने की भूल कर लोग बिना डॉक्टर की सलाह के दवा दूकानदारों से बेरोकटोक खरीद धड़ल्ले से उपयोग करते हैं। नतीजन इनसे बैक्टीरिया का मरना तो दूर उल्टा एंटीबायोटिक खाकर और मजबूत हो जाते हैं। चालू भाषा में ज्यादा ढ़ीठ हो जाते हैं और जिससे बीमारियां खतरनाक हो जाती है। ऐसे में तेज यानी हैवी एंटीबायोटिक दिए जाते हैं जो शरीर पर कई दूसरे दुष्प्रभाव का कारण बनते हैं। एंटीबायोटिक महज बैक्टीरियल इंफेक्शन से होनेवाली बीमारियों में असरदार होते हैं। लेकिन लोग अक्सर वायरल बीमारियों जैसे सर्दी-ज़ुकाम, फ्लू, ब्रॉन्कॉइटिस, गले में इंफेक्शन में भी सेवन करते हैं जिसका कोई मतलब और असर नहीं होता। 
जहां एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल को लेकर आमतौर पर अधूरी जानकारी और अज्ञानताएं काफी भ्रामक हैं। बिना ठीक ढंग से बीमारी को डायग्नोस किए ही या तो झोला छाप या दूसरी पैथी के यहां तक कि कई बार एमबीबीएस डॉक्टर भी धड़ल्ले से पर्चा में लिखते हैं जिनसे अच्छे और खराब दोनों तरह के बैक्टीरिया बेवजह की ऐसी खुराकों के आदी होकर बाद में बड़ी गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। वहीं आयुर्वेद में तमाम संभावनाओं के बावजूद लोगों की रुचि पैदा न होना या न करना भी चिन्ताजनक है। 
अब तक कई उदाहरण सामने हैं जिनसे ये साबित होता है कि कि हमारी देशी जड़ी-बूटी से बने चरक के नुस्खे कई बार एलोपैथी के मुकाबले बेहद कारगर साबित हुए हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए चरक संहिता विश्व चिकित्सा विज्ञान का मुख्य आधार है। यही कारण है कि कई एलोपैथ डाक्टर भी अब प्राकृतिक बैक्टीरिया रोधक क्षमता के नुस्खों का उपयोग बेझिझक करने लगे हैं। 
अक्टूबर 2017 में इलाज की नई तकनीक और बाजार में मौजूद नई दवाओं के वैज्ञानिक तौर तरीकों पर दिल्ली में हुए 2 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भी आधुनिक चिकिसकों ने माना था की कुछ बीमारियों में आयुर्वेद चिकित्सा ज्यादा कारगर है। सर गंगा राम अस्पताल के किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ. मनीष मलिक ने  किडनी की खराबी रोकने के लिए एलोपैथी की बजाए आयुर्वेद की उस दवा को बेहतर बताया जो 5 प्रकार की जड़ी-बूटी से तैयार होती है और बीमारी को आगे बढऩे से रोकती है। एक ऐसी बूटी की चर्चा भी हुई जिससे किडनी की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को जीवित करने में मदद मिलती है। मेरठ में भी जड़ी-बूटियों के प्रयोग के बेहतर नतीजे दिखे। वहां के जाने-माने आधुनिक हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. संजय जैन ने कई मरीजों पर चरक के नुस्खे से तैयार आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से बनीं दवाओं का इस्तेमाल कर मरीजों के सफल ऑपरेशन किए जिन्हें कोई संक्रमण तक नहीं हुआ। यहां तक कि एक 82 साल के मरीज को प्रोस्टेट के ऑपरेशन के बाद बजाए एंटीबायोटिक के चरक के नुस्खों की जड़ी-बूटियां से बनी देशी दवाएं दी जो कारगर साबित हुई।
निश्चित रूप से यह नतीजे ऐसे समय बेहद उम्मीदें बढ़ा रहे हैं जब समूची दुनिया में नए एंटीबायोटिक्स पर काम लगभग रूका हुआ है और इसको लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जबरदस्त परेशान है। दुनिया भर के मेडिकल जगत के लिए भले ही यह बेहद चिन्ताजनक बात हो लेकिन हमारे लिए संभावनाओं को खोलने का सुनहरा मौका है कि हम विश्व चिकित्सा की आधार चरक संहिता पर खास तवज्जो देकर दुनिया भर के मेडिकल साइंस पर अपना लोहा मनवा सकें।
अब जो भी मौजूदा एंटीबायोटिक्स हैं पूरी दुनिया की उन्हीं पर निर्भरता है। उस पर भी अंधाधुंध और हर रोग में धड़ल्ले से हो रहा उपयोग जहां उसके असर को दिनों दिन घटाता जा रहा है वहीं मेडिकल एक्सपर्ट्स के सामने तमाम बीमारियों के इलाज में इन एंटीबायोटिक के आगे दूसरी दवाओं के असरहीन होते जाने से गंभीर और नई चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। इसे हर कीमत पर पूरे देश-दुनिया में रोकना होगा जो संभव नहीं दिखता।
 ऐसे में भारत के सामने चुनौती से ज्यादा शानदार मौका है कि हम चरक संहिता और आयुर्वेद के जरिए वर्षों से प्रचलित पध्दति को नए, आधुनिक और असरदार रूप से सामने लाने की दिशा में काम करें और दुनिया भर में चिकित्सा के क्षेत्र में भी अपना डंका बजवा सकें। दुनिया भर के लिए जो एंटीबायोटिक चुनौती है हमारी चरक संहिता में वर्णित जड़ी-बूटियों में बिना साइड इफेक्ट के वो बड़ा वरदान साबित होगा जो भारत को विश्व स्वास्थ्य गुरू और बड़ा बाजार बनाने के लिए भी नया रास्ता होगा। 

 

 


Date : 04-Aug-2019

एलिजाबेथ ग्रेनियर

एक समय ऐसा भी था जब जर्मन के अमीर लोगों के पास भी थोड़ी-थोड़ी चीनी हुआ करती थी और वे इसका इस्तेमाल सिर्फ खास मौकों पर ही किया करते थे। यहां तक की हलवाई की दुकानों से पहले चीनी सिर्फ मेडिकल स्टोर पर मिलती थी।

एक आम जर्मन साल में लगभग 30 किलो चीनी खा लेता है। कोई समय था जब खाने के लिए चीनी पास में होना पैसे और ताकत की निशानी माना जाता था। लेकिन आज ऐसा नहीं है। ज्यादा चीनी खाना इंसान को मोटा और बीमार बनाने लगा है।जब तक यूरोप के व्यापारी चीनी को यहां नहीं लेकर आए थे, तब तक यहां मिठास के लिए क्या इस्तेमाल होता था? पुरातत्वविद कार्ल पाउजे कहते हैं,करीब दो हजार साल पहले फल ही मीठा खाने का एकमात्र जरिया थे। रोमन लोगों ने जर्मनी में सबसे पहले फल उगाना शुरू किया। यहां सेब, नाशपाती से बेर और अंगूर तक लगाए जाने लगे। धीरे-धीरे फलों का जूस निकाला जाने लगा और इनके गूदे से जैली बनाना शुरू किया गया। इसको ज्यादा दिनों तक रखा जा सकता था और इसे मीठे के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता था। कार्ल पाउजे स्वीट स्टफ  स्नैकिंग इन नॉएस नाम से जर्मनी के नॉएस शहर में एक प्रदर्शनी लगा रहे हैं।
गन्ने से बनने वाली चीनी यूरोप में मध्य पूर्व से आई थी। लेकिन इस चीनी को खरीदना यूरोप के लोगों के लिए मुश्किल था क्योंकि ये महंगी थी। मध्य पूर्व में गन्ने से चीनी बनाना मध्यकालीन युग में शुरू हुआ था। महंगाई की वजह से बड़े अमीर लोग भी इसे सिर्फ खास मौकों पर ही इस्तेमाल करते थे। एक प्रसिद्ध कैंडी बॉनबॉन का नाम भी ऐसे ही एक खास मौके पर पड़ा था। जब फ्रांस के राजपरिवार के एक बच्चे ने इस कैंडी को चखने के बाद बॉनबॉन कहा था। बॉन फ्रेंच भाषा का शब्द है जिसका मतलब है अच्छा।
18वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने अपने उपनिवेशों में भारी मात्रा में गन्ना उगाना शुरू किया। पाउजे के मुताबिक फ्रांस ने नेपोलियन के नेतृत्व में ब्रिटेन को व्यापार करने से रोकने के लिए हमला कर दिया था। इसके चलते ही इस महाद्वीप पर चीनी का आयात रुक गया। नेपोलियन के मर जाने के बाद यह आयात फिर से शुरू हो गया और 19वीं शताब्दी के मध्य में चीनी जर्मनी पहुंच गई। अब यह सस्ती भी थी और आम लोगों के लिए उपलब्ध थी।
आज की तारीख में चीनी को सफेद जहर तक कहा जाता है। इसे कई बीमारियों का कारण बताया जाता है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि पुराने समय में यह उन जगहों पर पाई जाती थी जहां इसकी उम्मीद सबसे कम होनी चाहिए थी यानी की दवा की दुकानों पर। माना जाता था की चीनी में चोट ठीक करने की क्षमता थी। इसलिए यह दवा के रूप में इस्तेमाल होती थी। ईसा पूर्व पहली शताब्दी में यही माना जाता था। 12वीं शताब्दी में साइन कंफेक्शन नाम की एक दवाई चलती थी जिसमें 90 प्रतिशत चीनी होती थी।
500 साल पहले दवाइयों में चीनी का इस्तेमाल इन्हें संरक्षित करने और इनके कड़वे स्वाद को कम करने के लिए किया जाता था। इसका उपयोग ऊर्जा के एक स्रोत के रूप में भी किया जाता था। मीठी दवाइयां ज्यादा बिकती थीं। अपनी बिक्री बढ़ाने के चक्कर में केमिस्टों ने दवाई की जगह सिर्फ मीठा बेचना शुरू कर दिया था। इस तरह वे दुकानें मेडिकल स्टोर से हलवाई की दुकान बन गईं।
जैसे ही हलवाई की दुकान काम करने लगीं तो वहां अलग-अलग मिठाइयां बनने लगीं। इसी क्रम में केक धीरे-धीरे प्रसिद्ध होने लगा। अपने नरम तले, मीठी क्रीम और चेरी की वजह से ये जर्मनी में तेजी से प्रसिद्ध होने लगा। जर्मन केक ने 2015 में अपना 100वां जन्मदिन मनाया है लेकिन 16वीं शताब्दी में भी ऐसे बेकरी उत्पाद उपलब्ध थे। हालांकि तब का केक आज से बहुत अलग होता थी। आज के ब्लैक फॉरेस्ट केक से मिलता जुलता उस केक में कुछ नहीं हुआ करता था।
पाउजे कहते हैं कि उस जमाने में केक पेस्ट्री लोई से बनाए जाते थे और बेक करने के बाद उसमें मीठी चीजों भरी जाती थी। वे पाई का एक प्रकार थे। पाउजे ने 200 साल पुरानी केक रेसिपो से केक बनाने की कोशिश की। उसका नतीजा एक जैम या फलों से भरी हुई आइसिंग की गई केक जैसा था। यह केक स्वाद में भी शुष्क था क्योंकि पुराने समय में खाने की चीजों को ठंडा करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। इसलिए क्रीम का इस्तेमाल नहीं होता था। इसका मतलब है कि ब्लैक फॉरेस्ट केक का अविष्कार तब हुआ होगा जब क्रीम को ठंडा रखने के उपाय हो गए थे।
लेकिन चीनी ने धीरे-धीरे अपनी इज्जत खो दी। जहां वह पहले एक स्टेटस सिंबल और लग्जरी की चीज हुआ करती थी, आज यह हर जगह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और इसे समस्याओं का कारण माना जाने लगा है। अच्छी बात यह है कि इस सब की चिंता ना करते हुए केक का एक बड़ा सा टुकड़ा खाइए और इन सब चिंताओं को भूल जाइए।  (ड़ॉयचेवेले)

 

 


Date : 04-Aug-2019

प्रेमचंद

(यह आलेख प्रेमचंद ने जनवरी 1934 में लिखा था। इसके कुछ अंश । आज के दौर में इसको पढऩा और समझना और ज़रूरी हो गया है।)

साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भांति जो सिंह की खाल ओढक़र जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढक़र आती है।
हिन्दू अपनी संस्कृति को कयामत तक सुरक्षित रखना चाहता है, मुसलमान अपनी संस्कृति को। दोनों ही अभी तक अपनी-अपनी संस्कृति को अछूती समझ रहे हैं, यह भूल गए हैं कि अब न कहीं हिन्दू संस्कृति है, न मुस्लिम संस्कृति और न कोई अन्य संस्कृति। 
अब संसार में केवल एक संस्कृति है, और वह है आर्थिक संस्कृति मगर आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोये चले जाते हैं। हालांकि संस्कृति का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं। आर्य संस्कृति है, ईरानी संस्कृति है, अरब संस्कृति है। हिन्दू मूर्तिपूजक हैं, तो क्या मुसलमान कब्रपूजक और स्थान पूजक नहीं है। ताजिये को शर्बत और शीरीनी कौन चढ़ाता है, मस्जिद को खुदा का घर कौन समझता है। अगर मुसलमानों में एक सम्प्रदाय ऐसा है, जो बड़े से बड़े पैगम्बरों के सामने सिर झुकाना भी कुफ्र समझता है, तो हिन्दुओं में भी एक ऐसा है जो देवताओं को पत्थर के टुकड़े और नदियों को पानी की धारा और धर्मग्रन्थों को गपोड़े समझता है। यहां तो हमें दोनों संस्कृतियों में कोई अन्तर नहीं दिखता।
तो क्या भाषा का अंतर है? बिल्कुल नहीं। मुसलमान उर्दू को अपनी मिल्ली भाषा कह लें, मगर मद्रासी मुसलमान के लिए उर्दू वैसी ही अपरिचित वस्तु है जैसे मद्रासी हिन्दू के लिए संस्कृत। हिन्दू या मुसलमान जिस प्रांत में रहते हैं सर्वसाधारण की भाषा बोलते हैं चाहे वह उर्दू हो या हिन्दी, बंग्ला हो या मराठी। बंगाली मुसलमान उसी तरह उर्दू नहीं बोल सकता और न समझ सकता है, जिस तरह बंगाली हिन्दू। दोनों एक ही भाषा बोलते हैं। सीमा प्रान्त का हिन्दू उसी तरह पश्तो बोलता है, जैसे वहां का मुसलमान।
फिर क्या पहनावे में अंतर है? सीमा प्रान्त के हिन्दू और मुसलमान स्त्रियों की तरह कुरता और ओढऩी पहनते-ओढ़ते हैं। हिन्दू पुरुष भी मुसलमानों की तरह कुलाह और पगड़ी बांधता है। अक्सर दोनों ही दाढ़ी भी रखते हैं। बंगाल में जाइए,  वहां हिन्दू और मुसलमान स्त्रियां दोनों ही साड़ी पहनती हैं, हिन्दू और मुसलमान पुरुष दोनों कुरता और धोती पहनते है तहमद की प्रथा बहुत हाल में चली है, जब से साम्प्रदायिकता ने ज़ोर पकड़ा है।
खानपान को लीजिए, अगर मुसलमान मांस खाते हैं तो हिन्दू भी अस्सी फीसदी मांस खाते हैं। ऊंचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते हैं, ऊंचे दरजे के मुसलमान भी। नीचे दरजे के हिन्दू भी शराब पीते है, नीचे दरजे के मुसलमान भी। मध्यवर्ग के हिन्दू या तो बहुत कम शराब पीते हैं, या भंग के गोले चढ़ाते हैं जिसका नेता हमारा पण्डा-पुजारी क्लास है। मध्यवर्ग के मुसलमान भी बहुत कम शराब पीते है, हां कुछ लोग अफीम की पीनक अवश्य लेते हैं, मगर इस पीनकबाजी में हिन्दू भाई मुसलमानों से पीछे नहीं है। हां, मुसलमान गाय की कुर्बानी करते हैं। और उनका मांस खाते हैं लेकिन हिन्दुओं में भी ऐसी जातियां मौजूद हैं, जो गाय का मांस खाती हैं यहां तक कि मृतक मांस भी नहीं छोड़तीं, हालांकि बधिक और मृतक मांस में विशेष अंतर नहीं है। संसार में हिन्दू ही एक जाति है, जो गो-मांस को अखाद्य या अपवित्र समझती है। तो क्या इसलिए हिन्दुओं को समस्त विश्व से धर्म-संग्राम छेड़ देना चाहिए?
संगीत और चित्रकला भी संस्कृति का एक अंग है, लेकिन यहां भी हम कोई सांस्कृतिक भेद नहीं पाते। वही राग-रागनियां दोनों गाते हैं और मुगलकाल की चित्रकला से भी हम परिचित हैं। नाट्य कला पहले मुसलमानों में न रही हो, लेकिन आज इस सींगे में भी हम मुसलमान को उसी तरह पाते हैं जैसे हिन्दुओं को। फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता इतना ज़ोर बांध रही है।
वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखंड। शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं। यह सीधे-सादे आदमियों को साम्प्रदायिकता की ओर घसीट लाने का केवल एक मन्त्र है और कुछ नहीं।

 


Date : 04-Aug-2019

सच्चिदानंद जोशी

बचपन में जब भोपाल के भारत टॉकीज चौराहे से गुजरते थे तो दो विज्ञापनों पर बरबस नजऱ जाती थी- ‘डॉ शाहनी का दवाखाना’  और ‘डॉ. राय का क्लीनिक’। विज्ञापन बहुत बड़ा होता था लेकिन उसके बारे में कभी पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि वहां क्या होता है। क्योंकि वहां लिखा होता था ‘गुप्त रोग’।  अब जो गुप्त है उसे प्रकट रूप में कैसे पूछा जाए। 
एक बार एक फि़ल्म भी आई थी ‘गुप्त ज्ञान’।  लेकिन फि़ल्म तो दूर उसका पोस्टर भी देखना वर्जित था। मामा के लडक़े ने जो उम्र में हमसे भी छोटा था ऑटो से जाते समय पोस्टर पढ़ लिया।  बेचारा नया-नया स्कूल गया था। अपने सद्य प्राप्त अक्षर ज्ञान का मुजाहिरा करना चाहता था सो बोल पड़ा ‘गुप्ता जान’।  तब भी सब बड़ों ने उसे शशश चुप ऐसा कहकर हतोत्साहित किया था। पता नहीं ंकि वो फिल्म देखी किसने। इतना जरूर मालूम है कि दूर के रिश्ते के फूफाजी को मोहल्ले के लडक़ों ने उस थिएटर में जाते देख लिया था। फिर दूर के रिश्ते की बुआजी ने फूफाजी की ऐसी खबर ली थी कई दिन तक उनका कही भी आना जाना बंद हो गया था।
दरअसल न पूछने की पृष्ठभूमि भूमि में वो झन्नाटेदार झापड़ था जो हमारे बड़े भाई साहब (बड़े ताऊ जी के छोटे लडक़े जो नौकरीशुदा थे और शादीशुदा होने वाले थे), ने हमें रसीद किया था हमारे सिर्फ बोर्ड पढ़ कर जोर से चिल्लाने पर ‘अहा गुप्त रोग’। उसके बाद डॉ. साहनी अथवा डॉ. राय के अध्यवसाय के बारे जानने का उत्साह मन में ही दबा रह गया। कालांतर में इनके व्यवसाय और अन्य ‘गुप्त’ बातों की जानकारी हमें वैसे ही प्राप्त हुई जैसे सत्तर और अस्सी के दशक में अन्य युवाओं को प्राप्त होती रही यानी श्री मस्तराम या उन जैसे अन्य समृद्ध लेखकों के जरिये या फिर लीलाधर बुक स्टॉल जैसे समाजसेवी पुस्तक विक्रेताओं के जरिये। कह सकते है कि ऐसे अनौपचारिक स्रोतों से प्राप्त कार्यसाधक ज्ञान के जरिये भी काम चल गया और खास कुछ बिगड़ा नही।
जब हमारे बच्चे भी उसी उम्र में आए तो जमाना बदल चुका था। ज्ञान (गुप्त वाला) प्राप्त करने की प्रविधियां भी बदल चुकी थी। नए-नए संसाधन थे, इंटरनेट था, खुला समाज था और शिक्षा के नए प्रयोग थे। कई औपचारिक और अनौपचारिक स्रोतों से उन्हें भी विषय का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त हो ही गया होगा ऐसा मानने में कोई हर्ज नहीं है। 
बचपन में कभी तंबू लगा कर प्राय: जादूगर सा भेस बनाए किसी मदारीनुमा हकीम को शिलाजीत बेचते देखते थे तो भी उत्सुकता होती थी। जिस ढंग से वो अपने डायलॉग बोलते थे वो बहुत ही आकर्षक होते थे। इतने की आप दवाई खरीदने के लिए प्रेरित हो जाओ। फिर  ‘मर्दानगी’  ‘जवानी’  ‘खोई हुई ताकत’ जैसे शब्द सुनाई पड़ते थे और भाईजी का झन्नाटेदार झापड़ याद आ जाता था। लब्बोलुबाब ये कि जो ‘गुप्त’  था और जिसका रहस्योद्घाटन करने की तमन्ना रही वो गुप्त ही रह गया। क्या करें किसी ने बात ही नहीं की उस बारे में। अच्छा हमसे किसी ने बात नहीं की तो समझ में आता है। लेकिन हमने भी कहां बात की अपने बच्चों से। जीवन की ‘गुप्तता’  के बारे में जैसा अधकचरा ज्ञान हमें ंमिला वैसा ही या उससे भी थोड़ा ज्यादा बुरा ज्ञान पाने के लिए हमने हमारे बच्चों को छोड़ दिया। नतीजा ये हुआ कि हमारी पीढ़ी छेड़छाड़ और जरा-सी चुहलबाजी में ही संतुष्ट हो जाती थी। आज इनके लिए बलात्कार, एसिड अटैक, ब्लेड से काट डालना भी कोई संवेदना नहीं जगाते।
अभी कल एक फिल्म देखी जो आपसे कहती है बात तो करो। वैसे कहा गया है ‘नीम-हकीम खतरे जान’।  हमने ‘यूनानी शफाखाना ’ का बोर्ड लगा भी देखा है पुराने भोपाल शहर में। लेकिन इन सब बातों से कभी कोई नज़दीक का रिश्ता रहा नहीं। इसलिए न इनका महत्व समझ पाए, न इनकी त्रासदी। 
‘खानदानी शफाखाना’  देखी तो मन संवेदना से भर गया। अपने आप से प्रश्न करने पर मजबूर हो गया कि कभी बात क्यों नहीं की इस विषय पर। फि़ल्म के मामाजी देखे तो एकदम पगड़ी लगाए डॉ. शाहनी याद आ गए। यकीन है कि फिल्म की निर्देशक शिल्पी दासगुप्ता को भी याद होंगे क्योंकि वो भी भोपाल की ही हैं। लेकिन ऐसे शफाखानो के अंदर घुसकर उनकी दर्दभरी दास्तान जान लेना गजब का काम है, जो शिल्पी ने किया है। बेबी बेदी के जरिये एक नई सोनाक्षी सिन्हा भी आपके सामने प्रकट होती है जो संवेदनशील और सशक्त अभिनेत्री का रूप है। सच मानिए जब फिल्म देखने गए तो ऐसी किसी अपेक्षा से नही गए। ऐसी बात ही नही हुई थी। पोस्टर और दूसरी पब्लिसिटी के भरोसे हम तो गए थे एक कॉमेडी फिल्म देखने। और लौटे एक बेहद संजीदा फि़ल्म देखकर।  कल ही रात एक मित्र को बताया इस फि़ल्म के बारे में तो मित्र ने पूछा- ‘कहां किसी थिएटर में लगी है’ । यानि नई फिल्म थिएटर में है और कइयों को पता भी नहीं। इसलिए सोचा कम से कम ‘बात तो करें’।

 

 

 


Date : 03-Aug-2019

भूपेश बघेल

(आउटलुक पोषण अवार्ड 2019 में आज 3 अगस्त को नई दिल्ली में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का दिया भाषण)

सबसे पहले मैं ‘आउटलुक’ को साधुवाद देता हूं कि गैर जरूरी मुद्दों के तूफान के बीच से एक दीया जलाते हुए वास्तविक जरूरतों के मुद्दों की पहचान की।
आपने असली सवालों को सामने लाने का साहसिक काम किया, यही वजह है कि हम सब यहां जाति, धर्म जैसे समाज को आपस में बांटने  वाले मुद्दों की बजाय सुपोषण पर चर्चा करने एकजुट हुए हैं।
मेरा मानना है कि तीसरी दुनिया के तमाम देशों के सामने बहुत लम्बे समय से कुपोषण बहुत बड़ी समस्या रही है, जो दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है और समाज के किसी भी हिस्से में काम करने वाले व्यक्ति या संगठन के लिए यह समझना सबसे ज्यादा जरूरी है कि हमें चांद से ज्यादा जरूरत, अपनी धरती में ही जीवन खोजने की है।
कोई चार साल पहले नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स की पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में कहा था ‘भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जो सबसे ज़्यादा अशिक्षित और अस्वस्थ लोगों के साथ वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की कोशिश कर रहा है।’ उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था, ‘न तो पहले कभी ऐसा हुआ है और न भविष्य में ऐसा होने वाला है।’
केरल का उदाहरण सामने है। 1956 में भाषाई आधार पर राज्यों का गठन हुआ था तब, केरल भारत का तीसरा सबसे गरीब राज्य था। 1960 में केरल की राज्य सरकार ने यूनिवर्सल शिक्षा और स्वास्थ्य योजना लागू करने का फैसला किया, जो एक गरीब राज्य के लिए आसान नहीं था, लेकिन वह फैसला अमल में लाया गया और परिणाम सामने हैं। केरल आज उन राज्यों में से है जहां कुपोषण की समस्या सबसे कम है।
मैं आंकड़ों की बाजीगरी पर विश्वास नहीं करता, लेकिन छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री होने के नाते यह चिंता जरूर करता हूं कि पिछले 15 वर्षों में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं होने के कारण हमारे यहां गरीबी का प्रतिशत 37 से बढक़र 39.9 प्रतिशत क्यों हो गया? 15 साल की सरकार जिस चमकते विकास के दावे करती थी, इस एक आंकड़े के प्रकाश में ही उन्हें झूठा क्यों नहीं माना जाए।
कुपोषण की वैश्विक दर यदि 22 प्रतिशत है तो छत्तीसगढ़ अभी भी 30 प्रतिशत से अधिक कुपोषण के साथ बहुत पीछे है। भारत में पांच वर्ष से कम आयु के 44 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं तो छत्तीसगढ़ में यह प्रतिशत 47.1 है।
आदिवासी इलाकों में तो यह प्रतिशत और अधिक है। महिलाओं में खून की कमी और वजन कम होने के आंकड़े भी चिंतित करने वाले हैं। अगर ऐसा भारी भरकम विकास हो रहा था तो ऐसा कैसे हुआ कि हमारे बच्चे और माताएं कुपोषित रह गए? यह तो मानना पड़ेगा कि कुपोषण का सीधा संबंध गरीबी से है। हमें सबसे पहले गरीबी दूर करने को ही लक्ष्य करना पड़ेगा। हमारी यूपीए सरकार ने मनरेगा जैसा कार्यक्रम लागू किया तो गरीबी रेखा से 14 करोड़ परिवारों को बाहर निकलने में मदद मिली। 
खाद्य सुरक्षा कानून ने भी आबादी के स्वास्थ्य में सुधार की दिशा में बड़ा योगदान दिया। हम देश में न्यूनतम आय की योजना लागू करना चाहते थे। इससे 25 करोड़ की आबादी गरीबी रेखा से बाहर निकल सकते थे, लेकिन विडम्बना है कि गरीबी दूर करने का अभियान सत्ता परिवर्तन का शिकार हुआ और प्रगति का रथ उल्टा चलने लगा।
असल चिंता अब सिर्फ भूख मिटाने तक सीमित रही, बल्कि क्या खाएं क्या खिलाएं जो किसी शिशु/किसी व्यक्ति को स्वस्थ शारीरिक और मानसिक विकास दे, यह सोचना जरूरी है। 
यह विषय हमारी परम्पराओं में भी था। विभिन्न समाजों और समुदायों के अर्जित अनुभव में भी इसका समाधान था। इसलिए हम उस तमाम ज्ञान को खारिज करके आगे नहीं बढ़ सकते। उसे नई खोज, नई सुविधाओं से जोडक़र आगे बढ़ सकते हैं।
आज यह खोज करने की जरूरत है कि दूध और अण्डा शाकाहारी है या मांसाहारी।
यदि हमारे पास अनेक विकल्प हों और हम समुदायों को यह चुनने का अधिकार दे सकते हों कि वे अपने खानपान की परम्पराओं के अनुसार जो चाहे, वो खिलाए-पिलाए, लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि आपको सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं खाना है, बल्कि शरीर में न्यूट्रीएंट की जरूरत के अनुसार खाना है, तो इसमें क्या बुराई है।
किसी ने कहा है 
दरिया से भी लौट जाते हैं
मुसाफिर प्यासे साहेब,
हर पानी की फितरत
प्यास बुझाना नहीं होती ...
मैं सोचता हूं कि इस तरह की जागरूकता भी आज समाज की बहुत बड़ी जरूरत है। देश और दुनिया में आज जिस तरह की राजनीति हो रही है, उसमें भयादोहन एक बड़ा हथियार है। 
एक जाति, एक समुदाय, एक समाज दूसरे के लिए खतरा है, यह बताकर जब राजनीति की जाती है, तब कुपोषण जैसे मुद्दों को पीछे छोड़ दिया जाता है। आज फिर दुनिया को युद्ध का डर बताकर राजनीति करने वाले सफल होते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि असली आक्रमण तो काफी पहले शुरू हो चुका है, जिसे कुपोषण के रूप में परिभाषित करना भर बाकी है। वास्तव में कुपोषित पीढिय़ां से घिरा देश इतना कमजोर हो जाएगा कि उसे शारीरिक और मानसिक तौर पर फिर से खड़ा करना बहुत कठिन हो जाएगा। इसलिए आज का समय इस वास्तविक आक्रमण की हर चाल को समझने को है और सुपोषण के द्वारा एक स्थाई जंग जीतने का है।  
यह मंच इस बात का गवाह है कि यह चिंता छत्तीसगढ़ की है, यह चिंता पूरे देश की है। इस लड़ाई को एक सिरे से हमारे वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, एक्टिविस्ट और आप जैसे जागरूक मीडिया के साथी थामे हुए हैं तो दूसरे सिरे पर यह जिम्मेदारी लोककल्याणकारी सरकारों की है।
अपनी इसी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए हमारी नेता माननीय सोनिया गांधीजी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार और उसके प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इस देश को ‘भोजन का अधिकार’ दिया कानून बनाकर। यह अधिकार कुपोषण के खिलाफ इस लड़ाई के लिए एक सशक्त औजार बना है।
कुपोषण हमारे देश के सर्वांगीण विकास में इतनी बड़ी बाधा थी कि सर्वोच्च अदालत ने इसकी चिंता की। याद ही होगा कि 1995 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल में ही स्कूलों में ‘मिड डे मील’ योजना शुरू हुई थी।
कांग्रेस पार्टी जब लोकल्याण की अपनी जिम्मेदारी की बात करती है तो उसके सामने समाज का सबसे वंचित तबका होता है। वही जिसे बापू ने अंतिम पंक्ति का अंतिम व्यक्ति कहा था।
अतीत की कांग्रेस सरकारों ने, फिर यूपीए ने महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू के विकास के मॉडल को अपना आदर्श माना। 
हमने यह महसूस किया कि कुपोषण के खिलाफ इस लड़ाई में स्त्री-पुरुषों के बीच की गैरबराबरी एक बड़ी बाधा है। पोषण आहार के मामले में इस गैरबराबरी को भी दूर करना ही होगा। इस गैरबराबरी को दूर किये बिना ना तो स्त्री सशक्तीकरण की बात की जा सकती है और ना ही निरोगी और स्वस्थ, तंदरुस्त शिशु की ही बात। और इनके बिना कोई भी विकास पूरा कैसे होगा? 
दरअसल कुपोषण के खिलाफ लड़ाई के कई आयाम हैं। अगर गैरबराबरी चुनौती है तो गरीबी भी उतनी ही बड़ी चुनौती है। अगर पौष्टिकता के ज्ञान का अभाव चुनौती है तो राजनीतिक इरादों का अभाव भी बड़ी चुनौती है। हम कुपोषण के खिलाफ नीतियां बनाते चलें और उन पर अमल ना कर पाएं तो यह भी तो एक बड़ी चुनौती है।
आज भी अगर भारत में पांच साल से कम उम्र के शिशुओं का बौनापन दुनिया का एक तिहाई है, तो हमें लगता है कि कुपोषण के खिलाफ लंबी लड़ाई अभी लड़ी जानी है। 

कुपोषण के खिलाफ इस विचार मंथन में बहुत से विशेषज्ञ शामिल हैं। बहुत से एक्टिविस्ट्स शामिल हैं। आप सभी के पास देश और दुनिया आंकड़े हैं। आपके पास हर राज्य और हर जिले के आंकड़े हैं ही।
देखिए कि ये आंकड़े कितने भयावह हैं। देखिए ये आंकड़े हमारे सामने कितनी बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। यहां बैठे सभी बुद्धिजीवी यह जानते हैं कि विभिन्न कारणों से होने वाली शिशु मृत्यु का प्रकोप 60 प्रतिशत अधिक कुपोषित बच्चों पर होता है। यदि कुपोषण व एनिमिया को एक बीमारी के रूप में चिन्हांकित कर लक्षित किया गया तो 6 वर्ष से कम आयु वर्ग में होने वाली मृत्यु पर नियंत्रण सुगम होगा। 
यदि हम पोषण व स्वास्थ्य के जीवन चक्र का अध्ययन करें तो पाएंगे कि एक कुपोषित किशोरी कुपोषित मां बनती है एक कुपोषित मां कम वजन वाले बच्चे को जन्म देती है। 
बौनापन कुपोषण का एक प्रकार है, जिसमें लंबे समय से सही पोषण न मिलने से प्रजाति में बौनापन आ जाता है। यह बौनापन उस राष्ट्र व उस राज्य के लिए ‘सम्पत्ति’ नहीं बन पाता है। 
मेरा जन्म एक छोटे से गांव में हुआ है। गांव में ही पला, गांव के स्कूल में ही पढ़ा, गांव की मिट्टी में ही खेला, गांव के तालाब में ही नहाया व गांव के अमरूद तोडक़र ही खाए। 
मुझे याद नहीं पड़ता कि गांव की परंपरागत खाद्य सामग्री को नियमित व संतुलित रूप से खाने वाला कोई बच्चा बीमार हो या कुपोषित हो। हम जब अपनी परंपरा, अपनी मिट्टी, अपनी मिट्टी से उपजी खाद्य सामग्री से जब दूर होते हैं। हम अपनी न्यूट्रीशन गैप या कुपोषण जैसी कठिनाइयों का इलाज परंपरागत पद्धतियों में नहीं ढूंढते हैं, जिससे यह समस्या ठीक होने के बजाय बढ़ती जा रही है।
हमने महसूस किया कि मिड डे मील में अंडा एक बड़ी जरूरत है। अंडे की पौष्टिकता निर्विवाद है फिर भी कतिपय तत्वों ने गरीब की जरूरतों की चिंता नहीं की और अंडा बांटने की हमारी योजना में बाधाएं खड़ी करने की कोशिश की, लेकिन इस योजना को जनता का भरपूर साथ मिला। स्वाभाविक रूप से हमने उन बच्चों का भी ख्याल  रखा जो अंडा नहीं खाते।
मैं व्यक्तिगत रूप से अमत्र्य सेनजी से सहमत हूं और चाहता हूं कि छत्तीसगढ़ को पहले एक शिक्षित और स्वस्थ्य राज्य में बदला जाए, तभी हम विकास के सही रास्ते पर आगे बढ़ सकेंगे।
हमने चुनाव के दौरान वादा किया था कि हम राज्य में यूनिवर्सल स्वास्थ्य योजना लागू करेंगे और हम इस दिशा में काम कर रहे हैं।
आज भी अगर हमारे समाज में पोषण आहार के मामले में स्त्री और पुरुष के बीच गैरबराबरी मौजूद है तो जानिए कि हमें कुपोषण के खिलाफ अभी लंबी लड़ाई लडऩी है।