विचार / लेख

Date : 31-Oct-2019

संयुक्त राष्ट्र समर्थित स्टॉप टीबी पार्टनरशिप संगठन ने बताया है कि बीपीएल नाम का की यह दवा कम आय वाले देशों को ग्लोबल ड्रग फैसिलिटी यानी जीडीएफ के जरिए मुहैया कराई जाएगी। स्टॉप टीबी पार्टनरशिप का गठन 2001 में टीबी की दवा मुहैया कराने के लिए किया गया था जो कीमतें कम रखने पर भी मोलभाव करता है।

दूसरे इलाजों के लिए वकालत करने वाले गुट इससे आधी कीमत रखने की बात कह रहे थे। बीपीएल एक दवा है जो टीबी के दूसरे इलाजों की तुलना में आसान है। इसमें एंटीबायोटिक दवाओं के एक मिश्रण का इस्तेमाल करीब दो साल की अवधि के लिए करना होता है। दवाओं का नया मिश्रण बीमारी की दवा प्रतिरोधी विकृतियों पर पूरा ध्यान देता है। इसमें टीबी एलायंस की नई स्वीकृत दवा प्रिटोमानिड के साथ लिनेजॉलिड और जॉन्सन एंड जॉन्सन की बेडाक्वीलिन होती है।
प्रिटोमानिड की कीमत एक आदमी के इलाज के लिए करीब 364 डॉलर होती है। प्रिटोमानिड बीते 40 सालों में तीसरी दवा है जिसे दवा प्रतिरोधी टीबी के इलाज के लिए मंजूरी दी गई है। इससे पहले बेडाक्वीलिन और डेलामानिड को ही टीबी के इलाज के लिए मंजूरी मिली थी।
कई संगठन लंबे समय से बेडाक्वीलिन और डेलामानिड की ऊंची कीमतों की आलोचना करते हैं। गैर लाभकारी संस्था मेडिसिन संस फ्रंटियर्स यानी एमएसएफ ने तो जॉन्सन एंड जॉन्सन के खिलाफ बकायदा सार्वजनिक अभियान चला रखा है। जॉन्सन एंड जॉन्सन की बेडाक्वीलिन की छह महीने के लिए खुराक की कीमत 400 डॉलर है। एमएसएफ की दलील है कि बेडाक्वीलिन को 25 सेंट प्रति दिन के मुनाफे पर बनाया और बेचा जा सकता है और इसकी कीमत पूरे इलाज के लिए 500 डॉलर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। हालांकि स्टॉप टीबी पार्टनरशिप का कहना है कि अत्यधिक दवा प्रतिरोधी टीबी के इलाज के लिए नियमानुसार दवाओं पर 2000 से 8000 डॉलर प्रति कोर्स का खर्च है जो कम से कम 20 महीने चलता है।
ट्यूबरकुलोसिस या फिर क्षय रोग का बैक्टीरिया खांसी जुकाम से फैलता है। सरकार सालों से अभियान चला रही है कि दो हफ्ते से ज्यादा खांसी टीबी हो सकती है। लेकिन इसके बावजूद देश में टीबी को लेकर संजीदगी नजर नहीं आती।
टीबी अलायंस ने अमरीकी दवा बनाने वाली कंपनी माइलान एनवी को उच्च आय वाले बाजारों के लिए प्रिटोमानिड बनाने का लाइसेंस दिया था। इसके साथ ही कंपनी को कम और मध्यम आय वाले देशों के लिए भी लाइसेंस मिला था, जहां टीबी के ज्यादा मामले सामने आते हैं लेकिन यह लाइसेंस सिर्फ उसी कंपनी के लिए नहीं है।
स्टॉप टीबी पार्टनरशिप का कहना है कि वह विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशानुसार दवाओं की सप्लाई शुरू कर देगी हालांकि उसका यह भी कहना है कि वह सीधे उन देशों को भी दवा बेचेगी जिन्हें इसकी जरूरत है। कम आय वाले देशों में जीडीएफ के जरिए यह दवा बेची जाएगी। वहां उनकी कीमत वही होगी जो तय की गई है। लेकिन दूसरे देशों के लिए उनके हिसाब से कीमत बातचीत के जरिये तय होगी। दवा 26 गोली वाली शीशी में होगी और छह महीने के इलाज के लिए सात शीशियों की जरूरत होगी। भारत में मैक्लियोड्स फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड को भी प्रिटोमानिड बनाने का लाइसेंस मिला है। 
एनआर/एके (रॉयटर्स)


Date : 30-Oct-2019

हाल ही में एक समाचार पत्र में पढऩे को मिला कि आंध्रप्रदेश के तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर में 12 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक धन चढ़ावे के रूप में और 9 हजार किलो स्वर्णाभूषण के रुप में भक्तों ने वहां चढा़ए तो इस अपार धनराशि और हजारों किलो स्वर्णाभूषण मंदिरों को मिलने के क्या फायदे जिस देश के हजारों किसान बैंकों के तगादों से परेशान होकर प्रतिवर्ष आत्महत्या कर रहे हैं (अपने कृषि ऋण न चुका सकने के कारण।
बहुत से अमेरिकन, भारतीय राजनीति और समाचारों में भी रुचि रखते हैं। हमारे यूनिवर्सिटी (कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी, अमरीका) के एक प्रोफेसर मित्र ने कहीं पढ़ा होगा कि मुंबई का अरब-खरबपति सिद्धिविनायक मंदिर महाराष्ट्र के उन किसानों के परिवारों की आर्थिक मदद करता है जो अपने कृषि ऋणसे परेशान होकर आत्महत्या कर चुके हैं। तो उस मित्र ने एक तर्कसंगत टिप्पणी कि सिद्धि धविनायक मंदिर किसान के आत्महत्या का इंतजार ही क्यों करता है?  (यानी कि कब आप आत्महत्या करोगे तो मैं आपके परिवार की आर्थिक सहायता के लिए तैयार बैठा हूं) वही आर्थिक सहायता सिद्धि धिविनायक मंदिर उस किसान के जीते जी ही क्यों नहीं कर देता यानी उसका ऋण ही क्यों नहीं चुकता कर देता। 
कर्जमुक्त हो जाने के बाद किसान को न तो आत्महत्या करने की जरुरत पड़ेगी और न ही सिद्धि धिविनायक मंदिर को आजीवन उसके परिवार की आर्थिक सहायता करने की जरुरत होगी। अब सिद्धि धिविनायक मंदिर और देश भर के करोड़पति, अरबपति और खरबपति मंदिर के संचालकों को कौन समझाए कि आप इस अपार धनराशि का कुछ हिस्सा देश के गरीब किसानों को कर्जमुक्त करने में लगाएं। क ोई समझाएगा भी तो भी वे सुनने के लिए तैयार नहीं होंगे लेकिन देश में कानून बनाने वाले (सांसद-विधायक) इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लेंगे कि उनका वेतन बढ़ाया जाय या उन्हें चुनाव हारने के बाद भी पेंशन दिया जाए।
शायद गणेश भगवान (मुंबई का सिद्धि धिविनायक  इन्हीं का मंदिर है) भी इस प्रस्ताव से 100 फीसदी सहमत होंगे कि मंदिर किसान का ऋण चुका दे बजाए उसके आत्महत्या करने के बाद उसके परिवार की आर्थिक सहायता करने के।
भारत के 25 - 30 अरब-खरबपति मंदिर बिल गेट्स और मुकेश अंबानी से भी ज्यादा धनी हैं। लेकिन उनके ये अपार धन किस काम के जो देश के असली पालनहारों (किसानों) के ऋण नहीं चुका सकते। और इससे हास्यास्पद और क्या हो सकता है कि किसान पहले आत्महत्या कर ले फिर उसके बाद वह उसके परिवार की आर्थिक सहायता करेगा!
केंद्र के मोदी सरकार ने कश्मीर से धारा 370 और 35 ए्र हटाने का काम जिस मुस्तैदी के साथ किया उसी मुस्तैदी से कानून बनाकर भारत के करोड़पति, अरबपति और खरबपति मंदिरों की अपार धनराशि से देश के पालनहारों (किसानों) के कर्ज क्यों नहीं चुकता कर दिए जाते? 370 हटाने का तो कई लोगों ने विरोध किया लेकिन संभवत: देश के पालनहारों के कर्जमुक्ति कानून का सारा देश केवल और केवल स्वागत ही करेगा।
-आदित्य शुक्ला


Date : 30-Oct-2019

पुलकित भारद्वाज

गुजरात में कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए अल्पेश ठाकोर और उनके करीबी धवल सिंह झाला को अपनी ही सीटों पर हुए उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा है

हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों के बीच गुजरात से आई एक महत्वपूर्ण ख़बर दब सी गई। ख़बर अल्पेश ठाकोर के अपनी ही विधानसभा सीट राधनपुर से उपचुनाव हारने की। वही अल्पेश ठाकोर जिन्होंने 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का हाथ थामकर भारतीय जनता पार्टी को नाकों चने चबाने के लिए मजबूर कर दिया था। तब अल्पेश के साथ दलित नेता जिग्नेश मेवानी और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल भी कांग्रेस के पक्ष में खड़े थे।

लेकिन कांग्रेस और अल्पेश का यह साथ ज्यादा नहीं चला। अल्पेश की तरफ़ से पार्टी को पहला झटका जुलाई 2018 में मिला। तब उन्होंने राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा प्रत्याशी एस जयशंकर और जुगलजी ठाकोर के पक्ष में मतदान किया था। उनके करीबी कांग्रेसी विधायक धवल सिंह झाला भी ऐसा करने में उनके साथ थे। इस घटना के करीब दस महीने बाद इन दोनों नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी और बीती जुलाई में भाजपा का दामन थाम लिया। अल्पेश और धवल सिंह के दल बदलने की वजह से ही उनकी विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे। इनमें इन दोनों को ही हार का सामना करना पड़ा है।

स्थानीय जानकारों के मुताबिक इस चुनाव में अल्पेश ठाकोर के सबसे बड़े हथियार ही उन पर उल्टे पड़ गए। दरअसल अल्पेश ठाकोर का अब तक का राजनीतिक सफऱ ठेठ जातिवाद और क्षेत्रवाद के दो प्रमुख स्तंभों पर टिका हुआ है जिसकी शुरुआत 2011 में ‘गुजरात क्षत्रिय ठाकोर सेना’ की स्थापना के साथ हुई थी। ठाकोर सेना का गठन आर्थिक और सामाजिक विषमताओं को दूर करने के नाम पर किया गया था। लेकिन इतने भर से अल्पेश सुर्खय़िां नहीं बटोर पाए। इस मोर्चे पर उन्हें पहली सफलता 2015-16 के दौरान मिली। तब गुजरात में पाटीदार समुदाय अपने लिए ओबीसी कोटे में आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलनरत था। इससे गुजरात में पाटीदारों व अन्य पिछड़ा वर्ग के बीच टकराव की स्थिति बन गई। मौके को भांपते हुए अल्पेश ठाकोर ने ओबीसी-एससी-एसटी मंच बनाकर पाटीदारों के विरोध में एक समानांतर आंदोलन खड़ा कर दिया।

किंतु इसके कुछ ही महीने बाद अल्पेश ठाकोर ने अपना रुख बदलते हुए गुजरात में अवैध शराब की बिक्री और बढ़ती बेरोजगारी को लेकर मुहीम छेड़ दी। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में वे कांग्रेस की टिकट पर राधनपुर क्षेत्र से विधायक बन गए। अब वे उन हार्दिक पटेल के साथ भी खड़े थे जो उन पाटीदारों के नेता थे जिनके खिलाफ वे अब तक लड़ रहे थे। 2018 में अल्पेश ने एक बार फिऱ राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा जब ठाकोर सेना पर गुजरात में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा भडक़ाने का आरोप लगा था। हिंदी भाषी राज्यों के लोगों पर ये हमले एक ग़ैरगुजराती मजदूर की गिरफ्तारी के बाद शुरु हुए थे जिस पर एक सवा साल की बच्ची से दुष्कर्म का आरोप था।

अब बात इस उपचुनाव की। राधनपुर विधानसभा क्षेत्र के कुल पौने तीन लाख मतदाताओं में से 70 से 80 हजार वोट अकेले ठाकोर समाज के हैं। ऊपर से अल्पेश को भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों के मत मिलना भी लगभग तय सा ही था। लिहाजा इस उपचुनाव में अल्पेश को बड़ी जीत मिलने की संभावनाएं जताई जा रही थीं। इस बात को लेकर अल्पेश ख़ुद भी इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने चुनाव से पहले ही ख़ुद को गुजरात का नया उपमुख्यमंत्री घोषित कर दिया था।

स्थानीय पत्रकार जेके जोशी इस बारे में कहते हैं, ‘अल्पेश ने अपने आप को एक जाति के नेता के तौर पर सीमित कर लिया। इससे राधनपुर के दूसरे समुदायों में उनके प्रति संशय और नाराजगी का भाव धीरे-धीरे घर करने लगा था। यह उपचुनाव एक तरह से ठाकोर बनाम ग़ैरठाकोर के बीच लड़ा गया और अल्पेश भाई को इसका नुकसान उठाना पड़ा।’ दिलचस्प बात यह है कि ख़ुद जाति आधारित राजनीति करने वाले अल्पेश ठाकोर ने अपनी शिकस्त के लिए जातिवादी तत्वों के षडयंत्र को जिम्मेदार ठहराया है।

लेकिन ऐसा नहीं था कि क्षेत्र के दूसरे समुदायों के लोग ही अल्पेश से खफ़़ा थे। जानकारों के अनुसार अल्पेश इस चुनौती से तो जैसे-तैसे पार पा लेते। मुसीबत यह हुई कि वे अपने ठाकोर समुदाय को भी अपने से जोड़े रखने में कामयाब नहीं हो पाए। राधनपुर क्षेत्र से ही ताल्लुक रखने वाले जीतू भाई ठाकोर का इस बारे में कहना है कि ‘अल्पेश ने अपनी राजनीति की शुरुआत समाज की भलाई के नाम पर की थी। लेकिन बाद में उनका लक्ष्य गुजरात में ख़ुद को बालासाहब ठाकरे और ठाकोर सेना को शिवसेना के तौर पर खड़ा करना रह गया। अल्पेश की शह पर ठाकोर सेना के युवा कार्यकर्ता चाहे जिस बात पर शहर-कस्बों की दुकानों में तोड़-फोड़ करते, उत्पात मचाते, दूसरे समुदायों के लोगों से झगड़ते, बाहर वालों को धमकाते।।। इस बात से ठाकोर समाज के बाकी सभ्रांत लोगों को आपत्ति होने लगी थी।’

ठाकोर सेना की तरफ़ से अपने गांव के प्रमुख रह चुके जीतू भाई आगे जोड़ते हैं, ‘कम समय में ज्यादा नाम होने की वजह से अल्पेश का अहंकार बहुत बढ़ गया है। वह सार्वजनिक तौर पर समाज के उन युवाओं की छोटी-छोटी बात पर बेइज्जती करने लगा, जिन्होंने उसे यहां तक पहुंचाने में जी-जान एक कर दिया था। बीते एक साल में अल्पेश के आस-पास रहने वाले उसके कई समर्थकों ने उसका साथ छोड़ दिया। उनमें से कइयों ने इस चुनाव में अल्पेश के विरोध में वोट डाले।’

एक अन्य स्थानीय पत्रकार की मानें तो क्षेत्रवाद फैलाने वाली छवि भी इस चुनाव में अल्पेश के लिए बैकफायर ही साबित हुई। इसके चलते उन्हें हिंदी पट्टी वाले लोगों के तो वोट नहीं ही मिले, बल्कि स्थानीय लोगों ने भी उनसे कन्नी काटना शुरु कर दिया। दरअसल, अल्पेश ठाकोर मूल रूप से राधनपुर (पाटण जिले) की बजाय अहमदाबाद से ताल्लुक रखते हैं। इसके चलते क्षेत्र में उपचुनाव से पहले यह चर्चा भी खूब थी कि ‘दूसरों को भगाने वाले ख़ुद भी तो राधनपुर के लिए बाहरी ही हैं।’ हालांकि अल्पेश को चार हजार वोट से हराने वाले कांग्रेस प्रत्याशी रघु देसाई भी राधनपुर से नहीं आते। लेकिन क्षेत्र में वे अल्पेश की तुलना में कहीं ज्यादा सक्रिय रहते हैं।

राजनैतिक विश्लेषक अल्पेश की शिकस्त को इसलिए भी बड़ी मान रहे हैं क्योंकि केंद्र और प्रदेश दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। ऐसे में माना जा रहा था कि सामान्य समझ वाला वोटर भी भाजपा प्रत्याशी के ही पक्ष में वोट डालेगा ताकि उसके क्षेत्र के विकास कार्यों में कोई अड़चन पैदा न हो। ऊपर से गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का गृहराज्य भी है और लोकसभा चुनाव में यहां की सभी 26 सीटें भाजपा की झोली में गई थीं। वैसे ये कयास गलत भी नहीं थे और शायद इसीलिए अल्पेश ठाकोर सम्मानजनक मत हासिल करने में सफल रहे। लेकिन फिर भी ये सभी वजहें उन्हें जीत दिलाने में नाकाम साबित हुईं।

राधनपुर जिले से ताल्लुक रखने वाले भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी इस बारे में नाम न छापने की शर्त पर एक काम की बात बताते हैं, ‘अल्पेश को पार्टी का टिकट मिलने के बाद हमारे स्थानीय कार्यकर्ताओं को बड़ा धक्का लगा था। वे इस बात को नहीं भूले थे कि उनकी ही वजह से विधानसभा चुनाव के दौरान क्षेत्र में उनकी जमकर किरकरी हुई थी। नतीजतन हमारे लाख समझाने के बावजूद हमारे कई कार्यकर्ताओं ने इस चुनाव से दूरी बना ली।’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘कार्यकर्ताओं को बिदकाने में अल्पेश ठाकोर के लटक-झटक वाले अंदाज ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। वे किसी शहरी नेता की तरह आम समर्थकों से एक दायरा बनाकर चलते हैं। जबकि राधनपुर जैसी ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली सीट पर लोगों से घुल-मिलकर ही राजनीति की जा सकती है।’ भाजपा से जुड़े इन सूत्र के शब्दों में, ‘क्षेत्र में भाजपा के कुछ कद्दावर नेताओं को यह डर भी था कि अल्पेश के इस सीट से जीत हासिल करने पर उनमें से कोई भी निकटतम भविष्य में पार्टी के टिकट पर दावेदारी नहीं कर पाएगा। ऐसे में हमें कुछ बूथों पर भितरघात की भी ख़बरें मिली हैं।’
जानकारों के मुताबिक अल्पेश के बार-बार अपने स्टैंड से पलट जाने की वजह से भी उनकी छवि को बड़ा नुकसान पहुंचा है। गौरतलब है कि ठाकोर सेना के गठन के बाद अल्पेश ने सार्वजनिक तौर पर कई बार राजनीति में कदम न रखने की प्रतिज्ञा ली थी। लेकिन उनकी इस प्रतिज्ञा का हश्र सभी के सामने है। इसके बाद उन्होंने अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों से पाटीदारों की मुखालफत करवाकर गुजरात को एक बार फिऱ कौमी हिंसा के मुहाने पर ला खड़ा किया (हिंदू-मुसलमान दंगों के अलावा गुजरात कई बार अलग-अलग हिंदू जातियों के बीच हुए दंगों का भी गवाह रह चुका है)। लेकिन 2017 का विधानसभा चुनाव आते-आते अल्पेश ख़ुद हार्दिक पटेल के करीबी बन गए।
इससे पहले उन्होंने कांग्रेस और भाजपा दोनों में से किसी के साथ न जाने जैसी बातें भी कई बार दोहराई थीं। लेकिन वे पहले कांग्रेस जुड़े और भारतीय जनता पार्टी को जी भर के कोसने के बाद उसके पाले में आ गए। ऐसा करते समय वे शायद भूल गए थे कि उनसे पहले राधनपुर के मतदाता 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में दल-बदलकर चुनाव लडऩे वाले विधायकों को घर का रास्ता दिखा चुके हैं।
उपचुनाव में अल्पेश ठाकोर और धवल सिंह झाला की हार के बाद कांग्रेस में एक स्वाभाविक खुशी का माहौल तो है ही लेकिन इससे पार्टी को बड़ा फायदा भी पहुंचा है। गुजरात में कांग्रेस के एक मौजूदा विधायक इस बारे में सत्याग्रह को बताते हैं कि ‘अल्पेश और झाला के बाद पार्टी के कुछ अन्य विधायकों में भी दल-बदलने को लेकर सुगबुगाहट होने लगी थी। आशंका थी कि राज्यसभा की चार सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनावों में वे भी भाजपा प्रत्याशियों को अपना समर्थन दे सकते हैं। लेकिन इन नतीजों के बाद उनके हौंसले पस्त होते दिख रहे हैं।’

 


Date : 30-Oct-2019

गिरीश मालवीय

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते आइडिया-वोडाफोन एयरटेल जैसी टेलीकॉम कंपनियों के डेथ वारंट पर साइन कर दिया है। कोर्ट के फैसले के बाद 9 दिग्गज टेलीकॉम कंपनियों के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है।
मामला यह था कि टेलीकॉम कंपनियों को ष्ठशञ्ज यानी दूरसंचार विभाग को लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल के बदले एक तय फीस देनी होती है। जिसे त्रक्र (समायोजित सकल राजस्व) कहा जाता है। विवाद ये था कि टेलीकॉम कंपनियों ने यूनिफाइड ऑपरेटर्स एसोसिएशन के जरिए दावा किया कि ्रत्रक्र (्रस्रद्भह्वह्यह्लद्गस्र त्रह्म्शह्यह्य क्रद्ग1द्गठ्ठह्वद्गह्य) में सिर्फ स्पेक्ट्रम और लाइसेंस फीस शामिल होती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मुद्दे पर यह फैसला दिया है कि ्रत्रक्र में लाइसेंस और स्पेक्ट्रम फीस के अलावा यूजर चार्जेज, किराया, डिविडेंट्स और पूंजी की बिक्री के लाभांश को भी शामिल माना जाए। दूरसंचार विभाग ने 15 कंपनियों पर 92,641 करोड़ रुपये की देनदारी निकाली थी अब जबकि ज्यादातर कंपनियां बंद हो चुकी हैं। इसलिए सरकार को आधी रकम ही मिलने की उम्मीद है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद टेलीकॉम कंपनियों को वास्तविक रूप में करीब 1.33 लाख करोड़ रूपये सरकार को चुकाने पड़ सकते हैं।  हालांकि, ये रकम वैसे लगभग 92 हजार करोड़ रुपए है. लेकिन ब्याज और अन्य चीजों को मिलाकर यह रकम 1.33 लाख करोड़ रुपए है।  टेलीकॉम सेक्टर पहले से ही टैरिफ वॉर और भारी कर्ज के चलते परेशानियों से घिरा है,टेलीकॉम सेक्टर पर पहले ही करीब 7 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है. ऐसे में इतनी बड़ी रकम चुकाने से कंपनियों की हालात और खराब हो सकती है. ओर यदि यह कंपनियां डूबी तो कई बैंक भी डूब सकते हैं। 
3 साल पहले टेलीकॉम कंपनियों पर कुल बकाया 29,474 करोड़ रूपये था जो अब बढक़र 92 हजार करोड़ रूपये तक पहुंच गया हैं।  इस बकाया रकम का 46 फीसदी रिलायंस कम्यूनिकेशंस, टाटा टेलीसर्विस, एयरसेल और अन्य कंपनियों को चुकाना था, लेकिन अब ये कंपनियां अस्तित्व में ही नहीं हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे ज्यादा असर एयरटेल और वोडाफोन आइडिा पर ही पड़ेगा। डीओटी की कैल्कुलेशन के मुताबिक वोडाफोन आइडिया को कुल 28,309 करोड़ रूपये भरने होंगे जिसमें लाइसेंस शुल्क पर 13,006 करोड़ रूपये का ब्याज, 3206 करोड़ रूपये पेनल्टी और पेनल्टी पर 5,226 करोड़ रुपए का ब्याज शामिल है। अगर कंपनी को इतनी रकम भरनी पड़ी तो उसके लिए यह बड़ा वित्तीय नुकसान होगा।
फैसले के बाद बीएसई में वोडाफोन-आइडिया के शेयर 27.43 फीसदी गिर कर 4.10 रुपये पर पहुंच गए। यह इसका 52 हफ्ते का निचला स्तर भी है। इसकी वेलुएशन 3,792 करोड़ घटकर अब सिर्फ 12,442 करोड़ रुपये रह गई है टेलीकॉम कंपनियों के संगठन सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआइ) ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निराशा जताते हुए कहा कि यह सेक्टर की खराब आर्थिक हालत के लिए आखिरी कील साबित होगी। सरकार ने इसी वित्त वर्ष में 5 फीसदी के लिए स्पेक्ट्रम नीलामी की भी घोषणा की है अब ऐसे हालात में यह संभव नहीं है कि जियो के अलावा अन्य टेलीकॉम कंपनियां इस नीलामी में भाग ले भी पाए  यानी सिर्फ जियो बचेगा बाकी सब मरेंगे। 

 


Date : 29-Oct-2019

मनीष सिंह

द गार्जियन में जूलियन बोरजर ने लिखा है-विनाश के संवाहक, जब अपनी करनी को पूर्ण विराम देकर, रिटायरमेंट की फोटो खिंचवाएं, वो जरूर ऐसी होगी। पांच विभिन्न महाद्वीपों से और अलग-अलग परिवेश के ये स्त्री-पुरुष, जिन्हें एक इन्वेस्टमेंट बैंक ने यहां इकठ्ठा किया है, कत्लेआम और खून खच्चर की साझी विरासत रखते हैं।
जे.पी.मोर्गन (एक अमरीकी अंतराष्ट्रीय वित्तीय फर्म) की ओर से दिल्ली में आयोजित इस मुलाकात की हंसती-मुस्कुराती तस्वीरें, इनके बीच बंधु-मित्रता और प्रेम की मधुर स्मृति रहेगी। इन सबके बीच आधी सदी का दौर है, कभी ना खत्म होने वाली युद्ध कहानियां है, दुनिया के प्रमुख झगड़ो में पर्दे के पीछे से कोई बटन- लीवर दबाकर उसे गहरा कर देने के किस्से हैं।
इन सबका बड़ा गुरु, नीचे दाएं बैठा है। छियानबे साल का हेनरी किसिंजर,जो कोल्ड वार की क्रूर राजनीति का जीवित जीवाश्म है। इसकी धनकोठरी में विदेश नीति से जुड़ी सूचनाएं, और दुनिया के खास याद किए जाते युद्ध हैं, जिसमे वियतनाम में अवैध गुप्त बमवर्षा शामिल है।
पीछे जो तीन खड़े हैं, 2003 में इराक पर हमले के असली दिमाग हैं। अपनी चिरपरिचित लालिमा और मुस्कान के साथ सबसे बाएं, पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर हैं। इनके बगल में कोंडलिजा राइस हैं, जो उस दौर में जार्ज बुश की नेशनल सेक्युरिटी एडवाइजर रहीं। उनके बगल में हैं जॉन हार्वर्ड, उस युद्ध मे अपनी सेना झोंकने वाले ऑस्ट्रेलियन प्रधानमंत्री।
सद्दाम हुसैन के मानव संहारक हथियार, जो कभी थे ही नही, उनकी खोज के नाम पर लड़ा गया ये धर्मयुद्ध हमारे इतिहास की सबसे बड़ी आपदाजनक गलतियों में से एक है। इसने हिंसा का वो पिटारा खोल दिया जिसमें आधे मिलियन लोग मारे गए और मिडिल ईस्ट में चरम हिंसा आज भी जारी है। ये सभी ज्ञानी संतों की उस वाणी के शिकार है जो कहती है कि विदेश नीति में एक सीमा के बाद और ऊंचा उठने की कोशिश सिर्फ असफलताएं पैदा करती है। इन तिलंगों के साथ हैं उस वक्त के सीआईए डायरेक्टर, और रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स, जो इराक युद्ध मे तो महत्वपूर्ण न थे, मगर सीआईए के उपनिदेशक के तौर पर निकारागुआ में बमबारी के बड़े पक्षधर थे।
इस छोटे से समूह के केंद्र और फोकस में क्लब के सबसे नए सदस्य हैं, नरेंद्र मोदी जो भारत के प्रधानमंत्री हैं, अभी भी अपने काम पर जारी हैं, और जिन्होंने इस तस्वीर में, उदार हृदय मेजबान मोदी ने ब्लेयर और हार्वर्ड का हाथ पकड़ा हुआ है और ऐसी मोहब्बत से किसिंजर की ओर देख रहे हैं कि महसूस होता है कि उन्होंने इस वृद्ध राजनयिक को माफ कर दिया है। उन पाकिस्तानी मिलिट्री रूलर्स को दिए गए दृढ़ सपोर्ट के लिए, जिनकी आर्मी बंगाल में तीन लाख हिन्दू बंगालियों उस जगह कत्ल किया, जो अब बंगलादेश है। इसमें से कई लाख भागकर भारत में बसे। बदनाम निक्सन टेप में किसिंजर भारतीयों को बास्टर्ड और इंदिरा गांधी को बिच कहते सुने जा सकते है।
अगर मोदी चिढऩा और बुरा मानना चाहते तो उनके पास काफी सामग्री थी- गैरी बॉस ने कहा है जिन्होंने ब्लड टेलीग्राम नाम से उस जनसंहार का इतिहास लिखा है। लेकिन जेपी मोर्गन के इस जलसे में मोदी में किसी चिढ़ या बुरा मानने के लक्षण नजर नही आते। जब ब्लेयर और राइस अपने पदों पर थे, तो उन्होंने मोदी के शासन में हुए  दंगों  के कारण उनकी यात्राओं को प्रतिबंधित किया था।
यह संभव है कि जब आप शीर्षस्थ स्तर की रणनीतिक अवस्था मे पहुंच जाते हैं, तब इस बात का महत्व खत्म हो जाता है कि आपने कितनो को मारा या आप किसकी तरफ से थे। यह सिर्फ आपके प्लेटिनम कार्ड ( गौरवान्वित पहचान पत्र) का हिस्सा बन जाता है। आपने उसमे हिस्सा लिया, और हंसते, मुस्कुराते, सफल बनकर के साथ बचकर निकल आये, यही बहुत है।

 


Date : 29-Oct-2019

जगदीश्वर चतुर्वेदी

अमत्र्य सेन इस युग के भारत के श्रेष्ठतम बुद्धिजीवी हैं। नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद से उनके लिखे को ज्यादा ध्यान से पढ़ा जाता है। उनकी बातों को ज्यादा ध्यान से सुना जाता है। अमत्र्य सेन ने पांच अगस्त को कोलकाता में अपनी किताब को बाजार में जारी करते हुए एक व्याख्यान  न्याय पर दिया। इस मौके पर दिए अपने व्याख्यान में सेन ने कहा-न्याय का विचार आकर्षित करता है। न्याय की तलाश उम्मीद जगाती है। न्याय की तलाश वैसे ही है जैसे आप अंधेरे में काली बिल्ली खोज रहे हों। जबकि कमरे में बिल्ली नहीं थी।
सेन के अनुसार न्याय प्रतिस्पर्धी होता है,रूपान्तरणकारी नहीं। अपने व्याख्यान में जॉन रावेल की न्यायपूर्ण संस्थान की धारणा पर आलोचनात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि न्याय का संबंध संस्थानों की तुलना में इस बात से है कि लोग आखिरकार कैसे रहते हैं, उनका जीने का तरीका क्या है, संस्थान और कानून से ही मात्र लोग प्रभावित नहीं होते बल्कि उनके जीवन,  व्यवहार,एक्शन और गतिविधियों से भी लोग प्रभावित होते हैं।
सेन ने यह भी कहा कि संस्थानों का जीवन पर क्या प्रभाव होता है यह भी देखना चाहिए। जो रूपान्तरणकारी न्याय की धारणा में विश्वास करते हैं वे अन्याय के खिलाफ तब तक कोई काम नहीं करते जब तक समूचा समाज दुरूस्त नहीं हो जाता। उनके अनुकूल नहीं हो जाता। इस धारणा के खिलाफ सेन ने अनेक उदाहरण देकर बताया कि कैसे गुलाम प्रथा, औरतों की पराधीनता आदि का खात्मा हुआ और कैसे संस्थानों के दुरूस्त न होने के बावजूद सामाजिक परिवर्तन की हवा चलती रही है। सेन कहना था समाज जब तक पूरी तरह सही न हो जाए तब तक लोग न्याय का इंतजार नहीं कर सकते।
अमत्र्य सेन ने एक अन्य महत्वपूर्ण बात कही है , सामाजिक और राजनीतिक तौर पर जिंदगी तब असहनीय हो जाती है यदि आप कुछ कदम नहीं उठाते। यदि आप सोचते हैं कि आदर्श स्थिति आएगी तब ही कदम उठाएंगे तो आदर्श स्थिति आने वाली नहीं है। दुरूस्त न्यायपूर्ण समाज की उम्मीद में हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने से अच्छा है अन्याय कीस्थितियों का प्रतिवाद करना।
 न्याय का सवाल सिर्फ दर्शन का सवाल नहीं है बल्कि राजनीतिक प्रैक्टिस का सवाल है। नीति बनाने वाले संस्थानों को अन्याय पर विचार करना चाहिए। सेन ने भारत में अन्याय के क्षेत्रों को रेखांकित करते हुए कहा कि बच्चों में कुपोषण, गरीबी, गरीबों के लिए चिकित्सा व्यवस्था का अभाव,शिक्षा का अभाव आदि अन्याय के रूप हैं। सेन ने कहा न्याय के लिए ज्यादा से ज्यादा सार्वजनिक संवाद में व्यापकतम जनता की शिरकत जरूरी है।
अमत्र्य सेन की नई किताब दि आइडिया ऑफ जस्टिस मूलत: मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में न्याय को व्याख्यायित करती है। आमतौर पर हमारे अनेक बुद्धिजीवी और वामपंथी दोस्त मानवाधिकार का सवाल आते ही भडक़ते हैं, मानवाधिकार संगठनों के बारे में षडयंत्रकारी नजरिए से व्याख्याएं करते हैं। सेन ने इस किताब में एक महत्वपूर्ण पक्ष पर जोर दिया है कि? न्याय और अन्याय के सवाल को अदालत में ही नहीं बल्कि सार्वजनिक जीवन में खुलेआम बहस मुबाहिसों के जरिए उठाया जाना चाहिए। न्याय के विवाद के लिए खुला वातावरण जरूरी है।
 न्याय की धारणा का इसके गर्भ से ही विकास होगा। इस प्रक्रिया में न्याय और मानवाधिकार दोनों की ही रक्षा होगी। सार्वजनिक विवाद,संवाद का अर्थ है सूचनाओं का अबाधित प्रचार -प्रसार। यही वह बिंदु है जहां पर मुक्त संभाषण या बोलने की स्वतंत्रता का भी विकास होगा। सेन ने अपनी किताब में किताबी न्याय और संस्थानगत न्याय की धारणा का निषेध कि?या है।
इस प्रसंग में उल्लेखनीय है समाजवादी समाजों से लेकर अनेक पूंजीवादी समाजों में न्याय के बारे में बेहतरीन कानूनी,नीतिगत और संस्थानगत व्यवस्थाएं मौजूद हैं किंतु सार्वजनिक तौर पर अन्याय का प्रतिवाद करने की संभावनाएं नहीं हैं तो न्यायपूर्ण संस्थान अन्याय के अस्त्र बन जाते हैं। 
समाजवादी समाजों का ढ़ांचा इसी कारण बिखर गया। समाजवादी समाजों में यदि खुला माहौल होता और अन्याय का प्रतिवाद होता तो समाजवादी व्यवस्था धराशायी नहीं होती। न्याय के लिए बोलना जरूरी है, अन्याय का प्रतिवाद जरूरी है। अन्याय के खिलाफ बोलने से न्याय का मार्ग प्रशस्त होता है।अन्याय का प्रतिवाद अभिव्यक्ति की आजादी और सार्वजनिक तौर पर खुला माहौल बनाने में मदद करता है और इससे न्याय का मार्ग प्रशस्त होता है।

 


Date : 29-Oct-2019

हमारी संस्कृति में किसी भी रीति-रिवाज या रिश्ते को स्थायित्व देने के लिए उसे धर्म और मिथकों से से जोडऩे की परंपरा रही है। यम द्वितीया के लिए भी पुराणों ने एक मार्मिक कथा गढ़ी है। कथा के अनुसार सूर्य के पुत्र और मृत्यु के देवता यमराज का अपनी बहन यमुना से अपार स्नेह था। 

आज यम द्वितीया दीपोत्सव के पांच-दिवसीय आयोजन की आखिरी कड़ी है। लोक भाषा में इस दिन को भाई दूज भी कहा जाता है। दीपोत्सव का यह दिन भाई-बहनों के आत्मीय रिश्ते के नाम समर्पित है। जहां रक्षाबंधन अथवा राखी सभी उम्र की बहनों के लिए अपने भाईयों के लिए प्रार्थना का पर्व है, भैया दूज की कल्पना मूलत: विवाहित बहनों की भावनाओं को ध्यान में रखकर की गई है। इस दिन भाई बहनों की ससुराल जाकर उनसे मिलते हैं, उनका आतिथ्य स्वीकार करते हैं और बहनें उनकी लंबी आयु की प्रार्थना करती हैं। 
हमारी संस्कृति में किसी भी रीति-रिवाज या रिश्ते को स्थायित्व देने के लिए उसे धर्म और मिथकों से से जोडऩे की परंपरा रही है। यम द्वितीया के लिए भी पुराणों ने एक मार्मिक कथा गढ़ी है। कथा के अनुसार सूर्य के पुत्र और मृत्यु के देवता यमराज का अपनी बहन यमुना से अपार स्नेह था। यमुना के ब्याह के बाद स्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि बहुत लंबे अरसे तक भाई-बहन की भेंट नहीं हो सकी। 
यमुना भाई को बराबर निवेदन भेजती रही कि वह किसी दिन उसके घर आकर उसका आतिथ्य स्वीकार करे। कार्य की व्यस्तता के कारण यम कभी बहन के लिए समय नहीं निकाल सके। अंतत: कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को यम एक बार बहन के घर पहुंच ही गए। 
यमुना ने दिल खोलकर भाई की सेवा की। तिलक लगाने के बाद अपने हाथों का बनाया भोजन कराया। प्रस्थान के समय स्नेह और सत्कार से अभिभूत यम ने बहन से कोई वरदान मांगने को कहा। यमुना ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। उसने दुनिया की तमाम बहनों के लिए यह वर मांग लिया कि आज के दिन जो भाई अपनी बहन की ससुराल जाए और यमुना के जल में या कम से कम या बहन के घर में स्नान कर उसके हाथों से बना भोजन करे, उसे यमलोक का मुंह कभी नहीं देखना पड़े।
यम और यमुना की यह पौराणिक कथा काल्पनिक ही सही, लेकिन इस कथा में अंतर्निहित भावनाएं काल्पनिक कतई नहीं है। इस कथा के पीछे हमारे पूर्वजों का उद्देश्य निश्चित रूप से यह रहा होगा कि भैया दूज के बहाने ही सही, भाई साल में कम से कम एक बार अपनी प्रतीक्षारत बहन की ससुराल जाकर उससे जरूर मिलें। बरस भर बाद भाई-बहन मिलेंगे तो इस रिश्ते का नवीकरण होगा। बचपन और किशोरावस्था की यादें ताज़ा होंगी। 
विगत स्मृतियां बोलेंगी। प्रेम भी बरसेगा, उलाहने भी। हंसी भी छूटेगी और आंसू भी टपकेंगे। अपनी सगी बहन न हो तो रिश्ते की किसी चचेरी, ममेरी, फुफेरी या मौसेरी बहन की ससुराल जाकर उसका आतिथ्य स्वीकार करने का प्रावधान है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस दिन बहनें भाईयों को तिलक लगाने के बाद मिठाई के साथ बजरी अर्थात कच्चे मटर या चने के दानें भी खिलाती हैं। बिना दांतों से कुचले सीधे-सीधे निगल जाने की सख्त हिदायत के साथ। ऐसा करने के पीछे बहनों की मंशा अपने भाईयों को बज्र की तरह मजबूत बनाने की होती है। भाई दूज के दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा गोधन कूटने की प्रथा भी है। गोबर की मानव मूर्ति बनाकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोडऩे के बाद यमराज और यमुना की पूजा करती हैं। संध्या के समय यमराज के नाम से दीप जलाकर घर के बाहर रख दिया जाता है।
यदि उस समय आसमान में कोई चील उड़ता दिखाई दे तो माना जाता है कि भाई की लंबी उम्र के लिए बहन की दुआ कुबूल हो गई है। जैसा कि हर पर्व के साथ होता आया है, कालांतर में भैया दूज के साथ भी पूजा-विधि के बहुत सारे कर्मकांड जुड़ गए, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करके देखें तो लोक जीवन की सादगी और निश्छलता के प्रतीक इस पर्व की भावनात्मक परंपरा सदियों तक संजोकर रखने लायक है।


Date : 26-Oct-2019

हिमांशु शेखर

महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना का गठबंधन बहुमत के आंकड़े तक पहुंच गया है। भाजपा और शिवसेना की यहां फिर से सरकार भले बन रही हो लेकिन दोनों की सीटें पिछले चुनाव के मुकाबले काफी कम हुई हैं।

पिछले पांच साल से महाराष्ट्र सरकार का नेतृत्व कर रही भाजपा ने 2014 के चुनावों में 122 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार उसकी सीटें 105 पर ही सिमट गई हैं। उसकी सहयोगी शिव सेना ने पिछले चुनावों में 63 सीटें जीती थी। इस बार उसकी सीटें भी 56 ही रह गई है। शिवसेना का नुकसान भाजपा के मुकाबले कम तो है लेकिन एक समय यह माना जा रहा था कि उसकी सीटें बढ़ेंगी। कांग्रेस महाराष्ट्र में पिछली बार 42 सीटें जीतकर भी तीसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। वह इस बार 44 सीटों के साथ चौथे नंबर पर पहुंच गई है।
महाराष्ट्र में सबसे अधिक फायदा शरद पवार की पार्टी एनसीपी को हुआ है जिसे इस बार पिछली बार की 42 सीटों के मुकाबले 54 सीटें मिली हैं। वह भी तब जब उसका शीर्ष नेतृत्व कई विवादों में फंसा रहा है और उसके सबसे बड़े नेता शरद पवार ने चुनाव राजनीति छोड़ दी है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि एनसीपी ने लोकसभा चुनावों में मिली हार के बाद भी अपने प्रदर्शन को बेहतर कर लिया और शिवसेना लोकसभा में मिली बड़ी जीत को विधानसभा में नहीं दुहरा पाई। महाराष्ट्र में कांग्रेस की हालत आज यह हो गई है कि इस प्रदेश में अब तक वह एनसीपी के साथ गठबंधन को नेतृत्व देने की भूमिका में थी। लेकिन एनसीपी से कम सीटें जीतकर अब वह उसके सहयोगी की भूमिका में आ गई है।
सबसे पहले यह समझते हैं कि महाराष्ट्र में शिव सेना और कांग्रेस लगातार कमजोर क्यों पड़ते जा रहे हैं? महाराष्ट्र के चुनावों को जिन लोगों ने करीब से देखा है, वे मानते हैं कि शिवसेना जिस तरह की राजनीति किया करती थी, उस शैली को उसने छोड़ दिया है। बाल ठाकरे द्वारा शुरू की गई पार्टी उनके समय में आक्रामक राजनीति के लिए जानी जाती थी। लेकिन जब से शिवसेना की कमान उद्धव ठाकरे के हाथों में आई है, तब से धीरे-धीरे उसका व्यवहार बदलता गया है।
उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे के राजनीति में सक्रिय होने के बाद से तो शिवसेना की आक्रामक राजनीति और भी पीछे छूटती हुई दिख रही है। इसके अलावा राज ठाकरे के शिवसेना से अलग होने की वजह से भी पार्टी को काफी नुकसान हुआ है। बल्कि कुछ लोगों का यह मानना है कि कि अगर राज छाकरे अभी भी शिवसेना में होते तो शायद पार्टी का चरित्र अब भी लगभग वैसा ही होता जैसा बाल ठाकरे के समय हुआ करता था। लंबे समय से शिवसेना की राजनीति को देखने-समझने वाले लोग कहते हैं कि इन वजहों से कभी महाराष्ट्र में भाजपा की सीनियर पार्टनर रही शिवसेना ने खुद को भाजपा का जूनियर पार्टनर बना लिया है।
इसी तरह महाराष्ट्र में कांग्रेस के लगातार नाकाम होने के पीछे भी कई वजहों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। सबसे पहली बात तो यही कही जा रही है कि प्रदेश स्तर के नेताओं के बीच कांग्रेस में इतनी आं?तरिक खींचतान है कि इसका नुकसान उसे लगातार चुनावों में उठाना पड़ रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि प्रदेश स्तर पर पार्टी के पास कोई ऐसा नेता नहीं है जिसके बारे में यह कहा जा सके कि पूरी कांग्रेस उसके नेतृत्व में एकजुट है और उसका अपना मजबूत जनाधार है। इस पूरे चुनाव में कोई भी नेता ऐसा नहीं दिखा जिसके बारे में कहा जा सके कि वह प्रदेश में कांग्रेस का चेहरा है। पार्टी के राष्ट्रीय नेता भी महाराष्ट्र में बहुत दिलचस्पी नहीं ले रहे थे। महाराष्ट्र चुनावों के दौरान ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस सुनियोजित ढंग से कोई प्रचार अभियान ही नहीं चला रही है। यही वजह है कि कांग्रेस की जूनियर पार्टनर रही एनसीपी आज महाराष्ट्र में उससे अधिक सीटें लेकर आई है।
महाराष्ट्र चुनाव के सबसे बड़े नायक बनकर उभरे हैं शरद पवार। भले ही वे अपनी पार्टी और गठबंधन को सरकार बनाने लायक सीटें नहीं दिला पाए हों लेकिन जिस ढंग से उन्होंने एनसीपी को इन चुनावों में सफल बनाया है, उसकी चर्चा चारों तरफ हो रही है। कहा जा रहा है कि 79 साल के होने जा रहे शरद पवार ने यह दिखा दिया है कि अगर भाजपा के विस्तार के इस दौर में भी अगर ढंग से कोशिश की जाए तो मजबूती से उसका मुकाबला किया जा सकता है।
शरद पवार पिछला लोकसभा चुनाव नहीं लड़े थे और उन्होंने एक तरह से चुनावी राजनीति से संन्यास ले लिया है। लेकिन जिस तरह से उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव में एनसीपी का नेतृत्व किया, उससे उन्होंने पार्टी में जान फूंक दी। चुनाव प्रचार के दौरान सतारा में उन्होंने बारिश में भीगते हुए जिस तरह से सभा को संबोधित किया, उसकी काफी चर्चा हुई। लेकिन सतारा पहला उदाहरण नहीं है जहां शरद पवार ने अपनी जीवटता का प्रदर्शन किया हो। और भी कई मौके ऐसे रहे जब उन्होंने ‘निश्चत हार’ की आशंकाओं के बावजूद बहुत मजबूती से विपक्ष के प्रचार अभियान को थामे रखा।
शरद पवार ने महाराष्ट्र चुनावों के विमर्श को कई तरह से प्रभावित करने की कोशिश की। इसमें जहां जरूरत पड़ी उन्होंने जनता से सीधे तौर पर माफी भी मांगी। जिस सतारा की सभा का जिक्र पहले किया गया है, उसमें पवार का कहना था कि लोकसभा चुनाव में उनसे यहां का उम्मीदवार देने में गलती हो गई थी लेकिन अब इस गलती को सुधारने का वक्त आ गया है। चुनाव प्रचार के दौरान पवार ने अपनी इस तरह की राजनीतिक सूझबूझ से कई बार सत्ता पक्ष के वारों को बेअसर करने का प्रयास किया और इस वजह से वे महाराष्ट्र चुनावों में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन का सबसे प्रमुख चेहरा बन गए।
खुद को प्रवर्तन निदेशालय का नोटिस मिलने के बाद शरद पवार ने जिस तरह से उसका सामना किया वह भी उनकी राजनीतिक सूझ-बूझ का ही एक उदाहरण है। विपक्षी नेताओं पर जिस तरह से केंद्र सरकार की एजेंसियां कार्रवाई कर रही हैं उसे विपक्ष की ओर से बदले की कार्रवाई कहा जा रहा है। इसी कड़ी में शरद पवार पर भी प्रवर्तन निदेशालय ने कार्रवाई करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने इसका इस्तेमाल कुछ इस तरह से किया कि लोगों में उनके प्रति सहानुभूति पैदा हो गई।
शरद पवार को मिले नोटिस के खिलाफ महाराष्ट्र के अलग-अलग शहरों में उनके समर्थकों ने बंद आयोजित किये। इससे एनसीपी के कार्यकर्ताओं में एक नए ढंग का उत्साह पैदा हुआ। शरद पवार ने घोषणा की कि वे खुद ही जांच के लिए प्रवर्तन निदेशालय के मुंबई कार्यालय में जाएंगे। उनके जाने की तारीख आते-आते ऐसा माहौल बना कि मुंबई पुलिस को खुद शरद पवार से अनुरोध करना पड़ा कि वे वहां नहीं जाएं क्योंकि इससे कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है। इसके बाद शरद पवार वहां नहीं गए।
एनसीपी के एक नेता इस बारे में कहते हैं, ‘भाजपा ने सोचा भी नहीं था कि शरद पवार इस मामले को इस तरह से मोड़ देंगे। जब उनके पक्ष में जनता आने लगी तब भाजपा को अपनी गलती का अहसास हुआ और फिर न सिर्फ मुंबई पुलिस की ओर से उनसे प्रवर्तन निदेशालय नहीं जाने का अनुरोध किया गया बल्कि भाजपा के कुछ नेताओं ने भी उन्हें फोन करके वहां नहीं जाने को कहा। लेकिन तब तक शरद पवार इसका राजनीतिक इस्तेमाल कर चुके थे। इससे दो फायदे हुए। एक तो हमारे कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर उत्साह आया कि हमारा नेता संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार है और दूसरे विपक्षी नेताओं की तरह भाजपा के सामने आत्मसमर्पण नहीं कर रहा है। वहीं दूसरी बात यह हुई कि कांग्रेस की ओर से किसी के नेतृत्व की स्थिति में नहीं रहने की वजह से शरद पवार विपक्षी गठबंधन का चेहरा बन गए।’
महाराष्ट्र भाजपा के एक नेता इस बारे में कहते हैं, ‘शरद पवार को चुनाव के समय प्रवर्तन निदेशालय का नोटिस दिलाना बड़ी गलती थी। पिछले पांच सालों से हमारी सरकार भले हो लेकिन अगर सिर्फ अपने दम पर जनाधार की बात हो तो महाराष्ट्र में सभी पार्टियों के नेताओं में शरद पवार सबसे आगे हैं। राजनीतिक तौर पर उनका दिमाग जितना तेज चलता है और उनके पास जो जनाधार है, उसमें वे ऐसी किसी भी गलती का राजनीतिक लाभ लेने का अवसर नहीं छोड़ेंगे।’
इसके अलावा शरद पवार ने महाराष्ट्र चुनावों में भाजपा के बड़े मुद्दों के मुकाबले बुनियादी मुद्दों को बार-बार उठाने का काम किया। वे महाराष्ट्र के कृषि संकट, पानी की समस्या और बेरोजगारी का मसला अपनी चुनावी सभाओं में लगातार उठाते रहे। इसमें भी वे हर मुद्दे को महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ उठा रहे थे। वे अपने भाषणों में शिवाजी के शासन का जिक्र कर रहे थे और बता रहे थे कि कैसे भाजपा ने महाराष्ट्र के गौरवशाली इतिहास और उस दौर के शासकों के सिद्धांतों को तार-तार करने का काम किया है।
उदाहरण के तौर पर एक सभा में उन्होंने एनसीपी और कांग्रेस छोडक़र भाजपा में शामिल होने वाले नेताओं का जिक्र किया। उन्होंने इसे शिवाजी महाराज के शासन काल से जोड़ा और कहा कि पाला बदलने वालों को शिवाजी महाराज कभी माफ नहीं करते थे और यही महाराष्ट्र की परंपरा है। चुनाव परिणाम आने के बाद भी शरद पवार ने यह बात दोहराई कि दल-बदल करने वालों को जनता ने खारिज कर दिया। चुनाव के दौरान पानी की उपलब्धता के मसले को भी मराठा शासन से जोडऩे की कोशिश वे बार-बार करते रहे।
उनकी इन कोशिशों का फायदा एनसीपी को मिला। भले ही एनसीपी महाराष्ट्र में सरकार बनाने की स्थिति में नहीं पहुंची, लेकिन इन्हीं वजहों आज 78 साल के शरद पवार को दूसरी विपक्षी पार्टियों के लिए उदाहरण पेश करने वाले नायक की तरह पेश किया जा रहा है। (सत्याग्रह)


Date : 26-Oct-2019

रशीद किदवई

एक मुहावरा है कि राजनीति में एक हफ्ता बहुत लंबा वक्त होता है। जिस तरह कांग्रेस अनिच्छुक और बीमार सोनिया गांधी को बदलने के लिए नए नेता को चुनने पर विचार कर रही थी, उसी दौरान हरियाणा विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन ने संकेत दे दिया है कि अंतरिम अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) प्रमुख केवल भाग्यशाली नहीं हैं, बल्कि बेटे राहुल गांधी से बेहतर फैसले लेने का उन्हें उपहार मिला हुआ है।
भूपिंदर सिंह हुड्डा में सोनिया के विश्वास ने पार्टी में एक आसन्न विभाजन पैदा कर दी। अधिक महत्वपूर्ण शब्दों में समझे तो (भले ही हरियाणा में सरकार गठन के सवाल को छोड़ दें तो), इसने पार्टी में एक प्रमुख जाति जाटों का विश्वास दोबारा हासिल कर लिया है।
पार्टी के पुराने नेता भीतर ही भीतर खुश हैं। इन नतीजों के बाद सोनिया को आसानी से अध्यक्ष छोडऩे नहीं देंगे। कांग्रेस की अंदरूनी सियासत से परिचित कोई भी व्यक्ति कहेगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी एक बार फिर से एक हॉबसन च्वाइस का सामना कर रही है, जहां सोनिया की चाह बेटे राहुल को अध्यक्ष की कुर्सी सौंपना है।
कांग्रेस के अधिकांश नेताओं को राहुल की नेतृत्व क्षमता से शिकायत नहीं है, लेकिन वे चाहते हैं कि वे अपनी कार्यशैली में बदलाव लाएं। कांग्रेस के 87वें अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी पहले ऐसे प्रमुख थे, जिनका कार्यकाल सबसे कम रहा। इस दौरान पुराने और नई पीढ़ी के बीच पर्दे के पीछे बड़ा खींचतान दिखाई दिया।
कांग्रेस चुनाव दर चुनाव हारती रही, लेकिन राहुल और उनकी कोर टीम ने पार्टी के एक वर्ग को दरकिनार किए रखा और कुछ नेताओं के सफल होने पर भी उनकी आलोचना की। 23 मई को लोकसभा परिणाम घोषित होने के तुरंत बाद एआईसीसी प्रमुख ने जिस तरह से प्रतिक्रिया दी थी, उसमें यह झलक रहा था।
एआईसीसी प्रमुख का पद छोड़ते हुए राहुल ने कथित रूप से अशोक गहलोत, कमलनाथ, पी चिदंबरम और अन्य लोगों का नाम लिया, जिन्होंने कांग्रेस की मदद करने के बजाय अपने बेटों के चुनावी भाग्य पर अधिक समय और ध्यान दे रहे थे। नकुल नाथ और कार्ति चिदंबरम दोनों चुनाव जीते, लेकिन राहुल के समर्थक जैसे कि मिलिंद देवड़ा और ज्योतिरादित्य सिंधिया को हार का सामना करना पड़ा।
हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों का परिणाम कई मायने रखता है। पहली बार, यहां गांधी परिवार ने बहुत कम प्रचार किया।
उदाहरण के लिए असंतुष्ट कांग्रेसी यह भी बता सकते हैं कि जिन स्थानों पर राहुल ने हरियाणा (नूंह और महेंद्रगढ़) और मुंबई में प्रचार किया वहां पार्टी सीटें हार गई। सोनिया महाराष्ट्र में नौ जनसभाओं को संबोधित करने वाली थीं, लेकिन उन्होंने एक भी सभा नहीं की।
इन नतीजों के बाद राजनीतिक विश्लेषक यह मान रहे हैं कि कांग्रेस नेता अब से गांधी के बिना चुनावी लड़ाई का सामना करने का साहस जुटा सकते हैं। अगर मराठा और जाट कांग्रेस में लौट सकते हैं तो देश के बाकी हिस्सों में यादव, रेड्डी, मीणा, पाटिल, गुर्जर, आदिवासी और अनुसूचित जाति क्यों नहीं?
राज्य के चुनाव पारंपरिक रूप से स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं, लेकिन भाजपा ने जानबूझकर इसमें राष्ट्रवाद की त्योरी चढ़ाई। अनुच्छेद 370, पाकिस्तान विरोधी बयानबाजी सहित दूसरे मुद्दों की लंबी सूची है। इसे सफल माना जा रहा था।
फिर भी महाराष्ट्र के विदर्भ में किसान संकट, हरियाणा के मानेसर में ऑटोमोबाइल निर्माताओं की दुर्दशा, नौकरियों में कमी और जाटों और मराठों जैसी प्रमुख जातियों में नाराजगी को नजरअंदाज करना बहुत साफ और घातक दिखा।
कांग्रेस को अमरिंदर सिंह, कमलनाथ, अशोक गहलोत और हुड्डा की तर्ज पर हर राज्य में क्षत्रपों में अधिक निवेश करने की जरूरत है। दक्षिण में 2004 और 2009 के आम चुनावों में कांग्रेस का उत्कृष्ट प्रदर्शन काफी हद तक एकजुट आंध्र प्रदेश में दिवंगत वाईएस राजशेखर रेड्डी के कारण था। अगर कांग्रेस जगन मोहन रेड्डी और के। चंद्रशेखर राव को पार्टी में बनाए रखने में कामयाब होती, तो यह आंध्र प्रदेश और तेलंगाना दोनों पर शासन कर रही होती।
कांग्रेस को नए नेतृत्व, संगठनात्मक सुधार और पार्टी पदानुक्रम के सभी स्तरों पर जवाबदेही तय करने की तत्काल आवश्यकता है और यह एकमात्र अवसर है जो उसके नेताओं के पास है। पार्टी कथित तौर पर अगले साल जनवरी में उदयपुर में एआईसीसी की बैठक की योजना बना रही है। राहुल को 2013 में जयपुर में जो वादा किया था, उसका खुलासा करने के लिए मंच का उपयोग करना चाहिए। (न्यूज18)
(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के साथ फेलो हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)


Date : 25-Oct-2019

रविन्द्र पटवाल

इन चुनाव परिणामों ने सिद्ध कर दिया है कि भारतीय मीडिया कितने गंदे स्तर पर खुद को गिरा चुकी है। करीब-करीब सभी मीडिया चैनल हरियाणा में बीजेपी को 70-75 सीट से कम नहीं दे रहे थे, और महाराष्ट्र में 200-220 तक दे रहे थे। चुनाव परिणामों से पता चल रहा है कि बीजेपी हरियाणा में 90 सीटों में 35-38 और महराष्ट्र में शिवसेना के इस बार साथ होने के बावजूद 160 तक पार नहीं कर पा रही। मेरा स्पष्ट मत है कि इन परिणामों में जो थोड़ी बहुत सीट बीजेपी को दिखाई दे रही है, उसमें बीजेपी से अधिक योगदान इन मीडिया वालों का दिन रात बीजेपी प्रचार की मुख्य भूमिका है।
 लोकतंत्र को मजाक बना दिया है इन बिके हुए मीडिया को संचालित कर रहे मुनाफाखोरों ने। उनके चीफ एंकर आज वे मीडिया वाले हैं, जो 2013 से पहले तक सडक़ों पर घूम घूम कर मीडिया के लिए बाईट बटोरने का काम करते थे, आज स्टूडियो में बैठकर सिर्फ साइबर सेल से प्राप्त सूचनाओं और ट्विटर पर उनके द्वारा ट्रेंडिंग हिन्दू-मुस्लिम, भारत-पाक घृणा के मुद्दों पर दिन रात प्रचार में लगे हैं।
उन्हें देश की बढ़ती गरीबी, असमानता, बेरोजगारी, दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों, मजदूरों, पब्लिक सेक्टर की बिकवाली, और बैंकों की संगठित लूट को दिखाने में शर्म आती है। उन्हें शर्म आती है, भारतीय अन्नदाता के मुद्दे को प्रमुखता से उठाने में। उन्हें शर्म आती है कि पिछले 3 दिनों से हजारों विकलांग युवा, रेलवे भर्ती में हुई धांधली के खिलाफ दिल्ली की सडक़ों पर बिलख रहे हैं। ये बेशर्म लोग वास्तव में भारतीय जन के मताधिकार को प्रभावित करने का जघन्य अपराध लगातार करते जा रहे हैं। इनका सम्पूर्ण बहिष्कार ही एकमात्र विकल्प है। सोशल मीडिया और वैकल्पिक मीडिया के रूप में उभरे विभिन्न डिजिटल मीडिया के निरंतर विकास में ही भारतीय लोकतंत्र और चुनाव को प्रभावित करने और जन गण मन को समाहित करने की क्षमता है।

 


Date : 25-Oct-2019

पुष्यमित्र

अगर मैं कहूं कि यह चुनाव भी बीजेपी की जीत और विपक्ष की हार है तो आप बुरा मान जाएंगे।  मगर मेरे हिसाब से सच यही है। क्करूष्ट बैंक के फेल होने पर महाराष्ट्र में जो हालात बने थे और खट्टर के खिलाफ हरियाणा में जो गुस्सा था, उसे विपक्ष ठीक से अपने पक्ष में नहीं कर पाया, नहीं तो इन दोनों राज्यों में क्लीन स्वीप होना था। भाजपा अभी भी इन दोनों राज्यों में सबसे बड़ी पार्टी है। उसे थोड़ा-सा नुकसान हुआ है, उसका आधार घटा है। मगर उसके चुनावी रणनीतिकारों ने उसे बचा लिया है। इस चुनाव में भी जनता ने विपक्षियों पर खुल कर भरोसा नहीं जताया है।
दरअसल हकीकत यह है कि आज लोगों के मन में कांग्रेस और दूसरे परिवारवादी दलों के प्रति भरोसा खत्म हो गया है। लोगों के मन में यह बात बैठ गई है कि ये खानदानी दल निकम्मों के गिरोह हैं और इनके लिए सत्ता पाने का मतलब सिर्फ पैसे बनाना है। इन दलों में कोई ताजगी नहीं है। इनकी छवि ही खाए और अघाए लोगों की बन गई है। वोटर इसी वजह से पिछले 5-6 सालों से इन्हें लगातार रिजेक्ट कर रहे हैं। बीजेपी आर्थिक मोर्चे पर विफल है, जन विरोधी है मगर लोगों के सामने विकल्प क्या है? किसी बड़े नेता का नाकाबिल बेटा, जिसके इर्द-गिर्द अवसरवादी चमचों की फौज है? यही वजह है कि लोग उकता भी जाते हैं मगर इन्हें मजबूती देने से परहेज करते हैं। अगर मुसलमान नहीं होते तो इनका आधार वोट भी अब तक जीरो पर पहुंच गया होता।
हमें दंगाई, नफरत फैलाने वाले, गरीब विरोधी, पूंजीपतियों की दलाली करने वाले बीजेपी का विकल्प चाहिए। मगर वह विकल्प कोई अवसरवादी, सत्तालोलुप, भ्रष्ट पृष्ठभूमि वाला बड़े बाप का नाकाबिल बेटा नहीं हो सकता। लोगों को और खास कर लिबरल समाज को इस किस्म की सुविधाभोगिता से बाहर निकलना चाहिए। यह नहीं कि बीजेपी से दुखी हैं तो आदित्य ठाकरे और दुष्यंत चौटालों का जय गान करने लगें। एक क्षण रूक कर सोचिये कि क्या ये नेतृत्व के योग्य हैं, इनमें ईमानदारी राजनीति के कोई गुण हैं क्या? क्या ये हम लोगों के नेता हो सकते हैं? यह देश अब नया और फ्रेश राजनीतिक विकल्प मांगता है, जो वाकई आम लोगों का हिमायती और सबको जोड़ कर साथ लेकर चलने वाला हो और उसमें नेता वाली बात भी हो।

 


Date : 25-Oct-2019

प्रभाकर

भारत में 1980 के दशक में ‘हम दो, हमारे दो’  का नारा काफी लोकप्रिय हुआ था। इसके जरिए बड़े पैमाने पर परिवार नियोजन अभियान चलाया गया था। लेकिन तब इस पर अमल के लिए कोई कानून नहीं बना था। लेकिन अब असम सरकार ने दो से ज्यादा बच्चों वाले लोगों को सरकारी नौकरी नहीं देने का फैसला किया है। इसका असर दूरगामी होगा। हालांकि सरकारी तौर पर कहा गया है कि इससे जनसंख्या विस्फोट पर काबू पाने में सहूलियत होगी। लेकिन दूसरी ओर, खासकर अल्पसंख्यक संगठनों ने सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि इसका मकसद अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों के लिए अयोग्य बनाना है। दूसरे संगठनों ने भी इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया जताई है।
वैसे, असम की बीजेपी सरकार ने दो साल पहले ही विधानसभा में एक जनसंख्या नीति पारित की थी। लेकिन अब जाकर उसे अमली जामा पहनाने का फैसला किया गया है। देश के कई अन्य राज्यों में भी खासकर पंचायत व निकाय चुनावों में उम्मीदवारी के मामले में दो बच्चों वाली नीति लागू है। लेकिन सरकारी नौकरियों में यह पाबंदी इस पूर्वोत्तर राज्य ने पहली बार लगाई है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि जल्दी ही बीजेपी-शासित दूसरे राज्य भी इसी राह पर चल सकते हैं।
क्या है नई नीति
असम सरकार ने कहा है कि एक जनवरी, 2021 से ऐसे लोगों को सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी जिनके दो से ज्यादा बच्चे हैं। सितंबर, 2017 में विधानसभा ने असम जनसंख्या व महिला सशक्तिकरण नीति पारित की थी। इसमें कहा गया था कि सरकारी नौकरी के लिए सिर्फ उनलोगों की उम्मीदवारी पर ही विचार किया जाएगा जिनके दो बच्चे हों। मौजूदा सरकारी कर्मचारियों को भी इस नीति का पालन करना होगा। मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल कहते हैं, ‘यह एक क्रांतिकारी फैसला है। अब सरकारी नौकरियों के इच्छुक लोग दो से ज्यादा बच्चे नहीं पैदा कर सकेंगे। इससे आबादी पर अंकुश तो लगेगा ही, बाल विवाह की सामाजिक समस्या पर भी काबू पाया जा सकेगा।’ 
दो महीने पहले स्वाधीनता दिवस के मौके पर अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जनसंख्या विस्फोट का जिक्र किया था। उसके बाद ही असम सरकार ने दो साल पहले पारित नीति को अमली जामा पहनाने का फैसला किया। राज्य के कार्मिक विभाग के आयुक्त व सचिव केके द्विवेदी कहते हैं, ‘नए नियमों के तहत एक जनवरी, 2021 के बाद दो से ज्यादा बच्चे वाले लोग सरकारी नौकरी के लिए पात्र नहीं होंगे। उस तारीख के बाद पहले से सरकारी नौकरी कर रहे लोग भी अगर दो के बाद तीसरा बच्चा पैदा करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।’  
उनका कहना है कि सरकार ने यह फैसला राज्य, देश व समाज के हित में लिया है। इस नियम के तहत दूसरी बार में पैदा होने वाले जुड़वां बच्चों को एक ही गिना जाएगा। मिसाल के तौर पर अगर किसी को पहले से एक बच्चा है और दूसरी बार उसे जुड़वां बच्चे होते हैं तो उसकी नौकरी पर कोई खतरा नहीं होगा।
सरकार ने अपने फैसले के समर्थन में राज्य की तेजी से बढ़ती आबादी का भी जिक्र किया है। सरकार की दलील है कि राज्य की आबादी 17.07 फीसदी की दर से बढ़ी है। वर्ष 2001 में जहां असम की आबादी 2.66 करोड़ थी वहीं वर्ष 2011 में यह बढ़ कर 3।12 करोड़ तक पहुंच गई। एक सरकारी अधिकारी कहते हैं, ‘आबादी में तेजी से वृद्धि की वजह से मौजूदा संसाधनों के जरिए आम लोगों के रहन-सहन के स्तर को बढ़ाने के लक्ष्य तक पहुंचने में दिक्कत हो सकती है।’  उक्त नीति स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय ने बनाई है। लेकिन सरकारी नौकरियों के मामले में इसे लागू करने की जिम्मेदारी कार्मिक विभाग पर है।
वैसे, दो बच्चों वाली नीति कई अन्य राज्यों में भी लागू है। लेकिन अब तक यह पंचायतों व निकायों के चुनावों की उम्मीदवारी के मामले में ही लागू रही है। ऐसे राज्यो में उत्तराखंड, महाराष्ट्र राजस्थान, आंध्र प्रदेश तेलंगाना व गुजरात शामिल हैं।
भारत में दो बच्चों वाली नीति को अक्सर धर्म के चश्मे से देखा जाता रहा है। तमाम अल्पसंख्यक संगठन इसका विरोध करते रहे हैं। हाल के वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जनसंख्या नियंत्रण के प्रति दिलचस्पी दिखाई है। हालांकि वर्ष 2013 में संघ ने कहा था कि हिंदू दंपतियों को कम से कम तीन बच्चे पैदा करने चाहिए। लेकिन वर्ष 2015 में अपने रांची अधिवेशन के दौरान संघ ने दो-बच्चों की नीति के समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया था। 
असम का फैसला इसी प्रस्ताव को लागू करने की दिशा में बढ़ा पहला कदम है। लेकिन इसके साथ ही इस फैसले पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कई संगठनों का कहना है कि इसके जरिए बीजेपी सरकार मुस्लिमों को निशाना बना रही है। असम की आबादी में लगभग एक-तिहाई मुस्लिम हैं। राज्य के 23 में से नौ जिले मुस्लिम-बहुल हैं। दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के लिहाज के सरकार के उक्त फैसले को अहम माना जा रहा है।
प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता ऋतुपर्णो कोंवर कहते हैं, सरकार ने दो साल पहले भी ऐसा एलान किया था। ऐसे में अब दोबारा इसके ऐलान की क्या जरूरत थी? सरकार को शिक्षा व जागरुकता कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उससे आबादी पर अंकुश लगाने में सहायता मिलेगी।  इत्र कारोबारी बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व वाले आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ), जिसका अल्पसंखयकों पर खासा असर है, के महासचिव अमीनुल इस्लाम कहते हैं, दो से ज्यादा बच्चों वाले लोगों के सरकारी नौकरी के अधिकार में कटौती सही फैसला नहीं है। इसकी बजाय सरकार को शिक्षा, गरीबी दूर करने और परिवार नियोजन के बारे में लोगों को जागरूक बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने भी सरकार के फैसले की आलोचना करते हुए इसे कठोर व असंवैधानिक बताया है। उनका कहना है, यह असंवैधानिक है। सरकार का फैसला सही नहीं है और इससे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि आबादी की दलील देकर सरकार ने फैसले को सही ठहराने का प्रयास किया है। लेकिन इसके चलते बीजेपी को अल्पसंख्यकों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। राजनीतिक पर्यवेक्षक प्रोफेसर नितिन डेका कहते हैं, सरकार ने दो साल बाद अगर इस फैसले को अमली जामा पहनाने का फैसला किया है तो इसके पीछे कोई सोची-समझी रणनीति होगी। लेकिन फिलहाल तो उसके फैसले से अल्पसंख्यकों में भारी नाराजगी है। उनको लगता है कि इसके जरिए सरकार ने उनको ही निशाना बनाने का प्रयास किया है।
(डॉयचेवेले)


Date : 25-Oct-2019

सचिन कुमार जैन

कल हम आंगनबाड़ी में उन बच्चों को अंडे दिए जाने का विरोध करेंगे, जिन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं है। हम खुद खूब पूंजी इक_ा करेंगे। उस हद तक कि लाखों बच्चे भूखे मरने लगें और उस हद तक कि राजनीति और सरकार पर हमारा खूब गहरा असर होने लगे।
हम समाज के विभिन्न तबकों, खासकर आदिवासियों के खानपान और संस्कृति को नियन्त्रित करने और बदलने की कोशिश करेंगे। हमें इससे कुछ मतलब नहीं कि आदिवासी बच्चे कुपोषण से मर रहे हैं।
हमें पता है कि दस सालों में पोषण आहार बनाने वाली।कम्पनियों ने बच्चों का पोषण आहार छीना और 4000 हज़ार करोड़ रूपये का मुनाफा कमा लिया। तब हमारे समाज के धर्म और ईश्वर को चोट नहीं पहुंची।
सरकार ने दूध पाउडर बांटा, हमने जाकर नहीं देखा कि उसका स्वाद और उपयोग कितना खराब है? सरकार एक बच्चे का पोषण आहार बनाने के लिए वंचित तबकों की महिलाओं को एक दिन का 1 रुपया प्रतिदिन देती है। वे 40 बच्चों का खाना बनाती हैं, और उन्हें बस 1000 रूपये का मानदेय मिलता है। हमने नहींं कहा कि यह शोषण क्यों? उनके पास कोई स्थाई रोजग़ार नहीं है। उन्हें जंगल से बेदखल किया जा रहा है, जहां वे हज़ारों साल से प्राकृतिक आवास बना कर रह रहे हैं। उन्होने जंगल पर रजिस्ट्री नहीं करवायी। हम कभी।उनके पास नहीं गए। हमने कभी उनसे नहीं जाना कि विकास उनकी जीवन में कौन कौन से झन्झावात ला रहा है?
हम अपने समाज में यह निगरानी नहीं रखते कि हमारे परिवारों में जो धन पूंजी आ रही है, उसका स्रोत क्या है? लाखों करोड़ों का दान देने वालों से नहीं पूछते कि क्या उन्होने यह अर्जन नैतिक माध्यम से किया है?
लेकिन अब जब आंगनबाड़ी में एक अंडा देने की पहल की बात होगी तो हम जरूर जरूर उसका पूरी ताकत से विरोध करेंगे क्योंकि हम मुख्यधारा की राजनीति, बाज़ार, पूंजी, जमीन सब पर नियन्त्रण रखते हैं।
हमें कुपोषित बच्चो को अंडा देने वालों से कहना है कि आप समाज को भ्रष्ट कर रहे हैं। बच्चे भूखे रहें तो रहें, हमें क्या? हमारा घर तो बादाम, दूध, रबड़ी, फलों, घी से भरा है। हम कुछ नहीं करेंगे, पर इसका विरोध करेंगे, फिऱ चाहे बच्चों की जान जाती रहे, वो विकलांग होते रहे। हमें हमारी ताकत और सम्पन्नता पर विश्वास है कि हम यह विकल्प लागू नहीं होने देंगे।
मुझे समाज के इस रुख को देख कर हत्यारा होने का अहसास भी होगा। हम इस विकल्प को बाधित करते हैं, किन्तु उन 10 लाख बच्चों की जिम्मेदारी नहीं लेते, जो कुपोषण के कारण मरने की कगार पर हैं। हम उनका खाना भी छीनते हैं और उनसे छूआछूत भी करते हैं। हम सबसे बड़ा धर्म हैं। बहुत दुखद वक्त।