विचार / लेख

Date : 20-Mar-2020

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ की राज्यपाल लालजी टंडन से शिकायत बावजूद कांग्रेस के 19 विधायक शुक्रवार देर रात तक भोपाल नहीं लाए जा सके।

वहीं सम्मान की तलाश में कांग्रेस से बीजेपी का रुख करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को मालाओं के साथ-साथ भरी सभा में ‘विभीषण’ के अलंकरण से भी नवाज़ा गया।

पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता शिवराज सिंह चौहान ने कहा, ‘रावण की लंका अगर पूरी तरह जलानी है तो विभीषण की तो ज़रूरत होती है मेरे भाई और अब सिंधिया जी हमारे साथ हैं।’ भोपाल में इस तुलना का अर्थ ‘घर का भेदी लंका ढहाए’ जैसे मुहावरे से लेकर ‘कुछ सीन में प्रकट हुए किरदार’ और ‘धोखेबाज़’ जैसे शब्द तक में ढूंढे जा रहे हैं।

सिंधिया परिवार को कभी ‘ग़द्दार’ कहने वाले शिवराज सिंह चौहान का पुराना बयान फिर से कई जगहों पर फैलाया जा रहा है और राज्य बीजेपी का वो इश्तिहार भी जिसका नारा था- ‘माफ़ करो महाराज, हमारा नेता तो शिवराज।’

मध्य प्रदेश कांग्रेस ईकाई ने एक ट्वीट करके कहा है, अब सिंधिया परिवार का इतना भी अपमान मत करो, 18 सालों से हमने बड़े नाज़ों से रखा था। मगर गुरुवार को बीजेपी कार्यालय में दिए गए शिवराज सिंह चौहान के विभीषण वाले भाषण पर कुछ लोगों का यह भी कहना है कि शिवराज ये न भूलें कि राम की लंका पर विजय के बाद वहां राज्याभिषेक विभीषण का हुआ था।

लोग कह रहे हैं कि कहीं सिंधिया पर निशाना दागऩे और ख़ुद के किरदार को राम जैसा बताने के चक्कर में शिवराज लटके न रह जाएं और गद्दी चली जाए ‘महाराज’ के हाथ।

इस बीच शुक्रवार को बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा के लिए नामांकन दाख़िल करने के बाद ग्वालियर के पूर्व राजघराने के वारिस और मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया दिल्ली रवाना हो गए। उधर, पिछले छह दिनों से 275 एकड़ में फैले प्रेस्टिज गोल्फ़शायर रिसॉर्ट में ‘रह रहे’ मध्य प्रदेश के 19 कांग्रेस विधायक भोपाल रवाना होने के लिए तैयार खड़े दो चार्टर्ड प्लेन्स पर सवार होने को शुक्रवार दोपहर बेंगलुरु हवाई अड्डे पहुंचे लेकिन फिर उन्हें वापस जाना पड़ा।

विधायकों को भोपाल लाए जाने में हुई देरी को बीजेपी खेमे में भरोसे की कमी बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि 19 में से कई लोग अब भी पाला बदलकर कांग्रेस खेमे में वापस जा सकते हैं। कहा जा रहा है कि इनमें से बहुत सारे सिंधिया के कहने पर कमलनाथ सरकार के खिलाफ जाने को तो तैयार हो गए लेकिन अब बीजेपी जॉइन करने के पक्ष में नहीं हैं।

विधायकों के फिर से चुनाव होने की स्थिति में दोबारा टिकट न पाने का डर भी सता रहा है क्योंकि उनके क्षेत्र में पहले से टिकट के प्रबल दावेदार बीजेपी की तरफ़ से मौजूद हैं। कांग्रेस ने एक विधायक मनोज चौधरी के पिता नारायण चौधरी को बेंगलुरु में बेटे से न मिलने और धमकी दिए जाने की शिकायत पुलिस से की है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने राज्यपाल से मिलकर बेंगलुरु में बंधक बनाकर रखे गए 19 विधायकों को रिहा करवाने और शक्ति परीक्षण की बात की है।

मध्य प्रदेश विधानसभा का सत्र 16 मार्च से शुरू हो रहा है और अध्यक्ष के ज़रिए सदस्यता से त्यागपत्र देने वाले 19 विधायकों को उनके सामने पेश करने की तारीख़ निकल चुकी है।

इस बीच शुक्रवार दिन में एक ट्वीट के ज़रिए सूचना आई कि विधानसभा सत्र को कोरोना वायरस की वजह से 19 के बदले 26 तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। लेकिन बाद में अध्यक्ष ने इस ग़लत बताया और इसे लेकर भोपाल साइबर पुलिस ने एक केस दर्ज किया है। (बीबीसी)


Date : 20-Mar-2020

राहुल कोटियाल

निर्भया मामले के दोषियों को फांसी दे दी गई है। चारों दोषियों को ये सजा दिल्ली की तिहाड़ जेल में दी गई। इससे पहले डेथ वारंट जारी होने के बावजूद फांसी दो बार टल गई थी। कल भी दोषियों ने पटियाला हाउस कोर्ट से लेकर ऊपरी अदालतों तक याचिकाएं लगाईं थीं, लेकिन उन्हें खारिज कर दिया गया।

16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में एक चलती बस में 23 साल की पैरामेडिकल छात्रा निर्भया के साथ सामूहिक बलात्कार और बर्बरता की गयी थी। उसी महीने सिंगापुर के एक अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी। दोषियों को फांसी होने के बाद निर्भया की मां आशा देवी ने संतोष जताया है। उन्होंने इसे देश की बेटियों के लिए एक नई सुबह बताया।

निर्भया मामले के अपने न्यायिक अंजाम तक पहुंचने के बाद महिला सुरक्षा से जुड़े जो सवाल उन दिनों सारे देश की सुखिऱ्यों में छाए थे, वही सवाल एक बार फिर से उठने लगे हैं। इनमें एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या बलात्कार पीडि़तों की पहचान उजागर होनी चाहिए। यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि आशा देवी अपनी बेटी का असली नाम सार्वजनिक कर चुकी हैं। ऐसा करते हुए उनका कहना था, ‘मुझे उसका नाम उजागर करने में जऱा भी शर्मिंदगी नहीं है।’

निर्भया का असली नाम उजागर करने की बात करीब आठ साल पहले भी उठी थी। उस वक्त तत्कालीन मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरूर ने इसकी मांग की थी। उनका कहना था कि बलात्कार से संबंधित जो नए कानून बनाए जा रहे हैं उन्हें इस बहादुर लडक़ी के नाम पर बनाया जाना चाहिए। ज्योति के माता-पिता के साथ ही किरण बेदी और अनुपम खेर जैसे बड़े नामों ने भी तब शशि थरूर के इस बयान का समर्थन किया था।

लेकिन इसके बाद भी निर्भया का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया था। इसलिए उसके साथ हुए अपराध के बाद जो नए कानून बने और बलात्कार पीडि़तों के लिए जो वित्तीय योजना शुरू की गई, उन्हें निर्भया नाम से ही जाना जाता है। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि बलात्कार पीडि़तों का नाम सार्वजनिक करना एक अपराध है। भारतीय दंड संहिता की धारा 228ए के तहत ऐसा करने वालों को दो साल तक की सजा का प्रावधान है।

2012 में जब नए कानून को निर्भया के असली नाम पर बनाने की मांग हो रही थी तो केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह भी कहा था कि ‘किसी व्यक्ति के नाम पर कानून बनाए जाने का कोई भी प्रावधान मौजूद नहीं है।’ लेकिन निर्भया के वास्तविक नाम पर कानून बनाए जाने की मांग कर रहे लोगों का तर्क था कि यह प्रावधान यदि मौजूद नहीं भी है तो आसानी से बनाया जा सकता है। रंगा-बिल्ला मामले के पीडि़त गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा के नाम पर बहादुरी पुरस्कार दिया जाता है। इनका उदाहरण देते हुए लोगों ने मांग की थी कि निर्भया के असली नाम पर भी नए कानून बनाए जा सकते हैं।

लेकिन कानून के कई दिग्गजों ने उस वक्त भी इस मांग का समर्थन नहीं किया था। दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजिंदर सच्चर का तब कहना था, ‘यह सवाल सिर्फ निर्भया तक ही सीमित नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि बलात्कार के मामलों में पीडि़ता की पहचान उजागर करने के क्या प्रभाव हो सकते हैं?  दिल्ली का यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चित हो चुका है इसलिए लोगों की सहानुभूति पीडि़त और उसके परिजनों के साथ है। लेकिन बलात्कार के मामलों में आज भी समाज पीडि़त को एक आम नागरिक की तरह नहीं स्वीकार करता। इसलिए उसकी पहचान उजागर करने की प्रथा शुरू नहीं होनी चाहिए।’

बलात्कार पीडि़तों को हमारा समाज कैसे देखता है? यह सवाल ही दरअसल उस प्रावधान को बनाए रखने का मूल कारण है जो बलात्कार पीडि़तों की पहचान उजागर करना प्रतिबंधित करता है। इस पर टिप्पणी करते हुए कुछ समय पहले आशा देवी का कहना था, ‘बलात्कार जैसा घिनौना अपराध करने वाले को अपना सिर शर्म से झुका लेना चाहिये। पीडि़त या उनके परिवार शर्मिंदा क्यों हों?’

आशादेवी का यह वाजिब सवाल कई बार उठता रहा है। लेकिन सवाल जितना सीधा है, इसका जवाब उतना ही उलझा हुआ। दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय से महिलाओं से जुड़े मामलों पर शोध कर रहीं भूमिका चंदोला बताती हैं, ‘यदि हम ऐसी व्यवस्था बना पाएं जहां बलात्कार से पीडि़त किसी व्यक्ति को अपनी पहचान छिपाने की जरूरत न हो तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।  लेकिन आज की व्यवस्था में यह संभव नहीं है।’ वे आगे कहती हैं, ‘हमारे समाज में आज भी कई जगह पीडि़ता को ही दोषी समझा जाता है। कभी उसके पहनावे पर तो कभी उसके व्यवहार पर सवाल उठाए जाते हैं। पीडि़तों पर ये भी आरोप लगते हैं कि उन्होंने ही अपराधियों को उकसाया होगा। जहां पीडि़तों को इस नज़रिए से देखा जाता है वहां उनकी पहचान उजागर होना उनकी मुश्किलें और बढ़ा देगा।’

हालांकि ऐसे उदाहरण भी हैं जहां बलात्कार की शिकार हुई लड़कियों ने खुद ही अपनी पहचान उजागर की है। 2012 में हुए कोलकाता के चर्चित ‘पार्क स्ट्रीट बलात्कार मामले’ की पीडि़ता सुजैट जॉर्डन ने ऐसा किया था। लेकिन उनकी राह बिलकुल भी आसान नहीं रही। अपने साथ हुए सामूहिक बलात्कार की सूचना जब उन्होंने पुलिस की दी और यह मामला सुखिऱ्यों में आया तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन पर ही सवाल उठाए। ममता बनर्जी का कहना था कि सुजैट जॉर्डन के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ है और वे सिर्फ उनकी सरकार को बदनाम करने के लिए झूठे आरोप लगा रही हैं। ममता बनर्जी के ऐसे बयान के बाद कुछ लोगों ने सुजैट के घर पर हमला भी किया।

लेकिन इन सब मुश्किलों के बावजूद सुजैट ने हिम्मत नहीं हारी और और अपनी लड़ाई पूरी ताकत से लड़ी। अदालत इस मामले के दोषियों को भी सजा सुना चुकी है। मार्च 2015 में सुजैट की एक बीमारी के चलते मौत हो गई लेकिन,आज वे एक ऐसा नाम बन चुकी हैं जो कई बलात्कार पीडि़तों को अपनी लड़ाई लडऩे की हिम्मत देता है। जब भी बलात्कार पीडि़तों की पहचान उजागर करने की बात होती है, सुजैट जॉर्डन का जिक्र इसमें जरूर आता है।  महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर काम करने वाले जानकारों का मानना है कि सुजैट जॉर्डन जैसे लोग हमें उस व्यवस्था की तरफ बढ़ाते हैं जहां बलात्कार के पीडि़तों को नहीं बल्कि अपराधियों को शर्मिंदा होना पड़े। लेकिन यह व्यवस्था तभी संभव है जब सुजैट जॉर्डन जैसी हिम्मत और उस जैसा आत्मविश्वास हम अन्य लोगों में भी पैदा कर पाएं।

इन लोगों का यह भी मानना है कि जब तक हम बलात्कार होने पर ‘इज्जत लुट जाना’ जैसे शब्द इस्तेमाल करते रहेंगे तब तक ऐसा संभव नहीं है। ये सिर्फ शब्द नहीं हैं। हमारा समाज बलात्कार की शिकार हुई किसी लडक़ी और उसके परिवार को सच में ऐसे देखता भी है जैसे अब उनकी इज्जत जा चुकी हो। इसलिए समाज का एक बड़ा वर्ग बलात्कार की घटना होने पर उसे छिपाने की ही कोशिश करता है। वह महसूस करता है कि ऐसा करने से वह अपनी ‘इज्जत’ बचाने की कोशिश कर रहा है। ऐसी व्यवस्थाओं से आगे बढऩे पर ही हम उस व्यवस्था तक पहुंच पाएंगे जहां बलात्कार के पीडि़तों को अपनी पहचान छिपाने और शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं होगी। (सत्याग्रह)


Date : 19-Mar-2020

अंजलि मिश्रा

बताया जा रहा है कि कोरोना वायरस से बिगड़ी स्थितियां संभलने में अभी थोड़ा वक्त और लग सकता है। इसलिए नागरिकों के घर पर बंद रहने की यह स्थिति अगले दो या तीन हफ्तों तक बरकरार रह सकती है। इस वक्त का इस्तेमाल करने के लिए मनोविश्लेषक किसी म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट, कोई नई भाषा या फिर कैलिग्राफी या बीटबॉक्सिंग जैसा कोई कौशल सीखने की भी सलाह देते हैं।

कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते दुनिया लगभग बंद सी हो गई है। स्कूल, दफ्तर, मॉल और सिनेमाघर बंद पड़ें है और लोग घरों में सिमटे हुए हैं। ऐसे में बोरियत होना स्वाभाविक है। लेकिन लंबे समय तक घर पर बंद होने का असर बोरियत से आगे बढक़र मानसिक परेशानियों में भी बदलने लगा है। दुनिया भर में, एक बड़ी संख्या में लोग एंग्जायटी (घबराहट) और बाकी मानसिक तकलीफों की शिकायत करने लगे हैं। अमेरिका, इटली, चीन समेत कई देशों में इससे जुड़ी एडवाइजरी और हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए गए हैं। भारत जैसे देश में जहां पहले ही मानसिक बीमारियों के प्रति जागरुकता कम है, वहां थोड़ा ज्यादा ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है। लेकिन सरकारी या किसी बाहरी मदद के पहले कुछ सावधानियां व्यक्तिगत स्तर पर भी रखी जा सकती हैं।

पिछले दिनों अकेलेपन पर हुए शोधों की दोबारा समीक्षा की गई। इसमें कोरोना वायरस के चलते घर पर बंद पड़े स्वस्थ लोगों में आने वाले बदलावों को भी शामिल किया गया। इसके नतीजे बताते हैं कि लंबे समय तक अकेले रहने का असर दिमाग पर ठीक वैसा ही होता है जैसा किसी दुखद त्रासदी का होता है। ऐसे में अगर व्यक्ति तक लगातार परेशान करने वाली खबरें भी पहुंच रही हैं तो वह ज्यादा भ्रमित और बेचैन होगा। इससे उसके मानसिक रूप से बीमार होने की संभावना बढ़ सकती है।

इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी एडवाइजरी में कहा गया है कि ऐसी खबरों को देखने, सुनने और पढऩे से बचें जो आपको परेशान करती हों। इनमें कोरोना से जुड़ी जानकारियां भी शामिल है। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि बेहतर होगा, अगर कोरोना से संबंधित जानकारी के लिए दिन में केवल दो बार किसी विश्वसनीय माध्यम का इस्तेमाल किया जाए। लगातार परेशान करने वाली खबरों का लोगों तक पहुंचना उनमें तनाव का स्तर बढ़ाकर उन्हें मानसिक परेशानियों का शिकार बना सकता है।

मनोविश्लेषक सलाह देते हैं कि तनाव से बचने का एक तरीका स्थितियों को स्वीकार कर लेना भी है। हो सकता है कि कोरोना वायरस से पैदा हुई इस आपात स्थिति में कुछ लोग मानसिक या शारीरिक परेशानियों के साथ-साथ आर्थिक नुकसान भी उठा रहे हों। ऐसे में केवल यह याद रखे जाने की जरूरत है कि जान है तो जहान है। हो सकता है, कुछ लोगों को यह समाधान स्थितियों का अति-सरलीकरण लगे लेकिन फिलहाल कोई और विकल्प मौजूद नहीं है। अगर आर्थिक नुकसान नहीं है और केवल डर या बेचैनी है तो यह मान लेने में कोई बुराई नहीं कि आपको डर लग रहा है। मनोविज्ञान कहता है कि ऐसा करते ही दिमाग डर की बजाय डर के कारण और उससे निपटने के तरीकों पर केंद्रित हो जाता है। एक बार तनाव के कारणों को पहचान लेने के बाद इससे बाहर आने के लिए, प्रोग्रेसिव मसल्स रिलेक्सेशन और ध्यान जैसे तरीके ऑनलाइन सीखे जा सकते हैं।

इस मामले में उन लोगों को खास तौर पर ध्यान देने की ज़रूरत है जिनके घरों में बच्चे हैं। माता-पिता के लगातार परेशान होने का असर बच्चों पर बहुत जल्दी और बुरा पड़ता है। जानकार सलाह देते हैं कि बच्चों के साथ भी कोरोना वायरस के बारे में बात किए जाने की ज़रूरत है ताकि उन्हें पता चल सके कि घर और बाहर का माहौल क्यों बदला हुआ है। साथ ही, उन्हें यह बताना भी ज़रूरी है कि बहुत सी बातें आपके यानी माता-पिता के नियंत्रण में भी नहीं होती हैं।

मनोविज्ञानियों के मुताबिक अच्छी नींद, पोषक भोजन, साफ वातावरण, व्यायाम और लोगों से मेल-जोल इंसान की मूलभूत ज़रूरतें हैं, इसलिए इसके विकल्प तलाशे जाने की ज़रूरत है। उदारहरण के लिए अपने घर वालों या दोस्तों से लगातार फोन पर संपर्क रखना या वीडियो चैट करना, दोनों तरफ के लोगों को सामान्य बने रहने में मदद करेगा। इसके अलावा भूले-बिसरे दोस्तों या कभी न मिलने वाले रिश्तेदारों को फोन कर उनके हाल-चाल जाने जा सकते हैं। कुछ जानकार खाना खुद बनाने से लेकर घर की सफाई करने या बाकी घरेलू काम निपटाने के विकल्प का भी इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। चूंकि ये काम सातों दिन चलते हैं इसलिए इनके साथ खुद को रोज व्यस्त रखना आसान है। इसके अलावा, वे लोग जो हमेशा समय की कमी के चलते स्वास्थ्य पर ध्यान न दे पाने की बात कहते हैं, कम से कम इन दिनों में एक्सरसाइज, योग, प्राणायाम आदि को अपना सकते हैं। यह स्वस्थ रखने के साथ-साथ तनाव कम करने में भी सहायक होगा।

बताया जा रहा है कि कोरोना वायरस से बिगड़ी स्थितियां संभलने में अभी थोड़ा वक्त और लग सकता है। इसलिए नागरिकों के घर पर बंद रहने की यह स्थिति अगले दो या तीन हफ्तों तक बरकरार रह सकती है। इस वक्त का इस्तेमाल करने के लिए मनोविश्लेषक किसी म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट, कोई नई भाषा या फिर कैलिग्राफी या बीटबॉक्सिंग जैसा कोई कौशल सीखने की भी सलाह देते हैं। इससे व्यस्त रहने के साथ-साथ कुछ करने की संतुष्टि भी बनी रहती है। इसमें यूट्यूब और ऑनलाइन ट्यूटोरियल खासे मददगार साबित हो सकते हैं। इन सबके अलावा पेंटिंग, राइटिंग, कुकिंग या सिलाई-बुनाई जैसे तमाम शौक पूरे करने का भी यह बहुत अच्छा वक्त है।

इसके अलावा किताबें, इंटरनेट पर मौजूद ज्ञान का खजाना, एमेजॉन प्राइम और नेटफ्लिक्स जैसे मंचों पर मौजूद शानदार कंटेट भी वक्त बिताने का बेहतरीन जरिया हो सकते हैं। इस मामले में सलाह यह दी जाती है कि फिल्में देखने या किताबें पढऩे जैसे काम अगर लगातार कई दिनों तक किए जाएं तो वे भी तनाव बढ़ाने लगते हैं। इसलिए इन्हें करना अच्छा है लेकिन थोड़ा ब्रेक ले-लेकर। वैसे, यह बात सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर भी पूरी तरह लागू होती है लेकिन फिर भी कुछ इस तरह के मज़ेदार वीडियोज तो देखे ही जा सकते हैं। (सत्याग्रह)

 


Date : 19-Mar-2020

अंधविश्वास से मुठभेड़

डॉ. दिनेश मिश्र

पिछले कुछ समय से विश्व कोरोना वायरस के संक्रमण से जूझ रहा है जिसमें दुनिया भर के 100 से अधिक देशों के नागरिक संक्रमित हो चुके हैं, भारत के भी करीब 18 प्रदेशों के किसी न किसी हिस्से से मरीजों के कोरोना से संक्रमित होने की खबरें सुनाई पड़ती है। पूरे विश्व में एक लाख से अधिक लोग कोरोना के संक्रमण के शिकार हुए हैं, 5000 से अधिक लोगों की मृत्यु भी हो चुकी है और बहुत सारे लोग अभी भी अस्पतालों में भर्ती है, जो अस्पतालों में स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर रहे हैं। मीडिया के प्रचार-प्रसार से कोरोना की चर्चा लगभग सभी जगह पहुंच चुकी है।

इसके संबंध में लोग आशंकित भी हैं, अपने स्वास्थ्य को लेकर, अपनी जान को बचाने के लिए और ऐसे में जब पूरे लोगों को सही वैज्ञानिक तरीके से कोरोना के फैलने, उसके संक्रमण, उसका उपचार, उसका बचाव के बारे में बातचीत होना चाहिए तब बहुत सारे लोग इस वायरस संक्रमण के बारे में, उसके उपचार के बारे में भी अजीबोगरीब बातें फैला रहे हैं और अंधविश्वास तथा भ्रम फैला रहे हैं। जैसे कोई गोमूत्र पिलाने से, तो कोई गाय का गोबर से नहाने से, कोई ताबीज पहनाने से तो कोई झाड़-फूंक करने से संक्रमण खत्म करने की बात प्रचारित कर रहे हैं।

किसी भी बाबा के द्वारा फैलाये गए प्रपंच में फंसने के पहले जरा सोचिए कि यदि गौमूत्र पीने, गोबर से नहाने से कोरोना या कोई बीमारी ठीक होती तो हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन जी नागरिकों को साफ-सफाई से रहने, बार-बार हाथ धोने की सलाह देने के बजाय नेशनल मीडिया में नागरिकों को गौमूत्र पीने, गोबर में लेटकर ठीक होने का नायाब इलाज खुद क्यों नहीं बताते। अन्य देशों की तरह भारत सरकार भी इस मामले में विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं चिकित्सा विशेषज्ञों के द्वारा बताए गए प्रोटोकाल का ही पालन कर रही है।

पिछले दिनों दिल्ली के पास एक तथाकथित बाबा चक्रपाणी ने कोरोना वायरस के संक्रमण को खत्म करने के लिए गोमूत्र पार्टी आयोजित की, तो कहीं कुछ लोगों को गोबर से भरे गड्ढे में डुबकी मारते, लगाते भी देखा गया। एयरपोर्ट में आने वाले लोगों को गौमूत्र पिलाने, गोबर से नहलाने की मांग की और कुछ लोगों को पिलाया। जबकि राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकाल के चलते देश भर में सामाजिक, धार्मिक कार्यक्रम, खेल, क्रिकेट मैच, समारोह स्थगित किए जा चुके हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों ने भी अपने अपने सार्वजनिक कार्यक्रम स्थगित कर दिए हैं। मंदिर, मस्जिद, चर्च, मॉल, ट्रेनें, फ्लाइटस्कूल, कॉलेज बंद हो रहे हैं। यही हालत विदेशों में भी है। नागरिकों से भीड़भाड़ में न जाने, साफ-सफाई से रहने, हाथ धोने की बार-बार सलाह दी जा रही है। तब गौमूत्र, पार्टी, गोबर के सामूहिक कार्यक्रम आयोजित करना कैसे उचित ठहराया जा सकता है।

पुलिस ने उत्तरप्रदेश में एक तथाकथित बाबा को कोरोना से मुक्ति का ताबीज बेचते भी हिरासत में लिया और कोरोना की झाड़-फूंक करके स्वस्थ करने वाले कुछ बैगा भी सामने आये, इसके साथ ही विभिन्न प्रकार के तरीकों से अलग-अलग स्थानों में काम कर रहे कतिपय लोगों ने देशी-विदेशी तौर-तरीके प्याज, लहसून, नीबू से भी कोरोना को खत्म करने की बात और दावे किये जाने लगे, जबकि जिन देशों से कोरोना के पॉजिटिव मामले मिले हंै और उन देशों में भी जहां काफी लोगों की मृत्यु हुई है, उनके संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी वर्तमान में इस संक्रमण से कोई उपयुक्त दवा उपलब्ध न होने, वैक्सीन उपलब्ध न होने की बात कही है और लोगों से इस संक्रमण के फैलने से बचाव करने की बात ही कही है, पर उसके बाद भी अलग-अलग किस्म  के भ्रामक  दावे  सामने आते हैं।  यहां यह बताना जरूरी है  कोरोना एक प्रकार का वायरल संक्रमण है  जिसे खोजा बहुत पहले जा चुका था, पर महामारी अभी हुई है, कोरोना संकमण में पहले तो कुछ समय तक व्यक्ति लक्षण प्रकट नहीं होते पर धीरे-धीरे उस व्यक्ति को खांसी-बुखार और फेफड़े में संक्रमण होता है और सांस लेने की तकलीफ के कारण उसकी मृत्यु हो जाती है पर यदि सही समय पर उस व्यक्ति को सही चिकित्सा मिल जाती है तो उसकी जान बचाई जा सकती है तथा यह वायरस हवा के माध्यम से नहीं फैलता बल्कि एक मरीज से दूसरे मरीज में फैल सकता है। इसलिए बचाव के लिए मास्क पहनने, एक से दूसरे रोगी से हाथ नहीं मिलाना, हाथों को बार-बार सैनिटाइजर, साबुन, पानी से धोने से बचाव के तरीके विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं चिकित्सकों द्वारा कही जा रही है ताकि उसका फैलाव कम हो सके तथा यदि किसी व्यक्ति को हुआ भी है तो उसे अपने आपको अलग-थलग कर लेना चाहिए, ताकि उसके माध्यम से घर के दूसरे व्यक्तियों में संक्रमण न फैले। अभी भी जानकारी के अभाव डर और भ्रम के कारण कुछ मरीजों ने ना तो अपने संक्रमित होने की बात जाहिर की बल्कि कुछ लोग तो अस्पतालों में भर्ती होने के बाद भी लापता हो गए, जिनसे दूसरे व्यक्तियों को संक्रमण फैल सकता है। इसलिए आवश्यक है कि इस संबंध में व्यक्ति को ईमानदारी से सोच-समझकर न केवल अपना खुद का बचाव करना चाहिए, बल्कि दूसरे लोगों पर भी संक्रमण न फैले इसके बारे में सावधानियां सुरक्षित एवं सुनिश्चित करना चाहिए।

अब बात करनी पड़ेगी जो लोग गोमूत्र पीने से संक्रमण ठीक होने की बात कर रहे हैं, क्या इसमें कोई सच्चाई है तथा जो लोग गोबर के उपयोग से कोरोना के खत्म होने की बात करते हैं, क्या उसमें कोई सच्चाई है, गाय, भैंस, बकरी, मनुष्य, ऊंट आदि  स्तनधारी प्राणी है जिसमें से गाय, भैंस के दूध का उपयोग हम पीने करते हैं, उसी प्रकार कुछ स्थानों में बकरी के दूध, तो राजस्थान के कुछ इलाकों में ऊंटनी के दूध का प्रयोग भी लोग करते हैं। गाय का दूध भारत में सहजता से उपलब्ध है, तथा स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के चलते गाय को माता का दर्जा दिया है, पर दूसरी बात है जिस प्रकार मनुष्य एक स्तनधारी प्राणी है और भी बहुत सारे स्तनधारी प्राणी, क्या हम उनका मूत्र एवं मल बीमारियों के इलाज के लिए काम में लाते हैं। मनुष्य एवं सभ्य स्तनधारी प्राणी जो भी पानी पीते हैं वह शरीर में आवश्यकतानुसार उपयोग होकर किडनी के द्वारा मूत्र के रूप में बाहर निकलता है तथा जो खाद्य पदार्थ ग्रहण करते हैं, उसमें से भोजन के पाचन के बाद जो पदार्थ आहार नली में बचता है वह धीरे-धीरे मलाशय से होते हुए मल के रूप में बाहर निकलता है, उसी प्रकार गाय, भंैस भी जो पानी पीती हैं, खाना खाती है और वह उसके शरीर में किडनी और मलाशय से बाहर निकलकर मूत्र एवं मल के रूप में बाहर निकलता है, इसका किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी बीमारी के इलाज में उपयोग करने में कितनी समझदारी है। सच्चाई यह है अलग-अलग क्षेत्रों में लोग उपलब्ध पशुओं का दूध पीते हैं जो कि वास्तव में उन पशुओं की  संतानों के लिए उनके शरीर में  बनता है पर क्या भैंस के मूत्र और बकरी के मूत्र और मल का ऊंटनी के मूत्र और मल का मनुष्य के मूत्र और मल का उपयोग कोरोना या किसी भी संक्रमण अथवा अन्य बीमारी के लिए करते हैं जो गाय के मूत्र, मल का  करने लगते हैं। जबकि गाय या किसी प्राणी के मूत्र, गोबर से बीमारियों के ठीक होने के संबंध में न ही वैज्ञानिक तौर पर कोई परीक्षण हुए है, न कोई खोज हुई है, किसी रिसर्च पेपर में, यहाँ तक गूगल में भी इस संबंध में किसी सही वैज्ञानिक रिसर्च का उल्लेख नहीं है। सिर्फ मिथकों, कही-सुनी बातों के आधार पर ही पूरा प्रोपेगैंडा रचा हुआ है।

 अंधविश्वास निर्मूलन अभियान के चलते मेरा ग्रामीण अंचल में जाना होता है। जिन गौशाला में और जहां पर एक से अधिक गाय हैं, वहां पर भी यदि गाय के मल और मूत्र को नियमित रूप से नहीं फेंका जाता तो वहां पर उसमें मक्खी, मच्छर, कीड़े, संक्रमण एवं इतनी दुर्गंध आने लगती है कि बाहर से ही वहां सांस लेना मुश्किल हो जाता है, और उससे गांव में संक्रमण फैलने की आशंका रहती है। इसलिए अनेक स्थानों में इंसानों और पशुओं के लिए भी अलग-अलग तालाब बनाए जा रहे ताकि संक्रमण न फैले, क्योंकि वास्तव में मूत्र एवं मल अपशिष्ट पदार्थ है जो अनुपयोगी होने के कारण हर प्राणी अपने शरीर से नियमित रूप से बाहर निकालता है ? न कि यह कोई औषधि पदार्थ है, पर कुछ आस्था और कुछ अंधविश्वास के कारण लोग भ्रम में पड़े रहते हैं और दूसरों को भी भ्रम में डालने का किया करते हैं।

गाय सहित किसी भी पशु के मलमूत्र,  पसीने, आंसू, नाक, कान से स्त्रावित होने वाले अनुपयोगी पदार्थ  से मनुष्य पशुओं की किसी भी बीमारी के ठीक होने यह रूकने के बाद भी एक मिथक ही है। जिस प्रकार अन्य वायरल संक्रमण फैलते है उसी प्रकार कोरोना भी एक संक्रमण है जिससे सावधानीपूर्वक रहने से बचा जा सकता है, तथा समय रहते डॉक्टरी सलाह व उपचार से संक्रमण से ठीक होना संभव है, दहशत, डर, भ्रम एवं अंधविश्वास का शिकार होने से बचे।

(नेत्र विशेषज्ञ अध्यक्ष अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति छत्तीसगढ़)


Date : 18-Mar-2020

कोरोना वायरस को लेकर भारत की तैयारी को समझने के लिए डाउन टू अर्थ ने सूक्ष्म जीव विज्ञान और विषाणु विज्ञान में25 साल से ज्यादा का विस्तृत अनुभव रखने वाले बाल रोग विशेषज्ञ टी जैकब जॉन से बात की। पेश हैं इसके अंश-

0 भारत ने विदेशी नागरिकों के आने पर पाबंदी लगा दी है। क्या इससे रोकथाम में मदद मिलेगी?

00 विज्ञान सबूत मांगता है। अगर इस बात के सबूत हैं कि ईरान, इटली, दक्षिण कोरिया, जापान और चीन जैसे देशों के ही नहीं बल्कि दुनिया भर के लोग संक्रमण फैला रहे हैं, तो यह सही है। लेकिन मुझे अफसोस है कि ऐसा कोई सबूत मौजूद नहीं है। मेरे ख्याल में, यह सरकार की एक दहशतभरी प्रतिक्रिया है, भले ही खुद लोगों से दहशत नहीं फैलाने की अपील कर रही है। 

0 भारत में एक के बाद दूसरे राज्य स्कूल, पार्क और साथ ही बड़े सामाजिक जमावड़े बंद कर रहे हैं। क्या लोगों के जमावड़े रोकने के ये उपाय जरूरी थे?

00 क्या किसी राज्य सरकार ने आपको बताया कि उनके राज्य में जोखिम का आकलन क्या है? अगर नहीं, तो वे ऐसा कैसे कर सकते हैं? बिहार, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे कुछ राज्यों में, जहां एक भी पॉजिटिव मरीज नहीं मिला है, उन्होंने भी ऐसा कदम उठाया है; लेकिन किस आधार पर किया, हम नहीं जानते। अगर कुछ नहीं हुआ,तो भी इससे लोगों में घबराहट फैलेगी और इस तरह के कठोर कदम रोजमर्रा की जिंदगी पर बुरा असर डालेंगे।

0 वायरस का पता लगाने के लिए अब तक 6,000 से ज्यादा सैंपल की जांच की गई है। क्या यह पर्याप्त है?

00 मैं ऐसा नहीं मानता। लेकिन मेरा सुझाव है कि आप इस तथ्य को संबंधित परिप्रेक्ष्य में देखें। भारत में बीमारी की गंभीरता का आकलन क्या है? अगर आप एकमुश्त यात्रा प्रतिबंध को देखें, तो यह बताता है कि जोखिम मूल्यांकन बहुत, बहुत ज्यादा है। अगर ऐसा है, तो 6,000 सैंपल की जांच बहुत कम है। तो, ये दोनों उपाय एक दूसरे से मेल नहीं खाते हैं।

0 सरकार का कहना है कि पूरे भारत में कोरोना मरीजों के संपर्क में आने वाले लोगों का पता लगाने की मुहिम में करीब 4,000 लोगों की पहचान की गई है। क्या यह पर्याप्त है?

00 इसका मतलब है कि प्रति केस लगभग 50 संपर्कों की पहचान की जा रही है, जो बुरा नहीं है। लेकिन अगर मरीजों की गिनती बढ़ती है, तो उन्हें फिलहाल जितना कर रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर मरीज के संपर्क में आने वालों का पता लगाना होगा। जितने ज्यादा संपर्क में आने वालों का पता लगाएंगे, उतने ज्यादा अस्पतालों को तैयार करना होगा।

0 डब्ल्यूएचओ का कहना है कि अस्पताल में भर्ती मरीजों में से 30-40 फीसद को आईसीयू में रखने की जरूरत है। क्या हम तैयार हैं?

00 हमारी स्वास्थ्य प्रबंधन प्रणाली इस तरह के किसी भी हालात का सामना करने के लिए तैयार नहीं है। हम अपने स्वास्थ्य प्रबंधन में सबसे निचले पायदान पर हैं। हमारे पास पर्याप्त वेंटिलेटर और मेडिकल ऑक्सीजन नहीं है। एच-1 एन-1महामारी से सबक मिला था कि सभी अस्पतालों को बड़ी संख्या में निमोनिया के मामलों के लिए तैयार रहना होगा। हमने सबक नहीं सीखा। हमने स्वास्थ्य क्षेत्र व स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे में निवेश और मानव संसाधन तैयार करने का मूल्य नहीं समझा। यह महामारी हमें बहुत कठोर बुनियादी सबक देने वाली है।

0 भारत में इस वायरस का फैलाव कितना होगा?

00 एक साल में कम से कम 60 फीसदी भारतीय आबादी संक्रमित हो जाएगी, क्योंकि इस दौरान संक्रमण अच्छी तरह पांव जमा लेगा।मेरे इतनी बड़ी संख्या बताने का कारण यह है कि यह मच्छर या जल जनित संक्रमण नहीं है, बल्कि यह सांस से फैलने वाला संक्रमण है। वक्त के साथ, लोगों में इसे लेकर प्रतिरक्षा विकसित हो जाएगी और फिर यह समय-समय पर होने वाली एक बीमारी बन जाएगी। और फिर, हर साल, यह एक खास मौसम के साथ आएगी जैसे दूसरे सांस के संक्रमण आते हैं।


Date : 18-Mar-2020

मनीष सिंह

यह सम्मान है, या अपमामन?  पदोन्नति है, या पदानवती? इनाम है, या तोहमत। ये कदम सदा सदा के लिए सुप्रीम कोर्ट के हर फैसले के पीछे जज की नीयत को सवालों के कटघरे में ले जाएगा। जिस लीगल प्रोफेशन ने उन्हें इतनी ऊंचाई दी, उस प्रोफेशन और एक पवित्र इंस्टीट्यूशन को ऐसी गहरी चोट की मिसाल भारतीय इतिहास में नही है।

लोकतंत्र के तीन कंगूरे हैं- व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। एकतरफा जनमत देकर, और विपक्ष को लंगड़ा-लूला करके, व्यवस्थापिका को 23 करोड़ वोटों ने ढहा दिया। कार्यपालिका की विश्वसनीयता 353 की मेजोरिटिज्म तले कुचली गई। मगर न्यापालिका को नपुसंक करने में अकेले रंजन गोगोई का योगदान अविस्मरणीय रहेगा।

जजों की उस ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस में अविस्मरणीय हुंकार ने एक उम्मीद जगाई थी, कि उभरते अधिनायकवाद के मार्ग में न्यायिक चेक और बैलेन्स की प्रक्रिया तनकर खड़ी रहेगी। मगर गोगोई साहब का तीन सालों का कार्यकाल न्याय की मूल परिभाषा में ही म_ा डाल गया।

तीन साल, ज्युडिशयरी के शीर्ष पर एक बड़ा लम्बा वक्त होता है। और ये वक्त बड़ा क्रूशियल, भारत की अनमेकिंग का दौर था। कॉलेजियम के तहत नियुक्तियों, प्रमोशन और ट्रांसफर के मामलों पर बहुतेरे सवाल हैं। मगर इसे उनकी निजी सल्तनत के फैसलों की तरह इग्नोर करता हूं। मगर जनता, लोकतंत्र और मानवाधिकार के मसलों पर, उनके फ़ैसलों ने, फैसलों से बचने की प्रक्रिया ने सुप्रीम कोर्ट पर जनता की आस्था को अभूतपूर्व चोट पहुंचाई है।

उनका दौर, वह दौर रहा है, जहां सडक़ पर चलता आदमी भी आने वाले फैसले प्रिडिक्ट कर सकता था। इसके लिए आपको ज्योतिषी या संविधानवेत्ता होने की जरूरत नही थी। केवल ये समझना होता कि सत्ता, या सत्ताधारी दल क्या चाहता है।

अंतिम दिनों में मन्दिर मामले में सुनवाई की उनकी अभूतपूर्व उत्कंठा दूसरे मामलों में पूरे कार्यकाल में नही दिखती है। एनआरसी के नाम पर 19 लाख लोग, उनकी सनक का शिकार बने घूम रहे हैं। चार राज्यों में आग लगी हुई है। कश्मीर बन्दी, लॉक डाउन, इलेक्टोरल बांड, विविपैट की गिनती, सीबीआई वर्सज सीबीआई, राफेल जैसे मामलों में सीलबंद न्याय आखिर उनकी टेबल पर दम तोड़ गया। कौन जाने कितने लिफाफे पहुंचे हों, मगर सबसे स्तब्धकारी लिफाफा तो अब पहुंचा है। लिफाफे में राज्यसभा की सीट है।

चीफ जस्टिस वह पद है, जो रास्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की गैरमौजूदगी में रास्ट्र का प्रमुख होता है। उस पद पर बैठ चुका व्यक्ति अब राज्यसभा ढाई सौ के झुंड में बैठेगा। कानून बनाएगा.. जिस संविधान का मान वे सुप्रीम पद में बैठकर नहीं रख सके, उसी की बनाई संसद के किसी कोने का शोपीस बनेंगे। जिनके साथ पर्दे के पीछे मिलना होता था, अब खुलकर उनके बीच खिलखिलायेंगे। शायद मंत्री भी हो जाएं।

यह सम्मान है, या अपमामन?  पदोन्नति है, या पदानवती? इनाम है, या तोहमत। ये कदम सदा सदा के लिए सुप्रीम कोर्ट के हर फैसले के पीछे जज की नीयत को सवालों के कटघरे में ले जाएगा। जिस लीगल प्रोफेशन ने उन्हें इतनी ऊंचाई दी, उस प्रोफेशन और एक पवित्र इंस्टीट्यूशन को ऐसी गहरी चोट की मिसाल भारतीय इतिहास में नही है।

मगर इतनी बारीक सोच रखी होती, तो सुप्रीम कोर्ट की गरिमा मटियामेट न करते। अब आप फिर से एक बार कपट भरी शपथ लेंगे, और खुशी खुशी सभासद हो जाएंगे।


Date : 17-Mar-2020

शोएब दानियाल

पूरी दुनिया में कोरोना वायरस से हो रही मौतों का आंकड़ा पांच हजार के करीब पहुंच गया है। सवा लाख से ज्यादा लोग इसकी चपेट में हैं। चीन से लेकर इटली तक तमाम देशों में लोग इस महामारी से निपटने के लिए अपनी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की शरण में हैं। लेकिन भारत में स्थिति उलट है। यहां कई लोगों को इस पर शक है कि सरकार उन्हें कोरोना वायरस से बचा सकती है। इसके चलते स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए हालात और जटिल हो चले हैं।

आगरा के एक उदाहरण से इसे समझा सकता है। बीते हफ्ते यहां से खबर आई कि एक महिला आइसोलेशन वार्ड से भाग गई है। इस महिला के पति में कोरोना वायरस संक्रमण की पुष्टि हो गई थी। बाद में पता चला कि हाल ही में यूरोप से लौटी यह महिला सरकारी स्वास्थ्य कैंप में भर्ती नहीं होना चाहती थी। उसके घरवालों ने दावा किया कि इसकी वजह आगरा के एसएन द्विवेदी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में बने आइसोलेशन वार्ड के गंदे टॉयलेट्स थे। अब इस महिला के ससुर पर महामारी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है जिसमें दो साल तक की जेल का प्रावधान है।

यह इस तरह का अकेला मामला नहीं है। नौ मार्च के कर्नाटक के मेंगलुरु में भी कोरोना वायरस का एक संदिग्ध सरकारी अस्पताल में बने आइसोलेशन वार्ड से भाग निकला। उसकी दलील थी कि वह प्राइवेट अस्पताल में जाना चाहता है ताकि उसका इलाज बेहतर तरीके से हो सके। हरियाणा के मानेसर में भी कुछ मरीजों ने सेना द्वारा चलाए जा रहे एक केंद्र में बेहतर सुविधाओं की मांग करते हुए हंगामा किया। इसके चलते पुलिस बुलानी पड़ी।

आगरा जैसा ही एक मामला मुंबई में भी देखा गया। यहां अंकित गुप्ता नाम के एक शख्स ने शहर के कस्तूरबा अस्पताल में फैली गंदगी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं। सरकार ने यहीं कोरोना वायरस के मरीजों के लिए आइशोलेशन वार्ड बनाया है और अंकित के एक दोस्त यहां पर निगरानी में हैं।

भारत में एक बड़ा वर्ग है जिसे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर जरा भी भरोसा नहीं है। लेकिन कोरोना वायरस का संकट इतना गंभीर है कि निजी स्वास्थ्य तंत्र के पास भी इससे उपजे हालात को संभालने की क्षमता नहीं है। तेलंगाना के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है जहां कोरोना वायरस की चपेट में आए एक शख्स की तब मौत हो गई जब एक के एक बाद एक प्राइवेट अस्पतालों ने उसे भर्ती करने से इनकार कर दिया। हालात को लेकर अनिश्चितता के इस आलम का एक नतीजा यह भी है कि हो सकता है इलाज के लिए जगह-जगह भटकते इस मरीज से कई दूसरे लोगों को संक्रमण हो गया हो।

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर लोगों को कम भरोसा क्यों है इसकी वजह समझना मुश्किल नहीं। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था दुनिया की सबसे लचर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में शुमार होती है। हमारा देश जन स्वास्थ्य पर जीडीपी का महज 1.28 फीसदी खर्च करता है। अनुपात के हिसाब से देखें तो हम इस मामले में दुनिया के गरीब से गरीब देशों से भी पीछे हैं। विश्व बैंक के मुताबिक निम्न आय वर्ग में आने वाले ये देश भी अपनी जीडीपी का करीब 1.57 फीसदी अपनी जनता को स्वास्थ्य सुविधाएं देने पर खर्च करते हैं। इसका नतीजा यह है कि स्वास्थ्य संकेतकों के हिसाब से बांग्लादेश, नेपाल और लाइबेरिया जैसे देश तक हमसे आगे हैं।

इस तरह की स्थिति सामान्य हालात में भी बुरी ही कही जा सकती है। लेकिन जब आपदा जैसे हालात हों, जैसे कि कोरोना वायरस के चलते इस समय हैं, तो यह महाविनाश का कारण बन सकती है। जिस तेजी से यह संक्रमण फैल रहा है उसमें सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को ही बड़े कदम उठाने की जरूरत होती है। निजी व्यवस्था बहुत हुआ तो सहायक की भूमिका निभा सकती है।

जानकार मानते हैं कि भारत की इस समस्या की वजह पैसे की कमी नहीं बल्कि सोच है। स्वास्थ्य मंत्रालय को सलाह देने वाले नेशनल हेल्थ सिस्टम रिसोर्स सेंटर के पूर्व निदेशक टी सुंदररमन कहते हैं, ‘आदर्श रूप में देखें तो सरकार अस्पतालों में जरूरत से ज्यादा व्यवस्था होनी चाहिए। मसलन वहां हमेशा कुछ ऐसे अतिरिक्त बेड और उपकरण होने चाहिए जो सामान्य हालात में इस्तेमाल हुए बिना ही रहें।’ उनके मुताबिक इस तरह की चीजें योजनाओं में शामिल होनी चाहिए ताकि संकट के समय जब ज्यादा संसाधनों की जरूरत हो तो ये काम आएं।

भारत इस मोर्चे पर हमेशा से पीछे रहा है। लेकिन मौजूदा सरकार के कार्यकाल में तो स्थितियां और खराब हो चली हैं। टी सुंदररमन कहते हैं कि सरकारी अस्पतालों के हाल में इस गिरावट को वर्तमान सरकार ने तेज ही किया है जिसने उनके बजट में कटौती की है और ये संकेत भी दिए हैं कि वह मुनाफे के लिए इन अस्पतालों को आउटसोर्स करने के लिए भी तैयार है।

जन स्वास्थ्य अभियान की संयुक्त राष्ट्रीय संयोजक सुलक्षणा नदीं मानती हैं कि यह उस विचारधारा का नतीजा है जो मानती है कि सरकार को स्वास्थ्य सुविधाएं खुद देने के बजाय इन्हें निजी संस्थाओं से खरीदना चाहिए। वे कहती हैं, ‘सरकारी अस्पतालों को बनाने और चलाने के बजाय सरकार आयुष्मान भारत जैसी स्कीमों पर पैसा खर्च कर रही है जिनसे लोग निजी अस्पतालों से स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ लें।’ वे आगे कहती हैं, ‘लेकिन यह योजना ही गड़बड़ है क्योंकि इसके केंद्र में मुनाफा है। इसके अलावा निजी स्वास्थ्य सुविधाएं शहरों में ही केंद्रित हैं तो सरकार की इस सोच का नुकसान ग्रामीण और आदिवासी आबादी को हो रहा है।’

सुलक्षणा नंदी मानती हैं कि बदहाल सरकारी स्वास्थ्य तंत्र ने कोरोना वायरस से निपटने के मोर्चे पर भारत की तैयारी को कमजोर किया है। उनके मुताबिक फिलहाल कुछ समय के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि सरकार नियम बनाए और निजी स्वास्थ्य तंत्र उनके हिसाब से चले। वे कहती हैं, ‘जिस तरह की आपातस्थिति कोरोना वायरस ने पैदा की है उसे देखते हुए मुनाफे का सिद्ंधात कुछ समय के लिए परे रखना होगा।’

हालांकि यह उपाय भी शायद ही काफी हो। टी सुंदररमन कहते हैं, ‘अगर किस्मत से यह संकट टल जाता है तो हम एक आपदा से बच जाएंगे। लेकिन जो हाल इटली में है वो अगर यहां हुआ तो संकट असाधारण हो सकता है।’

(सत्याग्रह)

 


Date : 17-Mar-2020

जेके कर

 पिछले कई दशकों से सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियां सरकारी नीतियों के कारण बीमार हो गई है। इस दौरान कांग्रेस के अलावा जनता पार्टी, एनडीए, यूपीए की सरकारें भी सत्ता में रहीं हैं परन्तु किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि देश का आत्मनिर्भर दवा उद्योग, विदेशों पर निर्भरशील होता जा रहा है। यदि सरकारी दवा कंपनियां जैसे आईडीपीएल, एचएएल आदि मजबूत होती तथा बल्क ड्रग का देश में ही निर्माण होता तो हमें चीन का मुंह नहीं ताकना पड़ता।

चीन से शुरू हए कोरोना वाइरस महामारी की चपेट में भारतीय दवा उद्योग आ गया है। अभी इसका दुष्प्रभाव आम जनता तक नहीं पहुंता है परंतु यदि कोरोना से फैली महामारी को नियंत्रण में नहीं लिया गया तो इसका प्रभाव भारत के मरीजों पर पड़ सकता है। यहां पर हम भारत में कोरोना वाइरस का जिक्र नहीं कर रहें हैं। हम कहना चाहते हैं कि यदि चीन में इसका प्रकोप जारी रहा तो भारतीय दवा उद्योग पर संकट छा जाएगा।  हालांकि, केन्द्र सरकार ने इससे निपटने के लिए कई निर्णय लिए हैं उसके बावजूद जानकारों को आशंका है कि यह संकट इतने से नहीं टलने वाला है।

वैसे दुनिया के उन देशों के मरीजों पर इसका असर पडऩा शुरू हो गया है जो भारत से निर्यात की जाने वाली दवाओं पर निर्भर हैं। दूसरी तरफ केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा चलाए जा रहे अस्पतालों में जिन दवा कंपनियों द्वारा जीवनरक्षक तथा आवश्यक दवाओं की सप्लाई की जाती है वे समय पर सप्लाई नहीं कर पा रहें हैं तथा सरकार से मांग कर रहें हैं कि इसके लिए उन पर कोई कार्रवाई न किया जाए तथा न ही उन्हें काली सूची में डाला जाए।

सबसे जरूरी बात यह है कि भारतीय दवा उद्योग जीवनरक्षक तथा आवश्यक दवाओं का निर्माण करने के लिए चीन से आयातित होने वाले एक्टिव फॉर्मास्युटिकल्स एंडग्रीडियेंट या एपीआई तथा इंडरमीडियेट्स पर अत्याधिक रूप से निर्भर है। वैसे अमरीका, इटली तथा जर्मनी से भी बल्क ड्रग का आयात किया जाता है। चीन में कोरोना फैलने के बाद वहां की सरकार ने कई बल्क ड्रग के उत्पादन ईकाईयों को एतिहात के तौर पर बंद करा दिया है। वैसे अभी भारतीय दवा कंपनियों के पास दो-तीन माह का स्टॉक है परन्तु यदि चीन में स्थितियों में सुधार नहीं हुआ तो भारतीय दवा कंपनियां मुसीबत में पड़ सकती हैं।

चीन पर दवाओं के लिए निर्भरता का मामला साल 2016 में संसद में उठा था। भारतीय दवा कंपनियां देश में दवाओं के उत्पादन में लगने वाली 84 फीसदी बल्क ड्रग का आयात करती है जिसमें से 65 से 70 फीसदी चीन से आयात किया जाता है। यहां तक कि चीन पर दवाओं के लिए भारत की निर्भरता पर नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजऱ ने भी आगाह किया था। उसके बाद कटोच कमेटी का गठन भी किया गया था। जिसने अपनी अनुशंसा में कहा कि देश में बल्क ड्रग के निर्माण को फिर से पुनर्जीवित करने के लिये निर्माताओं को टैक्स सहित कई रियायतें दी जाए उसके बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।

आज से 20-25 साल पहले स्थिति ऐसी नहीं थी। बल्क ड्रग का हमारें देश में उत्पादन होता था तथा उसे विदेशों को निर्यात भी किया जाता था। लेकिन वैश्वीकरण की जंग में भारत इसमें पिछड़ गया। इसका कारण है कि चीन से मंगाए जाने वाले बल्क ड्रग सस्ते होने लगे। चीनी सरकार बल्क ड्रग के निर्माण करने वाली यूनिटो को कई तरह से आर्थित सहायता भी प्रदान करती है। ज्यादा मुनाफे कमाने के लिए भारतीय दवा कंपनियों ने बल्क ड्रग का उत्पादन करने की बजाए उसे चीन से आयात करना शुरु कर दिया।

सबसे दुख की बात यह है कि पिछले कई दशकों से सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियां सरकारी नीतियों के कारण बीमार हो गई है। इस दौरान कांग्रेस के अलावा जनता पार्टी, एनडीए, यूपीए की सरकारें भी सत्ता में रहीं हैं परन्तु किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि देश का आत्मनिर्भर दवा उद्योग, विदेशों पर निर्भरशील होता जा रहा है। यदि सरकारी दवा कंपनियां जैसे आईडीपीएल, एचएएल आदि मजबूत होती तथा बल्क ड्रग का देश में ही निर्माण होता तो हमें चीन का मुंह नहीं ताकना पड़ता।

गौरतलब है कि भारतीय दवा कंपनियां तकरीबन 60 एक्टिव फॉर्मास्युटिकल्स एंडग्रीडियेंट या एपीआई चीन से मंगाती रही है। जो चीन के हेनान, हुबेई, गुआनडोंग, हुनान, वुहान, झेजेंग में बनते रहे हैं।

केन्द्र सरकार ने देश में दवाओं की कमी न होने पाए इसके लिए उनके विदेशों को निर्यात करने पर रोक लगा दी है। इसके तहत डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड ने 13 दवाओं के विदेशों को निर्यात करने पर रोक लगा दी है। जिसमें बुखार की दवा, एंटी बैक्टीरिल, एंटीबायोटिक, बैक्टोरियोस्टेटिक, एंटी वाइरल तथा विटामिन शामिल हैं। इसके अलावा केन्द्र सरकार ने बल्क ड्रग के देश में ही निर्माण को प्रोत्साहन देने के लिए कई कदम उठाए हैं।

अब विदेशों को दवा निर्यात करने वाली कंपनियां सवाल कर रहीं हैं कि उन्होंने विदेशों को भेजने के लिए दूसरे नाम से जो दवा बनाए हैं उन्हें भारतीय दवा बाजार में कैसे उतारे। उलट वे मांग कर रहें हैं कि जिन दवाओं को विदेशों के लिए बनाया गया है या जो बनने के विभिन्न स्टेज पर हैं उन्हें निर्यात करने दिया जाए। उनका कहना है कि यदि वे विदेशों को कान्ट्रेक्ट के मुताबिक दवाएं नहीं भेज पाते हैं तो उन्हें काली सूची में डाला जा सकता है। जिससे भविष्य में भारत से दवाओं के निर्यात पर उल्टा असर पड़ेगा तथा विदेशी मुद्रा आना भी कम हो जायेगा।

बता दें कि सारी दुनिया में भारत को फॉर्मेसी ऑफ वल्र्ड  माना जाता है। करीब 200 देशों को भारत से दवाओं का निर्यात किया जाता है। दुनिया के कई छोटे तथा मंझोले देश ऐसे हैं जो दवाओं का निर्माण नहीं कर सकते हैं वे भारत से आयात की जाने वाली दवाओं पर ही निर्भर हैं खासकर, एड्स पीडि़त। यहां तक कि जब से अमरीका में भारतीय कंपनियों ने एड्स की दवा सस्ते दामों में उपलब्ध कराई तो मजबूरन वहां की दवा कंपनियों को भी अपने दवाओं के दाम कम करने पड़े।

इस तरह से भारत में बनने वाली दवाएं भारत के मरीजों के लिए ही नहीं विदेशी मरीजों के लिये भी आवश्यक हैं। इतना ही नहीं भारत से सस्ते दामों पर वैक्सीनों की भी विदेशों में सप्लाई की जाती है। भारत ने पिछले साल 1,47,420 करोड़ रुपयों या 20 बिलियन अमरीकी डॉलर मूल्य के मेडिकल उपकरणों सहित दवाओं का विदेशों को निर्यात किया था। स्वंय केन्द्र सरकार के औषध विभाग के अनुसार भारतीय दवा उद्योग की देश के जीडीपी में 1.75 फीसदी की भागीदारी है।

कुल मिलाकर लब्बोलुआब तीन बातों पर आकर टिक जाता है। चीन में कोरोना वाइरस, भारत फॉर्मेसी ऑफ वल्र्ड तथा देश में बल्क ड्रग का निर्माण न किया जाना। चीन तथा मानव समाज कोरोना वाइरस से छुटकारा तो पा जाएगा लेकिन उसके बावजूद सवाल रह जाएगा कि पूरी दुनिया को दवाओं की सप्लाई करने वाला भारत खुद इन दवाओं को बनाने के लिए चीन पर निर्भर है। इसके लिए भारत सरकार को निजी क्षेत्र की दवा कंपनियों के भरोसे नहीं रहना चाहिए क्योंकि कोरोना वाइरस का मामला ठंडा पड़ते ही निजी क्षेत्र की दवा कंपनिया फिर से सस्ते बल्क ड्रग के लिए उसे चीन से ही मंगाना शिरू कर देगी।

जाहिर है कि वे अपने मुनाफे को कभी कम नहीं करना चाहेंगे। कहा जाता है कि जहां से बाज़ार और मुनाफे की शुरुआत होती है वहीं पर मानवता दम तोड़ देती। इस मामले में भारतीय निजी दवा कंपनियों ने देश को एक संकट के सामने लाकर खड़ा कर दिया है।

ध्यान रहे कि जिस क्षेत्र या उद्योग में सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती है वहां निजी क्षेत्र अपनी मनमानी पर उतर आता है। याद दिला दें कि सबसे पहले बीएसएनएल ने ही मोबाइल फोन के इनकमिंग तथा रोमिंग काल को फ्री किया तथा उसके बाद ही निजी कंपनियों को मजबूरन उन्हें फ्री करना पड़ा था।

केन्द्र सरकार तथा नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजऱ यदि वाकई में इस समस्या से स्थाई रूप से निज़ात चाहते हैं तो सार्वजनिक क्षेत्र के दवा कंपनियों को पुनर्जीवित करके, उनमें निवेश करके, बल्क ड्रूग तथा एंटरमीडियेट का निर्माण शुरू कर देना चाहिए ताकि वर्तमान व भविष्य में भी जीवनरक्षक तथा आवश्यक दवाओं के लिये विदेशों की निर्भरता कम होते-होते बंद हो जाए।


Date : 16-Mar-2020

अपने मूत्र को लेकर गायें विचलित हैं...
प्रो. विनोद वर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय

एक गाय को सोशल मीडिया पर पता चला कि कुछ लोग उसके मूत्र की पार्टी कर रहे हैं। गाय ने सोचा कि यह तो सरासर गायों का शोषण है। उसने गायों के व्हाट्सएप्प ग्रुप में तुरंत मैसेज डाला कि हमारे मूत्र पर मनुष्य जाति ने कब्जा कर लिया है और वो हर जगह हमारी मूत्र करने की आजादी के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। उसने यह भी लिखा कि मनुष्य को यह अधिकार किसने दिया कि वह हमारे मूत्र द्वार के इतना नजदीक आए की निर्लजता और अश्लीलता की सभी हदें पार कर दे। 
इस पर व्हाट्सएप ग्रुप की अनुभवी गायों ने लिखा कि यह सब अफवाह है। शायद कोई मन का भ्रम हो गया है। मनुष्य भला क्यों मूत्र का सेवन करेगा। इस पर खबर देने वाली गाय ने कई वीडियो पोस्ट किए तो अन्य गायें ये सब देख कर दंग रह गईं। दृश्य भी ऐसे-ऐसे की कई मनुष्य तो सीधे ही पीने को आतुर खड़े हैं। एक वीडियो में तो मूत्र प्यासे वेटिंग लिस्ट में भी खड़ें हैं। 
एक गाय के आखिर कितना मूत्र आएगा! एक वीडियो में तो गायों को ज्यादा से ज्यादा पानी पिलाया जा रहा है, ताकि मूत्र का उत्पादन बढ़ सके। यह सब नजारा देख कर गायें घबरा गईं। उन्होंने सोचा कि अब तो आराम से, इत्मीनान से पेशाब करने जाना भी नसीब में नहीं रहा है। जब किसी जीव के मूत्रद्वार पर इतना पहरा हो तो यह एनिमल राइट्स का सवाल तो बनेगा ही। 
गायों ने अपनी जिंदगी के साथ मनुष्यों द्वारा ऐसा व्यवहार करते देख उच्च न्यायालय जाने का फैसला किया। उन्होंने एक एनिमल राइट्स के वकील के माध्यम से एक रिट पिटीशन तैयार करवाई। गायों ने जब उसे इस काम के पैसे दिए तो उसने पैसे लेने से साफ मना कर दिया। वकील ने कहा वह मुकदमा इसी शर्त पे लड़ेगा कि आने वाले दिनों का इन वादी गायों का सारा गौमूत्र इस वकील का होगा। गायों को जैसे सांप काट गया हो! मगर वो क्या करतीं ! उन्होंने वकील की शर्त मान ली और वकील ने अपने ऑफिस के बाहर बोर्ड लगा दिया। यहां उत्तर भारत की शुद्ध गायों का असली गोमूत्र 200 रूपये लीटर के हिसाब से मिलता है। होम डिलीवरी के चार्ज एक्स्ट्रा होंगे। वहां पर इतने ताजे और आंखों के सामने निकल रहे मूत्र की पार्टी करने वाले तेजी से बढ़ रहे थे। 
जब मुकदमा न्यायधीशों के समक्ष पहुंचा तो सब जगह शोर मच गया कि गायें हमारी संस्कृति के खिलाफ जा रहीं हैं। गौमूत्र पर गायों का कोई अधिकार नहीं है। गौमूत्र पर धर्म और संस्कृति का अधिकार है।  गायों की निजी जिंदगी त्यागनी होगी और उन्हें देश और संस्कृति की रक्षा के लिए मूत्र पर अपना अधिकार नहीं जताना चाहिए। अखबार , टेलीविजऩ, सभागारों, संसदों , विधान सभाओं आदि पर भी इस मुद्दे पर गहरी चर्चाएं हुईं। मनुष्य ने गायों के इस व्यवहार की भत्र्सना की और एनिमल राइट्स को विदेशी साजिश बताया। 
कुछ गौमूत्र प्यासों ने तो यहां तक कहा कि इनमें से कुछ गायें गद्दार और देशद्रोही हैं, जिन्होंने पवित्र संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर उछाला है, अत: इन्हें डिटेंशन सेंटर पर भिजवाया जाए। इस प्रकार की चर्चा से घबरा कर न्यायमूर्तियों ने रिट पिटीशन को इस बात पर खारिज कर दिया कि गायों के मालिकों को गाय के दूध के साथ-साथ उनके मूत्र और गोबर पर पूरा अधिकार है। चूंकि ये निजी सम्पति के नियमानुसार बिकी हुई गायें हैं और इनके मालिक हैं, तो इन गायों को कोई कानूनी हक नहीं है कि वो मूत्र त्याग की आजादी मांगे और इसके लिए कोर्ट तक पहुंचे। अत: यह रिट पिटीशन खारिज की जाती है। साथ में न्यायधीशों ने यह भी लिखा कि आवारा गायों को डिटेंशन सेन्टर में तीन माह की सजा काटनी होगी और उनके मूत्र, गौबर और दूध को राज्य भंडारण में जमा कराना होगा। 
गायों ने मुकदमा की फजीहत होती देख एक दूसरे की आंखों में देखा और वहां अचानक भगदड़ मच गई। सभी गायें इधर-उधर भागीं और वहां से गायब हो गईं। यह कहना अब मुश्किल है कि वे गायें कहां गायब हुईं। और यह भी बताना मुश्किल है कि बाजार में उपलब्ध गौमूत्र किस जगह से आयात किया गया है। 
भारतीय गायों ने अपनी परंपरा के अनुसार आजाद भारत में आजादी से मूत्र त्यागने के अपने अधिकार को नहीं छोड़ा। मूत्र त्याग एक जीव अधिकार है और मूत्र के लिए कटोरा लेकर खड़ा आदमी इस अधिकार का हनन करता है। ऐसा तभी होता है जब मूत्र को जांच-पड़ताल के लिए पैथोलॉजिकल लैब जाना हो ताकि रोगादि की पुष्टि हो सके।


Date : 16-Mar-2020

अब हर वर्ष अज्ञान रत्न, भय रत्न और 
घृणा रत्न सम्मान भी दिए जाने चाहिए

-अशोक वाजपेयी

हम जिस हत्यारे-हिंसक समय में रह रहे हैं उसमें सभ्यता की लय की बात करना अप्रासंगिक लग सकता है। जब दूसरों को हर तरह से घायल करना नई नैतिकता बनता जा रहा है, तब शाहीन बाग़ जैसी जगहों पर साधारण नागरिकों ने, स्त्रियों ने, बिलकुल अहिंसक ढंग से, धीरज और शान्ति से, जो प्रतिरोध किया है उसमें क्या हमें अपनी सभ्यता की लय सुनाई-दिखाई नहीं देती? अगर नहीं तो इसका यही आशय हो सकता है कि सारे शोर-शराबे में हम अपनी सभ्यता की लय भूल गए हैं।
आल्बेयर कामू, फ्रेंच लेखक और चिंतक थे, जिन पर इधर पुनर्विचार हो रहा है। और ईरानी दार्शनिक रामिनजहां बेगलू की एक पुस्तक भी 'दि अनहीरोइकहीरो आव् अवर टाइमÓ रूटेलज से आई है। कामू की चिंता सभ्यता की लय खोजने की थी जो ध्रुवांतों के बीच झूलते युद्धोत्तर यूरोप में अतिवादों के बीच खो सी गई थी। कामू को लगा था कि यूरोप ने जो चीज़ें दुनिया में हैं उनसे और जीवित मनुष्य से प्यार करना छोड़ दिया है। 
उनको लगा कि यूरोप ने जीवन से प्यार करना बंद कर दिया है। तथाकथित राष्ट्रवाद के बरक़्स कामू दोस्ती के लिए आवेग, न्याय के लिए उत्कट आग्रह, प्रेम, सत्य और आलोचना-बुद्धि पर इसरार कर रहे थे। यह इसरार, एक तरह से उन प्रतिरोधों में भी देखा जा सकता है जो देश भर में जगह-जगह हो रहे हैं। वे सिर्फ एक अन्यायी कानून के विरुद्ध अभियान भर नहीं है। वे सभ्यता की खोई हुई लय का पुनर्वास करने की चेष्टा भी हैं। भारत में तरह-तरह की सत्ताएं हर दिन तरह-तरह के 'दूसरेÓ गढऩे के एक दृष्ट और दुर्दान्त अभियान में शामिल हैं। उन्हें यह याद दिलाना ज़रूरी है कि उनके विरोधी भी सही हो सकते हैं। इस एहतराम के अभाव में न तो संवाद संभव है, न कोई हल।
महात्मा गांधी ने सभ्यता की लय को सत्य, अहिंसा, न्याय, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आदि से रूपाकार देने की कोशिश की थी। जिस तरह के ध्रुवीकरण में इस समय हम हैं उसमें सत्ता अपनी जि़द और शक्ति पर अडिग रह कर सभ्य आचरण करने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में उम्मीद की संभावना लगातार घटती जाती है। फिर भी, छोटे-छोटे मानवीय कृत्य, जो हर रोज़ सामने आते हैं वे हमें बताते रहते हैं कि अंधेरे में भी मानवीय गरमाहट, संग-साथ, मदद और सहानुभूति की नन्हीं चिनगारियां बची हुई हैं। 
इस समय वे ही सभ्यता की लय का रूपाकार हैं। विनम्र पर अदम्य भी। यह भी अलक्षित नहीं जाना चाहिये कि ये चिनगारियां साधारण लोगों के व्यवहार से प्रगट हो रही हैं। साधारणता से ही वह लय बच पा रही है। थपेड़ खाती हुई तैर रही है। साधारणता से अलग-थलग संस्थाएं लगातार इस लय को खंडित कर रही हैं।
यह दिसंबर 1975 की बात है। उस समय हिन्दी साहित्य के भी तीर्थ इलाहाबाद में मेरी पहली शाम थी। सिविल लाइन्स, जो तब इतनी जनाकीर्ण नहीं हुई थी जितनी कि आजकल है, वहां स्थित रामाज़ कैफे में हम शाम को गये थे। काफ़ी पीने। दूर की एक मेज़ पर दो-तीन और लोग बैठे थे जिनमें से एक के लंबे कुन्तल-केश आकर्षक लग रहे थे। मैं इलाहाबाद में मार्कण्डेय और कमलेश्वर द्वारा आयोजित साहित्यकार सम्मेलन में भाग लेने उसी दिन सुबह सागर से पहुंचा था।
कुछ देर बाद जब उस व्यक्ति ने थोड़ा मुंह फेरा तो लगा कि वे फणीश्वरनाथ रेणु हैं। उन दिनों साहित्य में उनके उपन्यास 'मैला आँचलÓ की बड़ी धूम थी। सागर में जो पुस्तकों की दूकानें थीं उनमें उसकी प्रतियां तब तक नहीं आई थीं। मैंने राजकमल प्रकाशन दिल्ली को तार भेजकर वीपीपी से उसकी प्रति मंगाई थी। जब मैं आश्वस्त हो गया कि वे रेणु ही हैं तो मैं उन्हें नमस्कार करने उनकी मेज़ तक गया। उनसे जो भी औपचारिक सी बात हुई वह अब याद नहीं है। उस सम्मेलन में वे दिखते रहे पर उनसे कोई बात नहीं हुई। मेरी यह रेणुजी से पहली और आखिऱी मुलाक़ात थी। इधर उनका सौवां वर्ष शुरू हुआ है और उसे व्यापक रूप से मनाने और उनके अवदान पर ध्यान एकाग्र करने के लिए अनेक शहरों में अनेक आयोजन होने की बात है।
इस सिलसिले में एक आयोजन हाल ही में दिल्ली में हुआ। अक्सर शतियां मनाते हुए कई तरह के अतिरेकों और अतिशय और अल्पपरीक्षित विश्लेषणों का सामना करना पड़ता है। कई बार लगता है कि हिन्दी में सीधा-सच्चा मूल्यांकन, बिना दो-चार को अवमूल्यित किए, हो ही नहीं पाता। एक उदाहरण इस आयोजन में भी मिला। एक वयोवृद्ध विद्वान्आलोचक ने कहा कि हिन्दी उपन्यास का कथानक प्रेमचन्द के बाद रेणु ने ही निर्णायक रूप से बदला, जैनेन्द्र कुमार और अज्ञेय ने कथानक नहीं बदला क्योंकि दोनों ही ने समाज का अवमूल्यन किया! वे चूंकि अपनी किसी पुस्तक के हवाले से यह कह रहे थे इसलिए हो सकता है कि इस निहायत निराधार लगती अवधारणा को समुचित साक्ष्य द्वारा उन्होंने प्रतिपादित करने का प्रयास भी किया हो।
रेणु ने हिन्दी उपन्यास की एक धारा को बदला इसमें कोई संदेह नहीं है। उन्होंने प्रेमचंद के गांव और उसकी मलिन धूसरता को अपने गांव, अपने अंचल की अंर्तध्वनियों, आवाज़ों, बिम्बों, बोलियों, चरित्रों, लालित्य के साथ-साथ उसके संघर्षों, अन्तर्विरोधों, राजनीतिक और सामाजिक टकरावों आदि से किसी हद तक अतिक्रमित कर और भरा-पूरा किया।  'मैला आंचलÓ हिन्दी उपन्यासों में 'गोदानÓ की ही तरह एक क्लैसिक उचित ही माना जाता है। पर उपन्यास के रूपाकार, कथानक, कथाभाषा आदि को जैनेन्द्र कुमार और अज्ञेय अपने ढंग से बदल चुके थे और ऐसी मानवीय सचाई उपन्यास के भूगोल में ले आए थे जो प्रेमचंद के भूगोल में नहीं थीं। 
इन दोनों की समाज को समझने-बखानने की अपनी स्वतंत्र दृष्टियां थीं और आप उनसे असहमत हो सकते हैं। पर उन्होंने समाज का अवमूल्यन किया यह आरोप बिलकुल निराधार है। यहां यह याद दिलाना उचित होगा कि जैनेन्द्र का उपन्यास 'त्यागपत्रÓ और अज्ञेय का 'शेखर- एक जीवनीÓ भी हिन्दी उपन्यास के बहुमान्य क्लैसिक हैं। रेणु को बड़ा बताने के लिए जैनेन्द्र-अज्ञेय को अवमूल्यित करना बौद्धिक नहीं राजनैतिक कर्म है। अर्थव्यवस्था, विकास, अपराध, हिंसक घटनाएं आदि को नापने की विधियों और पैमाने हैं। उनके बारे में विधिवत् जुटाए गए आंकड़े सामने आते रहते हैं, भले इन दिनों वे राजनैतिक हस्तक्षेप या प्रशासनिक हेर-फेर के कारण धीरे-धीरे अप्रमाणिक और अविश्वसनीय होते जा रहे हैं। भारतीय जीवन और समाज में इस समय अज्ञान, भय और घृणा की जो व्याप्ति है वह सत्ता द्वारा किये गये दांव-पेंचों के बावजूद छुप नहीं रही है। 
आम धारणा यह है कि शिखर से लेकर निचले स्तरों तक, अज्ञान बेहद मुखर और सक्रिय है। जिन्होंने शायद इतिहास एक विषय के रूप में स्कूल तक में नहीं पढ़ा वे राजनेता हमें बताते रहते हैं कि सच्चा इतिहास क्या है! इसका कोई कारगर प्रत्याख्यान, बिना भय के, हमारे इतिहास के अध्यापक और विद्वान करते हों ऐसा नजऱ नहीं आता।
इन दिनों केन्द्रीय सत्ता हर दिन कोई न कोई नया डर पैदा करती है। नया डर इन दिनों यह है कि किसी का बैंक में जमा पैसा सुरक्षित नहीं है क्योंकि बैंक मनमानी कर लाखों करोड़ रुपये के कर्ज अक्षम दौलतमंदों को देकर दिवालिया हो रहे हैं। हिन्दू मुसलमान से डरे और मुसलमान हिन्दू से यह तो महामारी की तरह फैल ही गया है। इस समय अगर निडर हैं तो दो वर्ग-पुलिस और अपराधी। 
पुलिस निडर है कि वह अपने कर्तव्य में कितनी ही कोताही क्यों न करे, साम्प्रदायिक ढंग से खुल्लम-खुल्ला व्यवहार करे, दंगाइयों को रोकने की कोशिश करने के बजाए उन्हें प्रोत्साहित और मदद करे पर उसका बाल भी बांका न होगा। अपराधी, फिर वे बलात्कारी हों, हत्यारे, गोरक्षा के नाम पर आक्रामक, निडर हैं कि उनका भी कुछ नहीं बिगड़ेगा। अगर धर ही लिए गए दुर्भाग्य से तो पुलिस तहकीतात के दौरान चूक कर सुबूत के अभाव में उन्हें बचा लेगी।
राजनेता, ख़ासकर सत्ताधारी दल के, निडर हैं कि उनके घृणा-भाषणों के कारण उन पर अव्वल तो कार्रवाई बहुत देर से होगी और होगी भी तो न्यायालय उन्हें ज़मानत इत्यादि दे देंगे और सरकार बढ़ी हुई सुरक्षा तक। डर फैल रहा है आम नागरिकों में जो दिन-ब-दिन और निहत्थे होते जा रहे हैं क्योंकि सहज सुरक्षा के उपकरण पुलिस, न्यायालय उनकी पहुंच-पकड़ से दूर जा चुके हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में, जो दरअसल अब भारत का हिंसा-बलात्कार-घृणा के मामले में सबसे बर्बर प्रदेश है, ढाई लाख बलात्कार के मामले अदालतों में लंबित है, ऐसा बताया गया है।
आपसी घृणा भी उरूज पर हैं- सम्प्रदायों, धर्मों, जातियों आदि के बीच घृणा लगातार बढ़ और बढ़ायी जा रही है। विशेषत: दलित, स्त्रियां, अल्पसंख्यक वर्ग इस घृणा के रोज़ाना शिकार हो रहे हैं। यह भी एक विडंबना है कि आर्थिक स्थिति लगातार गिर रही है। कई संवैधानिक और सार्वजनिक संस्थाएं अवनत हो रही है पर अज्ञान-भय-घृणा लगातार बढ़ रहे हैं। 
इस भयानक उपलब्धि को नापने की विधि और पैमाना होना चाहिए।  राज तो क्या करेगा, समाज ही कुछ करे! जनमतसंग्रह द्वारा यह भी तय हो कि हर वर्ष अज्ञान रत्न, भय रत्न और घृणा रत्न के अखिल भारतीय सम्मान किन्हें दिए जाएं। (सत्याग्रह)

 


Date : 14-Mar-2020

एम. इल्यास ख़ान

पाकिस्तान के एक शीर्ष मीडिया संस्थान के मालिक को कऱीब 30 साल पहले सरकारी ज़मीन पर ग़ैर-कानूनी ढंग से कब्ज़ा करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है।
मीर शकीलउर रहमान पाकिस्तान के जंग मीडिया ग्रुप के एडिटर इन चीफ़ हैं। इस ग्रुप के कुछ अख़बार पाकिस्तान में काफ़ी ज्य़ादा लोकप्रिय हैं और जियो टीवी नेटवर्क भी इसी ग्रुप का हिस्सा है।
गिरफ़्तारी को पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता इस नजऱ से देख रहे हैं कि स्वतंत्र मीडिया और राजनीतिक असहमति रखने वालों को सरकार दबाने की कोशिश कर रही है। शुक्रवार को मीर शकीलउर रहमान को अदालत में पेश किया गया। उन्होंने ख़ुद पर लगे आरोपों को बेबुनियाद बताया। अदालत ने फि़लहाल उन्हें हिरासत में भेजा है। लेकिन अब तक उन पर आरोप तय नहीं हुए।
मीर शकीलउर रहमान पर आरोप है कि उन्होंने साल 1986 में लाहौर में कई प्लॉट खऱीदे थे। इसके लिए उन्होंने ग़ैर-कानूनी रास्ता अपनाया।
पाकिस्तान की एंटी-करप्शन एजेंसी नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो का कहना है कि उस साल जब नवाज़ शरीफ़ पंजाब प्रांत के तत्कालीन मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने रहमान को तय सीमा से अधिक सरकारी ज़मीन लेने की ग़ैर-कानूनी इजाज़त दी थी।
डॉन अख़बार ने हृ्रक्च के एक अधिकारी के हवाले से लिखा कि लाहौर डेवलपमेंट अथॉरिटी की ज़मीन माफ़ी योजना के तहत उन्होंने महज चार एकड़ सरकारी ज़मीन मिल सकती थी लेकिन उन्होंने 13 एकड़ से अधिक ज़मीन मिली।
इस मामले की वैधानिकता लेकर जितने सवाल उठ रहे हैं, वैसे ही एनएबी की कार्रवाई पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या उसने अपना काम ईमानदारी से किया है? इस एजेंसी ने अक्सर उन लोगों के खिलाफ एक्शन लिया है जो सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं।
रहमान की गिरफ़्तारी पर मीडिया समूहों के अलावा मानवाधिकार समूहों और राजनीतिक विपक्षी भी सरकार की आलोचना कर रहे हैं।
पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (॥क्रष्टक्क) ने इस गिरफ़्तारी पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
एक ट्वीट में एचआरसीपी ने लिखा, इस बात के संदेह बन रहे हैं कि एनएबी का ये एक्शन चुनिंदा, एकतरफ़ा और राजनीति से प्रेरित है। जर्नलिस्ट कम्युनिटी इसे एक तरह से स्वतंत्र प्रेस को दबाने के एक और प्रयास की तरह देखती है
पाकिस्तान ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन ने कहा, जब मामले की जांच जारी है उसके बीच में एक मीडिया हाउस के एडिटर इन चीफ़ को गिरफ़्तार कर लेना।  ऐसा लगता है कि यह उत्पीडऩ का प्रयास है।
रहमान की बेटी अनामता ने इस गिरफ़्तारी को एनएबी के नियमों के मुताबिक़ भी गैरक़ानूनी बताया है।
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने, यह लड़ाई मीडिया की आज़ादी के लिए है। आज जंग के एडिटर इन चीफ़ को गिरफ़्तार किया गया है, कल कोई और भी हो सकता है।
जंग ग्रुप पाकिस्तान का सबसे बड़ा मीडिया हाउस है। किसी अन्य मीडिया हाउस के मुक़ाबले देश भर में ग्राउंड पर इसके संवाददाताओं की संख्या बहुत अधिक है। पाकिस्तान में मीडिया संस्थानों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दौर में जंग ग्रुप के शीर्ष पर होने की यह भी एक वजह है।
लाहौर में एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी से कहा, ऐसा हो सकता है कि एनएबी के आरोपों में सच्चाई हो लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं है कि एनएबी की ये कार्रवाई मनमाने ढंग से की है क्योंकि फ्रेंडली मीडिया जाने वाले कई मीडिया समूहों के मालिकों के ग़ैर-कानूनी वित्तीय कार्यों के सबूत समय-समय पर सामने आते रहे हैं लेकिन एनएबी ने कभी कोई एक्शन नहीं लिया।
प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पाकिस्तान का नाम काफ़ी नीचे आता है। मीडिया पर और अधिक पाबंदियों का दौर तब शुरू हुआ जब साल 2018 में सेना पर यह आरोप लगे कि वो आम चुनावों में धांधली करके इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई को सत्ता में लाना चाहती है। लेकिन मीडिया की आवाज़ को दबाने का काम बहुत पहले से चलता आ रहा है। साल 2014 में जियो टॉक शो के होस्ट हामिद मीर को गोली मारी गई थी जिसमें वो बुरी तरह ज़ख़्मी हुए थे।
इस हमले में किसी को भी अब तक सज़ा नहीं हुई। कई लोगों का मानना है कि उन पर हमले की वजह बलूचिस्तान प्रांत से ग़ायब हुए लोगों के बारे में की गई ज़ोरदार कवरेज है। यहां सेना ने कऱीब एक दशक तक सशस्त्र अलगाववादियों के विद्रोह का सामना किया है।
अधिकतर लोगों के लापता होने का आरोप सेना पर ही लगा। पाकिस्तानी मीडिया ने इस मामले को दिखाना ही बंद कर दिया।
साल 2017 में धार्मिक समूहों और पाकिस्तान की ताक़तवर सेना की आलोचना करने वाले कई सोशल मीडिया ब्लॉगर कई हफ़्तों के लिए ग़ायब हो गए। कुछ समय बाद जब उन्हें छोड़ा गया को उनमें से अधिकतर विदेश चले गए। उसी साल जाने-माने पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट ताहा सिद्दीक़ी पर, जिन्हें सैन्य प्रशासन ने कई बार चेतावनी दी थी, इस्लामाबाद में सरेआम हमला हुआ। 
वो किसी तरह वहां से भागने में कामयाब रहे लेकिन उस घटना के बाद उन्होंने देश छोड़ दिया और अब फ्ऱांस में रह रहे हैं। साल 2018 के बाद से मीडिया पर और अधिक सेंसरशिप लागू है।
इसमें पत्रकारों को धमकी देना, थोड़े वक़्त के लिए या पूरी तरह किसी टीवी चैनल को बंद कर देना या केबल ऑपरेटरों को उन चैनलों को बढ़ावा न देने के लिए प्रभावित करना ताकि बहुत कम लोग उन चैनलों को देखें, तक शामिल है।
पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ़ ने एनएबी की शुरुआत साल 2000 में की थी। इसका मक़सद भ्रष्ट नेताओं, अफसरों और कारोबारियों को पकडऩा था। लेकिन इसके कामों को देखते हुए यह साफ़ होने लगा कि मुशर्रफ़ इसका इस्तेमाल अपनी दो बड़ी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पार्टियों के पर कतरने के लिए कर रहे हैं।
पहली पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (क्करूरु-हृ) थी जिसे एक साल पहले सैन्य तख़्तापलट में मुशर्रफ़ ने सत्ता से बाहर किया था और दूसरी थी- पाकिस्तान पीपल्स पार्टी ।
इस दशक के मध्य में एनएबी ने ऐसे रास्ते खोज लिए जिनके ज़रिए वो उन नेताओं के ख़िलाफ़ लगे भ्रष्टाचार के मामले हटा देती थी जो इन दोनों पार्टियों को छोडक़र जनरल मुशर्रफ़ की अगुआई वाली पार्टी में शामिल हो जाते थे या इससे गठबंधन कर लेते थे।
साल 2018 में हुए चुनाव विवादों में घिरे रहे हैं, जिसमें इमरान ख़ान को सत्ता मिली है। एजेंसी ने विपक्षी पार्टियों के नेताओं को गिरफ़्तार किया और लंबे समय तक हिरासत में रखा। सरकार के विरोधियों का कहना है कि कोर्ट में ऐसे सबूत पेश करना अभी बाक़ी है जो क़ानून की कसौटी पर खरे उतरें। (बीबीसी)

 

 


Date : 14-Mar-2020

अल्बर्ट आइंस्टीन की जयंती

28 सितंबर, 1949 को गाइ रेनर जूनियर को लिखे अपने पत्र में आइंस्टीन ने कहा था- ‘मैं नास्तिक नहीं हूं।  लेकिन व्यक्तिपरक ईश्वर का विचार मुझे बचकाना लगता है। इसलिए आप मुझे अज्ञेयवादी कह सकते हैं।  लेकिन पेशेवर नास्तिकों के यौद्धिक तेवर के बजाए मैं उस विनम्रता को धारण करना पसंद करूंगा जो प्रकृति के बारे में और हमारे अपने अस्तित्व के बारे में हमारी अपनी बौद्धिक समझ की कमजोरी से जुड़ा हुआ है।’
तबसे करीब 19 साल पहले 14 जुलाई, 1930 को आइंस्टीन ने बर्लिन स्थित आवास पर कविगुरु टैगोर का स्वागत किया था। दोनों के बीच ब्रह्मांड और मानवता के अस्तित्व पर गहन दार्शनिक चर्चा चली थी।
सवाल सारे आइंस्टीन के थे और जवाब कविगुरु टैगोर के। दोनों आखिरकार इस बात पर सहमत हुए कि जो सत्य आइंस्टीन को विज्ञान के जरिए समझ में आया है, वही सत्य कविगुरु को कला, साहित्य और आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से समझ में आया है। उस वार्तालाप पर विस्तार से बातचीत फिर कभी। लेकिन तबसे कोई आठ साल पहले 1922 में कविगुरु ने अपनी पुस्तक ‘क्रिएटिव यूनिटी’ में लिखा था- ‘विश्व की व्याख्या एक भौतिक संरचना के रूप में करने में विज्ञान अपनी उपयोगिता पाता है, लेकिन बिल्कुल उसी तरह जिस तरह कि किसी कविता के छंद-विन्यास की विवेचना में व्याकरण अपनी वैधता पाता है। एक सृष्टि के रूप में विश्व केवल एक संरचना मात्र नहीं है, यह केवल छंद-विन्यास मात्र नहीं है। यह एक पूरी कविता है। हालांकि जब हमारे दिमाग पर केवल व्याकरण का ही आधिपत्य हो जाता है, तब हम कविता की वास्तविक महिमा को भूलने लगते हैं।’
आज जब आंखों से न दिखने वाले एक सूक्ष्म विषाणु से पूरी मानवजाति भयभीत हो चली है और उसका तात्कालिक समाधान ढूंढऩे के लिए विज्ञान के व्याकरणिक विन्यासों में उलझ-पुलझकर छटपटा रही है, तब भी आइंस्टीन की एक बात याद आती है- ‘जिस मानसिकता ने समस्याओं को जन्म दिया है, उसी मानसिकता से उनका समाधान नहीं किया जा सकता।’ 

 

 


Date : 14-Mar-2020

राजेन्द्र धोड़पकर

2001 में जब स्टीफन हॉकिंग भारत आए थे तो दिल्ली के सिरी फोर्ट सभागार में उनका भाषण सुनने का सौभाग्य मुझे भी मिला था। जब हम सभागार के बाहर पहुंचे तो वहां लंबी-लंबी लाइनें लगी हुई थीं। मेरे साथ जो मित्र थे, वे उन दिनों एक अख़बार के संपादक थे। उनके संवाददाता के रसूख़ की वजह से हमें आगे के ऐसे दरवाजे से घुसने का मौक़ा मिल गया जो श्रोताओं के लिए बंद था। साथ ही बहुत आगे की पंक्ति में बैठने का मौका भी मिल गया।
स्टीफन हॉकिंग मंच पर अपनी बिजली से चलने वाली पहियेदार कुर्सी पर बैठे आए। तब उनके शरीर में चेहरे की कुछ मांसपेशियों के अलावा एक हाथ की छोटी अंगुली की कुछ मांसपेशियां काम कर रही थीं। उसी अंगुली से सेंसर जुड़े होते थे जिससे वे अपनी पहियेदार कुर्सी चलाने के अलावा लिखना, पढऩा और ‘बोलने’ का काम करते थे। वे अपनी आवाज भी करीब 25 साल पहले खो चुके थे। उन्हें जो कहना होता, वे अपनी अंगुली के जरिये कंप्यूटर पर लिखते जो एक यांत्रिक आवाज़ में तब्दील हो जाता। उनका भाषण भी उसी यांत्रिक आवाज़ में हुआ।
हम जैसे लोग, जो विज्ञान तो पढ़े हैं लेकिन ऊंचे स्तर की भौतिकी नहीं पढ़े, उनके लिए भी वह भाषण पूरा समझना नामुमकिन था, जबकि वह बहुत तकनीकी जटिलताओं से भरा नहीं था। सभागार में शायद बहुत ज्यादा लोगों को वह भाषण उतना भी समझ में नहीं आया था, लोग उनके विचार सुनने कम, उन्हें देखने ज्यादा आए थे। उनकी किताब ‘ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम’ के बारे में भी कहा जाता है कि वह सबसे ज्यादा बिकी, लेकिन सबसे कम पढ़ी गई किताब है। लेकिन यह कोई बुरी नहीं बल्कि अच्छी बात है। अगर लोग स्टीफऩ हॉकिंग जैसे लोगों को देखने के लिए उमड़ते हैं और वे ‘सेलिब्रिटी’ हैं तो यह बताता है कि इस दौर में भी हमारे समाज में ज्ञान के साधकों के लिए सम्मान है। इससे कुछ तो आशा बंधती है।
हमारा वक्त विज्ञान के, खास तौर पर भौतिक विज्ञान के नजरिए से एक संक्रमण का दौर है। एक ओर भौतिकी एक ऐसे दौर में पहुंच गई है कि लोग ‘भौतिकी के अंत’ की बात करने लगे हैं। इसकी वजह यह है पिछले कई दशकों से भौतिक विज्ञान जैसे एक चक्र में घूम रहा है।  आमतौर पर इन दिनों नोबेल पुरस्कार भी ऐसी खोजों पर मिल रहे हैं जो दशकों पहले हुई थीं, या बहुत पुरानी अवधारणाओं के प्रायोगिक सबूत मिलना बड़ी ख़बर हो रहा है। अगर पिछले सालों की सबसे बड़ी उपलब्धियों की चर्चा की जाए तो पहली होगी लार्ज हेड्रॉन कोलाइडर (एलएचसी) के जरिए हिग्स बोसॉन के होने का सबूत, जिसकी अवधारणा 50 साल पहले पीटर हिग्स ने सामने रखी थी।
दूसरी ‘लेगो’ के जरिए गुरुत्वाकर्षण तरंग के अस्तित्व का प्रमाण, जिसका प्रतिपादन सौ साल पहले आइन्स्टाइन ने किया था। इन दिनों भौतिक विज्ञान कुछ ऐसी जगहों पर जाकर उलझ गया है जिसके आगे रास्ता सूझ नहीं रहा है। कई तरह की अवधारणाएं और सूत्र सामने आ चुके हैं, लेकिन उनमें से कोई भी आज की गुत्थियों को पूरी तरह सुलझाता नहीं लगता या उसके सत्य होने का प्रमाण पाना मुमकिन नहीं लगता। विज्ञान को ऐसी उलझन में डालने का काफी कुछ श्रेय स्टीफन हॉकिंग की सबसे बड़ी खोज हॉकिंग पैरॉडॉक्स या इन्फ़ॉर्मेशन पैरॉडॉक्स को है जिसने आधुनिक विज्ञान के दो आधारस्तंभों, सापेक्षतावाद और क्वांटम मैकेनिक्स के बीच अंतर्विरोध को गहरा कर दिया।
हॉकिंग पैरॉडॉक्स के मुताबिक़ ब्लैक होल से लगातार विकिरण उत्सर्जित होता रहता है जिसके चलते वह एक समय पर पूरी तरह नष्ट हो जाता है। यह बात क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों के विरुद्ध है जिसके मुताबिक़ कोई ‘सूचना’ कभी भी नष्ट नहीं हो सकती। आधुनिक भौतिकी की सबसे बड़ी चुनौतियों मे से एक इस पैरॉडॉक्स या विरोधाभास को सुलझाना है।
लेकिन इस तरह अंधे छोर पर आ जाने का एक मतलब यह नहीं है कि आगे कोई रास्ता नहीं है। इसका ज्यादा संभव अर्थ यह है कि विज्ञान में मौजूदा सैद्धांतिक ढांचे के ज़रिये यहीं तक पहुंचा जा सकता था और अब कोई ऐसी राह खोजी जाए जो विज्ञान की दिशा बदल दे जैसे बीसवीं सदी के शुरू में हुआ था। उन्नीसवीं सदी के अंत में भी यही कहा जाने लगा था कि अब विज्ञान का अंत हो गया है क्योंकि क्लासिकी भौतिकी से जितनी दूर पहुंचा जा सकता था उतना पहुंचा जा चुका था। तभी सापेक्षतावाद और क्वांटम भौतिकी ने सारे विज्ञान को बदल डाला।
आइंस्टाइन अगर इस क्रांति का सूत्रपात करने वाले थे तो स्टीफन हॉकिंग उसे उस तार्किक परिणति तक पहुंचाने वाले प्रमुख लोगों में से थे, जहां एक नई क्रांति की शुरुआत हो सकती है। यह भी प्रासंगिक ही है कि वे ब्लैक होल पर काम करते रहे जिसके बारे में कहा जाता है कि जहां पहुंचकर कुछ भी वापस नहीं आता। 
हॉकिंग मानते थे कि ऐसा नहीं है। आखिरी दिनों में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं मानना चाहिए कि अगर आप ब्लैक होल में चले गए तो सब कुछ ख़त्म हो गया, वहां से निकलने का रास्ता हो सकता है। उनका कहना था कि शायद ब्लैक होल दूसरे ब्रह्मांडों के द्वार हैं, ब्लैक होल में गई चीज़ें दूसरे ब्रह्मांडों में चली जाती हैं।
यह शायद उनके जीवन का निचोड़ भी था कि जहां अंत दिखता है, वहां शायद एक नई शुरुआत होती है।


Date : 13-Mar-2020

निधि राय
कोरोना वायरस का असर क्या भारतीय बाजार पर पड़ेगा? इस सवाल का छोटा-सा जवाब है, हां। संयुक्त राष्ट्र की कांफ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवेलपमेंट ने खबर दी है कि कोरोना वायरस से प्रभावित दुनिया की 15 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत भी है।
चीन में उत्पादन में आई कमी का असर भारत से व्यापार पर भी पड़ा है और इससे भारत की अर्थव्यवस्था को करीब 34.8 करोड़ डॉलर तक का नुक़सान उठाना पड़ सकता है। यूरोप के आर्थिक सहयोग और विकास संगठन यानी ओईसीडी ने भी 2020-21 में भारत की अर्थव्यवस्था के विकास की गति का पूर्वानुमान 1.1 फीसदी घटा दिया है।
ओईसीडी ने पहले अनुमान लगाया था कि भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.2 फीसदी रहेगी लेकिन अब उसने इसे कम करके 5.1 फीसदी कर दिया है।
भारत सरकार, देश की जनता को ये भरोसा दिला रही है कि उन्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं। हालांकि, विपक्षी दलों ने कोरोना वायरस के भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव के बारे में सरकार से सवाल पूछने शुरू कर दिए हैं।
तेलुगू देशम पार्टी के सांसद जयादेव गल्ला ने इस बारे में अपनी चिंता लोकसभा में जताई थी। गल्ला ने कहा था,हमें ये बात समझनी होगी कि कोरोना वायरस से हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा। 
किन सेक्टरों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ा?
दवा कंपनियां
ये केवल फार्मा कंपनियों की आमदनी का मामला नहीं है। किसी भी बुरे प्रभाव की एक मानवीय क़ीमत भी होती है। मेडिकल स्टोर में दवाओं की कमी हो रही है। तमाम बड़े शहरों में केमिस्ट, सैनिटाइजर और मास्क के ऑर्डर तो दे रहे हैं लेकिन उन्हें एक हफ्ते से माल की डिलिवरी नहीं मिल पा रही है। अब जब बहुत से भारतीय अपने यहां दवाएं, सैनिटाइजर और मास्क जमा कर रहे हैं, तो ये सामान अधिकतम खुदरा मूल्य से भी अधिक दाम पर बिक रहे हैं।
मुंबई के मलाड इलाके में स्थित जेके मेडिकल के हेमंत येवाले ने बीबीसी को बताया, हमने एन-95 मास्क के ऑर्डर पिछले हफ़्ते ही दिए थे लेकिन हमें वो मास्क अब तक नहीं मिल सके हैं। यही हाल सैनिटाइज़र्स का है। हमारे पास छोटी बोतलें नहीं हैं। इस हफ़्ते सैनिटाइजर्स और मास्क की मांग और बढ़ गई है और मुझे लगता है कि आने वाले समय में ये मांग और बढ़ेगी।
मुंबई के खार इलाके में स्थित नोबल प्लस फार्मेसी के बिछेंद्र यादव भी हमें यही बातें बताते हैं। बिछेंद्र यादव कहते हैं, हमारे पास मास्क तो हैं लेकिन इन पर ये नहीं लिखा है कि ये एन-95 मास्क हैं। फिर भी लोग इन्हें खऱीद रहे हैं। हमारे पास सैनिटाइजर्स की 500 मिलीलीटर की बोतले हैं लेकिन, नया स्टॉक आ नहीं रहा है। हमने बहुत-सा स्टॉक बेच दिया है। फिर भी, लोगों की मांग कम नहीं हो रही है।
मुंबई के ही धवल जैन ने शुक्रवार को दोपहर बाद का पूरा समय बांद्रा इलाक़े में स्थित तमाम मेडिकल स्टोर्स में मास्क तलाशने में ही ख़र्च किया। धवल कहते हैं, मैं आमतौर पर ख़ुद को प्रदूषण से बचाने के लिए मास्क पहनता हूं। लेकिन अब वही मास्क मुझे तीन गुनी ज़्यादा कीमत पर मिल रहे हैं। मैं ये कीमत भी देने को तैयार हूं, पर मुझे वो मास्क नहीं मिल रहे हैं। किसी मेडिकल स्टोर पर मास्क है ही नहीं। मैंने एन-95 मास्क का ऑर्डर ऑनलाइन दिया था। उन्होंने कहा था कि ये सोमवार को पहुंचेगा लेकिन अब ये हफ़्ता खत्म होने को है और मुझे वो मास्क अब तक नहीं मिला है।
थोक ऑनलाइन कारोबार की सबसे बड़ी भारतीय कंपनी ट्रेड इंडिया डॉट कॉम  के अनुसार, पिछले तीन महीनों में सैनिटाइजर और मास्क की मांग में 316 फीसदी का इजाफा हो गया है। ट्रेड इंडिया के सीओओ संदीप छेत्री ने बीबीसी को बताया, भारत के मैन्यूफैक्चरिंग उद्योग ने इस मांग को पूरा करने के लिए अपना उत्पादन कई गुना बढ़ा दिया है। ऐसे अन्य निजी सुरक्षात्मक उत्पादों की मांग भारत में भी बढ़ रही है और बाक़ी दुनिया में भी। तो मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर इसका फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रहा है।
भारत, जेनेरिक दवाओं का दुनिया भर में सबसे बड़ा सप्लायर है। चीन में उत्पादन बंद होने से भारत ने ऐहतियाती कदम उठाते हुए कुछ दवाओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है ताकि भारत को अपनी जरूरत पूरी करने में कोई कमी न हो। इसीलिए पैरासेटामॉल, विटामिन क्च1, क्च6 और क्च12 के साथ-साथ अन्य एपीआई और फॉर्मूलों की दवाओं के निर्यात पर पाबंदियां लगाई गई हैं।
केंद्रीय जहाजऱानी, रसायन और उर्वरक मंत्री मनसुख मंडाविया ने कहा, देश में दवाओं की कमी होने से रोकने के लिए एक टास्क फ़ोर्स बनाने का सुझाव दिया गया है। मंत्रियों का एक स्थायी समूह लगातार स्थितियों का आकलन कर रहा है। हम एक्टिव फार्मास्यूटिकल इन्ग्रेडिएंट्स और इंटरमीडियरी का निर्यात भी करते हैं और आयात भी। अगर निर्यात जारी रहता है, तो कुछ एपीआई के मामलों में भविष्य में भारत में संकट खड़ा होने की आशंका है। इसीलिए हमने थोड़े समय के लिए ऐसे एपीआई के निर्यात पर पाबंदियां लगाई हैं, जो कोरोना वायरस के इलाज में काम आ सकती हैं।
पर्यटन उद्योग
कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते, जब से आने-जाने में पाबंदियां लगी हैं, एहतियात के लिए दिशा-निर्देश और एडवाइजऱी जारी की गई हैं, तब से अश्विनी कक्कड़ का फोन बजना बंद नहीं हुआ है। उन्हें लगातार कॉरपोरेट ग्राहकों और व्यक्तिगत कस्टरमर के फोन आ रहे हैं। फोन करने वाले या तो अपना सफर रद्द करना चाहते हैं या फिर आगे के लिए स्थगित करना चाहते हैं। अश्विनी कक्कड़ पिछले तीस बरस से पर्यटन के कारोबार में हैं। वो कहते हैं कि उन्होंने कभी भी अपने कारोबार में इतना बुरा वक्त नहीं देखा।
वो बताते हैं, मैंने अपनी जि़ंदगी में इससे बड़ी मेडिकल इमरजेंसी अब तक नहीं देखी। इसके आगे सार्स मार्स और स्वाइन फ्लू का संकट कुछ भी नहीं है। जितना बुरा असर कोरोना वायरस का हुआ है, उतना किसी बीमारी के प्रकोप से नहीं हुआ। बाहर जाने वाले कम से कम 20 फीसदी टूर या तो कैंसिल कर दिए गए हैं या फिर आगे के लिए टाल दिए गए हैं। आने वाले तीन महीनों में 30 फीसदी कॉरपोरेट यात्राओं पर इसका प्रभाव पडऩा तय है। इनमें से अधिकतर या तो अपनी यात्राएं रद्द कर देंगे, या अभी स्थगित कर देंगे। इसके बाद हमें और भी कोशिशें करनी पड़ेंगी।
अश्विनी कक्कड़ ने ये भी कहा, भारत आने वाले पर्यटकों की यात्राओं का अनुमान लगाना भी बहुत मुश्किल है। क्योंकि सरकार हर रोज नई नीति की घोषणा कर रही है और हमें पता नहीं है कि आगे किन और देशों के नागरिकों के भारत आने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। एहतियात के तौर पर सरकार ने कोरिया और इटली से आने वाले लोगों को कहा है कि वो अपनी यहां कि आधिकारिक लैब से इस बात का प्रमाणपत्र लेकर आएं कि वो कोरोना वायरस से संक्रमित नहीं हैं।
स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी एक प्रेस रिलीज़ के अनुसार, इटली, ईरान, दक्षिण कोरिया और जापान के नागरिकों को जो भी वीजा और ई-वीज़ा 3 मार्च 2020 या उससे पहले जारी किए गए हैं और जिन्होंने अभी भारत में प्रवेश नहीं किया है, वो सभी वीजा तत्काल प्रभाव से निलंबित किए जाते हैं। सरकार ने नागरिकों को ये भी सलाह दी है कि वो चीन, इटली, ईरान, रिपब्लिक ऑफ कोरिया, जापान, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी की यात्रा तब तक न करें, जब तक ये बहुत जरूरी न हो। सरकार नियमित रूप से यात्रा से जुड़े दिशा-निर्देश अपडेट कर रही है। इससे सफऱ पर निकलने वालों के बीच अनिश्चितता का माहौल है।
अश्विनी कक्कड़ ने बताया, होटलों के कमरों की ऑक्यूपैंसी में 20 से 90 फीसदी तक की गिरावट आ गई है। दुनिया भर में बहुत से अंतरराष्ट्रीय आयोजन रद्द किए जा रहे हैं। सबसे बुरा असर तो डेस्टिनेशन वेडिंग पर पड़ा है।
हाल ही में शादी करने वालीं पीआर अधिकारी अनु गुप्ता, लंबे हनीमून पर थाईलैंड जाने की योजना बना रही थीं लेकिन वायरस के प्रकोप के चलते उन्हें अपनी योजना रद्द करनी पड़ी।
अनु कहती हैं, मेरी ये पहली विदेश यात्रा होती। हमने सभी टिकट बुक कर लिए थे। होटल में बुकिंग कर ली थी। घूमने जाने का प्लान बना लिया था। लेकिन अब हम नहीं जा सकते। और मुझे तो ये भी नहीं पता कि हमारा पैसा वापस भी आएगा या नहीं।
ट्रैवेल ऐंड टूरिज़्म काउंसिल और ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स, विश्व के पर्यटन उद्योग पर कोरोना वायरस के प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं। उनके शुरुआती आकलन इशारा करते हैं कि कोरोना वायरस की महामारी से दुनिया के पर्यटन उद्योग को कऱीब 22 अरब डॉलर का नुक़सान होगा। इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (ढ्ढ्रञ्ज्र) का अनुमान है कि विमानन उद्योग को यात्रियों से होने वाले कारोबार में कम से कम 63 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है। इस अनुमान में माल ढुलाई के व्यापार को होने वाला नुकसान शामिल नहीं है।
पर्यटन उद्योग पर कोरोना वायरस का जो एक और बुरा प्रभाव पड़ रहा है, वो है कि वायरस के संक्रमण के डर से बहुत से आयोजन रद्द हो रहे हैं, बहुत से जश्न टाले जा रहे हैं। बाहर से आने वाले यात्री और यहां से बाहर जाने वाले लोग, दोनों ही अपनी यात्राएं रद्द कर रहे हैं।
सीएआईटी  के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने मीडिया को जारी एक बयान में कहा, "अलग-अलग व्यापार संगठनों द्वारा देश भर में आयोजित किए जाने वाले कऱीब 10 हज़ार कार्यक्रम रद्द कर दिए गए हैं।
हाल ही में भारत में होने वाले जो प्रमुख आयोजन रद्द किए गए हैं, उनमें से कुछ इस तरह हैं-
ऑटोमोबाइल उद्योग
सोसाइटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्यूफैक्चरर्स का कहना है कि भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग में कऱीब 3.7 करोड़ लोग काम करते हैं। भारत में ऑटो उद्योग पहले से ही आर्थिक सुस्ती का शिकार था। अब चीन में मंदी के कारण भारत के ऑटो उद्योग को भी कल-पुजऱ्ों की किल्लत हो रही है।
निर्मल गर्ग, पश्चिम बंगाल में एक ऑटो डीलर हैं। राज्य भर में उनके चार शो-रूम हैं। निर्मल गर्ग कहते हैं, हर गुजऱते दिन के साथ हालत बिगड़ती ही जा रही है। हम पहले ही मंदी के दौर से गुजऱ रहे थे और अब तो लोग भविष्य को लेकर और भी आशंकित हैं। इसीलिए वो एक नई कार में पैसा नहीं लगाना चाहते हैं। ऑटोमोटिव कम्पोनेंट मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के महानिदेशक विनी मेहता ने बीबीसी को बताया कि अभी तो घबराहट की स्थिति नहीं है।
विनी मेहता कहते हैं, हम अभी तो घबराहट के शिकार नहीं हैं लेकिन चिंतित ज़रूर है। बाज़ार के बड़े खिलाडिय़ों ने हमें बताया है कि उनके पास अभी मार्च तक का स्टॉक है। अगर अप्रैल में चीन से सामान की सप्लाई नहीं शुरू होती, तो हालात चिंताजनक हो सकते हैं। तब हमें स्थानीय स्तर पर अपने लिए नए विकल्प तलाशने शुरू करने होंगे।
ऑटो उद्योग की कई बड़ी कंपनियों ने कहा है कि उन्हें कल-पुजऱ्ों की आपूर्ति में परेशानी उठानी पड़ रही है। टाटा मोटर्स, टीवीएस मोटर्स, हीरो मोटर कॉर्प और बजाज ऑटो ने कहा है कि वो कोरोना वायरस के प्रभावों पर अपनी नजऱ बनाए हुए हैं।
एक और उद्योग जो कोरोना वायरस के प्रकोप से प्रभावित है, वो है जवाहरात और जूलरी का कारोबार। कोरोना वायरस से इस सेक्टर को कऱीब सवा अरब डॉलर का नुक़सान होने की आशंका है।
भारत के तराशे और पॉलिश किए हुए हीरों के निर्यात के सबसे बड़े केंद्र चीन और हॉन्ग कॉन्ग हैं और इन दोनों ही जगहों पर वायरस का बहुत बुरा असर पड़ा है।
कीर्ति शाह, सूरत स्थित हीरा तराशने वाली कंपनी, नेकलेस डायमंड के संस्थापक हैं।
कीर्ति शाह ने बीबीसी को बताया, हमारे पास ऐसे बहुत से छोटे-मोटे कारोबारी हैं, जो हीरे और जवाहरात तराश कर हमें देते हैं और हम उन्हें भुगतान करते हैं। हमें चीन और हॉन्ग-कॉन्ग से कोई भुगतान नहीं मिल रहा है। हम इन जगहों पर अपने ग्राहकों से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं। ये बहुत बड़ी चुनौती है। हम अपने छोटे सप्लायर्स को भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। दोनों ही तरफ़ पैसा अटका हुआ है। कीर्ति शाह ने कहा कि कारोबारियों के पास अपने कर्मचारियों को देने के लिए भी बहुत पैसा नहीं है। अगर बाज़ार के ऐसे ही हालात रहे, तो उनके लिए धंधा करना बहुत मुश्किल होगा।
इसी तरह जेम ऐंड जूलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के उपाध्यक्ष कॉलिन शाह ने बीबीसी को बताया, इन परिस्थितियों के चलते भारत के हीरे और जवाहरात के पूरे उद्योग को एक अरब डॉलर का और भी घाटा उठाना पड़ सकता है क्योंकि इनके निर्यात के प्रमुख केंद्र वायरस के प्रकोप के शिकार हैं। (बीबीसी)

 

 


Date : 13-Mar-2020

विष्णु नागर
हम पर फालतू की खुशियां और फालतू के गम बहुत लाद दिए जाते हैं और हमारी भी खासियत यह है कि हम खुशी-खुशी उन्हें अपने ऊपर लदवा भी लेते हैं। किसी और देश से भारत की क्रिकेट टीम फाइनल में आकर भी हार जाए तो हम पर वज्रपात हो जाता है और जीत जाएं तो खुशी के मारे हम पागल हो जाते हैं। और पाकिस्तान से जीत -हार तो हमारी या तो नाक कटवा देती है या इतनी ऊंची करवा देती है कि नाक अपनी जगह बदलकर सिर पर चिपक जाती है।
अब हमें यह भी हौले से सिखाया जा रहा है कि हम  मुकेश अंबानीजी के सेंसेक्स की गिरावट या ऊपर चढ़ जाने से उनके एशिया के सबसे बड़े धनी आदमी बन जाने या नंबर दो हो जाने पर रोएँ या हँसें। क्यों रोएं, क्यों हंसें? हमारे अपने गम कम हैं क्या?
और मेरी बला से जैक मा एशिया के सबसे धनी आदमी बने या मुकेश अंबानी, या कोई और। क्या फर्क पड़ता है? हमारी संपत्ति को प्यार से, हमारे सहयोग से लूटकर ही तो कोई इतना बड़ा या इनसे बड़ा या इनसे छोटा बनता है! होना तो यह चाहिए कि यह लूट बंद हो मगर बिल्ली के गले में घंटी बाँधे कौन? 
मोदीजी हों या मनमोहनजी थे या उनसे पहले के जी या साहब थे, सब हमारे नहीं, इनके हितचिंतक रहे हैं, रहे थे और रहेंगे। इन्हें ये कुछ भी इनकी और अपनी इच्छा से लुटाकर इनके हाथ पर धर देंगे। जब मुकेश अंबानी के पिताश्री जीवित थे, सुनते थे कि बजट में इनकी सुविधा और लाभ के लिए बजट में इस तरह की व्यवस्थाएं की जाती थीं कि बहुत जानकार ही समझ पाते थे कि यह अंबानीजी के लिए किया गया है। अंबानीजी अवश्य बजट के बाद प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को धन्यवाद देते होंगे और वित्त सचिव को भी, जिनके सक्रिय सहयोग के बगैर यह संभव नहीं होता। बाद में एक पर एक सरकारी कंपनियां इन्हें लुटाई जाने लगीं। एक मंत्रालय ही बना दिया गया अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में-विनिवेश मंत्रालय। इसके मुखिया आज के मोदी विरोधी अरुण शौरी होते थे।
मोदीजी तो खैर दोनों हाथों और दोनों पैरों से भी सारे पूंजीपतियों को लुटा रहे हैं और हमें हिन्दू-मुस्लिम परोस रहे हैं और हम खुश हैं कि हिंदू स्वाभिमान लौट रहा है! भला अंबानी-अडाणी का हो रहा है और ज्योतिरादित्य को मोदीजी के हाथों देश सुरक्षित नजर आ रहा है। देश और सुरक्षित हो जाएगा, जब सिंधिया जी भी हिंदू -मुसलमान शुरू कर देंगे।

 


Date : 13-Mar-2020

कृष्णकांत
यूपी सरकार ने पहले हाईकोर्ट में डांट खाई, फिर सुप्रीम कोर्ट गई और वहां भी डांट खाई। ऐसा मुख्यमंत्री और प्रशासन की गैनकानूनी हठधर्मिता के चलते हो रहा है। सरकार ने प्रदर्शन करने वाले कुछ समाजसेवियों और आम लोगों के 100 पोस्टर लगवाए थे। हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया और सरकार को कानून के दायरे में रहने की नसीहत दी। लेकिन हठधर्मी सरकार नहीं मानी। वह हाईकोर्ट को चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। वहां भी वही हुआ। पहले सौ प्याज, फिर सौ जूता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूपी सरकार की यह कार्रवाई कानूनन सही नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अगर दंगा-फसाद या लोक संपत्ति नष्ट करने में किसी खास संगठन के लोग सामने दिखते हैं तो कार्रवाई अलग मुद्दा है, लेकिन किसी आम आदमी की तस्वीर लगाने के पीछे क्या तर्क है?
कोर्ट ने कहा कि जनता और सरकार में यही फर्क है कि जनता कई बार कानून तोड़ते हुए भी कुछ कर बैठती है, लेकिन सरकार पर कानून के मुताबिक ही चलने और काम करने की पाबंदी है। फिलहाल कोई कानून आपको सपोर्ट नहीं कर रहा। अगर कोई कानून है तो बताइए?
सरकार ने इसे निजता का अधिकार और राजकीय संपत्ति के नुकसान का मुद्दा बनाया तो सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक न लगाते हुए इस मामले को बड़ी बेंच को सौंप दिया है। हालांकि, अभी सरकार को राहत नहीं मिली है। अब इस मामले को चीफ जस्टिस देखेंगे। अब यूूपी सरकार को 16 मार्च तक यह सारे पोस्टर हटाने होंगे।  लेकिन सवाल यह है कि सरकार किस बात का मुकदमा लड़ रही है? क्या सुप्रीम कोर्ट निजता के अधिकार को रद्द कर देगा? क्या सुप्रीम कोर्ट विरोध और प्रदर्शन के अधिकार को रद्द कर देगा? क्या सुप्रीम कोर्ट यह कह देगा कि यूपी के मुख्यमंत्री की मर्जी को ही कानून माना जाएगा? यूपी सरकार को यह क्यों लगता है कि उनके कहने पर कोर्ट और जनता यह मान लेगी कि एक रिटायर्ड अधिकारी, एक बुजुर्ग, एक समाजसेवी दंगाई है? क्या वे यह साबित कर लेंगे कि सदफ जफर और दीपक कबीर जैसे सुलझे लोगों को वे दंगा करने और सार्वजनिक संपत्ति जलाने वाला साबित कर ले जाएंगे?
सरकार की इस हठधर्मिता से राज्य का प्रशासन दोहरी फजीहत का सामना कर रहा है। पुलिस अधिकारी यह बात पहले से जानते होंगे कि वे जो कर रहे हैं वह गैर कानूनी है, लेकिन उनसे यह करवाया गया। अगर मुख्यमंत्री ने दबाव न डाला होता तो कोई भी अधिकारी ऐसे काम नहीं करेगा। यूपी सरकार को पुलिस पर बदले की भावना से, गैरकानूनी काम करने का दबाव नहीं बनाना चाहिए।
यह समझ में नहीं आता कि बीजेपी के मुख्यमंत्रियों से लेकर केंद्र सरकार के मंत्री कानून की धज्जियां उड़ाने और संविधान को धता बताने के लिए इतने बेकरार क्यों हैं?

 


Date : 12-Mar-2020

मध्यप्रदेश: दल-बदल कानून कैसे हुआ बेमानी?
-गुरप्रीत सैनी
ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद मध्यप्रदेश के 22 कांग्रेस विधायकों ने भी इस्तीफा दे दिया। अब अटकलें लगाई जा रही हैं कि ये लोग बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। वहीं मध्यप्रदेश कांग्रेस का दावा है कि बीजेपी के भी कुछ विधायक उनके संपर्क में हैं।
ये मामला नया नहीं है। कर्नाटक समेत दूसरे राज्यों में पहले भी ऐसा हो चुका है कि विधायक अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी का दामन थाम लेते हैं।
हालांकि ऐसे बागी विधायकों को दल-बदल करने से रोकने के लिए एक कानून मौजूद है। दलबदल कानून कहता है कि स्वेच्छा से पार्टी छोडऩे वाले विधायक या सांसद की सदस्यता ख़त्म हो सकती है। संविधान के जानकार कहते हैं कि 1985 में ये कानून आने के बाद कुछ हद तक तो दल बदल पर लगाम लगी, लेकिन अब लग रहा है कि ये कानून काफी नहीं है।
संविधान विशेषज्ञ फैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, पहले गोवा, मणिपुर, झारखंड जैसे छोटे राज्यो में ये हो रहा था। लेकिन अब बड़े-बड़े राज्यों में चुनाव का मतलब ख़त्म होता जा रहा है। जनता किसी पार्टी को चुनती हैं, फिर उस पार्टी के लोगों को दूसरी पार्टी अपने पैसे के बूते या सत्ता का गलत इस्तेमाल कर अपनी तरफ आकर्षित कर लेती है और वो लोग उस पार्टी से टूटकर दूसरी पार्टी में चल जाते हैं। ये जनादेश के साथ खिलवाड़ है।
मध्यप्रदेश के हालिया घटनाक्रम से पहले पिछले साल कर्नाटक में भी ये सब हो चुका है। वहां भी कांग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार को संकट में डालते हुए 17 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था। लेकिन कर्नाटक के विधानसभा अध्यक्ष ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के विश्वासमत से पहले ही 14 विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया था। वो तीन को पहले ही अयोग्य ठहरा चुके थे। कुल 17 विधायकों को अयोग्य घोषित किए जाने से कर्नाटक विधानसभा में सदस्यों की संख्या 225 से घटकर 208 हो गई है। और बहुमत का आँकड़ा 105 हो गया था।
हालांकि बागी विधायकों ने विधान सभा अध्यक्ष के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने कहा कि हमने तो इस्तीफा दे दिया है, अब हमें अयोग्य क्यों ठहराया जा रहा है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि इस्तीफे का मतलब ये नहीं है कि आपको अयोग्य ना ठहराया जाए।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि स्पीकर को ये अधिकार नहीं है, कि वो सदन की बची हुई अवधि तक बाग़ी विधायकों की सदस्यता निरस्त कर दे। यानी अयोग्य ठहराते वक्त स्पीकर को ये अधिकार नहीं होगा कि वो बाग़ी विधायकों के विधान सभा के बचे हुए कार्यकाल तक चुनाव लडऩे पर रोक लगा दे। इसके बाद कर्नाटक में कुछ महीनों में दोबारा चुनाव कराए गए। इसमें बागी हुए विधायक भी बीजेपी के टिकट से लड़े और कई जीत भी गए। मुस्तफा कहते हैं कि मध्य प्रदेश में भी ऐसा हो सकता है, तो ऐसे में दल बदल क़ानून अब बेमानी होता लगता है। वो कहते हैं कि इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से दल बदल आसान हो गया है।
फैज़ान मुस्तफा के मुताबिक़ दल बदल क़ानून में बदलाव लाने की ज़रूरत है। वो कहते हैं, कानून में संशोधन कर ये प्रावधान किया जाना चाहिए कि दल बदल करने वाला विधायक पूरे पांच साल के टर्म में चुनाव नहीं लड़ सकता। या फिर वो अविश्वास प्रस्ताव में वोट देंगे तो तो वोट काउंट नहीं किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि दल-बदल कानून के दायरे से बचने के लिए विधायक या सांसद इस्तीफा दे रहे हैं। लेकिन ऐसा प्रावधान किया जाना चाहिए कि जिस पीरियड के लिए वो चुने गए थे, अगर उससे पहले उन्होंने स्वेच्छा से त्यागपत्र दिया, तो उन्हें उस वक्त तक चुनाव नहीं लडऩे दिया जाएगा।
वो कहते हैं, देशव्यापी कोई बहुत बड़ी वजह हो, आदर्शों की बात है या कोई बहुत उसूलों की बात है। तब तो ठीक है, लेकिन बिना वजह त्याग पत्र देने के बाद अगला चुनाव आप फिर से लड़ रहे हैं। तो ये तकनीकी तौर पर तो सही है। लेकिन व्यावहारिक तौर पर ये सारे लोग कानून में बारूदी सुरंग लगा रहे हैं। किसी भी कानून को तोडऩे वाले उसका तरीका निकाल लेते हैं, यहां जो तोड़ निकाला गया है, उसे रिसॉर्ट संस्कृति का नाम दिया जा रहा है।
दल-बदल कानून एक मार्च 1985 में अस्तित्व में आया, ताकि अपनी सुविधा के हिसाब से पार्टी बदल लेने वाले विधायकों और सांसदों पर लगाम लगाई जा सके।
1985 से पहले दल-बदल के खिलाफ कोई कानून नहीं था। उस समय आया राम गया राम मुहावरा खूब प्रचलित था।
दरअसल 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली, जिसके बाद आया राम गया राम प्रचलित हो गया। लेकिन 1985 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार इसके ख़िलाफ़ विधेयक लेकर आई।
1985 में संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई। ये संविधान में 52वाँ संशोधन था।
इसमें विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने पर लगाम लगाई गई। इसमें ये भी बताया गया कि दल-बदल के कारण इनकी सदस्यता भी ख़त्म हो सकती है।
कब-कब लागू होगा दल-बदल कानून
1. अगर कोई विधायक या सांसद ख़ुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है।
2. अगर कोई निर्वाचित विधायक या सांसद पार्टी लाइन के खिलाफ जाता है।
3. अगर कोई सदस्य पार्टी व्हिप के बावजूद वोट नहीं करता।
4. अगर कोई सदस्य सदन में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करता है।
विधायक या सांसद बनने के बाद ख़ुद से पार्टी सदस्यता छोडऩे, पार्टी व्हिप या पार्टी निर्देश का उल्लंघन दल-बदल कानून में आता है।
लेकिन इसमें अपवाद भी है...
अगर किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहें, तो उनकी सदस्यता ख़त्म नहीं होगी।
वर्ष 2003 में इस क़ानून में संशोधन भी किया गया। जब ये क़ानून बना तो प्रावधान ये था कि अगर किसी भूल पार्टी में बँटवारा होता है और एक तिहाई विधायक एक नया ग्रुप बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी। लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा महसूस किया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फ़ायदा उठाया जा रहा है। इसलिए ये प्रावधान ख़त्म कर दिया गया। इसके बाद संविधान में 91वाँ संशोधन जोड़ा गया। जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक दल बदल को असंवैधानिक करार दिया गया।
विधायक कुछ परिस्थितियों में सदस्यता गँवाने से बच सकते हैं। अगर एक पार्टी के दो तिहाई सदस्य मूल पार्टी से अलग होकर दूसरी पार्टी में मिल जाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी। ऐसी स्थिति में न तो दूसरी पार्टी में विलय करने वाले सदस्य और न ही मूल पार्टी में रहने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जा सकते हैं।
तो इन परिस्थितियों में नहीं लागू होगा दल बदल क़ानून-
1. जब पूरी की पूरी राजनीतिक पार्टी अन्य राजनीति पार्टी के साथ मिल जाती है।
2. अगर किसी पार्टी के निर्वाचित सदस्य एक नई पार्टी बना लेते हैं।
3. अगर किसी पार्टी के सदस्य दो पार्टियों का विलय स्वीकार नहीं करते और विलय के समय अलग ग्रुप में रहना स्वीकार करते है।
4. जब किसी पार्टी के दो तिहाई सदस्य अलग होकर नई पार्टी में शामिल हो जाते हैं।
स्पीकर के फैसले की हो सकती है समीक्षा
10वीं अनुसूची के पैराग्राफ़ 6 के मुताबिक स्पीकर या चेयरपर्सन का दल-बदल को लेकर फ़ैसला आखिरी होगा। पैराग्राफ 7 में कहा गया है कि कोई कोर्ट इसमें दखल नहीं दे सकता। लेकिन 1991 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 10वीं अनुसूची को वैध तो ठहराया लेकिन पैराग्राफ 7 को असंवैधानिक करार दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि स्पीकर के फैसले की कानूनी समीक्षा हो सकती है। (बीबीसी)

 


Date : 12-Mar-2020

कांग्रेस के कुछ और बड़े युवा नेता 
भी सिंधिया की राह जा सकते हैं?

बीते दिसंबर में झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा को तगड़ा झटका लगा था। सत्ता में वापसी का दावा कर रही पार्टी 81 विधानसभा सीटों में से महज 25 जीत सकी। मुख्यमंत्री रघुवर दास तक अपनी सीट हार गए। इसके दो महीने बाद पार्टी जेवीएम मुखिया बाबूलाल मरांडी की 'घर वापसी' कर उन्हें नेता प्रतिपक्ष बना चुकी है। इसके एक दिन बाद ही झारखंड भाजपा को दीपक प्रकाश के रूप में नया अध्यक्ष भी मिल गया।
अब कांग्रेस पर आते हैं। बीते साल लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की एक बार फिर बुरी फजीहत हुई। इसके बाद तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफा दे दिया। तब से अब तक 10 महीने होने को आए, लेकिन कांग्रेस को नया अध्यक्ष नहीं मिल सका है।
राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद नए अध्यक्ष को लेकर खूब मंथन हुआ था। लेकिन घूम-फिरकर बात वहीं आ गई और नई व्यवस्था होने तक सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बना दिया गया। बीते कुछ समय से शशि थरूर सहित तमाम नेता लगातार कह रहे हैं कि नए अध्यक्ष का चुनाव हो। लेकिन बात वहीं की वहीं है। पार्टी नेता संदीप दीक्षित तो हाल में यह तक बोल गए कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। यानी पार्टी की नैया बिना पतवार के चल रही है।
कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर जो हाल राष्ट्रीय स्तर पर है वहीं राज्यों में भी दिखता है। कई राज्यों में अंतरिम अध्यक्ष के रूप में अस्थाई व्यवस्था चल रही है। लोकसभा चुनाव में पार्टी की दुर्गति के बाद से दर्जन भर से बड़े नेता उसे अलविदा कह चुके हैं। इनमें कई पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन या पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शामिल हैं। पिछले साल झारखंड कांग्रेस के तत्कालीन मुखिया अजय सिंह ने अपने इस्तीफे के ऐलान के साथ यह तक कह दिया था कि खराब से खराब अपराधी भी पार्टी में उनके सहयोगियों से बेहतर दिखते हैं।
शायद यही वजह है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे के बाद कांग्रेस महासचिव पीएल पुनिया का कहना था, 'हमें गहराई से आत्ममंथन की जरूरत है कि क्या इसके लिए सिर्फ श्री सिंधिया जिम्मेदार हैं। 15 साल तक भाजपा के कुशासन के बाद हम सत्ता में आए थे और हम इसे 15 महीने तक भी अपने पास नहीं रख सके।Ó
पीएल पुनिया ने संकेतों में यह बात कही तो पार्टी के एक अन्य नेता कुलदीप बिश्नोई ने इसे बिना किसी लाग-लपेट के कह दिया। उनका कहना था, 'ज्योतिरादित्य सिंधिया का जाना कांग्रेस के लिए बड़ी चोट है। वे पार्टी के केंद्रीय स्तंभ थे और नेतृत्व को उन्हें रोकने के लिए और प्रयास करने चाहिए थे। उनकी तरह देश में कई समर्पित कांग्रेस नेता हैं जो आज खुद को अलग-थलग, बेकार और असंतुष्ट महसूस करते हैं।'
तो फिर कांग्रेस के लिए आगे का रास्ता क्या हो? पार्टी के एक प्रमुख नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री द इंडियन एक्सप्रेस से कहते हैं, 'या तो राहुल गांधी अध्यक्ष के तौर पर वापस आएं और आगे बढ़कर नेतृत्व करें। या फिर वे और गांधी परिवार किसी ऐसे शख्स को आगे बढ़ाए जो सबको साथ लेकर चलने की क्षमता रखता हो। उनकी तरफ से कोई संकेत आना चाहिए, लेकिन वहां सिर्फ शांति है। कोई नहीं जानता कि वे क्या चाहते हैं और क्या करने की सोच रहे हैं।'
जानकारों के मुताबिक कांग्रेस के मौजूदा हाल के पीछे एक कारण यह भी रहा है कि नेताओं के साफ तौर पर असंतोष के संकेत देने के बावजूद शीर्ष नेतृत्व उनसे संपर्क कर उनकी समस्या समझने या उन्हें आश्वस्त करने की कोशिश नहीं करता। जयंती नटराजन से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया तक इसका एक लंबा सिलसिला है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के चचेरे भाई और त्रिपुरा के शाही परिवार से ताल्लुक रखने वाले प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा कहते हैं कि ज्योतिरादित्य ने बीते कुछ समय के दौरान कई बार राहुल गांधी से मिलने की कोशिश की, लेकिन हर बार वे असफल रहे। यानी उन्हें उनके हालात पर छोड़ दिया गया था।
कांग्रेस के एक प्रमुख युवा नेता उम्मीद जताते हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे के बाद हालात बदलेंगे और पार्टी जागेगी। द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में वे कहते हैं, 'अगर वो इससे भी नहीं जागती तो फिर उसकी नींद किसी चीज से नहीं टूटने वाली।'
खबरें आ रही हैं कि हिंदी पट्टी के कांग्रेस के तीन अन्य बड़े युवा चेहरे भी शीर्ष नेतृत्व से निराश हैं और विकल्प तलाश रहे हैं। यानी कांग्रेस की मुश्किलें आगे भी बनी रह सकती हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया आज भाजपा का दामन थामने की तैयारी कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि उन्हें राज्यसभा भेजा जाएगा और इसके बाद केंद्रीय कैबिनेट में जगह भी दी जाएगी।
ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे के साथ ही मध्य प्रदेश में कांग्रेस सत्ता गंवाने के कगार पर पहुंच गई है क्योंकि 21 विधायक उनके साथ हैं। मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार के पास 116 विधायकों का समर्थन है जो बहुमत के आंकड़े से सिर्फ चार ज्यादा है। अगर सिंधिया समर्थक विधायकों के इस्तीफे स्वीकार हो जाते हैं तो सरकार गिर जाएगी। कुछ समय पहले कर्नाटक में भी कांग्रेस ने इसी तरह सत्ता गंवाई थी। (सत्याग्रह)

 


Date : 09-Mar-2020

होली / भंगलोक से उतरा ज्ञान!
 ध्रुव गुप्त

द्वापर युग के अंतिम चरण में एक प्रतापी ऋषि थे जो समाधि की अवस्था में दुनिया के किसी कोने में रह रहे व्यक्ति से संदेशों का आदान-प्रदान और उसका साक्षात दर्शन करने में सक्षम थे। जब वे मरणासन्न हुए तो उनके प्रिय शिष्य ने पूछा- गुरुवर, आने वाले कलियुग में जब तप की शक्ति जाती रहेगी तब क्या दूरस्थ लोगों से संवाद के सारे मार्ग बंद हो जाएंगे?
समाधिस्थ होने के बाद ऋषि ने कहा-हे वत्स, कलियुग के अंतिम चरण में जुकरबर्ग नामक एक ऋषि के रूप में अवतरित होकर मैं वसुंधरा के दूरस्थ लोगों को जोडऩे के लिए मुखपोथी नामक एक आभासी संसार की रचना करूंगा। मोबाइल और लैपटॉप नामक छोटे-छोटे यंत्रों के माध्यम से इससे लोग पहले जिज्ञासावश ही जुड़ेंगे और कालांतर में घर-परिवार-समाज से वैराग्य लेकर बस इसी के हो जाएंगे। अहर्निश उसके आगे समाधि की अवस्था में बैठकर अपनी रचनाओं, भावनाओं, कुंठाओं और विषों का परस्पर आदान-प्रदान करेंगे। 
मित्रों के 'लाइक्स'  और 'कमेंट्स'  पाकर आह्लादित भी होंगे और उपेक्षा से मर्माहत भी। कुछ अपने अधूरे प्रेम की व्यथा बांटकर रुलाएंगे, कुछ मूर्खताओं से हंसाएंगे, कुछ दार्शनिक और नीतिगत प्रवचनों से ज्ञान-चक्षु खोलेंगे, कुछ राजनीतिक संग्राम से इसे कलुषित करेंगे, कुछ मिथ्या सूचनाएं प्रसारित कर दंगे भड़काएंगे और कुछ भोले-भाले लोग ऐसे भी होंगे जो सुबह, संध्या, रात्रि के अभिवादनों और देवी-देवताओं, स्वजनों-परिजनों के चित्रों के अविरल प्रवाह से वात्सल्य और करुण रसों की उत्पत्ति करेंगे। इसका अच्छा या बुरा जैसा प्रयोग करें, इस दिव्य मंच पर जो एक बार आ गया, वह चाह कर भी इसके मायाजाल से निकल नहीं सकेगा।
शिष्य ने जिज्ञासा की - 'प्रभु, इस पर संपर्क शाब्दिक ही होगा या लोग अपने दूरस्थ मित्रों को साक्षात देख भी सकेंगे ?Ó 
ऋषिवर ने कहा कहा- ''शिष्य, जिस दिव्य दृष्टि के लिए हमें आजीवन साधना करनी होती है, कलियुग में लोग उंगलियों के स्पर्श मात्र से वह प्राप्त कर लेंगे। मुखपोथी से जुड़े दो और आभासी मंच होंगे - मेसेंजर और व्हाट्सएप। इनका उद्देश्य तो संदेशों का आदान-प्रदान और आत्मीयों का दर्शन ही होगा, लेकिन अधम कलियुगी प्राणी इसका उपयोग निरर्थक संदेशों से मित्रों को पागल करने और अपने मनोरंजन के लिए लड़के या लड़कियां पटाने नें अधिक करेंगे। 
इस पर अकेलेपन से ऊबे युवा और दांपत्य की एकरसता से थके अधेड़ और वृद्धजन स्त्रियों की संदेश मंजूषाओं में अनामंत्रित जाकर प्रणय निवेदन करेंगे। विवाहित जन अपनी पत्नियों को चूल्हे-चौके में उलझा कर मित्र सूची की ठीक-ठाक दिखने वाली स्त्रियों को अपनी मौलिक या चोरी की प्रेम कविताएं भेजकर लुभाएंगे। एक से बात नहीं बनी तो दूसरी। दूसरी नहीं तो तीसरी। कभी-कभी एक साथ कई। इस आभासी संसार में लोगों में अगर धैर्य और निर्लज्जता है तो यहां स्त्री-पुरुषों के मध्य आकर्षण भी घटित होगा, प्रेम भी और बात बढ़ी तो यौनोन्माद भी। पृथ्वीलोक को जनसंख्या विस्फोट से बचाने के लिए इस आभासी संसार में बस बच्चे पैदा करने का कोई प्रावधान नहीं रखा जाएगा।'
शिष्य आह्लादित हुआ- नमन गुरुश्रेष्ठ, मैं तो कलियुग का नाम सुनकर ही भयभीत हुआ जा रहा था। अब आश्वस्त हूं कि आपके कलियुगी आभासी संसार के सहारे मेरा जीवन आनंद में कट जाएगा।' 


Date : 09-Mar-2020

महिला दिवस तो गुजर गया, पर असली संघर्ष...
8 मार्च 1926  न्यूयॉर्क की फर व लेदर वर्कर्स यूनियन (अधिकांश औरतें) ने हड़ताल कर दी। पुलिस की पिटाई से लेकर तमाम तरह की यातनाएं झेलीं। मगर अंत में 10 फीसदी वेतन वृद्धि ही नहीं, 5 दिन का कार्यसप्ताह भी हासिल किया। आज दुनिया भर में करोड़ों स्त्री-पुरुष कामगार 5 दिन के कार्यसप्ताह का लाभ ले रहे हैं। 8 मार्च महिला कामगार दिवस शानदार संघर्षों के इतिहास वाला दिवस है, सरकारी रस्म अदायगी और बाजार के चोंचलों वाला दिन नहीं।
8 मार्च 1917 (पुराने रूसी कैलेंडर अनुसार 25 फरवरी) को सेंट पीटर्सबर्ग की स्त्री श्रमिकों और गृहिणियों ने ही भूख और महंगाई के विरुद्ध सड़क पर उतर कर उस क्रांति की शुरुआत की थी जिसमें बाद मे सभी श्रमिक शामिल हो गए और जार के निरंकुश शासन को उखाड़ फेंका गया। बाद में यह क्रांति नवंबर में समाजवादी क्रांति में तब्दील हुई और मजदूर-किसानों का शासन स्थापित हुआ।
1917 में हुई रूसी क्रांति ने पहली बार औरतों को पुरुषों के बराबर हर वो अधिकार दिए जो पुरुषों को उपलब्ध थे। सोवियत संघ दुनिया का पहला देश था जहां सभी औरतों को मताधिकार मिला, खुद को जनतंत्र बताने वाले सारे अमरका-यूरोप ने इसके बाद औरतों को वोट देने का हक दिया। सोवियत संघ ने ही पहली बार सभी औरतों को रोजगार का अधिकार, 18 हफ्तों का मातृत्व अवकाश दिया, औरतों को पुरुषों बराबर वेतन दिया, पहली बार औरत को आंतरिक्ष में भेजा, एबॉर्शन के अधिकार दिए जो उस समय किसी भी देश में उपलब्ध नहीं था। सोवियत संघ में औरतों ने पहली बार वे सभी अधिकार हासिल किए जो विश्व के किसी भी लोकतांत्रिक देश में उपलब्ध नहीं थे।
8 मार्च कोई सरकारी रस्म अदायगी वाला या पूंजीवादी बाजार द्वारा बिक्री के लिए शुरू किया दिवस नहीं है। भारी क्रांतिकारी इतिहास वाला कामगार महिला दिवस है। यह दिन 8 मार्च 1857 को अमरीका की महिला मजदूरों द्वारा काम के घंटे 16 से घटाकर 10 करने के महान संघर्ष की स्मृति में 1911 में मनाना शुरू किया गया था। इस संघर्ष का लाभ आज सभी स्त्री-पुरुष कामगारों को मिल रहा है।