विचार / लेख

03-Jul-2020 8:07 PM

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

चीन को लेकर भारत में अत्यंत विचित्र स्थिति है। आज के दिन यह पता लगाना मुश्किल है कि भारत चाहता क्या है ? क्या वह चीन के साथ फौजी संघर्ष चाहता है या बातचीत से सीमाई तनातनी खत्म करना चाहता है या कोई उसकी भावी लंबी-चौड़ी रणनीति है ?

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक चीन का नाम लेकर उसके विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोला है। उन्होंने जो बोला है, उसे दोहराने की हिम्मत भारत का कोई नेता नहीं कर सकता है। वे शायद भारतीय जवानों के पराक्रम और बलिदान की प्रशंसा करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने कह दिया कि भारत की सीमा में कोई नहीं घुसा और हमारी जमीन पर कोई कब्जा नहीं हुआ। सरकार, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने चीनी माल के बहिष्कार की कोई अपील भी जारी नहीं की है। इससे भी बड़ी बात यह कि भारत और चीन के कोर कमांडर गालवान घाटी में 10-10-12-12 घंटे बैठकर तीन बार बात कर चुके हैं और दोनों पक्ष कह रहे हैं कि वे पीछे हटने के तौर-तरीकों पर बात कर रहे हैं। बात सफल भी हो रही है लेकिन अभी वह लंबी चलेगी। इस प्रगति का समर्थन चीन के बड़बोले और मुंहफट अखबार ‘ग्लोबल टाईम्स’ ने भी किया है।

इन बातों से आप किस नतीजे पर पहुंचते हैं ? इन बातों में आप यह भी जोड़ लें कि अभी तक चीन के राष्ट्रपति और मोदी के मित्र शी चिन फिंग ने भारत के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोला है। याने सारा मामला धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है लेकिन इसका उल्टा भी हो रहा है। चीन ने कल ही सुरक्षा परिषद में भारत पर कूटनीतिक हमला करने की कोशिश की है।

कराची में हुए बलूच हमले पर पाकिस्तान जो प्रस्ताव लाया, उसके समर्थन में भारत का नाम लिये बिना चीन ने भारत पर उंगली उठा दी है। गालवान घाटी के पास उसने हजारों सैनिक जमा कर लिये है। पाकिस्तान ने भी उसके आस-पास के क्षेत्र में 20 हजार सैनिक डटा दिए हैं। इधर भारत अपनी सभी सरकारी कंपनियों से हो रहे चीनी सौदों को रद्द करता जा रहा है। हमारी गैर-सरकारी कंपनियां भी चीनी पूंजी के बहिष्कार की बात सोच रही हैं। इससे भी बड़ी बात यह हुई कि भारत में लोकप्रिय 59 चीनी ‘एप्स’ पर भारत ने प्रतिबंध लगा दिया है। चीन इस पर बौखला गया है। अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोंपियो इस मामले में भारत की पीठ ठोक रहे हैं।

फ्रांस-जैसे कुछ राष्ट्रों ने, चाहे दबी जुबान से ही सही, भारत का समर्थन किया है। भारत की जनता इन परस्पर-विरोधी धाराओं का कुछ अर्थ नहीं निकाल पा रही है। हो सकता है कि दोनों देश एक-दूसरे पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दबाव बना रहे हैं। आज दोनों इस स्थिति में नहीं हैं कि युद्ध करें।

चीन तो कोरोना की बदनामी और हांगकांग की उथल-पुथल में पहले से ही फंसा हुआ है। भारत यदि चीन को सबक सिखाना चाहता है तो ये तात्कालिक टोटकेबाजी काफी नहीं है। उसके लिए सुदीर्घ, गोपनीय और सुचिंतित रणनीति की जरुरत है।

(नया इंडिया की अनुमति से)


02-Jul-2020 8:47 PM

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

चीनी ‘एप्स’ पर लगे प्रतिबंध का लगभग सभी ने स्वागत किया लेकिन हमारी सरकार एक ही दिन में पल्टा खा गई। उसने इन चीनी कंपनियों को 48 घंटे की मोहलत दी है कि वे बताएं कि उन पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाए ? इन एप्स पर सरकार के आरोप ये थे कि भारतीय नागरिकों की सब गोपनीय जानकारियां भी इनके द्वारा चीनी सरकार को जाती हैं। इससे भारतीय सुरक्षा को खतरा पैदा होता है और भारत की संप्रभुता नष्ट होती है।

यदि भारत के पास इनके ठोस प्रमाण हैं तो इन चीनी कंपनियों को मोहलत देने की कोई जरुरत ही नहीं थी। यदि बिना ठोस प्रमाणों के भारत सरकार ने यह कार्रवाई कर दी है तो निश्चय ही उसे अपना यह कदम वापस लेना पड़ेगा और इसके कारण उसकी बड़ी बदनामी होगी। विपक्षी दल उसकी खाल नोंच डालेंगे। वे कहेंगे कि चीनी एप्स पर प्रतिबंध की घोषणा वैसी ही है, जैसे लाकडाउन (तालाबंदी) की घोषणा थी या नोटबंदी की घोषणा की गई थी।

यह सरकार बिना सोचे-समझे काम करनेवाली सरकार की तरह कुख्यात हो जाएगी। टिक टॉक के भारतीय संचालक निखिल गांधी ने दावा किया है कि उनकी संस्था सूचना सुरक्षा संबंधी भारतीय कानून का पूरी निष्ठा से पालन करती है और उसने चीनी सरकार को कोई भी जानकारी नहीं लेने दी है। चीनी ‘एप्स’ पर प्रतिबंध लगाने से सरकार को सीधा नुकसान कोई खास नहीं होनेवाला है, लेकिन इनमें काम करनेवाले हजारों भारतीय नागरिक बेरोजगार हो जाएंगे।

उन्होंने शोर मचाना शुरु कर दिया है। उनका कहना है कि आप सिर्फ चीनी ‘एप्स’ पर जासूसी का आरोप लगाते हैं लेकिन क्या अन्य देशों के ‘एप्स’ के जरिए यही काम नहीं होता होगा ? वे तो इस तरह की तकनीक में चीन से कहीं आगे हैं। आपने उन पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया ? इन प्रश्नों का सीधा-सा जवाब यह है कि इन प्रतिबंधों को थोपने का जो मकसद था, वह पूरा हो रहा है। गालवान घाटी में चीन को नरम करना जरुरी था। इस प्रतिबंध पर चीनी सरकार बौखला गई है।

भारत सरकार यही चाहती थी। यही दबाव न तो फौजी कार्रवाई करके, न ही राजनयिक दबाव बनाकर और न ही व्यापारिक बहिष्कार करके बनाया जा सकता था। इसमें भारत का कुछ नहीं बिगड़ा और चीन पर दबाव भी पड़ गया। चीन की इन कंपनियों को लगभग 7500 करोड़ का नुकसान भुगतना पड़ सकता है।

मोदी सरकार चीन के आमने-सामने खम फटकारने की बजाय उसे टंगड़ी मारने की कोशिश कर रही है। अब देखें, चीन कौनसी टंगड़ी मारता है ? कौनसा दांव खेलता है ? इस मामले में मैं 16 जून से ही कह रहा हूं कि मोदी को चाहिए कि वह चीनी राष्ट्रपति शी चिन फि़ंग से सीधे बात करें। स्थानीय और अचानक मुठभेड़ के मामला को लंबा और गहरा न करें। जहां तक इन विदेशी ‘एप्स’ (इंटरनेट मंच) का मामला है, चीन समेत सभी देशों के ‘एप्स’ पर भारत-सरकार कड़ी निगरानी रखे। इन पर भारत-विरोधी और अश्लील सामग्री बिल्कुल न जाने दे।

(नया इंडिया की अनुमति से)


02-Jul-2020 1:43 PM

-सुनीता नारायण

यह हमारे जीवनकाल का सबसे अजीब एवं संकटग्रस्त समय है। लेकिन साथ ही साथ यह सर्वाधिक भ्रमित करने वाला भी है। ऐसा लगता है, जैसे कोरोना वायरस की वजह से हमें इंसानियत के सबसे अच्छे और बुरे, दोनों पहलू देखने को मिल रहे हैं। सबसे पहले तो न केवल दिल्ली में बल्कि विश्वभर से हवा के साफ होने की खबरें आ रही हैं। 

ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में गिरावट के भी संकेत प्राप्त हुए हैं। इसके अलावा मानवीय दृढ़ता, समानुभूति एवं इन सबसे बढक़र स्वास्थ्य एवं आवश्यक सेवाओं के लिए काम करने वाले लाखों लोगों के निस्वार्थ कार्य का प्रमाण प्राप्त हुआ है। इस वायरस के खिलाफ चल रहे युद्ध को किसी भी सूरत में जीतने एवं लोगों की जानें बचाने का जज्बा ही कोविड -19 की लड़ाई का हॉलमार्क बनेगा। 

दूसरी ओर, इस वायरस से लडऩे के क्रम में हमारे द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे प्लास्टिक की मात्रा में आशातीत वृद्धि हुई है। देश में कई शहर ऐसे हैं, जो अब कचरा अलग करने की प्रक्रिया बंद कर रहे हैं, क्योंकि लगातार बढ़ते मेडिकल कचरे और प्लास्टिक के व्यक्तिगत सुरक्षा किट (पीपीई) की संख्या के सामने सफाई कर्मचारी बेबस हैं। तो कह सकते हैं कि हम इस लड़ाई में पीछे जा रहे हैं। इसके अलावा, लोग सार्वजनिक परिवहन के साधनों का प्रयोग नहीं करना चाहते हैं। उन्हें डर है कि भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों पर संक्रमण का खतरा बढ़ जाएगा। इसलिए, जैसे-जैसे लॉकडाउन खुलेगा, शहरों की सडक़ों पर निजी वाहनों की संख्या में निश्चय ही बढ़ोतरी होगी। इससे जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार जीवाश्म इंधनों से होने वाला उत्सर्जन भी बढ़ेगा।

यह वह समय भी है जब हम मानवता को उसके सबसे बुरे रूप में देख रहे हैं। चाहे गरीबों को पैसे एवं भोजन उपलब्ध कराने में हुई देरी हो, जिनमें वो प्रवासी मजदूर शामिल हैं, जो नौकरियां छूट जाने की वजह से घर जाने को परेशान थे या जनता को जाति, धर्म एवं नस्ल के नाम पर बांटने की कोशिशें हों या फिर वैसे लोग हों, जिन्होंने अपने सगे संबंधी खो दिए, क्योंकि उन्हें समय पर चिकित्सकीय मदद नहीं मिल पाई। इन दिनों यह सब देखने को मिल रहा है। लेकिन हमें भविष्य की ओर अग्रसर होना चाहिए क्योंकि कोरोना की इस रात का सवेरा भी अवश्य होगा और हम जिस दुनिया का निर्माण अभी करते हैं वही हमारा भविष्य होगा। साथ ही साथ मैं यह स्पष्ट कर दूं कि यह कोरी बयानबाजी नहीं है और न ही सत्य की कोई लंबी खोज है। असंभव को संभव करना समय की मांग है और आज जब हम इस स्वास्थ्य संकट के चरम पर पहुंच चुके हैं, हमें काम करने के नए तरीके ढूंढने होंगे। 

हम हालात के सामान्य होने का इंतजार नहीं कर सकते, क्योंकि तब यह न तो नया होगा और न ही अलग। और यह संभव है, हमें आवश्यकता है तो बस ऐसे रचनात्मक उत्तर ढूंढने की जो कई चुनौतियों से एकसाथ निपट सकें। उदाहरण के लिए शहरों में होने वाले वायु प्रदूषण को लें। हम जानते हैं कि हवा में विषाक्त पदार्थों के उत्सर्जन के लिए वाहन सबसे अधिक जिम्मेवार हैं। सबसे अधिक प्रदूषण माल लेकर शहरों में आवाजाही करने वाले हेवी ड्टी ट्रकों से फैल यू ता है। 
जनवरी (प्री-लॉकडाउन) में, हर महीने तकरीबन 90,000 ट्रकों ने दिल्ली में प्रवेश किया, वहीं अप्ल में रै (लॉकडाउन के दौरान) शहर में प्रवेश करने वाले ट्रकों की संख्या घटकर 8,000 रह गई। अब जैसे-जैसे लॉकडाउन खुलता है, आखिर हम ऐसा क्या कर सकते हैं, जिससे प्रदूषण लॉकडाउन के पहले वाले स्तर पर ही रहे ? दरअसल लॉकडाउन के दौरान भारत ने स्वच्छ ईंधन एवं वाहन तकनीक की तरफ एक कदम बढ़ाया है। हेवी ड्टी ट्रकों की बा यू त की जाए तो अप्ल के पहले रै के बीएस-4 मॉडलों एवं वर्तमान के बीएस-6 मॉडलों के प्रदूषण की मात्रा में नब्बे प्रतिशत का अंतर आता है। 

यह भी सच है कि ऑटोमोबाइल उद्योग बड़े पैमाने पर वित्तीय संकट झेल रहा है। यह हमारे लिए एक अवसर बन सकता है। अगर सरकार अपने पुराने वाहनों को नए से बदलने के लिए ट्रक मालिकों को सब्सिडी देने की एक स्मार्ट योजना तैयार कर ले तो यह गेम चेंजर साबित हो सकता है। लेकिन साथ ही साथ यह सुनिश्चित भी करना होगा कि पुराने ट्रकों को कबाड़ में बदलकर उन्हें रिसाइकिल किया जाए, ताकि उनसे और प्रदूषण न फैले। 

सार्वजनिक परिवहन के साथ भी कुछ ऐसे ही हालात हैं, सुरक्षा का दबाव लगातार बना हुआ है। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि सार्वजनिक परिवहन के बिना हमारे शहर ठप हो जाएंगे। हमें अब जाकर इसके महत्व का एहसास हुआ है। इसलिए, भविष्य के ऐसे शहरों का पुनर्निर्माण करने के लिए, जो गाडिय़ों नहीं, बल्कि इंसानों के आवागमन को ध्यान में रखकर बनाए गए हों, का समय आ चुका है और सरकार से वित्तीय प्रोत्साहन अपेक्षित है। 

हमें सभी सावधानियों के साथ सार्वजनिक परिवहन को फिर से शुरू करने की आवश्यकता है। हमें इसे तेजी से इस तरह बढ़ाना है, जिससे साइकिल चालकों एवं पैदल चलने वालों को भी साथ लेकर चला जा सका। आंकड़ों से पता चलता है कि हमारी रोजमर्रा की यात्राओं का एक बड़ा हिस्सा 5 किमी से कम का है। इसलिए ऐसा किया जाना संभव है। लेकिन आज हमने विघटन के जिस पैमाने को देखा है, वह इसी तरह के पैमाने पर प्रतिक्रिया की मांग करता है। यह किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए कल्पनाशीलता के साथ-साथ ठोस, जुनूनी कारवाई की जरूरत है। जहां तक उद्योगों एवं उनसे होने वाले प्रदूषण की बात है तो सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि ये उद्योग किस ईंधन का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए, अगर हम ईंधन के तौर पर कोयले की जगह प्राकृतिक गैस के प्रयोग की ओर कदम बढ़ा सकें तो इससे प्रदूषण में भारी कमी आएगी। उसके बाद अगर हम ईंधन के तौर पर विद्युत का इस्तेमाल करें और वह विद्युत प्राकृतिक गैस एवं हाइडेल, बायोमास इत्यादि जैसे स्वच्छ साधनों से मिले तो प्रदूषण के स्तरों में स्थानीय स्तर पर कमी तो आएगी ही, साथ ही साथ जलवायु परिवर्तन पर भी लगाम लगेगी।
 
एक बार फिर मैं कहना चाहूंगी कि यह सब संभव है। लेकिन यह सब इस विश्वास पर आधारित है कि हम एक बेहतर कल चाहते हैं। कोविड-19 केवल एक भूल या दुर्घटना नहीं है, बल्कि यह उन कार्यों का एक परिणाम है जो हमने एक ऐसी दुनिया के निर्माण के लिए उठाए हैं, जो असमान और विभाजनकारी है और प्रकृति व हमारे स्वास्थ्य को नजरंदाज करती हैं। तो इस मुगालते में न रहें कि कल बेहतर होगा, यह बेहतर होगा और बेहतर हो सकता है, लेकिन तभी अगर हम स्वयं इस दिशा में कदम उठाएं।
(डाउन टू अर्थ)


02-Jul-2020 1:19 PM

कुछ लेखकों-बुद्धिजीवियों का एक वर्ग गांधी को नस्लवादी और जातिवादी साबित करना चाहता है। आरोप है कि उन्होंने भारत के दलित हितों को क्षति पहुंचाई। ये लोग उनकी पूरी जीवन यात्रा की बात नहीं कर रहे, बल्कि उनके शुरूआती लेखन के चुनिंदा अंशों का हवाला दे रहे हैं।

- राम पुनियानी

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने दुनिया के सबसे बड़े जनांदोलन का नेतृत्व किया था। यह जनांदोलन ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध था। गांधीजी के जनांदोलन ने हमें अन्यायी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए दो महत्वपूर्ण औजार दिए- अहिंसा और सत्याग्रह। उन्होंने हमें यह सिखाया कि नीतियां बनाते समय हमें समाज की आखिरी पंक्ति के अंतिम व्यक्ति का ख्याल रखना चाहिए।

जिन विचारों के आधार पर उन्होंने अपने आंदोलनों को आकार दिया, वे विचार गांधीजी अपनी मां के गर्भ से साथ लेकर नहीं आए थे। वे विचार समय के साथ विकसित हुए और उन्हीं विचारों ने भारत के स्वाधीनता आन्दोलन की नींव रखी। वे कहा करते थे कि उनका जीवन ही उनका संदेश है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व, दुनिया भर के औपनिवेशिकता और नस्लवाद विरोधी आंदोलनों की प्रेरणा बना। वे भारत में सामाजिक समानता की स्थापना के पैरोकार थे और जाति प्रथा का उन्मूलन उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य था।


ये बातें याद दिलाना आज इसलिए जरूरी हो गया है, क्योंकि लेखकों और बुद्धिजीवियों का एक तबका उन्हें नस्लवादी और जातिवादी साबित करने पर तुला हुआ है। यह कहा जा रहा है कि उन्होंने भारत के दलितों के हितों को क्षति पहुंचाई। ये तत्व महात्मा गांधी की पूरी जीवन यात्रा को समग्र रूप में नहीं देख रहे हैं और उनके शुरूआती लेखन के चुनिंदा अंशो का हवाला दे रहे हैं। वे उनके जीवन के केवल उस दौर की बात कर रहे हैं, जब वे नस्ल और जाति के नाम पर समाज में व्याप्त अन्यायों के विरुद्ध लड़ रहे थे।


हाल में जॉर्ज फ्लॉयड की क्रूर हत्या के बाद शुरू हुए ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आन्दोलन के दौरान, अमरीका में कुछ प्रदर्शनकारियों ने गांधीजी की मूर्ति को नुकसान पहुंचाय। इसके पहले, घाना में उन्हें नस्लवादी करार देते हुए उनकी एक मूर्ति को उखाड़ फेंका गया था और ‘रोड्स मस्ट फाल’ की तर्ज पर ‘गांधी मस्ट फाल’ आन्दोलन चलाया गया था। जबकि गांधी को किसी भी स्थिति में रोड्स जैसे अश्वेतों को गुलाम बनाने में मुख्य भूमिका अदा करने वालों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है।

गांधीजी के बारे में गलत धारणाओं के मूल में है केवल उनके शुरूआती लेखन पर जोर। दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों को उनका हक दिलाने के लिए शुरू किये गए अपने आन्दोलन के दौरान गांधी ने कुछ मौकों पर अश्वेतों के बारे में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया था। ये शब्द वे थे जिन्हें औपिनिवेशिक आकाओं ने गढ़ा था, जैसे ‘अफ्रीकन सेवेजिस’ (अफ्रीकी जंगली)। दक्षिण अफ्रीका के भारतीय श्रमजीवियों के पक्ष में आवाज उठाते हुए उन्होंने कहा था कि औपनिवेशिक शासक, भारतीयों के साथ ‘अफ्रीकन सेवेजिस’ जैसा व्यवहार कर रहे हैं।

दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के हकों की लडाई के समांतर उन्होंने वहां के अश्वेतों की दयनीय स्थिति को भी समझा और उनके दर्द का अहसास करने के लिए उन्होंने यह तय किया कि वे केवल थर्ड क्लास में यात्रा करेंगे। इसके काफी समय बाद उन्होंने कहा था कि अश्वेतों के साथ भी न्यायपूर्ण व्यवहार होना चाहिए। नस्लवाद के संबंध में उनकी सोच का निचोड़ उनके इस वाक्य में है, “अगर हम भविष्य की बात करें तो क्या हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत में एक ऐसी सभ्यता नहीं छोड़नी चाहिए जिसमें सभी नस्लों का समिश्रण हो- एक ऐसी सभ्यता जिसे शायद विश्व ने अब तक नहीं देखा है।”

यह बात उन्होंने 1908 में कही थी। समय के साथ उनके विचार विकसित और परिपक्व होते गए और 1942 में उन्होंने रूजवेल्ट को एक पत्र में लिखा, “मेरा विचार है कि मित्र देशों का यह दावा कि वे दुनिया में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रजातंत्र की सुरक्षा के लिए लड़ रहे हैं तब तक खोखला जान पड़ेगा जब तक कि ग्रेट ब्रिटेन भारत और अफ्रीका का शोषण करता रहेगा और अमरीका में नीग्रो समस्या बनी रहेगी।”

गांधी के नस्लवादी होने के आरोपों का सबसे अच्छा जवाब नेल्सन मंडेला ने दिया था। उन्होंने लिखा था, 'गाँधी को इन पूर्वाग्रहों के लिए क्षमा किया जाना चाहिए और हमें उनका मूल्यांकन उनके समय और परिस्थितियों को ध्यान में रख कर करना चाहिए। हम यहां एक युवा गांधी की बात कर रहे हैं जो तब तक महात्मा नहीं बने थे।'

जाति का मसला भी उतना ही टेढ़ा है। अपने जीवन के शुरूआती दौर में गांधीजी ने काम पर आधारित वर्णाश्रम धर्म की वकालत की। उन्होंने मैला साफ करने के काम का महिमामंडन किया और दलितों को हरिजन का नाम दिया। कई दलित बुद्धिजीवी और नेता मानते हैं कि गांधीजी ने मैकडोनाल्ड अवार्ड के अंतर्गत दलितों को दिए गए पृथक मताधिकार का विरोध कर दलितों का अहित किया।

जबकि गांधीजी साफतौर पर इस निर्णय को भारतीय समाज को विभाजित करने की चाल मानते थे। उनका ख्याल था कि इससे भारतीय राष्ट्रवाद कमजोर पड़ेगा। इसलिए उन्होंने इसके खिलाफ आमरण अनशन किया जो तभी समाप्त हुआ जब आंबेडकर ने आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

जहां कई नेता और बुद्धिजीवी इसे महात्मा गांधी द्वारा दलितों के साथ विश्वासघात मानते हैं, वहीं आंबेडकर ने गांधीजी को इस बात के लिए धन्यवाद दिया था कि उन्होंने आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के जरिये दलितों को और अधिक आरक्षण देकर समस्या का संतोषजनक हल निकाला। उन्होंने लिखा, 'मैं महात्मा गांधी का आभारी हूं। उन्होंने मेरी रक्षा की।'

आंबेडकर के निकट सहयोगी भगवान दास ने आंबेडकर के भाषण को उद्धृत करते हुए लिखा कि 'बातचीत की सफलता का श्रेय महात्मा गांधी को दिया जाना चाहिए। मुझे यह स्वीकार करना ही होगा कि जब मैं महात्मा से मिला तब मुझे यह जानकार आश्चर्य हुआ, घोर आश्चर्य हुआ, कि मुझमें और उनमें कितनी समानताएं हैं।'

संयुक्त राष्ट्रसंघ में 2009 में हुई एक बहस में नस्ल और जाति को एक समान माना गया था। दोनों मामलों में गांधीजी, जो मानवीयता के जीते-जागते प्रतीक थे, ने शुरुआत उन शब्दावलियों के प्रयोग से की जो तत्समय प्रचलित थीं। जैसे-जैसे सामाजिक मुद्दों से उनका सरोकार बढ़ता गया उन्होंने नस्लवाद और जातिवाद के सन्दर्भ में नए शब्दों का प्रयोग करना शुरू कर दिया। जाति के प्रश्न पर वे आंबेडकर के विचारों से बहुत प्रभावित थे और उनके प्रति गहरा जुड़ाव रखते थे। यहां तक कि उन्होंने सिफारिश की थी कि आंबेडकर की किताब ‘जाति का उन्मूलन’ सभी को पढ़नी चाहिए।

नस्लवाद के मुद्दे पर उन्होंने उतनी गहराई से विचार नहीं किया, जितना कि जातिवाद पर। अस्पृश्यता के विरुद्ध उनके अभियान ने आंबेडकर के प्रयासों को बढ़ावा दिया। नेहरु ने आंबेडकर को अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर उन्हें नीति निर्माण करने का अवसर प्रदान किया। नेहरु ने समान नागरिक संहिता का मसविदा तैयार करने की जिम्मेदारी भी आंबेडकर को सौंपी और महात्मा गांधी की अनुशंसा और सलाह पर ही आंबेडकर को संविधान की मसविदा समिति का मुखिया नियुक्त किया गया।

केवल वे लोग ही गांधी पर नस्लवादी या जातिवादी होने का आरोप लगा सकते हैं जो उनके जीवन के केवल उस दौर पर फोकस करते हैं जब महात्मा अपने मूल्यों और विचारों को आकार दे रहे थे। आगे चल कर गांधीजी ने संकीर्ण सामाजिक प्रतिमानों को त्याग दिया और एक ऐसे राष्ट्रीय और वैश्विक बंधुत्व की स्थापना का स्वप्न देखा जिसमें नस्ल और जाति के लिए कोई जगह नहीं होगी।

(लेख का हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया)


02-Jul-2020 12:16 PM

-श्रवण गर्ग

एक सौ तीस करोड़ की देश की कुल आबादी में अगर अस्सी करोड़ लोगों को सरकार द्वारा दिए जाने वाले मुफ़्त के अनाज की ज़रूरत है वरना उन्हें या तो भूखे पेट रहना पड़ेगा या फिर आधे पेट सोना पड़ेगा तो क्या यह स्थिति अत्यंत भयावह नहीं है? क्या मुल्क के बाक़ी बचे कोई पचास करोड़ नागरिकों को देश की इस हकीकत का पहले से पता था या फिर उन्हें भी पहली बार ही आधिकारिक रूप से जानकारी हुई है और वह भी प्रधानमंत्री के द्वारा।इस का खुलासा प्रधानमंत्री ने मंगलवार को अपने सोलह मिनट और नौ सौ साठ शब्दों के सम्बोधन में किया। कोरोना काल के अपने छठे सम्बोधन में नरेंद्र मोदी की राष्ट्र के नाम सबसे महत्वपूर्ण घोषणा यही मानी जा सकती है कि ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना’ जो पूर्व में कोरोना संकट के पहले तीन महीनों के लिए ही प्रारम्भ की गयी थी उसे अब छठ पूजा के पर्व यानी नवम्बर अंत तक के लिए बढ़ाया जा रहा है। नवम्बर तक बिहार में चुनाव भी सम्पन्न होने हैं। इसी राज्य में लॉक डाउन के बाद कोई अठारह लाख प्रवासी मज़दूर बुरी हालत में अपने परिवार जनों के पास वापस भी लौटे हैं जो चुनावों को प्रभावित कर सकते हैं। नवम्बर के बाद इन अस्सी करोड़ लोगों का क्या होनेवाला है अभी खुलासा होना बाकी है। पेट की भूख तो नवम्बर के बाद भी इसी तरह से जारी रहने वाली है।

देश में अगर अस्सी करोड़ लोगों के परिवार मुफ़्त के सरकारी अनाज(प्रति व्यक्ति पाँच किलो गेहूं या चावल और एक किलो दाल प्रति माह) पर ही जीवन जीने को निर्भर हैं तो भारत में व्याप्त गरीबी और बेरोजगारों की कुल संख्या का अनुमान भी लगाया जा सकता है। साथ ही यह भी कि आज़ादी के बाद के तिहत्तर वर्षों, जिनमें कि वर्तमान सरकार के पिछले छह वर्ष भी शामिल हैं, हमने कितनी तरक्की की है! इस नयी जानकारी के बाद विदेशों में बसने वाले लाखों-करोड़ों भारतीय हमारी उपलब्धियों पर अपना सिर कितना ऊँचा कर पाएँगे ? प्रधानमंत्री ने गर्व के साथ बताया कि मुफ़्त अनाज सहायता प्राप्त करने वालों की संख्या अमेरिका की कुल आबादी से ढाई गुना, ब्रिटेन से बारह गुना और युरोपियन यूनियन की जनसंख्या से दुगनी है।प्रधानमंत्री की घोषणा का जवाब बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने इस ऐलान से किया कि वे अगले साल जून तक मुफ़्त चावल-दाल बाटेंगी यानी कि विधानसभा चुनावों तक।उन्होंने यह भी दावा किया है कि उनका चावल दिल्ली से ज़्यादा साफ़ है।अन्य राज्य सरकारों की घोषणाएँ बाक़ी हैं।

कृषि विशेषज्ञ और आमतौर पर सरकार की कथित किसान-विरोधी नीतियों के कठोर आलोचक देविंदर शर्मा ने भी प्रधानमंत्री की घोषणा का यह कहते हुए स्वागत किया है कि ‘एक तरफ़ अनाज का भरपूर भंडार है और दूसरी तरफ़ करोड़ों लोग भूखे हैं अत: यह कदम सराहनीय है।’ कोई भी इससे ज़्यादा कुछ कहने या पूछने की कोशिश नहीं करना चाहता।देश में जब दो तिहाई लोग अपना पेट भरने के लिए सरकार का मुँह ताक रहे हों और आधे या ख़ाली पेट रहकर ही कोरोना से लडऩे के लिए अपनी इम्यूनिटी बढ़ाने में भी जुटे हों तो वे क्यों और कैसे जान पाएँगे कि लद्दाख़ कहाँ है और चीन के साथ वहाँ क्या झगड़ा चल रहा है।अत: उचित रहा होगा कि प्रधानमंत्री ने भी अपने संदेश में चीन के साथ चल रहे तनाव का कोई जि़क्र ही नहीं किया।राहुल गांधी बेवजह ही हाय-तौबा मचा रहे हैं कि प्रधानमंत्री इधर-उधर की बातें करके देश का ध्यान भटका रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि लॉक डाउन के दौरान नागरिकों ने जिस सतर्कता का पालन किया था वह अब लापरवाही में परिवर्तित होता दिख रहा है जबकि उसकी इस समय और भी ज़्यादा ज़रूरत है।पूछा जा सकता है कि क्या पेट की भूख का थोड़ा बहुत सम्बंध इस बात से नहीं होता होगा कि लोग उसी अनुशासन की अब सविनय अवज्ञा कर रहे हैं जो उनपर बिना पर्याप्त सरकारी तैयारी किए और उन्हें भी करने का मौक़ा दिए बग़ैर अचानक से आरोपित कर दिया गया था ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि जनता अपने प्रधानमंत्री के कहे के प्रति धीरे-धीरे उदासीन होती जा रही है, उनके कहे का ठीक से पालन नहीं कर रही है और इनमें वे बाक़ी पचास करोड़ भी शामिल हैं जिन्हें मुफ़्त का अनाज नहीं चाहिए ? प्रधानमंत्री के दूसरे कार्यकाल का अभी पहला ही साल ख़त्म हुआ है।चार साल अभी और बाक़ी हैं।


02-Jul-2020 10:17 AM

दवाईयां इकट्ठा कर चैरिटेबल डॉक्टर्स तक पहुँचाना

“हमारे आस-पास बहुत से लोग हैं जो मदद करना चाहते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि कैसे करें। वहीं दूसरी तरफ, बहुत से लोगों को मदद की ज़रूरत है। हम इन दोनों तबकों के बीच का सेतु बनाना चाहते हैं ताकि सही मदद सही लोगों तक पहुँच सके।”
- निशा डागर

अक्सर लोगों के बीमारी से ठीक होने के बाद, उनकी बहुत-सी दवाईयां बच जाती हैं। ज़्यादातर घरों में आपको ऐसी बहुत-सी ऐसी दवाईयां मिल जाती हैं। कुछ समय बाद, हम इन दवाईयों को डस्टबिन का रास्ता दिखा देते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि जिस तरह इंजेक्शन की सूई का सही तरह से डिस्पोजल ज़रूरी है, वैसे ही दवाईयों का डिस्पोजल भी ज़रूरी होता है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, भारत के रजिस्टर्ड हेल्थकेयर सेक्टर से प्रति दिन लगभग 4,057 टन मेडिकल वेस्ट उत्पन्न होता है। साथ ही, भारत पूरे विश्व के लिए दवाओं के उत्पादन का केंद्र रहा है, लेकिन दवाइयों का सही निपटान न होना एक गंभीर समस्या है। दक्षिण भारत के एक इंडस्ट्रियल इलाके से मिले वेस्टवाटर के टेस्ट में एंटीबायोटिक की मात्रा काफी अधिक थी। सिप्रोफ्लोक्सासिन जैसे लगभग 21 दवाईयां इतनी ज्यादा मात्रा में इस पानी में छोड़ी गईं कि इन दवाईयों से लगभग 90,000 लोगों का इलाज किया जा सकता था।

हमारे देश की विडंबना यही है कि एक तबके के पास इतना ज्यादा है कि उनके यहाँ महंगी से महंगी दवाईयां भी कचरे में जाती है। तो वहीं, एक तबका इतना गरीब है कि वे दवाईयों पर शायद दस रुपये भी खर्च नहीं कर सकते। लेकिन अच्छी बात यह है कि इन दोनों तबकों के बीच इस खाई को पाटने का काम मुंबई के तीन युवा कर रहे हैं।

युग सांघवी, कृष्य मनियार और अयान शाह, तीनों दोस्त धीरुभाई अम्बानी इंटरनेशनल स्कूल में 12वीं कक्षा के छात्र हैं। ये तीनों मिलकर, ‘शेयर मेड्स’ नाम से एक अभियान चला रहे हैं, जिसके अंतर्गत ये समृद्ध तबके के घरों से बची हुई, लेकिन बिल्कुल सही दवाईयां लेकर चैरिटेबल क्लीनिक्स को देते हैं ताकि वहां से ये ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँच सकें। इससे ज़रूरतमंदों की मदद भी हो रही है और साथ ही, मेडिकल वेस्ट भी कहीं न कहीं कम हो रहा है।

 Ayaan Shah, Krishay Maniar, and Youg Sanghavi, Founders of ShareMeds

युग बताते हैं कि शेयरमेड्स की कहानी उनके दादाजी से शुरू होती है। उनके दादाजी को कैंसर डिटेक्ट हुआ और उनके परिवार ने हर संभव इलाज़ कराया। इस बीच उन्होंने कई उतार-चढाव देखे। “उनकी दवाईयां बहुत महंगी थीं। मैं एक समृद्ध परिवार से हूँ तो हम सारा खर्च मैनेज कर पाए। लेकिन उस समय मेरे दिमाग में आया कि गरीब लोग कैसे इतना कुछ मैनेज करते होंगे। इस एक विचार से मुझे लगा कि क्या हम कुछ कर सकते हैं और वहां से मैंने एक कजिन के साथ मिलकर ‘शेयरमेड्स’ का सफ़र शुरू किया,” उन्होंने आगे बताया।

साल 2017 से युग और उनके कजिन ने अपने स्तर पर लोगों से उनके घरों में बची हुई दवाईयां इकट्ठा करना शुरू किया। उनका उद्देश्य इन दवाईयों को इकट्ठा करके इन्हें चैरिटेबल डॉक्टर्स तक पहुँचाना था। युग अपने लेवल पर काम कर रहे थे और लोगों को इस बारे में जागरूक भी कर रहे थे कि कैसे उनकी ये मदद ज़रूरतमंद लोगों के काम आ सकती है।

साल 2019 में युग के इस सफर में उनके दोस्त, कृष्य और अयान भी जुड़ गए और तब से ये तीनों मिलकर इस अभियान को हर दिन बड़ा बनाने में जुटे हुए हैं। कृष्य बताते हैं कि फ़िलहाल वे बांद्रा, घाटकोपर, सांताक्रुज़ के इलाकों में काम कर रहे हैं।

समृद्ध और ज़रूरतमंदों के बीच बने सेतु:

Collecting Medicines

अअयान बताते हैं कि उनके इस अभियान के मुख्य दो काम है- पहला, दवाईयां इकट्ठा करना और दूसरा, इन दवाईयों को चैरिटेबल क्लिनिक्स और ट्रस्ट आदि तक पहुँचाना। लेकिन इसके पूरी प्रक्रिया में और भी बहुत-से ज़रूरी स्टेप्स हैं जिन्हें वे फॉलो करते हैं।

“सबसे पहला काम होता है लोगों को जागरूक करना। शुरुआत में, हम घर-घर जाकर दवाईयां इकट्ठा करते थे, पहले लोगों को बताते कि हम क्या कर रहे हैं और फिर उनके यहाँ से दवाईयां लेते। लेकिन अभी हम अलग-अलग जगह ड्राइव्स करते हैं,” युग ने बताया।

शेयर मेड्स मुंबई के अलग-अलग इलाकों में अब तक 14 ड्राइव्स कर चूका है, जिनमें मलाड, वोर्ली जैसे इलाके भी शामिल हैं। अपनी प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए अयान आगे बताते हैं, “हम जिस सेक्टर में काम कर रहे हैं, वहां हमें हर चीज़ का बहुत ध्यान रखना होता है। सबसे पहले तो हम उन दवाईयों को लेते हैं, जिनका बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं हुआ है और जिनकी एक्सपायरी तारीख बहुत बाद की है। इसके अलावा, दवाईयां अच्छे से पैक है इस बात को भी ध्यान में रखा जाता है। ख़ासतौर पर, सिरप आदि के मामले में, बिना सील पैक्ड सिरप हम नहीं लेते।”

कृष्य की माँ डॉक्टर हैं और उनके मार्गदर्शन में ही दवाईयों को इकठ्ठा करने के बाद अलग-अलग करके उनका कैटेलॉग तैयार किया जाता है। ताकि उनके पास एक रिकॉर्ड रहे। सभी दवाईयों को अच्छे से चेक किया जाता है और उसके बाद ही चैरिटेबल ट्रस्ट और क्लीनिक्स को दिया जाता है। यहाँ पर भी दवाईयां फिर से चेक होती हैं और उसके बाद ही मरीज़ों को दी जाती हैं।

युग कहते हैं कि कृष्य की माँ के डॉक्टर होने से उन लोगों को इस अभियान में काफी मदद मिल रही है। साथ ही, उनके फैमिली डॉक्टर्स भी उनके इस काम की सराहना करते हुए, उन्हें ऐसे डॉक्टरों से जोड़ रहे हैं, जो गरीब तबके के लिए काम करते हैं। बहुत-से डॉक्टर मुंबई के आस-पास के गांवों और कच्ची बस्तियों में लोगों के लिए मुफ्त मेडिकल कैंप लगाते हैं।
कृष्य कहते हैं कि पिछले एक साल में उन्होंने लगभग 15 हज़ार टेबलेट स्ट्रिप्स जमा करके दान की हैं। इनमें बुखार से लेकर सभी तरह की विटामिन आदि तक की दवाईयां थीं।

सफ़र की चुनौतियाँ:

कृष्य आगे बताते हैं कि उनके इस अभियान में कोई बहुत बड़ी इन्वेस्टमेंट नहीं है औरे जो थोड़ी-बहुत है, उसे वे तीनों आसानी से मैनेज कर लेते हैं। लेकिन इसके अलावा, उन्हें कई बार परेशानियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि कई बार लीगल परेशानियां हुईं। जैसे उन्होंने दवाईयां तो इकट्ठा कर लीं लेकिन जब बारी इन दवाईयों को क्लीनिक्स में देने की आई तो बहुत-सी जगह उन्हें मना कर दिया गया। हर कोई उनसे यही कहता कि अगर कुछ गलत हो गया तो।

“हमने क्लीनिक्स के डॉक्टरों से बात की, उन्हें हमारा उद्देश्य समझाया और उनसे कहा कि वे खुद दवाईयां चेक कर सकते हैं। काफी मुश्किलों के बाद, हर एक चीज़ जांचकर क्लीनिक्स ने हमारी दवाईयां लीं। लेकिन अब स्थिति थोड़ी बेहतर हुई है क्योंकि अब हम नियमित रूप से लगभग 5 चैरिटेबल क्लीनिक्स को ये दवाईयां पहुँचा रहे हैं,” उन्होंने आगे कहा।

उनके इस अभियान पर लोगों की प्रतिक्रिया के बारे में बात करते हुए युग ने हमारे साथ एक किस्सा साझा किया। वह कहते हैं, “एक ड्राइव के दौरान हमें एक महिला ने कहा कि कुछ दिन पहले उनके पिता का देहांत हुआ है और उनके काफी इंजेक्शन घर पर बिना इस्तेमाल के बची हुई हैं। जब हम उनके घर पहुंचे तो उन्होंने सभी दवाईयां काफी अच्छे से छांटकर हमें दीं और साथ ही, वह बता रहीं थीं कि किस दवाई को किस लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। उस दिन हमें लगा कि बहुत से लोग हैं जो अपना दुःख भुलाकर लोगों की मदद करना चाहते हैं, उन्हें बस एक ज़रिया चाहिए।”

वहीं दूसरी तरफ, अयान ने बताया कि कैसे एक बार, एक रिक्शावाला उनके और उनकी मां के पास आया था क्योंकि उसे अपनी पत्नी के लिए आँखों की दवाई आवश्यकता थी। लेकिन वह उसे खरीद पाने में असमर्थ था और अयान ने उनकी मदद की। वह कहते हैं कि उनका उद्देश्य इसी गैप को भरना है। जो लोग मदद करना चाहते हैं और जिन्हें मदद की ज़रूरत है, उनके बीच एक सेतु का काम कर रहे हैं।

आगे की योजना:

फ़िलहाल, कोरोना वायरस के चलते उनका यह काम बंद हैं। लेकिन इस लॉकडाउन में भी ये तीनों अपनी तरफ से ज़रूरतमंदों की हर संभव मदद कर रहे हैं। उन्होंने दवाईयों का कलेक्शन अभी रोका हुआ है। लेकिन इसके बदले उन्होंने गरीब लोगों को मास्क, सैनीटाइज़र आदि बांटना शुरू किया।

“सोसाइटी के गार्ड से लेकर सब्ज़ी बेचने वालों तक, हमने बहुत से लोगों को मास्क आदि बांटे हैं। इसके अलावा, हमने डॉक्टरों के साथ वीडियो इंटरव्यू भी करना शुरू किया है ताकि कोविड-19 से संबंधित मिथकों के बारे में लोगों को जागरूक करें,” उन्होंने आगे बताया।

जैसे ही परिस्थितियाँ ठीक होंगी, शेयरमेड्स की टीम एक बार फिर अपने अभियान में जुट जाएगी। आगे उनका उद्देश्य इस अभियान को और बड़े स्तर पर लेकर जाना है, जहां वे ज्यादा से ज्यादा लोगों की मदद कर सकें। अगर आप इनके अभियान के बारे में अधिक जानना चाहते हैं और कोई मदद करना चाहते हैं तो उनके फेसबुक पेज पर संपर्क कर सकते हैं!  (hindi.thebetterindia.com)

 


02-Jul-2020 9:43 AM

शेख और परिवार 3 दशक से मंदिर की देख-रेख कर रहे हैं.

-सुहैल ए शाह

ग़ुलाम नबी शेख़ की वजह से यह विश्वास कर पाना मुश्किल है कि कश्मीर के अनंतनाग जिले में स्थित इस मंदिर में सालों से किसी ने पूजा-अर्चना नहीं की है
पिछले करीब 30 सालों से ग़ुलाम नबी शेख रोज़ फ़जर की नमाज़ मस्जिद में पढ़ने के बाद उनके घर के पास ही स्थित ज़यादेवी (जयदेवी) मंदिर का रुख करते हैं. पूरे मंदिर का जायजा लेकर जब उन्हें संतुष्टि हो जाती है कि हर चीज़ अपनी जगह पर ही है और सही है, तभी वे अपने घर लौट कर नाश्ता करते हैं.

65 साल के शेख और उनका परिवार दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में स्थित बिजबेहरा कस्बे में रहता है. वे पिछले करीब तीन दशक से इस मंदिर की देख-रेख करते आ रहे हैं. न केवल वे बल्कि उनका परिवार भी. इस मंदिर की चाबी भी उन्ही के पास है. वे हर महीने दो-तीन बार अपने बेटे के साथ मिलकर इस मंदिर की सफाई भी करते हैं.

इस मंदिर को देखकर ऐसा बिलकुल अनुभव नहीं होता है कि इसमें सालों से किसी ने पूजा-पाठ नहीं किया है. पूजा-पाठ तो दूर शायद सालों से इस मंदिर में कोई हिंदू श्रद्धालु आया भी नहीं है. तो क्यों एक मुसलमान परिवार, कुछ लोगों से दुश्मनी मोलकर लेकर भी इस मंदिर की देख-रेख बिलकुल वैसे ही करता है जैसे कि वह किसी मस्जिद की करेगा.

कहानी कश्मीर में, कुछ दशक पहले तक, सदियों से साथ-साथ रह रहे मुसलमानों और पंडितों की है.

यह कहानी शेख के बचपन से ही शुरू हो गयी थी. ‘यह तब की बात है जब कश्मीर में मुसलमान और पंडित मिल-जुल कर एक परिवार की तरह रहा करते थे” शेख मंदिर के पास ही हुई सत्याग्रह से मुलाकात में बताते हैं.

शेख और बिजबेहारा के दूसरे लोग भी बताते हैं कि उन दिनों इस मंदिर के अहाते में हर त्योहार पर मेला लगा करता था.

“चाहे वो ईद हो, दिवाली हो, होली हो या और कोई त्योहार. यहां हमेशा मेला लगता था और पूरे शहर से बच्चे, जवान, बूढ़े और औरतें यहां आते थे. बच्चे खेलते-कूदते थे और बड़े आपस में गप्पें लड़ाते थे. दुकानें लगती थीं यहां और खूब जश्न होता था. तब मजहब से परे यहां सब इंसान थे” बिजबेहरा में ही रहने वाले 70 साल के ग़ुलाम हसन हजाम सत्याग्रह को बताते हैं.

मंदिर के करीब ही रहने वाले शेख हर ऐसे मेले में हमेशा हिस्सा लेते थे, फिर चाहे वह त्योहार मुसलमानों का हो या पंडितों का. “यूं कह लें कि इस मंदिर से मेरा बचपन जुड़ा हुआ है” गुलाम नबी शेख कहते हैं.

जवानी आई और शेख रोजगार की तलाश में निकल पड़े. यहां-वहां किस्मत आजमाने के बाद उनकी मुलाक़ात वैशव नाथ जुत्शी, से हो गयी. जुत्शी का मंदिर के बगल में ही सेब का बाग था जिसकी देख-रेख करने के लिए उन्हें एक आदमी की ज़रूरत थी. तो शेख जुत्शी के बाग की देख-रेख करने लग गए. कुछ सालों बाद जुत्शी के ही प्रयत्नों से गुलाम नबी शेख को स्वास्थ विभाग में नौकरी मिल गयी.

“लेकिन नौकरी मिलने के बावजूद मैंने उनके बाग में काम करना नहीं छोड़ा” शेख बताते हैं. एक दिन बाग में काम करते-करते ही उनकी नज़र मंदिर के अहाते पर पड़ी जहां काफी बड़ी घास उग आई थी.

शेख ने मंदिर के आस-पास उगी घास काटने के बाद वहां फूलों की क्यारियां लगा दीं. लेकिन जहां एक तरफ मंदिर के सहन में फूलों की क्यारियां लग रही थीं, वहीं कश्मीर घाटी में एक नए दौर की शुरुआत भी हो रही थी. यह दौर अभी तक चल रहा है और हज़ारों लोगों की जान भी ले चुका है.

1988 के अंत में जम्मू कश्मीर लिबेरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ़्फ़) नाम का एक मिलिटेंट गुट कश्मीर में सक्रिय हुआ और जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करने के प्रयास में जुट गया.

यह चीज़ कश्मीर के मुसलमानों के लिए भी उतनी ही नयी थी जितनी कि पंडितों के लिए. लेकिन पंडितों में भय ने तब सिर उठाया जब 14 सितंबर,1989 में टीका लाल टपलू नाम के वकील (और भारतीय जनता पार्टी के नेता) की उनके श्रीनगर में स्थित घर में घुस कर हत्या कर दी गयी.

4 नवम्बर 1989 को एक और हत्या हुई, इस बार हाइ कोर्ट के जज नीलकंठ गंजू मारे गए. गंजू ने जेकेएलएफ़ के संस्थापक, मक़बूल भट, को 1968 में एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या के आरोप में फांसी की सज़ा सुनाई थी. उस समय वे एक निचली अदालत में जज हुआ करते थे. 1982 में भारत के सूप्रीम कोर्ट ने यह सज़ा सही ठहराई थी और 1984 में भट को फांसी दे दी गयी थी. इस हत्या का बदला लेने के उद्देश्य से जस्टिस गंजू की जम्मू-कश्मीर के हाई कोर्ट के पास ही हत्या कर दी गई.

इन दो हत्याओं को फिर भी राजनीतिक दृष्टि से देखा जा रहा था. लेकिन आने वाले सालों में हालात बिगड़ते ही रहे.

“न सिर्फ पंडित, बल्कि काफी ऐसे मुसलमान भी मारे गए जो सरकार में थे या फिर सरकार के लिए काम किया करते थे, या किसी भी प्रकार सरकार के करीब थे” श्रीनगर के एक वरिष्ठ पत्रकार सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

हत्याओं का सिलसिला चलता रहा और पंडितों में भय का माहौल गहराता गया. जहां सरकारी आंकड़े यह कहते हैं कि 219 पंडित 1989 और 2004 के बीच में मारे गए हैं वहीं अलग-अलग पंडित संस्थाएं अलग-अलग आंकड़ों के दावे करती आई हैं.

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति इस दौरान मारे गए पंडितों की संख्या 650 बताती है और वहीं पनुन कश्मीर नाम की एक और संस्था यह संख्या 1000 से ऊपर बताती है. इस बात पर लेकिन सभी को इत्तेफाक है कि ज़्यादातर (75 प्रतिशत से ज़्यादा) ऐसी हत्याएं 1989 और 1991 के बीच ही हुई थीं.

कुछ पंडित संस्थाएं यह भी कहती हैं कि 1990 में कई स्थानीय अखबारों में पंडितों को कश्मीर छोड़ कर चले जाने की धमकियां दी गयी थीं. इनके मुताबिक घाटी में रहने वाले पंडितों के घरों के बाहर पोस्टर भी लगाए गए थे जिनमें उन्हें धमकाया गया था और मस्जिदों से ऐसे ऐलान भी किए गए थे जिनमें लोगों को पंडितों के घर लूटने के लिए उकसाया गया था.

“ये ऐसी चीज़ें हैं जो शायद हुई हों या नहीं भी हुई हों या उतनी नहीं हुई हों. इनको कौन सिद्ध या रद्द कर सकता है. लेकिन वो ऐसा वक़्त था जब कश्मीर में मुसलमान भी मारे जा रहे थे और भय चारों तरफ था. ऐसे माहौल में जहां हर किसी को अपनी जान के लाले पड़े हों इन सब चीजों का हिसाब कौन रखता है” एक और पत्रकार, जिन्होंने 90 के दशक में ही पत्रकारिता करना शुरू कर दिया था, सत्याग्रह को बताते हैं.

लेकिन वे यह भी कहते हैं कि उन दिनों कश्मीर में अखबार वाले मिलिटेंट गुटों की प्रेस रिलीज ज़रूर छापा करते थे. “अब उनमें पंडितों को धमकियां मिली या नहीं मैंने अपनी आंखों से नहीं देखा है.”

1991 आते-आते कश्मीर के हालात काफी बिगड़ चूके थे और फिर उसी साल जनवरी में 18 और 19 तारीख के बीच की रात ज़्यादातर कश्मीरी पंडित घाटी छोड़ कर जम्मू चले गए. कश्मीर छोड़ के जाने वाले पंडितों की संख्या भी विवादित है.

जहां कुछ संस्थाएं मानती हैं कि उस रात करीब एक से डेढ़ लाख पंडितों ने कश्मीर को छोड़ दिया था, वहीं कुछ संस्थाएं इस संख्या को छह से सात लाख तक बताती हैं.

“यह जो सात लाख की संख्या बताई जाती है यह पिछली कई शताब्दियों में कश्मीर छोड़ कर जाने वाले हिंदुओं की है,” ट्रिनिटी कॉलेज डब्लिन में पढ़ाने वाली, मृदु राय अपनी एक किताब “अनटिल माइ फ्रीडम हैस कम’ में लिखती हैं.

अब चाहे मारे कितने भी लोग गए हों और कश्मीर छोड़ कर कितने लोग गए हों, हक़ीक़त यह है कि पंडित कश्मीर से चले गए और उनके घर और मंदिर पीछे छूट गये. उसके बाद से ज़्यादातर पंडित जम्मू में ही रह रहे हैं.

“उस वक्त ज़्यादातर पंडितों को लगा था कि वे तान-चार महीनों में ही वापस आ जाएंगे. किसी को यह नहीं पता था कि उन्हें सालों बाहर रहना पड़ेगा” पंडित हिन्दू वेलफ़ेयर सोसाइटी के अध्यक्ष, मोतीलाल भट, एक इंटरव्यू में कहते हैं. भट उन गिने-चुने लोगों में से हैं जो कश्मीर छोड़ कर नहीं गए.

कश्मीर में रहने वाले काफी मुसलमान यह भी कहते हैं कि पंडितों को भारत सरकार ने इसलिए यहां से निकाल दिया था ताकि मुसलमानों को मार सकें. “ऐसा सोचने वाले लोगों के लिए, पंडितों के यहां से जाने के बाद, हुई चीज़ें उनके यकीन को और पक्का करती हैं” कश्मीर में सिविल सेवाओं की तैयारी कराने वाली एक कोचिंग में इतिहास पढ़ाने वाले इम्तियाज़ शेख सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

इम्तियाज़ का इशारा 21 जनवरी 1990 को हुए गौकदल नरसंहार की ओर है जिसमें 150 से अधिक मुसलमान सुरक्षा बलों की गोलियों से मारे गए थे. “या फिर जकूरा और टेंगपोरा नरसंहार, जिनमें 33 लोग मारे गए थे; या कुनन पोशपोरा समूहिक बलात्कार. ऐसी कई चीज़ें हुई जिससे लोगों को लगा कि पंडितों का कश्मीर से जाना एक सोची समझी साजिश थी” इम्तियाज़ कहते हैं.

आने वाले सालों में हजारों कश्मीरी मुसलमानों की जानें गयीं और कश्मीरी पंडित अपने घरों में लौटने को तरसते रहे.

पंडित अब चले गए थे. वहीं शेख की ज़िंदगी भी कोई मजे से नहीं कट रही थी. हर जगह फ़ाइरिंग, धमाके और फिर सुरक्षा बलों द्वारा किए जाने वाले लगभग रोज़ के “क्रैकडाउन” जिनमें लोगों को अपने घरों से निकाल कर एक जगह जमा कर लिया जाता था और मिलिटेंट्स को ढूंढ़ने के लिए उनके घरों की तलाशी ली जाती थी. बाहर निकाले गए लोगों की भी शिनाख्ती परेड होती थी और कइयों को शक की बिना पर भी गिरफ्तार कर लिया जाता था.

“और अगर सुरक्षा बालों पर कभी फ़ाइरिंग होती थी तो वे घरों में घुस कर भी मार-पीट करते थे” बिजहेबरा के कुछ लोग सत्याग्रह को बताते हैं.

ग़ुलाम नबी शेख भी इस सब से परेशान होकर अपना घर छोड़ कर पास के एक मोहल्ले में अपने रिश्तेदारों के पास रहने चले गए थे. “ऐसा नहीं था कि वहां ये सब नहीं था, लेकिन साथ रह के एक दूसरे को हिम्मत और दिलासा देके दिन कट रहे थे,”

शेख ने अपना घर इसलिए भी छोड़ दिया क्योंकि वह हाइवे के काफी नजदीक था और वहां आए दिन कुछ न कुछ होता ही रहता था, “मैं चाहता था कि मैं अपने बच्चों को सुरक्षित रखूं. मुझे डर था किसी दिन कुछ ऐसा न हो जाये जिसके बाद मुझे पछताना पड़े,”

हुआ भी बिलकुल वही जो शेख सोच रहे थे. 22 अक्टूबर, 1993 को सीमा सुरक्षा बल की फ़ाइरिंग में 33 लोग, शेख के घर के पास ही मारे गए थे. फ़ाइरिंग वहां प्रदर्शन कर रहे कश्मीरियों पर हुई थी. इसमें 200 से ज़्यादा लोग घायल हो गए थे.

“मैं दो तीन साल अपने रिश्तेदारों के घर पर ही रहा, लेकिन उस बीच भी में जुत्शी के बाग को देखने ज़रूर आता था. साथ ही साथ, धीरे-धीरे, में मंदिर की भी देखभाल करने लगा” शेख बताते हैं.

जब शेख 1994 में अपने घर वापिस लौटे तो उन्होने पूरी तरीके से मंदिर की देखभाल अपने ज़िम्मे ले ली. जहां कश्मीर में कई मंदिर देख-रेख न होने के चलते असामाजिक तत्वों के हत्थे चढ़ गए थे वहीं ज़यादेवी (जयदेवी) मंदिर, शेख के रख-रखाव की वजह से बिलकुल बिलकुल सही हालत में है.

“भले ही जुत्शी जी ने अपना बाग बेच दिया लेकिन मैंने मंदिर की देख-रेख करना नहीं छोड़ा. मैंने मंदिर के दरवाजे और इसके अहाते पर लगे दरवाजे पर ताला लगा दिया. इनकी चाबी मेरे पास ही रहती है, सालों से. हर महीने में और मेरा बेटा पूरे मंदिर को धोते हैं और वहां उग आई घास वगैरह साफ करके इसको वैसे ही रखते हैं जैसे हमारे पंडित भाई रखते थे, जो अब यहां नहीं हैं” शेख थोड़ा दुखी होकर कहते हैं.

कुछ स्थानीय पंडित परिवार, जो अब जम्मू में रहते हैं, पहले कभी-कभार आया यहां करते थे और शेख का शुक्रिया अदा करते थे, लेकिन अब सालों हो गए यहां कोई नहीं आया है. लेकिन शेख और उनका परिवार इस मंदिर की पूरी ज़िम्मेदारी उठाने में कोई कोताही नहीं बरतते हैं. लेकिन ऐसा करना सिर्फ इसलिए विशेष नहीं है क्योंकि वे हिंदू नहीं हैं.

लेकिन सुनने में यह जितना आसान है उतना करने में है नहीं. शेख को बीते सालों में इस मंदिर की देखभाल करने की वजह से बहुत सी मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा है.

90 के दशक के आखिरी सालों में पास में तैनात सुरक्षा बल इस मंदिर के बारे में सुन कर यहां आने लगे थे और कभी-कभार उसमें पूजा भी किया करते थे.

“एक दिन वो लोग आए और देखा कि किसी ने मंदिर कि छत्त पे भेड़ का फेफड़ा फेंका हुआ था. इससे वो बहुत उत्तेजित हो गए थे और में उन्हें समझा-समझा के थक गया था कि कश्मीरी पंडित इस चीज़ को बुरा नहीं समझते थे. वे लोग भी कभी-कभी ऐसी चीज़ें परिंदों के खाने के लिए डाल दिया करते थे. लेकिन वे सुरक्षा कर्मी बाहर के थे और कश्मीरी पंडितों की संस्कृति से बेखबर. तो जब मुझे लगा कि अब वे लोग मेरी पिटाई करने वाले हैं तो मैंने छत्त पे चढ़ के खुद वो फेफड़ा उतारा” शेख ने बताया.

अब सुरक्षाकर्मी नहीं आते. लेकिन परेशानियां जब-तब दूसरे रूपों में उनके सामने आती ही रहती हैं. शेख को परेशान करने वालों में सबसे आगे इलाक़े के नशेड़ी हैं, जिन्हें यह लगता है कि मंदिर वाली जगह उनके बैठने के लिए एक सुरक्षित स्थान हो सकता था, जहां वे आराम से बैठकर नशा कर सकते थे.

“दूसरी तरफ उनको लगता है कि मंदिर में शायद बेचने लायक कोई चीज़ हो जिसको चुरा कर वो अपने नशे का इंतजाम कर सकते हैं. लेकिन मैं ऐसा नहीं होने देता और इसके चलते इस इलाक़े के सारे नशेड़ियों से मैंने दुश्मनी मोल ले रखी है” शेख बताते हैं.

उधर मंदिर के पास खूबनी के कुछ पेड़ भी हैं और काफी छोटे छोटे लड़के हर वक़्त उसका फल चुराने की ताक़ में रहते हैं. “और फिर वो पड़ोसी जिनको लगता है कि मैंने शायद मंदिर की ज़मीन पे कब्जा कर लिया है” शेख कहते हैं, “वो लोग भी मुझे शक की निगाह से देखते हैं और फिर सबका एक ही सवाल कि मैंने किस हक़ से मंदिर पे ताला लगा के चाबी अपने पास रखी है.”

शेख इन सब चीजों को नज़रअंदाज़ करते हुए मंदिर की देखभाल कर रहे हैं, लेकिन अब उनको कुछ और भी चीजों से डर लगने लगा है.

“मैंने काफी लोगों से इस मंदिर के चलते दुश्मनी मोल ले रखी है और हर इंसान एक ही सोच का नहीं होता. मान लो कल को किसी ने इस मंदिर को कोई नुकसान पहुंचाया तो शायद सबसे पहले पुलिस मुझे ही पकड़ कर ले जाएगी. फिर मेरी कौन सुनेगा” शेख पूछते हैं.

वहीं अब उनकी उम्र भी ढल रही है, और वो चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी मंदिर के असली हकदार आकर इसको अपने हाथों में लें और उनको इस ज़िम्मेदारी से मुक्त करें.

“अब जो मैंने कर लिया शायद मेरे बच्चे न कर पाएं. मैंने कई फोन किए, जितने भी पंडितों को मैं जानता हूं और उनसे विनती की इस मंदिर को अपने हाथों में लेने की. लेकिन अभी तक कोई सामने नहीं आया है” शेख बताते हैं.

अब पता नहीं पंडित कश्मीर कब लौटेंगे और कब शेख अपनी इस पवित्र जिम्मेदारी से मुक्त होंगे, लेकिन इतने साल इस मंदिर की देखभाल करके शेख ने सांप्रदायिक सौहार्द्र की एक ऐसी मिसाल कायम की है, जो आज-कल विलुप्त होने के कगार पर खड़ी दिख रही है.

लेकिन शेख कहते हैं उन्होने वही किया जो सही था. “वही जो एक पंडित करता अगर मुसलमान कश्मीर से चले गए होते.”  (satyagrah.scroll.in)
 


01-Jul-2020 8:04 PM

आज भारतीय सेना के गौरव शहीद अब्दुल हमीद का यौमे विलादत है। जब भी यह दिन आता है, मेरे मन में बीस साल पहले की एक भयानक रात की स्मृतियां कौंध जाती हैं। तब मैं मुंगेर जिले का एस.पी हुआ करता था। आज ही के दिन आधी रात को शहर के नीलम सिनेमा चौक पर सांप्रदायिक दंगे की भयावह स्थितियां बन गई थीं। संवेदनशील माने जाने वाले उस चौक पर एक तरफ मुसलमानों के मुहल्ले थे और दूसरी ओर हिंदुओं की आबादी। मैं चौक पर पहुंचा तो देखा कि एक तरफ सैकड़ों मुसलमान जमा थे और दूसरी तरफ सैकड़ों हिन्दू। दोनों तरफ से उत्तेजक नारे लग रहे थे। बीच-बीच में पटाखों भी छूट रहे थे। मेरे साथ सुविधा यह थी कि इस शहर और जिले के लोग मेरा सम्मान बहुत करते थे। मैं साथी पुलिसकर्मियों के मना करने के बावज़ूद मुसलमानों के मुहल्ले में घुस गया।

मुझे अपने बीच पाकर वे लोग शांत होने लगे। कुछ युवा मेरे पास आए तो मैंने बवाल की वजह पूछी। उन्होंने बताया कि वे चौक पर शहीद अब्दुल हमीद के स्मारक की बुनियाद रख रहे थे कि कुछ ही देर में सैकड़ों हिन्दू जमा होकर उसे तोडऩे की कोशिश करने लगे। मैंने पूछा- ‘क्या आप लोगों ने स्मारक बनाने के लिए प्रशासन से अनुमति ली थी ? क्या लोगों को पता था कि यहां किसके स्मारक की बुनियाद रखी जा रही थी ?’ मेरे सवालों पर वे बगले झांकने लगे। मैं समझ गया। मैंने उन्हें आश्वस्त किया- ‘चौक पर शहीद का स्मारक बनेगा और सबके सहयोग से बनेगा। आप लोग घर जाओ, मैं ख़ुद रात भर यहां रहकर बुनियाद की हिफाजत करूंगा।’ कुछ ही देर में सभी मुस्लिम घर लौटने लगे। पटाखों की आवाज़ें इधर बंद हुई, मगर दूसरी तरफ अब भी आतिशबाज़ी हो रही थी।

मैं हिंदुओं की तरफ गया तो उत्तेजित लोगों ने बताया कि उन्हें पता चला था कि मुसलमान शहर के व्यस्त चौराहे पर चोरी-चोरी किसी मुस्लिम की मज़ार बना रहे हैं। वे विरोध करने पहुंचे हैं। मैंने उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया तो पल भर में उनका गुस्सा काफूर हो गया। मैंने उन्हें बताया कि सिर्फ संवादहीनता और गलतफहमी की वजह से ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बनी है। अब्दुल हमीद का नाम सुनकर इधर से भी आतिशबाजी बंद हो गई और लोग लौटने लगे। मैं अखबार बिछाकर प्रस्तावित स्मारक पर बैठ गया और शहीद को याद कर कहा-माफ़ करना हमारे आज़ाद भारत के अभिमन्यु, वे लोग नहीं जानते कि वे तुम्हारे नाम पर क्या करने जा रहे थे!

आज मुंगेर के नीलम सिनेमा चौक पर आम लोगों के सहयोग से बना शहीद अब्दुल हमीद का स्मारक शान से खड़ा है जिस पर न केवल सभी संप्रदायों के लोग पुष्पांजलि अर्पित करते हैं, बल्कि राष्ट्रीय पर्वों के दिन वहां झंडोत्तोलन भी होता है।


01-Jul-2020 8:03 PM

चाइनीज एप्स तो डिलीट हो जाएंगे लेकिन एक बार भारत की सबसे बड़ी चीनी कम्पनी के बारे में तो जान लीजिए! और वह है आपके फोन में मौजूद, आपकी दुकान में मौजूद पेटीएम।

चीनी कम्पनी अलीबाबा की होल्डिंग वाली पेटीएम देश की सबसे बड़ी ई पेमेंट कंपनी है, कुछ भोले-भाले लोग पेटीएम का मालिक विजय शेखर शर्मा को समझते है क्योंकि वही इस कंपनी के मुख्य प्रबंधक निदेशक भी हैं। लेकिन क्या आप जानते है कि उनके पास कंपनी की कितनी हिस्सेदारी है? उनके पास कम्पनी की मात्र 15.7 फीसदी हिस्सेदारी ही है। (बकौल इकनॉमिक टाईम्स 2019)

पेटीएम की मुख्य कंपनी का नाम है वन 97 कम्युनिकेशन लिमिटेड. यह सिंगापुर की कम्पनी है अब यही से सारा कन्फ्यूजन शुरू होता है क्योंकि अलीबाबा ने भी अपना निवेश चीन की अपनी मूल कंपनी के जरिए नहीं किया है। बल्कि उसने पेटीएम में निवेश अपनी एक सहयोगी कंपनी, जो सिंगापुर में रजिस्टर्ड है, उसके जरिए किया है. पेटीएम में निवेश करने वाली कंपनी का नाम है ‘अलीबाबा सिंगापुर होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड’

अलीबाबा ने 2015 में पेटीएम में 41 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने की घोषणा की थी। दरअसल तभी अलीबाबा के जैक मा भारत मे आये थे और मोदी जी से भी मिले थे पेटीएम का असली उभार नोटबंदी के बाद से ही शुरू हुआ था, पेटीएम जो चीन के अलीबाबा की फंडिंग हासिल कर चुकी थी मोदी जी नोटबंदी के दूसरे दिन उसके पोस्टरबॉय बने हुए थे।

दरअसल पेटीएम के मॉडल को अलीबाबा कम्पनी के पेमेन्ट गेटवे अलीपे की ही तरह ही डेवलप किया गया था, 2018 में पेटीएम ई-कॉमर्स में अलीबाबा सिंगापुर की हिस्सेदारी कम होकर 36.31 फीसदी हो गई मायासोशि सोन की सॉफ्टबैंक ने भी अपनी हिस्सेदारी प्रत्यक्ष तौर पर कंपनी में 20 प्रतिशत कर ली थी लेकिन चीन में भी दोनों कंपनियों की एक दूसरे में हिस्सेदारी है इसलिए यह मामला उलझा हुआ है, पेटीएम के बाकी के शेयर एसएपी वेंचर्स, सिलिकॉन वैली बैंक, पेटीएम की मैनेजमेंट टीम और अन्य इनवेस्टर्स के पास हैं।

एसएआईएफ पार्टनर्स इंडिया की हिस्सेदारी 4.66 फीसदी है 2017 में अनिल अंबानी के पास जो एक प्रतिशत शेयर पेटीएम का था उसे भी अलीबाबा ने खरीद लिया था, एक बड़ा हिस्सा अलीबाबा की ऐंट फाइनेंशियल के पास भी है यानी अगर स्पष्ट रूप से देखा जाए तो 2020 में भी चीनी अलीबाबा ग्रुप और उसकी सहयोगी ऐंट फाइनेंशियल के पास वन 97 कम्युनिकेशंस के सबसे ज्यादा शेयर है। केवल दिखावे के लिए एक भारतीय को कम्पनी का मुख्य चेहरा बना रखा है।

अलीबाबा की टीम ही पेटीएम के ऑपरेशन के रिस्क कंट्रोल कैपेसिटी को डेवलप करती है। और जानकार लोग बताते हैं कि रिस्क कंट्रोल कैपेसिटी ही किसी भी ऑनलाइन कंपनी की बैक बोन यानी रीढ़ की हड्डी होती है।

पेटीएम कोई छोटी-मोटी कम्पनी नहीं है पिछले दिनों विजय शेखर शर्मा का एक साक्षात्कार प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने दावा किया कि देश के ऑनलाइन भुगतान में अब भी पेटीएम की हिस्सेदारी 70 से 80 फीसदी हो गयी है, रेलवे की टिकट बेचने की जिम्मेदारी के लिए सिर्फ पेटीएम के पेमेंट गेटवे को ही अधिकृत किया है रेलवे के टिकट बिक्री में रोज करोड़ों नहीं अरबो का ट्रासिक्शन होता है इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी चीनी होल्डिंग वाली पेटीएम को क्यों दी गई सवाल तो खड़ा होता ही है?

कैसे चीनी कंपनियों से जुड़ी पेटीएम देश की सबसे बड़ी फिनटेक कम्पनी बन गयी सवाल तो खड़ा होता है और सवाल तो ये भी खड़ा होता है कि यह सब जानते बुझते हुए आज सरकार पेटीएम पर कैसे और किस प्रकार की कार्यवाही करेगी?

 


01-Jul-2020 8:02 PM

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

सरकार ने घोषणा की है कि उसने चीन के 59 मोबाइल एप्लीकेशंस (मंचों) पर प्रतिबंध लगा दिया है। उसका कहना है कि इन चीनी मोबाइल मंचों का इस्तेमाल चीनी सरकार और चीनी कंपनियां जासूसी के लिए करती होंगी। इनका इस्तेमाल करनेवाले लोगों की समस्त गोपनीय जानकारियां चीनी सरकार के पास चली जाती होंगी। इतना ही नहीं, इन मंचों से चीनी कंपनियां हर साल अरबों रु. भी कमाकर चीन ले जाती हैं। सरकार ने इन पर प्रतिबंध लगा दिया, यह अच्छा किया।

टिक टोक जैसे मंचों से अश्लील और अभद्र सामग्री इतनी बेशर्मी से प्रसारित की जा रही थी कि सरकार को इस पर पहले ही प्रतिबंध लगा देना चाहिए था। मुझे आश्चर्य है कि भारतीय संस्कृति की पुरोधा यह भाजपा सरकार इन चीनी प्रचार-मंचों को अब तक सहन क्यों करती रही ? जो लोग इस चीनी ‘एप्स’ को देखते हैं, उन्होंने मुझे बताया कि हमारे नौजवानों को गुमराह करने में इनकी पूरी कोशिश होती है। बांग्लादेश और इंडोनेशिया- जैसे कई देशों ने इन चीनी मोबाइल मंचों पर काफी पहले से प्रतिबंध लगा रखा है।

असली बात तो यह है कि चीन की तथाकथित साम्यवादी सरकारों के पास आज न तो कोई विचारधारा बची है और न ही उन्हें अपनी प्राचीन संस्कृति पर गर्व है। चीन अब अमेरिका की नकल पर शुद्ध उपभोक्तावादी राष्ट्र बन गया है। पैसा ही उसका भगवान हैं। डालरानंद ही ब्रह्मानंद है। बाकी विचारधारा, सिद्धांत, आदर्श, परंपरा और नैतिकता- जैसी चीजें चीन के लिए सब मिथ्या है।

चीनी चीज़ों से भारत में भी चीन की इन्ही प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिल रहा है। जरुरी यह है कि इन पर तो रोक लगे ही, चीन की ऐसी चीज़ों पर भी एकदम या धीरे-धीरे प्रतिबंध लगना चाहिए, जो गैर-जरुरी हैं, जैसे खिलौने, कपड़े, जूते, सजावट का सामान और रोजमर्रा के इस्तेमाल की कई छोटी-मोटी चीजें। इससे भारत में आत्म-निर्भरता बढ़ेगी और विदेशी मुद्रा भी बचेगी। लेकिन जैसा कि केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी ने कहा है, आंख मींचकर सभी चीनी चीज़ों का हम बहिष्कार करेंगे तो हमारे सैकड़ों कल-कारखाने ठप्प हो जाएंगे और लाखों लोगों को बेरोजगार होना पड़ेगा। इन मोबाइल एप्लीकेशंस के बंद होने का बड़ा राजनयिक फायदा भारत सरकार को इस वक्त यह भी हो सकता है कि चीन पर जबर्दस्त दबाव पड़ जाए। चीनी सरकार को यह संदेश पहुंच सकता है कि यदि उसने गलवान घाटी के बारे में भारत के साथ विवाद बढ़ाया तो फिर यह तो अभी शुरुआत है। बाद में 5 लाख करोड़ रु. का भारत-चीनी व्यापार भी खतरे में पड़ सकता है। (नया इंडिया की अनुमति से)


01-Jul-2020 7:09 PM

नई दिल्ली, 1 जुलाई ।लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन की सेना के बीच हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिकों की मौत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के कूटनीतिक कामकाज को लेकर लगातार चर्चा हो रही है.

बीते कुछ दिनों के दरम्यान पड़ोसी मुल्कों के साथ भारत के रिश्तों में थोड़ी कड़वाहट देखने को मिली है. बात चाहे बांग्लादेश की हो या नेपाल की. भारत के संदर्भ में इन पड़ोसी देशों की जो प्रतिक्रियाएँ बीते दिनों आई हैं उससे कूटनीतिक रिश्ते असहज हुए हैं.

अब इन देशों में नया नाम भूटान का जुड़ा है. बीते कुछ दिनों से भूटान का नाम काफी चर्चा में है.

क्या है मामला?

हाल ही में भूटान की सीमा से सटे असम के बाक्सा ज़िले में सैकड़ों किसानों ने अपनी नाराज़गी जताते हुए भूटान के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था. इन नाराज़ किसानों का आरोप था कि भूटान ने सीमा पार काला नदी से सिंचाई के लिए मिलने वाले पानी के प्रवाह को रोक दिया था.

जब भारतीय मीडिया में यह ख़बर सुर्खियों में बनी तो भूटान के विदेश मंत्रालय को सामने आकर मामले में अपना पक्ष रखना पड़ा.

भूटान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित समड्रोप जोंगखार शहर भारत के असम की सीमा से सटा है. भूटान की इस सीमा के पास असम की तरफ दरंगा, बोगाजुली, ब्रहमपाड़ा जैसे कुल 26 गांव हैं जहां की लगभग पूरी आबादी कृषि पर निर्भर है.

डाउनस्ट्रीम की तरफ़ बसे ये गांव दरअसल काफी पिछड़े हुए हैं. यहां के लोग सालों से भूटान की तरफ़ से आने वाली काला नदी के पानी से खेती करते आ रहे हैं. लेकिन इस साल जब खेती करने के लिए पानी समय पर नहीं मिला तो किसानों ने भूटान पर काला नदी के पानी के बहाव को सिंचाई चैनलों (बड़े नाले) तक रोकने का आरोप लगाया.

गांव के लोगों का दावा है कि वे 1951 से ही काला नदी के पानी से खेती करते आ रहे हैं और इतने सालों में उन्हें कभी कोई असुविधा नहीं हुई.

अब जब उन्हें अपनी खेतों में पानी नहीं मिलने की असुविधा का सामना करना पड़ा तो किसानों की सालों पहले बनाई गई कालीपुर बोगाजुली काला नदी आंचलिक बांध कमेटी ने अपनी मांग को लेकर 22 जून को धरना दिया.

सीमावर्ती किसानों की क्या है समस्या?

पिछले आठ सालों से काला नदी आंचलिक बांध कमेटी का अध्यक्ष पद संभाल रहे महेश्वर नार्जरी ने बीबीसी से कहा, "भूटान से हमारे संबंध काफी पुराने है और इतने सालों में उनकी तरफ़ से हमें कभी कोई तकलीफ़ नहीं हुई. लेकिन हम किसान है और खेती करके अपना पेट भरते है. अगर हमें खेती करने के लिए पानी नहीं मिलेगा तो हमारी आजीविका कैसे चलेगी. हमने धरना प्रदर्शन करने से पहले इस समस्या के समाधान के लिए स्थानीय प्रशासन से आग्रह किया था. लेकिन जब किसी ने हमारी परेशानी की तरफ़ ध्यान नहीं दिया तब जाकर हम धरने पर बैठे. हमारे लोगों ने भूटान के ख़िलाफ़ कोई नारेबाज़ी नहीं की और न ही किसी अपशब्द का प्रयोग किया. असल में हमारी समस्या का हल तो भारत सरकार और असम सरकार को निकालना होगा."

क्या धरना देने के बाद अभी यहां के किसानों को भूटान से पानी मिल रहा है?

इस पर नार्जरी कहते हैं, "भूटान ने इस साल खुद अपने लोगों से सिंचाई के लिए पानी के चैनल बनाकर दिए हैं लेकिन हमें अब भी पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा है. इतने सालों तक हमारे किसान खुद भूटान की सीमा में जाकर अपने हिसाब से बांध बनाकर चैनलों के ज़रिए पानी खेतों तक ला रहे थे लेकिन कोविड-19 के लिए भूटान ने अपनी सीमा में प्रवेश पर रोक लगा रखी है. दरअसल खेती के सीजन के दौरान हमें नदी से पानी लाने के लिए कई बार उस पार जाकर नाले बनाने पड़ते हैं. क्योंकि इन अस्थाई कच्चे नालों में पत्थर और मिट्टी भर जाने से पानी की धार कम हो जाती है. अब भूटान के लोग बार-बार हमारे लिए नाले की खुदाई थोड़े ही कराते रहेंगे. अगर इस समस्या का स्थाई हल नहीं निकाला गया तो यहां पांच सौ परिवार बर्बाद हो जाएंगे."

इंडिया भूटान फ्रेंडशिप एसोसिएशन के समड्रोप जोंगखार शाखा के सलाहकार सदस्य त्शेरिंग नामग्येल भी पानी रोकने को लेकर भूटान पर लगे आरोपों को ग़लत बताते हैं.

वे कहते हैं, "भारत-भूटान के संबंधों का लंबा इतिहास रहा है. आज भी सीमा के दोनों तरफ लोगों में बहुत अच्छे संपर्क हैं. सीमावर्ती गांवों में बसे असम के किसान सालों से काला नदी का पानी अपने खेतों में ले रहे है लेकिन कभी कोई विवाद नहीं हुआ. जबकि हमने खुद मज़दूरों को पैसा देकर नालों की खुदाई करवाई है. भूटान को लेकर भारत के मीडिया में जिस तरह की ख़बरें प्रकाशित हुई है, दरअसल ये पूरी तरह ग़लत सूचना है."

पानी रोकने के विवाद पर क्या बोला भूटान?

ऐसे में सीमावर्ती भारतीय किसानों के विरोध और पानी रोकने के आरोपों का जवाब देते हुए भूटान की शाही सरकार के विदेश मंत्रालय ने 26 जून को एक बयान जारी कर कहा, "24 जून 2020 से भारत में प्रकाशित कई लेखों में आरोप लगाया गया है कि भूटान ने उन जल आपूर्ति माध्यमों को अवरुद्ध कर दिया है जो असम के बाक्सा तथा उदालगुड़ी ज़िलों में भारतीय किसानों तक सिंचाई का जल पहुँचाते हैं. लेकिन ये तमाम आरोप आधारहीन और तकलीफदेह है. क्योंकि इस समय जल प्रवाह को रोकने का कोई कारण ही नहीं है."

भूटान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट करते हुए कहा, "असम के किसान कई दशकों से भूटान के जल स्रोतों से लाभान्वित होते आ रहे हैं और कोविड-19 महामारी जैसे वर्तमान कठिन समय में भी उन्हें इसका लाभ मिल रहा हैं. कोविड-19 की महामारी के चलते भारत में लॉकडाउन और भूटान की सीमाओं को बंद करने के कारण असम के किसान सिंचाई चैनलों को बनाए रखने के लिए भूटान में प्रवेश नहीं कर पा रहे थे, जैसा कि अतीत में वे करते आ रहे थे. लिहाज़ा असम के किसानों की परेशानी का ध्यान रखते हुए जब भी असम में पानी के सुचारू प्रवाह को लेकर समस्याएँ होती हैं, तो हमारे समड्रोप जोंगखार ज़िला प्रशासन के अधिकारी और स्थानीय लोग सिंचाई चैनलों को दुरुस्त करने का काम करते रहे हैं.

भूटान ने पानी रोकने की इन ख़बरों को 'भ्रामक जानकारी' फ़ैलाने और भूटान तथा असम के मित्रवत लोगों के बीच ग़लतफ़हमी पैदा करने के लिए यह निहित स्वार्थों से किया गया सोचा-समझा प्रयास बताया है.

भारत-चीन तनाव के बीच भूटान के नाम पर क्या हो रही है राजनीति?

ऐसे में सवाल उठते हैं कि क्या भारत-चीन के बीच मौजूदा तनाव के माहौल में भूटान का नाम उछाल कर सत्ताधारी बीजेपी पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है?

असल में भूटान से सटा यह पूरा इलाक़ा अर्थात ये तमाम गांव बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) के अंतर्गत आते हैं. एक समय यह पूरा इलाक़ा बोडो चरमपंथी संगठनों की सक्रियता के कारण काफी अशांत रहा है. लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 10 फ़रवरी, 2003 को हाग्रामा मोहिलारी की अध्यक्षता वाले विद्रोही संगठन बोडोलैंड लिबरेशन टाइगर्स (बीएलटी) के साथ एक समझौता किया. जिसके आधार पर बीटीसी का गठन हुआ.

इस समझौते के बाद से हाग्रामा मोहिलारी की पार्टी बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) लगातार काउंसिल की सत्ता संभाल रही है. बीपीएफ ने अपने 12 विधायकों के साथ असम की सत्ता संभाल रही बीजेपी को समर्थन दे रखा है. लेकिन इस साल होने वाले बीटीसी चुनाव को लेकर बोडोलैंड इलाके में बीजेपी-बीपीएफ आमने सामने हैं.

इलाक़े के दौरे पर जा रहे बीजेपी के नेता बीपीएफ के कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं. वहीं बीपीएफ पर व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार करने के आरोप लग रहे है. फिलहाल बीटीसी के कार्यकाल का पांच साल पूरा हो जाने से अगले चुनाव तक यहां का प्रशासन अब राज्यपाल के अधीन है.भारत-चीन तनाव के बीच भूटान के नाम पर क्या हो रही है राजनीति?

ऐसे में सवाल उठते हैं कि क्या भारत-चीन के बीच मौजूदा तनाव के माहौल में भूटान का नाम उछाल कर सत्ताधारी बीजेपी पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है?

असल में भूटान से सटा यह पूरा इलाक़ा अर्थात ये तमाम गांव बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) के अंतर्गत आते हैं. एक समय यह पूरा इलाक़ा बोडो चरमपंथी संगठनों की सक्रियता के कारण काफी अशांत रहा है. लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 10 फ़रवरी, 2003 को हाग्रामा मोहिलारी की अध्यक्षता वाले विद्रोही संगठन बोडोलैंड लिबरेशन टाइगर्स (बीएलटी) के साथ एक समझौता किया. जिसके आधार पर बीटीसी का गठन हुआ.

इस समझौते के बाद से हाग्रामा मोहिलारी की पार्टी बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) लगातार काउंसिल की सत्ता संभाल रही है. बीपीएफ ने अपने 12 विधायकों के साथ असम की सत्ता संभाल रही बीजेपी को समर्थन दे रखा है. लेकिन इस साल होने वाले बीटीसी चुनाव को लेकर बोडोलैंड इलाके में बीजेपी-बीपीएफ आमने सामने हैं.

इलाक़े के दौरे पर जा रहे बीजेपी के नेता बीपीएफ के कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं. वहीं बीपीएफ पर व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार करने के आरोप लग रहे है. फिलहाल बीटीसी के कार्यकाल का पांच साल पूरा हो जाने से अगले चुनाव तक यहां का प्रशासन अब राज्यपाल के अधीन है.

भारत-भूटान के सीमावर्ती लोगों के बीच लंबे समय से समन्वय बनाए रखने का काम करते आ रहे भूटान के गेलेफु टाउन के रहने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया, "इस पूरी घटना के पीछे एक राजनीतिक कहानी छिपी हुई है. इस इलाके में बीपीएफ के कई बड़े नेता इस बार बीजेपी के साथ जाने वाले हैं और वे बीपीएफ के मौजूदा उम्मीदवार के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं. ऐसी जानकारी मिली थी कि ये नेता पानी के प्रभाव को रोकने के लिए समड्रोप जोंगखार के कुछ अधिकारियों को प्रभावित करने की कोशिश में लगे थे और उन्हीं लोगों ने असम के किसानों को विरोध करने के लिए उकसाया. लेकिन भूटान के अधिकारी इस बात को समझ गए और किसानों की समस्या का समाधान कर दिया. भूटान हमेशा से भारत का सबसे अच्छे दोस्त रहा है. इस तरह की राजनीति से दोनों देशों के लोगों के बीच न केवल मतभेद पैदा होंगे बल्कि विश्व के समक्ष भारत-भूटान की दोस्ती पर असर पड़ेगा."

बोडोलैंड इलाक़े की एक मात्र लोकसभा सीट कोकराझाड़ से निर्दलीय सांसद नव कुमार सरनिया सीमावर्ती गांवों में सिंचाई के लिए केंद्र सरकार से आवंटित फंड में भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाते हैं.

वे कहते हैं, "भूटान के साथ भारत का मसला चीन और नेपाल जैसा नहीं है. सीमावर्ती किसानों को पानी नहीं मिलने के इस मसले पर अगर ज़िला प्रशासन के लोग भूटान से बात कर लेते तो समस्या हल हो जाती. इन सीमावर्ती गांवों में सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं है. लोग भूटान के अंदर जाकर मिट्टी-पत्थर के अस्थाई नाले बनाकर खेतों में पानी लाते हैं. मैंने सीमावर्ती गांवों के सिंचाई, भू-कटाव, पानी का जलाशय बनाने जैसे मुद्दे कई बार संसद में उठाए हैं. बीटीसी में सिंचाई के काम के लिए जो करोड़ों रुपये आए हैं उसमें व्यापक भ्रष्टाचार हुआ है. काला नदी (भारत की तरफ) पर चार करोड़ रुपये खर्च कर बांध बनाया गया था, वह बांध भी बर्बाद हो गया. उस इलाक़े में राजनीति करने वाले कुछ लोगों ने किसानों को धरने पर उतार दिया. जबकि यह इतना बड़ा मुद्दा ही नहीं था."

भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेता मानते है कि पानी रोकने के नाम पर भूटान के साथ भारत के संबंधों को मीडिया में उछालने के पीछे राजनीति हो सकती है.

असम प्रदेश बीजेपी उपाध्यक्ष विजय कुमार गुप्ता कहते हैं, "भूटान हमेशा से हमारा एक अच्छा मित्र रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले भूटान का दौरा किया था और आज उसी की बदौलत वहां कई पनबिजली प्रोजेक्ट चल रहे हैं. सीमावर्ती किसानों को पानी नहीं मिला या फिर असल समस्या क्या थी उसे समझना ज़रूरी है. कुछ लोग प्रोपगैंडा में ग़लत तरीक़ों का प्रयोग करके इस तरह की छोटी सी बात को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं. भूटान ने इस मामले में अपनी बात कही है और वहां का शासन हमारे लोगों की मदद कर रहा है. इसके बावजूद कोई राजनीति कर रहा है तो वह अपने देश को ही नुक़सान पहुंचा रहा है. क्योंकि इससे भारत-भूटान के मज़बूत रिश्तों पर असर पड़ता है."

क्या बोली असम सरकार?

असम सरकार के मुख्य सचिव कुमार संजय कृष्णा ने भूटान के पानी रोकने की बात मीडिया में आने के बाद एक ट्वीट कर कहा, "हाल में आई मीडिया रिपोर्ट्स में ग़लत बताया गया है कि भूटान ने भारत को हो रही पानी की आपूर्ति को रोका है. भारतीय क्षेत्रों में अनौपचारिक सिंचाई चैनलों में प्राकृतिक अवरोध इसका वास्तविक कारण है. भूटान वास्तव में इस रुकावट को दूर करने में लोगों की मदद कर रहा है."

भारत-भूटान सीमावर्ती गांव में बीते 20 सालों से काम कर रहे राजू नार्जरी कहते हैं, "किसानों को पानी नहीं मिलने वाली बात स्थानीय समस्या है, इस लेकर दोनों देशों के बीच कोई विवाद नहीं है. पहले इस इलाक़े में बार्डर ही नहीं था. दोनों तरफ़ के लोग बिना रोक-टोक के आना जाना करते थे. अगर कोई परेशानी होती तो आपस में बात करके समाधान कर लेते थे. लेकिन 2003 में रॉयल भूटान आर्मी के साथ सेना ने असम के अलगाववादी विद्रोही समूहों के ख़िलाफ़ ऑपरेशन ऑल क्लियर नाम से सैन्य अभियान चलाया और उसके बाद से भूटान के प्रवेश गेट तथा इसके आसपास सीमा पर फेंसिंग लगाई गई. दोनों तरफ़ सुरक्षा बलों को तैनात किया गया. अब लोगों को अंदर जाने के लिए आई-कार्ड और पास बनाने पड़ते हैं. लिहाज़ा जो लोग खेती करते हैं उनका अब भूटान के अंदर जाना पहले की तरह आसान नहीं रहा."

भूटान में पनबिजली बांध निर्माण में भारत के निवेश से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए राजू कहते हैं, "भूटान से 56 नदियां निकली हैं और वे सारी बोडोलैंड में गिरती हैं. भूटान के लोग सही कह रहे हैं कि उन्होंने पानी को नहीं रोका. लेकिन यहां के किसानों को पहले के मुक़ाबले खेती के लिए पानी कम मिल रहा है. भारत हज़ारों मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए भूटान की नदियों पर बांध निर्माण करवा रहा है. इन बांधों में प्रवाह के लिए पानी की धार कई बार कम हो जाती है. असल में भारत सरकार को इन बांधों से नीचे की तरफ बसे किसानों को क्या नुक़सान हो सकता है उस बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए. क्योंकि यह सैकड़ों किसानों की आजीविका से जुड़ा मुद्दा है."

भारत-भूटान संबंध

भूटान के साथ लंबे समय से भारत के काफी अनोखे और विशिष्ट संबंध रहे हैं. 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने पहले विदेश दौरे के रूप में भूटान को ही चुना था. प्रधानमंत्री मोदी शुरू से कहते रहे हैं कि पड़ोसी मुल्कों से मजबूत संबंध बनाए रखना उनकी प्राथमिकता होगी.

भूटान के संबंध देश की आज़ादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ज़माने से ही काफी अच्छे रहे हैं. 1958 में नेहरू ने भूटान का दौरा किया और भूटान की स्वतंत्रता के लिए भारत के समर्थन को दोहराया. फिर उन्होंने भारतीय संसद में घोषणा की कि भूटान के ख़िलाफ़ किसी भी आक्रमण को भारत के ख़िलाफ़ आक्रमण के रूप में देखा जाएगा.

लिहाज़ा भूटान उस ज़माने से भारत के साथ अपने मज़बूत रिश्तों को कायम रखे हुए है. फिर चाहे भारत में किसी भी पार्टी की सरकार रही हो.

इन दोनों देशों के बीच संबंध कितने प्रगाढ़ हैं इसका ताज़ातरीन उदाहरण 600 मेगावाट के खलोंगछु जेवी-हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को लेकर किया गया समझौता है. सोमवार को हस्ताक्षर किए गए इस परियोजना के तहत भारतीय कंपनी भूटान में बिजली उत्पादन करेगी.(bbc)


01-Jul-2020 6:36 PM

-गिरीश मालवीय
बैन लगाना ही है तो चीन के दूसरे सबसे बैंक ‘बैंक ऑफ चाइना’ पर लगाइए !.......कुछ फालतू एप्प पर बैन लगाने से क्या हासिल होगा ?....... बैंक ऑफ चाइना को लाइसेंस नेहरू जी या मनमोहन सिंह ने नहीं दिया है यह 2018 में मोदीजी ने ही दिया है वह भी तब, जब 2018 में एससीओ समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से इसका वादा करके आए थे।
बैंक ऑफ चाइना ने जुलाई 2016 में सिक्योरिटी क्लीयरेंस के लिए आवेदन किया था। इस बैंक पर आतंकवादी संगठनों की फंडिंग के आरोप थे लेकिन उसके बावजूद भी इसे भारत में व्यापार करने का लाइसेंस दे दिया गया
यही नहीं 2019 अगस्त में इसे भारतीय रिजर्व बैंक कानून, 1934 की दूसरी अनुसूची में शामिल कर लिया गया और देश में नियमित बैंक सेवायें देने की अनुमति दे दी गयी.... इससे पहले मोदी राज में ही जनवरी 2018 से इंडस्ट्रियल एंड कॉमर्शियल बैंक ऑफ चाइना को भी भारत में बिजनेस करने की अनुमति दे दी गई थी।
हमारे देश के बहुत से अर्थशास्त्री इन बैंको को लाइसेंस देने के खिलाफ थे, आरबीआई के पूर्व डेप्युटी गवर्नर पी. के. चक्रवर्ती ने उस वक्त कहा भी था कि चीन अपनी आक्रामक कारोबारी नीति के लिए जाना जाता है। चीन के पास जो भी रिसोर्स हैं, उसको वह बड़े अग्रेसिव तरीके से इस्तेमाल करता है। रिसोर्स, टेक्नॉलजी और अग्रेसिव रणनीति के मामले में हमारे सरकारी बैंक अभी पीछे हैं। अगर उनका मार्केट शेयर गिरा तो यह देश की इकॉनमी के लिए ठीक नहीं होगा।
मार्केट एक्सपर्ट और पूर्व बैंकर एस. के. लोढ़ा ने अमेरिका का उदाहरण देकर के समझाया था कि इस बैंक को लाइसेंस देना कितना गलत निर्णय है नवभारत टाईम्स में उन्होंने कहा
'अमेरिका ने पहले चीनी कंपनियों और बैंकों को अमेरिका में खुलकर काम करने दिया। इसका परिणाम यह रहा कि अमेरिका में चीन के कारोबारी और प्रॉडक्ट छा गए। इससे अमेरिका की इकॉनमी गड़बड़ा गई। चीन के कारोबारियों के साथ एक खास बात यह है कि वे विदेश में कारोबार करते हैं, पैसा कमाते हैं और इनवेस्टमेंट अपने देश में ज्यादा करते हैं'
वैसे आपको बता दूं कि बैंक ऑफ चाइना साधारण बैंक नही है। बैंक ऑफ चाइना यानी एसबीपी चीन सरकर द्वारा चलाई जा रही इनवेस्टमेंट कंपनी चाइना सेंट्रल हुईजिन के अधीन काम करता है। यह बैंक 50 देशों में फैला हुआ है, जिनमें से 19 चीन के ‘वन बेल्ट, वन रोड’ योजना के तहत आते हैं ओबीओआर यानी वन बेल्ट वन रोड परियोजना विश्व व्यापार को अपने कब्जे में कर लेने की चीन द्वारा चलाईं जा रही सबसे महत्वाकांक्षी योजना है। यह योजना चीन की विस्तारवादी नीति का ही प्रतिरूप है इसलिए इस बैंक का लाइसेंस कैंसल करना ही वह कार्य होगा जिससे चीन वास्तविक रूप में प्रभावित होगा क्योंकि उसका व्यापार सीधा प्रभावित होगा यह टिकटोक बैन करने से, या चीनी झालरों के बहिष्कार से कुछ हासिल नही होगा।


01-Jul-2020 11:45 AM

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि जिस रफ्तार से कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ रहा है उसे देखते हुए दुनिया की एक बड़ी आबादी का इसकी चपेट में आना तय दिखता है

चीन से शुरू हुआ कोरोना वायरस का प्रकोप छह महीने बाद भी थमने का नाम नहीं ले रहा. आंकड़ों में देखें तो अब तक यह पूरी दुनिया में पांच लाख से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है. कुल मामलों की संख्या एक करोड़ के पार चली गई है. चिंता की बात यह भी है कि जिन देशों के बारे में यह लग रहा था कि वहां अब इस महामारी की रफ्तार कम हो रही है, उनमें भी संक्रमण और मौतों के नए मामले दर्ज होने लगे हैं. चीन, ईरान और इटली और हाल में खुद को कोरोना वायरस मुक्त घोषित कर चुका न्यूजीलैंड इनमें शामिल हैं. इसे देखते हुए यह आशंका जोर पकड़ने लगी है कि कहीं अब इस महामारी की दूसरी लहर शुरू न हो जाए.

मास्क, सफाई और सोशल डिस्टेसिंग जैसी जरूरी सावधानियां रखकर कोरोना वायरस के संक्रमण से काफी हद तक बचा जा सकता है. लेकिन फिर भी कई जानकार मानते हैं कि जिस तरह से कोरोना वायरस फैल रहा है उसके चलते यह कहा जा सकता है कि दुनिया की आबादी के एक बड़े हिस्से को इसकी चपेट में आना ही है. कुछ समय पहले लंदन के चर्चित इंपीरियल कॉलेज ने अपने एक अध्ययन में अनुमान लगाया था कि ब्रिटेन और अमेरिका में 80 फीसदी से ज्यादा लोगों को यह बीमारी अपनी चपेट में ले सकती है. यानी हो सकता है कि दुनिया में अधिकतर लोगों की कश्ती को इस तूफान से गुजरना ही पड़े. इसलिए कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अब डरने से ज्यादा समझदारी इस तूफान के लिए तैयारी करने में है.

कोरोना वायरस का अब तक कोई इलाज या वैक्सीन नहीं है इसलिए फिलहाल इसके लक्षणों को काबू में रखकर इसका इलाज करने की कोशिश की जाती है. अगर किसी व्यक्ति में इसके लक्षण विकट नहीं होते हैं तो वह कुछ दिनों में इससे अपने आप ही ठीक हो जाता है. ऐसे मामलों की संख्या लगभग 80 फीसदी होती है. बाकी लोगों को (लक्षणों के) इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कर लिया जाता है. ऐसे में कोरोना वायरस से मुकाबले की तैयारी दो स्तरों पर की जा सकती है. इनमें से पहला अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी को बढ़ाना है ताकि आपका शरीर इससे लड़ाई करने के लिए तैयार हो. और दूसरा इस बात का इंतजाम करना है कि कोरोना वायरस का संक्रमण होते ही इसके लक्षणों को काबू में रखने के हमारे प्रयास भी चालू हो जाएं ताकि ये लक्षण इतने न बिगड़ें कि हमें अस्पताल या आईसीयू में दाखिल होना पड़े. इस समय अस्पताल में भर्ती होना बहुत मुश्किल है और महंगा भी.

लेकिन कोरोना वायरस से संक्रमित ज्यादातर लोगों को इसका पता कई दिन बाद ही चल सकता है और तब तक उनमें से कुछ के लक्षण बिगड़ चुके होते हैं. तो फिर क्या किया जाए? किया यह जाए कि अपनी इम्यूनिटी बढ़ाने के साथ-साथ कोरोना संक्रमित न होने पर भी उसके लक्षणों को काबू में रखने के कुछ साधारण व नुकसानरहित प्रयास करते रहा जाए. यानी कि अपने खान-पान और आदतों में कुछ ऐसी चीजें भी शामिल की जाएं जो कोरोना वायरस के लक्षणों को कम करती हैं और कुछ ऐसी चीजों को इनसे बाहर करें जो इन लक्षणों को विकट बना सकती हैं. ऐसा करने से कोरोना संक्रमित होने पर हमारा एक दिन भी खराब नहीं होगा और शुरू से ही हमारे लक्षणों का उपचार चलता रहेगा.

इसके उदाहरण के तौर पर जब तक कोरोना का प्रकोप है हम ठंडी चीजें खाना और पीना बंद कर सकते हैं. क्योंकि संक्रमण होने पर इसके बारे में पता न चलने तक अगर हम कुछ दिन भी ठंडा खाते-पीते रहे तो यह हमारे लक्षणों को विकट कर सकता है. और अगर हम कुछ दिनों के अंतराल पर हम बिना जरूरत के भी भाप लेते रहें तो यह हमारे श्वसन तंत्र को हमेशा साफ-सुथरा रखेगा. ऐसे में संक्रमण होने पर हमें श्वसन तंत्र से जुड़ी परेशानियों से कम जूझना पड़ेगा क्योंकि इसकी शुरुआत से ही हम इसका एक किस्म का उपचार भी कर रहे होंगे.

भोजन
स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता का एक अहम आधार है खान-पान. विशेषज्ञों के मुताबिक वैसे तो खान-पान संबंधी अच्छी आदतें आपको हमेशा ही अपनानी चाहिए, फिर भी कोरोना वायरस संक्रमण के इस दौर में इनकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है. और इन आदतों के लिए आपको अलग से जाकर कोई विशेष उपाय भी करने की जरूरत नहीं है. अपनी रोजमर्रा के खाने को समय पर खाना और इसमें तरह-तरह की चीजें शामिल करना कोरोना वायरस के खिलाफ आपके मोर्चे को मजबूत कर सकता है.

सुबह की चाय हममें से ज्यादातर की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है. जानकारों के मुताबिक अगर आप चाय में दूध की जगह नींबू शामिल कर लें तो इसका आपको काफी फायदा होगा. तब यह एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन सी के मेल वाली लेमन टी हो जाएगी जो न सिर्फ कोरोना वायरस जैसे संक्रमण के खिलाफ आपकी प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी बढ़ाएगी बल्कि हल्के संक्रमण, जिससे ज्यादातर लोगों का सामना तय दिख ही रहा है, के दौरान आपको आराम पहुंचाने और जल्दी उबारने में भी मददगार साबित होगी. चाय न पीने के शौकीन सुबह नींबू और शहद वाला गुनगुना या गरम पानी पी सकते हैं. नींबू के बारे में तो हमें पता ही है और शहद खांसी-जुकाम के लक्षणों से भी गले को राहत देता है. एक साक्षात्कार में दिल्ली स्थित मैक्स अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन विभाग के डॉक्टर रोमेल टिकू कहते हैं, ‘ये घरेलू नुस्खे आपकी इम्यूनिटी से जुड़े होते हैं. अगर आपकी इम्यूनिटी थोड़ी बेहतर हो जाएगी तो आपको इंफेक्शन नहीं होंगे.’

अगर आप चाय पीने के शौकीन हैं तो आप अपनी शाम की चाय में दालचीनी, अदरक, लौंग और काली मिर्च डालकर पी सकते हैं. नहीं शौकीन हैं तो भी फिलहाल इस तरह की एक चाय रोज़ पीने में कोई बुराई नहीं है. आप चाहें तो इसमें शक्कर की जगह गुड़ या शहद का इस्तेमाल कर सकते हैं. और अगर आप रोज दूध पीने वालों में से हैं तो दूध के गिलास में थोड़ी हल्दी डाल सकते हैं. इसे गोल्डन मिल्क भी कहा जाता है और इसका सुझाव आयुष मंत्रालय ने भी दिया है. हर घर की रसोई में पाई जाने वाले इन आम सी चीजों में एंटीवायरल होने से लेकर खांसी में आराम पहुंचाने तक तमाम गुण छिपे हैं. यानी ये कोरोना वायरस से बचाने और संक्रमण होने पर उससे उबरने की संभावना में मददगार हो सकती हैं.

इसके अलावा खाने में कुछ चीजें ऐसी भी हैं जिनसे आपको बचने की जरूरत है. मसलन अगर आप मीठे के काफी शौकीन हैं तो अपनी इस आदत को कम से कम करने की कोशिश करें. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक आपको ऐसी चीजों का इस्तेमाल कम करना चाहिए जिनमें वसा (फैट), चीनी और नमक का स्तर ज्यादा हो क्योंकि इनका आपकी इम्यूनिटी पर बुरा असर पड़ता है. और जैसा कि हम ऊपर पढ़ ही चुके हैं कि फिलहाल आपको फ्रिज के ठंडे पानी और कोल्ड ड्रिंक्स-आइसक्रीम से भी परहेज करना चाहिए. कोरोना वायरस के इस दौर में आप निश्चित तौर पर नहीं चाहेंगे कि ये चीजें गलत वक्त पर आपका गला पकड़ लें और आपके लिए हालात मुश्किल कर दें.

नींद
शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को रीचार्ज होने के लिए अच्छी नींद यानी पर्याप्त आराम की जरूरत होती है. अगर नींद पर्याप्त नहीं होगी तो तनाव बढ़ेगा और इसका सीधा असर आपकी इम्यूनिटी पर पड़ेगा. इसलिए विशेषज्ञों के मुताबिक रोज सात-आठ घंटे की नींद जरूर सुनिश्चित करें. नींद आपके स्वास्थ्य का दूसरा प्रमुख आधार है. अगर आप स्वस्थ रहेंगे तो कोरोना वायरस के आपको संक्रमित करने की संभावना घट जाएगी और अगर आपको संक्रमण हो भी गया तो एक स्वस्थ शरीर में इससे लड़ने की ताकत बनिबस्त ज्यादा होगी. एक साक्षात्कार में अटलांटा स्थित मनोविज्ञानी डॉ. लोरी व्हाटले का कहना है कि स्वस्थ रहने के लिए नींद और पर्याप्त मात्रा में पानी पीना जरूरी है. वे कहती हैं, ‘ये वे चीजें हैं जिन पर हम नियंत्रण कर सकते हैं.’

फेफड़ों पर खास ध्यान
कोरोना वायरस का सबसे घातक हमला श्वसन तंत्र पर होता है जिसमें फेफड़े भी शामिल हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे में जरूरी है कि आप फेफड़ों की सेहत पर विशेष ध्यान दें. प्राणायाम को इनके लिए सबसे अच्छा व्यायाम कहा जाता रहा है. कोरोना वायरस के संदर्भ में कपालभाति प्राणायाम को बेहतर बताया गया है. भस्त्रिका प्राणायाम से भी आपको मदद मिलेगी और इसके लिए अनुलोम-विलोम को भी किया जा सकता है. दिल्ली में कोरोना वायरस से संक्रमित होकर उबर आने वाले पहले मरीज रोहित दत्ता ने कहा था कि प्राणायाम से उन्हें तेज रिकवरी में मदद मिली. 45 साल के रोहित दत्ता कारोबारी हैं. उत्तर भारत में कोरोना वायरस के इस पहले मरीज ने ठीक होने के बाद कहा, ‘मैं कोविड-19 के मरीजों के लिए प्राणायाम का सुझाव दूंगा. यह रिकवरी में बेहद काम आता है. इससे एंग्जाइटी लेवल्‍स कम रखने में मदद मिलती है.’

इसके अलावा श्वसन तंत्र की सेहत बनाए रखने के लिए आप भाप भी ले सकते हैं. इससे न सिर्फ आपके फेफड़ों की शक्ति बढ़ेगी बल्कि संक्रमण की सूरत में आपको खांसी में आराम भी मिलेगा. जानकारों के मुताबिक जिस पानी की भाप लेनी है उसमें पुदीने की कुछ पत्तियां या पेपरमिंट या यूकेलिप्टिस ऑयल की कुछ बूंद डालने से इसका असर बढ़ जाता है. आयुष मंत्रालय की एडवाइजरी के मुताबिक दिन में एक बार पुदीने के पत्ते या अजवाइन डाल कर पानी की भाप लेनी चाहिए.

जैसा कि पहले भी जिक्र हुआ बुखार और सूखी खांसी इस संक्रमण के आम लक्षण हैं. इसके अलावा मरीजों में थकान, सांस लेने में तकलीफ, गला खराब होना और बदन दर्द जैसे लक्षण भी देखे गए हैं. तो अगर आप भी इनमें से कुछ या सभी लक्षण महसूस कर रहे हों तो आपको क्या करना चाहिए? विशेषज्ञों के मुताबिक इसके बाद आपको अपने आपको परिवार के बाकी लोगों से अलग-थलग करना होगा और डॉक्टरी परामर्श लेना होगा. अगर लक्षण हल्के हैं तो पैरासिटामोल और आईबूप्रोफेन जैसी आम दवाएं ली जा सकती हैं. लेकिन जैसे ही संभव हो डॉक्टरी मदद लेना जरूरी है. अस्पताल जाने से पहले ऐसा ऑनलाइन भी किया जा सकता है.

आखिर में एक बात और. ये सारे उपाय कोरोना वायरस से बचने या संक्रमण होने पर उससे उबर आने की गारंटी नहीं हैं. लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक इतना निश्चित है कि इनसे इस महामारी से अपेक्षाकृत आसानी से उबरने की संभावनाएं खासी बढ़ जाती हैं. (satyagrah.scroll.in)


01-Jul-2020 10:08 AM

दलित परिवारों के पास जो छोटे काम थे वे ख़त्म हो गये
-सुमन देवठिया

आज कोरोना महामारी पूरे देश में तेज़ी से फ़ैल रही है जिसकी चपेट में भारत भी है। कोरोना ने ना केवल इंसान के स्वास्थ्य को प्रभावित किया है बल्कि इंसान के रोजगार, आजादी और पसंद को भी छीन लिया है और इसका प्रभाव महिलाओं पर शारीरिक व मानसिक रूप से बहुत नकारात्मक पड़ा है। कोरोना के बचाव के रूप में हुए लॉकडाउन के दौरान घरों में होने वाली हिंसा के आँकड़े भी बढ़ें हैं, जिसकी पुष्टि विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ़ से जारी किये गये आँकड़ों में भी साफ़ है।

इन महिलाओं में भी अगर दलित महिलाओं की बात करें तो ये दलित महिलाएँ शारीरिक हिंसा की शिकार तो हुई ही है, लेकिन अन्य महिलाओं की तुलना में मानसिक पीड़ा की शिकार ज्यादा हुई है, क्योंकि हमारे देश के श्रमिक व पलायन करने वाले परिवारों को देखा जाये तो हम पाएंगे कि इनमें सबसे ज्यादा दलित परिवार ही होते है। ग़ौरतलब है कि अधिकतर दलित महिलाएँ ही पुरुषों के साथ मजदूरी का काम करती है। पलायन करने वाले परिवारों की मजदूरी असंगठित क्षेत्रों पर निर्भर रहती है, जैसे ईंट-भट्टा, फ़ेक्ट्री, ठेकेदारी, रोजाना मजदूरी आदि रोजगार के साधन रहे है। पर कोरोना की वजह से इन्हें वापिस अपने घरों में आना पड़ा है, जहां उनके लिए ना कोई रोजगार है और ना ही रहने, खाने व पीने की व्यवस्था है।

राजस्थान की पूनम वर्मा (सामाजिक कार्यकर्ता, दलित वीमेन फ़ाइट) से बात करने पर पता चला कि ‘कोविड-19 की वजह से बेरोजगारी ज्यादा बढ़ गई है। लोग आर्थिक तंगी का सामना कर रहे है। महिलाओं के साथ शारिरिक व मानसिक प्रताड़ना भी बढ़ गयी है और इससे शिक्षा भी प्रभावित हुई है, जो पहले से ही दलित बच्चों में बेहद सीमित थी। साथ ही, पलायन किये हुए कुछ दलित परिवारों के पास अपने दस्तावेज पूरे नहीं है, जिसकी वजह से भी उनको सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

वहीं राजस्थान की रहने वाली (एक सामूहिक दुष्कर्म से पीड़ित) नाबालिग बालिका की माँ का कहना है कि ‘पहले ही लोग हमारे साथ बहुत जातिगत भेदभाव करते थे और हमें मजदूरी देने से भी कतराते थे। अब इस कोरोना ने हमें और ज्यादा अछूत बना दिया है।’ दलित महिलाओं के साथ काम करने पर हमारा यह भी अनुभव रहा है कि यह कोरोना दलित मजदूर महिलाओं को जातिगत व्यवसाय करने पर मजबूर कर रहा है। साथ ही, कुछ दुष्कर्म पीड़ित महिलाओं के न्याय को दूर होते और गाँव के दबंग लोगों के हाथों अपने घर के पुरुषों को रोटी के लिए बिकने को मजबूर कर रहा है।

दलित महिलाओं के साथ काम करने पर हमारा यह भी अनुभव रहा है कि यह कोरोना दलित मजदूर महिलाओं को जातिगत व्यवसाय करने पर मजबूर कर रहा है।

हमारे समाज में आमतौर पर दलित महिलाएँ ज्यादातर रोजाना की मजदूरी पर निर्भर रहती है और एक जिला व राज्य से दूसरे जिला व राज्यो में मजदूरी की वजह से पलायन भी करती है। लेकिन लॉकडाउन की वजह से मजदूरी बन्द होने के कारण उन्हें वापिस अपने मूल निवास पर आना पड़ा है, जहां पर उनके जीवनयापन  के लिए कुछ भी रोजगार नहीं है। राजस्थान में दलित परिवारों के पास जो छोटे काम थे वह भी कोविड 19 की वजह से ख़त्म हो गये है। इसी संदर्भ में दलित महिला मानवाधिकार कार्यकर्ता मोहिनी बाई बताती है कि ‘लॉकडाउन की वजह से मेरे टिफ़िन सेन्टर व केटरीन का काम ठप हो गया है।’

इसलिए हम दलित महिलाएँ इस परंपरागत आचरण और रीतियों को तोड़कर एक स्थायी निवास, आजादी व स्वाभिमान के साथ जीना चाहते है। हम इस देश के श्रमिक है लेकिन अपनी रोजी-रोटी को स्वाभिमान से पाना चाहते हैं। हमें लगता है कि इस सच्चाई को बाहर लाने के लिए सरकार या संस्थाओ को एक अध्ययन करना चाहिए ताकि इस अत्याचार, रोजगार व स्वास्थ्य की हक़ीक़त उजागर हो सके…..!!!

(यह लेख पूर्व में 'फेमिनिज्म इन इंडिया' में प्रकाशित किया जा चूका है ) (hindi.feminisminindia.com)

 


01-Jul-2020 9:48 AM

वह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है

पिछले करीब डेढ़ साल से हांगकांग आंतरिक हलचलों और तनाव से जूझ रहा है. हांगकांग के लोकतांत्रिक ढांचे पर आघात और वहां के नागरिकों के मानवाधिकारों के हनन की खबरों ने दुनिया को चिंता में डाल दिया है.

"वन कंट्री टू सिस्टम" के वादे के साथ 1997 में ब्रिटेन से चीन के अधिकार में आए हांगकांग के नागरिकों ने कभी सोचा नहीं था कि जिन लोकतांत्रिक मूल्यों और अधिकारों को वे अपनी सामाजिक और राजनीतिकि व्यवस्था का अभिन्न अंग मान रहे थे, उन्हीं को बचाने के लिए उन्हें सड़कों पर आना पड़ जाएगा और इसके लिए इतने लंबे संघर्ष की जरूरत पड़ेगी.

चीन और ब्रिटेन के बीच समझौते और चीन की "वन कंट्री टू सिस्टम" की नीति के तहत हांगकांग को अपना अलग राजनीतिक और न्यायिक तंत्र रखने की छूट मिली थी, साथ ही अपनी मुद्रा, झंडा, और व्यक्तिगत आर्थिक और सामाजिक आजादी भी, लेकिन आज सब कुछ हाथ से फिसलता लग रहा है.

हांगकांग में उथल पुथल क्यों

बद से बदतर होते हालात के बीच चीन की सरकार ने पिछले महीने हांगकांग में एक नया राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू करने की घोषणा कर दी. 22 मई को चीन की नेशनल पीपल्स कांग्रेस की बैठक में हांगकांग संबंधी बिल पास कर दिया गया जिससे अब कानूनी तौर पर शी जिनपिंग की चीनी सरकार के हाथ में हांगकांग में इच्छानुसार कानूनी बदलाव लाने की क्षमता आ गई है.

समझा जाता है कि यह कानून जुलाई से लागू हो जाएगा. इस कानून के कई पहलू हैं जो डराने वाले हैं. इनमें सबसे प्रधान तो यही है कि कुछ मुद्दों पर इस कानून को हांगकांग के अपने कानून और नियमों पर वरीयता मिलेगी. इसके साफ मायने हैं लोगों की राजनीतिक और नागरिक स्वतंत्रताओं का सीधा हनन होगा.

सरकार के खिलाफ प्रदर्शनों को कानूनी अपराध से लेकर आतंकवाद और देशद्रोह तक कुछ भी माना जा सकता है. क्या जुर्म तय होगा, यह भी पुलिस और सरकार ही तय करेगी. इस कानून के तहत चीन हांगकांग में एक राष्ट्रीय सुरक्षा आफिस भी बनाएगा. और तो और, इस कानून के तहत हांगकांग के राज्याधिकारी अब यह तय करेंगे कि राष्ट्रीय सुरक्षा के किस केस को कौन सा जज सुने जो कि हांगकांग की स्वतंत्र न्यायपालिका पर एक तुषारापात है.

साफ है, हांगकांग के प्रशासकों ने अपने विवेक का उपयोग करने के बजाय चीन की सरकार के निर्देशों का आंख मूंद कर पालन किया और नतीजतन छोटी-छोटी घटनाओं ने धीरे धीरे जमा होते-होते एक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समस्या का रूप ले लिया. हांगकांग एक ऐसी चुनौती बन गया है जिसका हल अब अकेले हांगकांग के लोग शायद ही कर पाएं. जाशुआ वांग जैसे हांगकांग के युवा नेताओं ने दुनिया भर के देशों, खास तौर पर लोकतांत्रिक देशों से, गुहार लगाई है कि इस संकट की घड़ी में ये देश हांगकांग के नागरिकों की सहायता करें.
ब्रिटेन की बोरिस जॉनसन सरकार ने आश्वासन तो दिया है कि वो हांगकांग से आए लोगों को अपने देश में पनाह देंगे लेकिन इस सुविधा में 1997 के बाद पैदा हुए लोग भी जोड़े जाएंगे या नहीं, यह कहना मुश्किल है.

क्या चाहते हैं हांगकांग के लोग

हांगकांग में उपजे इस संघर्ष की जड़ में है वहां की सरकार का प्रस्तावित प्रत्यर्पण बिल. अक्टूबर 2019 में पेश किए गए इस बिल के कई प्रावधान ऐसे थे जिन्हें लोगों ने नकार दिया और इसके खिलाफ सड़कों पर उतर आए. पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच बढ़ते तनाव ने हिंसात्मक रूप ले लिया जिससे प्रदर्शनकारी भी जिद पर अड़ गए. 

जाशुआ वांग और अन्य प्रदर्शनकारियों की कई मांगें  हैं, जिनमें से प्रमुख हैं:  

1. प्रत्यर्पण बिल को वापस ले लिया जाए.

2. पुलिस के हिंसक और बर्बरतापूर्ण व्यवहार की निष्पक्ष जांच हो दोषियों को दंड दिया जाए.

3. प्रदर्शनकारियों को दंगाई की संज्ञा न दी जाए और उन पर लगे सारे आरोपों को वापस लिया जाए.

4. विधायी परिषद और मुख्य कार्यकारी के चुनाओं में सर्वव्यापक मताधिकार की व्यवस्था की जाए.

बहरहाल, प्रदर्शनकारियों की तमाम मांगों और विरोध प्रदर्शनों को धता बताते हुए हांगकांग की सरकार ने चीन की सरकार के इशारे पर नया कानून लागू करने का निर्णय लिया है जिसके तहत इन तमाम मांगों का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा. 

लोकतांत्रिक देशों ने चीन के इस कदम पर खासा विरोध दर्ज कराया है और कहा है कि यह कानून चीन की "वन कंट्री टू सिस्टम" की नीति के विरुद्ध है और इनसे हांगकांग की स्वायत्तता का हनन होगा.

भारत क्या कर सकता है

भारत ने इस मुद्दे पर फिलहाल चुप्पी साध रखी है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के तौर पर भारत को हांगकांग का साथ देना चाहिए. हालांकि भारत ने कभी आधिकारिक तौर पर, अमेरिका और पश्चिमी देशों के रास्ते पर चलते हुए दूसरे देशों में लोकतंत्र को बढ़ावा देने की नीति को समर्थन नहीं किया है, और पंचशील नीति के तहत वह दूसरे देश के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देता, लेकिन लोकतंत्र को बढ़ावा देना इसकी विदेशनीति का हिस्सा रहा है.

अगर भारतीय विदेश नीति के इतिहास को कायदे से देखा जाए तो साफ दिखता है कि पिछले 70 सालों में कई बार ऐसे अवसर आए हैं जब भारत के नीति नियामकों ने दूसरे देशों में लोकतंत्र के समर्थन में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं. मिसाल के तौर पर 90 के दशक में म्यांमार के साथ भारत के संबंधों में खासी कड़वाहट इस बात को लेकर बन गई थी कि वहां चुनावों में जीत कर आईं आंग सान सू ची को सेना ने सत्ता देने से इनकार कर दिया था. नेपाल और पाकिस्तान के साथ भी भारत के संबंधों में लोकतंत्र एक बहुत बड़ा कारक रहा है.

हांगकांग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है और इस लड़ाई में भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों का साथ उसके लिए बहुत जरूरी है.  (www.dw.com)

 


30-Jun-2020 7:50 PM

इस लॉकडाउन में जब शेल्टर की जिम्मेदारी जिला प्रशासन से मिली तो सबसे पहले बातचीत शुरू हुई उन सभी श्रमिकों से जिनके घर छत्तीसगढ़ में ही थे, लेकिन वो घर नहीं लौटना चाहते थे। थोड़ा अजीब लगा, फिर बातचीत से समझ आया चावड़ी में काम करने वालों का जीवन का नया पक्ष।

कोई भी युवा अपने गांव में काम और खेती की कमी के साथ-साथ कुछ अधिक पैसा कमाने के सपनों के साथ शहर आता है। शुरुआत में किसी की मदद से पहुँचता है फिर धीरे-धीरे अपना काम का नेटवर्क बनाता जाता है। इनमें से कुछ लोग पहुँचते हैं श्रम के बाजार में। जहाँ सुबह बोली लगती है काम और विशेष कौशल की भी। अधिकांश सामान उतारने-चढ़ाने, निर्माण कार्य, कैटरिंग आदि रहते हैं। इसमें 400 से लेकर 1500 रुपए तक की कमाई होती है और काम करने वाले धीरे-धीरे कौशलयुक्त हो जाते हैं तो उनकी मांग और आय दोनों बढ़ती जाती है।

कैटरिंग में सब्जी काटने वाले सब्जी बनाने लगते हैं तो आगे जाकर चायनीज खाने के विशेषज्ञ भी। लेकिन इनके पास पैसे का आना इन्हें कुछ आदतों में शामिल करता जाता है, उनमें विशेष शराब की लत लगना होता है। इनमें से 50 प्रतिशत ही होंगे जिनका कोई स्थाई ठिकाना शहर में होता है। ये किसी स्टेशन के बेंच में, पार्क में, रैनबसेरा में या किसी रिश्तेदार के घर में रहते हैं जिसका कोई स्थाई किराया नहीं देना होता, कोई गृहस्थी नहीं चलानी होती। अपने घरों में मात्र दो-तीन महीनों में जेब में अच्छा पैसा लेकर जाते हैं। इनका परिवार में सम्मान इनके नगद की वृद्धि के साथ बढ़ता जाता है। जिस गांव के निवासी होते हैं, उसके समाज से धीरे-धीरे कटते जाते हैं और शहर में उनका कोई समाज या संगठन खड़ा ही नहीं होता। इसलिए वो असंगठित के दायरे में आ जाते हैं। इन्हें भोजन की कोई समस्या नहीं होती क्योंकि चावड़ी या स्टेशन में 40 रुपये थाली में पर्याप्त भोजन मिलता है। ऐसे ही कई वर्षों से सबका जीवन चल ही रहा है।

ऐसे में अचानक लॉकडाउन से सब कुछ बंद हो जाता है। काम, भोजन, परिवहन तो सब पहुंचे शेल्टर। शेल्टर से जब लौटने का समय आने लगा तो सबने कहा कि हम घर नहीं जाएंगे..कारण? जेब में पैसे नहीं, पैसे नहीं तो घर में इज्जत नहीं, भोजन नहीं, पहले तो विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब पूरी कहानी समझा गया तो समझ आया इनका रिश्ते-नातों का सूत्र मात्र नगद है। बच्चे से लेकर पत्नी और माता-पिता भी अधिकांश के मूल्यों के साथ नहीं जुड़े हैं, रिश्तों की गर्माहट तो कब की समाप्त हो चुकी है। परिवार के लिए वो एकमात्र पैसा कमाने की मशीन हैं। तब हमने दूसरा विकल्प दिया कि किसी ठेकेदार के साथ काम करने जाइये, क्योंकि चावड़ी की शुरुआत नहीं हुई है तो जो कारण उन्होंने बताये।

1 . चावड़ी में रोज नहीं जाना पड़ता, ठेके में जाना होता है।

2. चावड़ी से मिले काम में पैसा बहुत है, ठेके में कम।

3. चावड़ी के पैसे उसी दिन मिलते हैं, वो भी नगद, ठेके में कई बार हफ्ते तो कभी महीने में, हो सकता है कि बैंक में डालते हों।

4. चावड़ी के माध्यम से मिले काम में कोई बेइज्जती नहीं करते, सब कौशल का सम्मान करते हैं इसलिए ही चुने जाते हैं। ठेके में गालियां सुनने मिलती हैं।

5. इसमें छुट्टी का झंझट नहीं, ठेके में है।

6. इसमें गृहस्थी नहीं चाहिए, उसमें काम के आसपास ही रसोई जमानी पड़ेगी।

हमारे लिए सब नई बात थी, नए तर्क थे। इनमें से कुछ आखिरकार मजबूरी में काम की तलाश में ठेकेदार के साथ चले गए। कुछ चावड़ी वापस लौटे उम्मीद में कि कभी तो सब खुलेगा।

अब सब खुल गया है , लेकिन समस्याएं वहीं हैं।

1. किसी के पास श्रम कार्ड नहीं है।

2. किसी का बैंक खाता नहीं है।

3. किसी के कौशल की कोई सूची कहीं नहीं है।

अब सरकार को चाहिए कि

1. चावड़ी को व्यवस्थित करें।

2. सभी आने वाले मजदूरों को कौशल के साथ पंजीकृत करें।

3. सबका बैंक खाता अनिवार्य हो

4. काम के मांग का डिस्प्ले बोर्ड बने।

5. अभी महिलाओं के लिए यह बहुत सहज वातावरण के साथ नहीं है, जिसे योग्य बनाया जा सकता है।

6. टोकन सिस्टम हो। काम का अवसर देने वाला एक दिन पूर्व सुचना दे।

कुछ बहुत आसान सा है। करने योग्य भी। लगता है बाकी सबका सुझाव आमंत्रित है।


30-Jun-2020 7:38 PM

दुनिया भर में हिंदू बहुल आबादी वाले दो ही देश हैं, एक भारत और दूसरा नेपाल। भारत की कुल जनसंख्या में हिंदू आबादी करीब 80 फीसदी है, जबकि नेपाल में यह आंकड़ा 85 फीसदी है। वर्षों से इसे दोनों देशों के जुड़ाव की एक बड़ी वजह माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ समय से भारत और नेपाल के रिश्ते तनावपूर्ण बने हुए हैं।

फिलहाल दोनों देशों के बीच तनाव की वजह नेपाल का नया नक्शा बना है जिसे भारत के कड़े विरोध के बाद भी जारी कर दिया गया। इस नक्शे में लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाली क्षेत्र में दर्शाया गया है, जबकि भारत इन्हें अपना इलाका मानता है। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली इस समय भारत के लिए बेहद कठोर शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। बीते हफ्ते उन्होंने भारत पर नेपाल की जमीन पर कब्जा करने का आरोप लगाया।

ओली ने कहा, ‘लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी विवादित भूमि हैं। कालापानी में भारतीय सेना रखकर हमसे हमारी जमीन छीनी गई है। जब तक वहां भारतीय सेना की मौजूदगी नहीं थी, तब तक वह जमीन हमारे पास ही थी। सेना रखने के कारण हम उधर नहीं जा सकते हैं। एक प्रकार से कहा जाए तो यह कब्जा है।।। हम कूटनीतिक संवाद के जरिए समाधान चाहते हैं और समाधान तब होगा जब हमें हमारी जमीन वापस मिलेगी।’ ओली ने भारत पर फर्जी सीमा बनाने का आरोप भी लगाया है।

भारत और नेपाल के बीच बीते महीने यह विवाद तब शुरू हुआ जब रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रे को धारचुला से जोडऩे वाली 80 किलोमीटर लंबी सडक़ का उद्घाटन किया। नेपाल ने इस सडक़ के उद्घाटन पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए दावा किया कि यह सडक़ नेपाली क्षेत्र से होकर गुजरती है। भारत ने नेपाल के दावों को खारिज करते हुए दोहराया कि यह सडक़ पूरी तरह से उसके भूभाग में स्थित है। इस घटनाक्रम से कुछ महीने पहले ही भारत ने अपना एक नया नक्शा जारी किया था जिसमें उसने कालापानी क्षेत्र को अपना हिस्सा बताया था। नेपाल सरकार भारत के इस फैसले का भी विरोध कर रही है।

दोनों देशों के बीच तनाव का परिणाम सीमा पर भी दिखा। एक महीने के अंदर भारत और नेपाल की सीमा पर दो बार गोली चली। बिहार से मिलती नेपाल की सीमा पर नेपाल पुलिस की फायरिंग में एक भारतीय नागरिक की मौत हो गयी और दो अन्य घायल हुए। स्थानीय लोगों के मुताबिक नेपाल पुलिस ने यह फायरिंग तब की जब ये लोग सीमा पर स्थित अपने खेतों में काम करने जा रहे थे। हालांकि, नेपाल पुलिस ने मारे गए व्यक्ति और घायलों को तस्कर बताया। इससे पहले बीते महीने भी बिहार-नेपाल सीमा पर इस तरह की घटना हुई थी। तब भी भारतीय किसानों को रोकने के लिए नेपाली पुलिस ने हवाई फायरिंग की थी। आज स्थिति यह है कि सीमा के नजदीक रहने वाले भारतीयों का नेपाल में अपने रिश्तेदारों से मिलना मुश्किल हो गया है क्योंकि नेपाल पुलिस अब उन्हें सीमा पार नहीं करने देती है।

नेपाल की सरकार इस समय भारत से इस कदर नाराज है कि वह अपने नागरिकता कानून में भी एक बड़ा बदलाव करने जा रही है। 21 जीन को नेपाल की संसद में नागरिकता संशोधन बिल पेश किया गया। इस कानून के पास होने के बाद नेपाल में विवाह करने वाली दूसरे देश की महिलाओं को नागरिकता के लिए सात साल तक इंतजार करना पड़ेगा। वैसे तो यह कानून सभी देशों पर लागू होगा, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसे भारत की वजह से ही लाया गया है क्योंकि नेपाल के मधेसी समुदाय और भारत में सीमा के नजदीक रहने वाले लोगों में एक-दूसरे के यहां शादी करना आम बात है। भारत और नेपाल के बीच का रिश्ता भी बेटी और रोटी का माना जाता है।

साल 2015 में रिश्तों में कड़वाहट शुरू हुई

भले ही भारत-नेपाल के बीच इस समय तनाव अपने चरम पर हो, लेकिन दोनों देशों के बीच रिश्तों में कड़वाहट करीब पांच साल पहले आना शुरू हुई थी। तब नेपाल में तराई के इलाकों में रहने वाले मधेसी और थारू समुदायों ने नए संविधान में बेहतर प्रतिनिधित्व न मिलने पर अपनी सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन छेड़ दिया था। उस समय मोदी सरकार ने नेपाली संविधान में (भारत के करीबी माने जाने वाले) मधेसियों को उचित स्थान दिए जाने की वकालत की थी और इस मामले को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भी उठाया था। तब मधेसियों ने भारत की सीमा से नेपाल में सामान की आवाजाही पूरी तरह बंद कर दी थी। हर जरूरी सामान के लिए केवल भारत पर निर्भर नेपाल में इस आर्थिक नाकेबंदी के चलते डीजल, पेट्रोल, गैस और खाने-पीने के सामान की काफी किल्ल्त हो गई थी।

नेपाल सरकार का कहना था कि जिन सीमाई इलाकों में मधेसियों ने नाकाबंदी नहीं की है, वहां से भी भारत सरकार सामान नहीं भेज रही है। ऐसे में नेपाल सरकार और वहां के अधिकांश लोग यह मानने लगे थे कि मधेसियों की नाकाबंदी के पीछे भारत की नरेंद्र मोदी सरकार का ही हाथ है। उस समय नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने अपने देश के बिगड़े हालात के लिए कई बार सीधे तौर पर भारत को जिम्मेदार भी ठहराया था। उन्होंने एक बयान में कहा था कि नेपाल को एक विकसित और खुशहाल हिमालयी राष्ट्र बनाने को लेकर उन्होंने काफी सपने देखे थे, लेकिन भारत की नाकाबंदी ने इन सपनों को तबाह कर दिया। उन्होंने भारत द्वारा इस मसले को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में उठाने पर भी नाराजगी जताई थी।

चीन ने तुरंत मौके का फायदा उठाया

2015 में बनी इन परिस्थितियों से उबरने के लिए नेपाल को चीन के पास जाना पड़ा। चीन ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया और नेपाल की खुलकर मदद की। उसने अपनी सीमा को नेपाल में सामान की आवाजाही के लिए पूरी तरह खोल दिया। उसने नेपाल को कई महीनों तक तेल, गैस और खाने-पीने की चीजें मुफ्त में या बेहद रियायती दामों पर दीं। इसके चलते देखते ही देखते चीन और नेपाल के संबंध काफी ज्यादा मजबूत हो गए। लेकिन, उस समय चीन की तरफ झुकते जा रहे केपी शर्मा ओली को उनके गठबंधन में शामिल पुष्प कमल दहल (प्रचंड) ने तगड़ा झटका दिया

और सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। जुलाई 2016 में ओली की सरकार गिर गयी और इसके बाद प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) ने नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार का गठन किया। इस सरकार में एक समझौते के तहत पहले प्रचंड प्रधानमंत्री बने और फिर नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा ने यह पद संभाला।

इसके करीब साल भर बाद नवंबर-दिसंबर 2017 में नेपाल में राष्ट्रीय चुनाव हुआ। कुछ महीने पहले ही अलग हो चुके केपी शर्मा ओली और प्रचंड इस चुनाव में फिर एक साथ आ गए और अपनी पार्टियों का विलय कर एक मोर्चे (नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी) का गठन किया। नेपाली मीडिया के मुताबिक चीन ने केपी ओली और पुष्प कमल दहल (प्रचंड) की वामपंथी पार्टियों के बीच गठबंधन करवाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी।

नेपाल के इस चुनाव में जहां वामपंथी केपी ओली को चीन का उम्मीदवार माना जा रहा था, वहीं नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा को भारत का। चुनाव में ओली और प्रचंड के मोर्चे की बड़ी जीत हुई और केपी शर्मा ओली देश के प्रधानमंत्री बने। यह भारत के लिए बड़े झटके जैसा था क्योंकि ओली चीन के बड़े समर्थक थे और उनकी जीत एक तरह से नेपाल के मामले में भारत के ऊपर चीन की जीत थी।

जैसी आशंका जताई जा रही थी केपी शर्मा ओली ने दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने रास्ते चीन की ओर मोड़ दिए और उससे कई बड़े-बड़े समझौते किये। प्रधानमंत्री बनने के तीन महीने बाद उन्होंने चीन की पांच दिवसीय यात्रा की। इस दौरान चीन के साथ 14 समझौते किये गये। 15 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के इन समझौतों में ऊर्जा, पर्यटन, जल विद्युत, सीमेंट फैक्ट्री, व्यापार और कृषि जैसे कई क्षेत्र शामिल हैं। इसके अलावा इस दौरान दोनों देश उस रेलवे लाइन को बिछाने पर भी सहमत हो गए, जो तिब्बत के ग्योरोंग पोर्ट को नेपाल के काठमांडू से जोड़ेगी।

ओली की इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच नेपाल में विमानन, बंदरगाहों तक राजमार्ग, दूरसंचार क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव, नेपाल में तीन बड़े आर्थिक गलियारों के विकास में तेजी लाने, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासतों और स्कूलों के पुनर्निर्माण में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी। दोनों के बीच एक समझौता सुरक्षा और कानून व्यवस्था को लेकर भी हुआ जिसके तहत दोनों देशों की खुफिया और पुलिस सेवाएं मिलकर काम करेंगी। नेपाल के पोखरा क्षेत्र में चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना के तहत एयरपोर्ट का निर्माण करने को लेकर भी एक समझौता हुआ जिस पर इस वक्त काफी तेजी से काम चल रहा है। चीन ने बीते साल तिब्बत से नेपाल को जोडऩे वाले हाइवे को यातायात और व्यापार के लिए खोल दिया।

इसके अलावा चीन ने नेपाल में भारी भरकम निवेश भी किया है। वह पिछले चार सालों से लगातार नेपाल में सबसे ज्यादा निवेश करने वाला देश बना हुआ है। हाल में नेपाल के उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आंकड़े के मुताबिक वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में (नेपाल में वित्तीय वर्ष जुलाई से शुरु होता है) नेपाल में चीन का प्रत्यक्ष निवेश करीब नौ करोड़ डॉलर था जबकि, इसी समय में भारत का करीब दो करोड़ डॉलर। इस वित्त वर्ष में नेपाल में हुए कुल विदेशी निवेश का 93 फीसदी हिस्सा चीन से आया है। पिछले कुछ सालों से चीन दो से चार अरब डॉलर की सालाना वित्तीय मदद भी नेपाल को देता आ रहा है। बीते साल अक्टूबर में 23 साल बाद चीन का कोई राष्ट्रपति नेपाल पहुंचा था। इस यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिंनपिंग ने नेपाल को 56 अरब नेपाली रुपए की मदद देने की घोषणा की थी।

केपी शर्मा ओली के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत के प्रयास

नेपाल में नवंबर-दिसंबर 2017 में हुए चुनाव के बाद फरवरी 2018 जब केपी शर्मा ओली दोबारा प्रधानमंत्री बने तो भारत ने भी उन्हें साधने की कोशिशें तेज कर दीं। इसके तुरंत बाद तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज खुद नेपाल गयीं और नेपाली पीएम को पहली विदेश यात्रा के लिए भारत आने का न्योता दिया। इसके बाद केपी ओली भारत यात्रा पर आए और फिर इसके कुछ महीनों बाद ही नरेंद्र मोदी भी नेपाल यात्रा पर गये। इन दोनों मौकों पर भारत ने नेपाल के साथ कई नए समझौते किये। बीते साल सितम्बर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के मोतिहारी से नेपाल के अमलेखगंज तक तेल पाइपलाइन का भी उद्घाटन कर दिया, जिसे नेपाल के लिए एक बड़ी सहूलियत माना जाता है। बीते समय में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की यात्राओं के दौरान चीन से संबंधों को लेकर नेपाली प्रधानमंत्री ने भारत को आश्वस्त भी किया। उन्होंने कहा कि वे इनके चलते भारत के हितों पर कोई आंच नहीं आने देंगे।

भारत की नेपाल को साधने की कोशिश कुछ हद तक सफल भी हुई। साल 2016 में केपी शर्मा ओली ने खुद चीन द्वारा बिछाई जाने वाली रेल लाइन को तिब्बत से नेपाल के लुंबिनी यानी भारत की सीमा तक लाने की बात की थी। लेकिन, 2018 में चीन यात्रा के दौरान उन्होंने इसे काठमांडू तक सीमित कर दिया। माना गया कि नेपाल ने यह फैसला भारत की वजह से लिया। नेपाल ने चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव योजना के तहत भी कोई ऐसा समझौता अभी तक नहीं किया है जिससे भारत को कोई नुकसान हो।

संबंध पटरी पर आने लगे थे, तभी भारत का नया नक्शा जारी हो गया

भारत और नेपाल के बीच 2015 के मधेसी आंदोलन के समय जो रिश्ते खराब हो गए थे, वे बीते एक-डेढ़ साल में धीरे-धीरे पटरी पर आना शुरू हो गए थे। लेकिन बीते नवंबर में एक बार फिर दोनों के बीच तब अनबन शुरू हो गयी जब भारत की नरेंद्र मोदी सरकार ने देश का नया राजनीतिक नक्शा जारी किया। सरकार ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद दो नवंबर को यह नक्शा जारी किया था। नेपाल ने भारत के नए नक्शे पर सवाल उठाए। नेपाल को इस मानचित्र के उस हिस्से से आपत्ति थी, जहां विवादित कालापानी क्षेत्र को भारतीय सीमा के अंदर दिखाया गया है। नेपाल का दावा है कि कालापानी क्षेत्र नेपाल के दार्चुला जि़ले का हिस्सा है। उधर, भारत का कहना है कि ‘कालापानी’ उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जि़ले का भाग है।

कालापानी एक तरह से डोकलाम की तरह ही है, जहां तीन देशों की सीमाएं हैं। डोकलाम में भारत, भूटान और चीन हैं। वहीं कालापानी में भारत, नेपाल और चीन हैं। ऐसे में सैन्य नजरिये से यह ट्राइजंक्शन बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। यह उस क्षेत्र में सबसे ऊंची जगह भी है। 1962 युद्ध के दौरान भारतीय सेना यहां पर थी। सामरिक मामलों के जानकार बताते हैं कि इस क्षेत्र में चीन ने भी बहुत हमले नहीं किए थे क्योंकि भारतीय सेना यहां मजबूत स्थिति में थी। इस युद्ध के बाद जब भारत ने वहां अपनी पोस्ट बनाई, तब नेपाल ने इसका कोई विरोध नहीं किया था। जानकारों की मानें तो भारत का यह डर है कि अगर वह इस पोस्ट को छोड़ता है, तो हो सकता है चीन यहां धमक जाए और इस स्थिति में भारत को सिर्फ नुकसान ही होगा। इन्हीं बातों के मद्देनजऱ भारत इस इलाके से सेना को नहीं हटाना चाहता है। बहरहाल, बीते नवंबर में जब भारत के नए नक़्शे का नेपाल में भारी विरोध हुआ तो वहां की सरकार और भारत सरकार दोनों ने ही कहा कि वे इस मामले को बैठकर सुलझा लेंगे और इसके बाद इस पर बवाल थम गया।

लेकिन, बीते मई में दोनों देशों के बीच तब एक बार फिर तकरार शुरू हो गयी, जब भारतीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रे को पिथौरागढ़ जिले के धारचुला से जोडऩे वाली 80 किलोमीटर लंबी सडक़ का उद्घाटन किया। यह सडक़, पिथौरागढ़-तवाघाट-घाटियाबागढ़ रूट का विस्?तार है। यह सडक़ अब घाटियाबागढ़ से शुरू होकर लिपुलेख दर्रे पर ख़त्म होती है, जो कैलाश मानसरोवर का प्रवेश द्वार है। भारत के नजरिये से देखें तो कैलाश मानसरोवर तीर्थयात्रियों को यह सडक़ बनने के बाद लंबे रास्?ते की कठिनाई से राहत मिलेगी और गाडिय़ां चीन की सीमा तक जा सकेंगी। इस सडक़ के उद्घाटन के तुरंत बाद नेपाल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए दावा किया कि यह सडक़ नेपाली क्षेत्र से होकर गुजरती है। जबकि भारत ने इसे अपने क्षेत्र में स्थित होने की बात कही।

महाकाली नदी का उदगम विवाद की वजह

इतिहासकारों की मानें तो 1816 में नेपाल और ब्रिटिश इंडिया के बीच सुगौली संधि हुई थी जिसके तहत महाकाली नदी को ही भारत और नेपाल दोनों की सीमा मान लिया गया था। अब भारत-नेपाल के बीच का झगड़ा महाकाली नदी के उद्गम को लेकर है। नेपाल का कहना है कि नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से है और यह नदी लिम्पियाधुरा से निकलकर दक्षिण-पश्चिम की तरफ बहती है। वहीं भारत दावा करता रहा है कि यह नदी कालापानी से निकलती है और दक्षिण-पूर्व दिशा की तरफ बहती है। जानकार कहते हैं कि अगर भारत का दावा सही है तो लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा तीनों ही उसके क्षेत्र हो जाते हैं। लेकिन अगर नदी का उदगम लिम्पियाधुरा है तो फिर इन तीनों क्षेत्रों पर नेपाल का अधिकार है।

भारत और नेपाल के बीच विवादित क्षेत्र 7 फोटो : आईएस पार्लियामेंट

हालिया झगडे पर कुछ जानकार यह भी कहते हैं कि भले यह क्षेत्र भविष्य में बातचीत के बाद भारत के कब्जे में आ जाएं, लेकिन वर्तमान हालात को देखते हुए भारत को कालापानी को अपने नए नक़्शे में दिखाने और लिपुलेख तक सडक़ बनाने से पहले नेपाल को विश्वास में लेना जरूरी था। क्योंकि दोनों के बीच इन क्षेत्रों को लेकर चीजें साफ़ नहीं हैं। यही वजह थी कि जब नेपाल से विवादित हिस्सों पर बातचीत किये बिना फैसले ले लिए गये तो वह नाराज हो गया। और फिर उसने भी वही काम किया जो भारत ने किया था, यानी लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा तीनों को ही अपने नक़्शे में दिखा दिया।

वैसे हालिया मामले को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने जनता का ध्यान बांटने और अपनी कुर्सी बचाने के लिए नए नक़्शे को हवा दी है। कहा जाता है कि कोरोना वायरस सहित तमाम मामलों पर सरकार के ढीले रुख की वजह से जनता उनसे नाराज है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का मोर्चा भी अब टूट के कगार पर पहुंच गया है। कुछ ही दिन पहले सत्ताधारी मोर्चे के कार्यकारी चेयरमैन पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ पीएम ओली को असफल बताते हुए उनसे इस्तीफे की मांग कर चुके हैं। प्रचंड ने ओली को चेतावनी देते हुए यह भी कहा है कि अगर प्रधानमंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया तो वे मोर्चे को तोड़ देंगे। इस घटनाक्रम के लिए भी केपी शर्मा ओली ने भारत को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि नेपाल का नया नक्शा जारी करने से नाराज भारत उन्हें उनकी कुर्सी से हटाना चाहता है। (सत्याग्रह)


30-Jun-2020 7:35 PM

बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) देश की सबसे पुरानी और सबसे प्रामाणिक समाचार समिति है। मैं दस वर्ष तक इसकी हिंदी शाखा ‘पीटीआई—भाषा’ का संस्थापक संपादक रहा हूं। उस दौरान चार प्रधानमंत्री रहे लेकिन किसी नेता या अफसर की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह फोन करके हमें किसी खबर को जबर्दस्ती देने के लिए या रोकने के लिए आदेश या निर्देश दे लेकिन अब तो प्रसार भारती ने लिखकर पीटीआई को धमकाया है कि उसे सरकार जो 9.15 करोड़ रु. की वार्षिक फीस देती है, उसे वह बंद कर सकती है।

यह राशि पीटीआई को विभिन्न सरकारी संस्थान जैसे आकाशवाणी, दूरदर्शन, विभिन्न मंत्रालय, हमारे दूतावास आदि, जो उसकी समाचार-सेवाएं लेते हैं, वे देते हैं। यह धमकी वैसी ही है, जैसी कि आपात्काल के दौरान इंदिरा सरकार ने हिंदी की समाचार समितियों- ‘हिंदुस्थान समाचार’ और ‘समाचार भारती’ को दी थी। मैंने ‘हिंदुस्थान समाचार’ के निदेशक के रुप में इस धमकी को रद्द कर दिया था। मैं अकेला पड़ गया। मेरे अलावा सबने घुटने टेक दिए और इन दोनों एजेंसियों को उस समय पीटीआई में मिला दिया गया। क्या पीटीआई को दी गई यह धमकी कुछ वैसी ही नहीं है ?

मैं पीटीआई के पत्रकारों से कहूंगा कि वे डरें नहीं। डटे रहें। 1986 में बोफोर्स कांड पर जब जिनीवा से चित्रा सुब्रह्मण्यम ने घोटाले की खबर भेजी तो ‘भाषा’ ने उसे सबसे पहले जारी कर दिया। प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनके अफसरों की हिम्मत नहीं हुई कि वे मुझे फोन करके उसे रुकवा दें। अब पीटीआई ने क्या गलती की है ? सरकारी चि_ी में उस पर आरोप लगाया गया है कि उसने नई दिल्ली स्थित चीनी राजदूत सुन वीदोंग और पेइचिंग स्थित भारतीय राजदूत विक्रम मिसरी से जो भेंट-वार्ताएं प्रसारित की हैं, वे राष्ट्रविरोधी हैं और वे चीनी रवैए का प्रचार करती हैं। उनसे हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वक्तव्य का खंडन होता है।

हमारे राजदूत ने कह दिया कि चीन गलवान घाटी में हमारी जमीन खाली करे जबकि मोदी ने कहा था कि चीन हमारी जमीन पर घुसा ही नहीं है। इसी तरह चीनी राजदूत ने भारत को चीनी-जमीन पर से अपना कब्जा हटाने की बात कही है। यही बात चीनी विदेश मंत्री ने हमारे विदेश मंत्री से कही थी। मेरी समझ में नहीं आता कि इसमें पत्रकारिता की दृष्टि से राष्ट्रविरोधी काम क्या हुआ है ?

यह पत्रकारिता का कमाल है कि वह दुश्मन से भी उसके दिल की बात उगलवा लेती है। जो काम नेता और राजदूत के भी बस का नहीं होता, उसे पत्रकार पलक झपकते ही कर डालते हैं। उन पर राष्ट्रविरोधी होने की तोहमत लगाकर प्रसार भारती अपनी प्रतिष्ठा को ही ठेस लगा रही है। मैं समझता हूं कि सरकार को चाहिए कि प्रसार भारती के मुखिया अफसर को वह फटकार लगाए और उसे खेद प्रकट करने के लिए कहे।

(नया इंडिया की अनुमति से)


30-Jun-2020 7:10 PM

हम इंसानों द्वारा पर्यावरण का जिस तरह से विनाश किया जा रहा है, वो महामारियों के खतरे को और बढ़ा रहा है| साथ ही इकोसिस्टम में आ रही गिरावट इन बीमारियों से निपटना मुश्किल बना रही हैं|

-ललित मौर्य 

हम इंसानों द्वारा पर्यावरण का जिस तरह से विनाश किया जा रहा है, वो महामारियों के खतरे को और बढ़ा रहा है| साथ ही इकोसिस्टम में आ रही गिरावट इन बीमारियों से निपटना मुश्किल बना रही हैं| यह जानकारी हाल ही में किये गए एक शोध से सामने आई है| जोकि यूनिवर्सिटी ऑफ इंग्लैंड और एक्सेटर विश्वविद्यालय की ग्रीनपीस रिसर्च लेबोरेटरीज द्वारा किया गया है| इस शोध के अनुसार बीमारियों का खतरा जैवविविधता और प्राकृतिक प्रक्रियाओं जैसे जल चक्र आदि से जुड़ा होता है|

जिस तरह से जूनोटिक डिजीज बढ़ती जा रही है दुनिया के लिए वो एक बड़ी चिंता का विषय है| हाल ही में फैली महामारी कोविड-19 उसका एक प्रमुख उदाहरण है| इससे पहले भी सार्स, इबोला, हन्तावायरस पल्मोनरी सिंड्रोम, रेबीज, बैक्टीरिया कैम्पिलोबैक्टर जेजुनी, एवियन फ्लू, स्वाइन फ्लू जैसी न जाने कितनी बीमारियां जानवरों से इंसानों में फैली हैं| जो स्पष्ट तौर पर इंसानों के प्रकृति के साथ बिगड़ते रिश्तों का परिणाम हैं|

वैज्ञानिकों ने समाज और पर्यावरण के बीच के जटिल संबंधों और वो आपस में किस तरह एक दूसरे को प्रभावित करते है, इसे समझने के लिए एक फ्रेमवर्क का निर्माण किया है| जिसके द्वारा किये विश्लेषण के अनुसार एक पूरी तरह से विकसित इकोसिस्टम को बनाये रखना जरुरी है| साथ ही इससे जुड़े पर्यावरण और स्वास्थ्य सम्बन्धो को भी बरक़रार रखना जरुरी है, क्योंकि यह महामारियों को रोकने के लिए अहम् होते हैं|

महामारियों के प्रसार के लिए स्वयं ही जिम्मेदार है इंसान

लेकिन यदि पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) में किसी तरह की गिरावट आती है| तो वो इन संक्रामक बीमारियों के इंसानों तक पहुंचने के खतरे को बढ़ा सकती हैं| इकोसिस्टम में आ रही यह गिरावट कई तरह से हो सकती है- जैसे वनों की अंधाधुन्द कटाई, भूमि उपयोग में बदलाव करना, कृषि सघनता में वृद्धि और बदलाव करना, साथ ही पानी और अन्य संसाधनों की उपलब्धता को कम करना आदि, इन सभी के चलते बीमारियों का प्रसार आसान हो जाता है|

यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्ट इंग्लैंड में शोधकर्ता और इस अध्ययन के प्रमुख मार्क एवरर्ड ने बताया कि, "स्वाभाविक रूप से इकोसिस्टम इस तरह से काम करते हैं कि बीमारियां जानवरों से इंसानों में नहीं फैल सकती| पर जैसे-जैसे इकोसिस्टम में गिरावट आती जाती है, बीमारियों का इंसानों में फैलना आसान हो जाता है|" उनका मानना है कि इसके साथ ही इकोसिस्टम में गिरावट के कारण जल संसाधनों जैसे जरुरी तत्वों की उपलब्धता घट जाती है| जो इन बीमारियों को फैलने में मददगार होती है| यदि हाथ धोने और साफ सफाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं उपलब्ध होगा तो इन रोगों का फैलना आसान हो जाता है| उनके अनुसार बीमारियों के बढ़ते खतरे और प्राकृतिक संसाधनों और इकोसिस्टम में आ रही गिरावट को अलग नहीं किया जा सकता| यह सभी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं|

एक्सेटर विश्वविद्यालय के शोधकर्ता और इस अध्ययन से जुड़े डेविड सेंटिलो ने बताया कि, "दुनिया भर में जिस तरह कोविड-19 से जुड़े स्वास्थ्य और आर्थिक खतरों से निपटने के लिए दुनिया के अनेक देशों ने प्रभावी कदम उठाये हैं| उससे एक बात तो साफ हो जाती है कि यदि राजनैतिक इच्छाशक्ति हो तो जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता को हो रहे नुकसान जैसे खतरों से भी निपटा जा सकता है|

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह महामारी हम सभी के लिए एक सबक है| हमें आज पारिस्थितिक तंत्रों को जो नुकसान हुआ है उसे ठीक करने की जरुरत है| साथ ही वैश्विक समाज को बेहतर बनाना होगा| आज पर्यावरण और आर्थिक नीतियों के निर्माण में प्रकृति और मानव अधिकारों को वरीयता देना जरुरी है| संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी 2021 से 2030 की अवधि को पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और जैव विविधता की सुरक्षा का दशक माना है| जिससे हमारे और प्रकृति के बीच के बिगड़ते रिश्तों को सुधारा जा सके|(downtoearth)


30-Jun-2020 4:05 PM

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट ने इसराइल द्वारा काबिज फलस्तीनी इलाकों को गैरकानूनी ढंग से छीनने की योजना से पीछे हटने को कहा है। यूएन मानवाधिकार प्रमुख ने इसराइल की इस कार्रवाई का फलस्तीनियों और पूरे क्षेत्र के लिए चेतावनी भरे शब्दों में विनाशकारी असर होने की आशंका जताई है। इससे पहले यूएन महासचिव ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ऐसी कोई भी एकतरफा कार्रवाई अन्तरराष्ट्रीय कानून का गम्भीर उल्लंघन होगी। 

मानवाधिकार उच्चायुक्त बाशेलेट ने कहा कि ऐसी कोई भी कार्रवाई गैरकानूनी है जिस पर और बात हो ही नहीं सकती। 

ज़मीन छीना जाना ग़ैरक़ानूनी है। बस। हड़पने की कोई भी कार्रवाई, फिर चाहे वो पश्चिमी तट का 30 फ़ीसदी हो या फिर पाँच फ़ीसदी।

उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि ऐसी कार्रवाई के झटके कई दशकों तक महसूस किए जाते रहेंगे और यह इसराइल और फ़लस्तीनी, दोनों के लिए बेहद नुक़सानदेह होगा। साथ ही उन्होंने समय रहते इस फ़ैसले को पलटने का आहवान किया है।

ग़ौरतलब है कि इसराइली प्रधानमन्त्री बिन्यामिन नेतान्याहू ने मार्च 2020 में राष्ट्रीय चुनावों के आखिरी दौर में प्रचार के दौरान फ़लस्तीनी इलाक़े छीनने की योजना को अपने चुनावी प्रमुख वादों में शामिल किया था। 

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक ऐसी काफ़ी सम्भावना है कि इसराइली प्रधानमन्त्री क़ाबिज़ फ़लस्तीनी पश्चिमी तट के इलाक़ों को एकतरफ़ा रूप से हड़पने के वादे पर एक जुलाई तक अमल कर सकते हैं। 

इस योजना से पश्चिमी तट पर इसराइल की सम्प्रभुता लगभग 30 फ़ीसदी तक बढ़ जाएगी – इसमें जॉर्डन घाटी से सैकड़ों ग़ैरक़ानूनी इसराइली बस्तियों तक का क्षेत्र शामिल है। लेकिन फ़लस्तीनियों ने इस कार्रवाई का प्रतिरोध करने, यहाँ तक कि हिंसा की भी चेतावनी दी है।

हाल ही में यूएन प्रमुख एंतोनियो गुटेरेश ने भी सुरक्षा परिषद की वर्चुअल बैठक को सम्बोधित करते हुए कहा था कि अगर इलाक़े हड़पने की इस योजना पर अमल हुआ तो यह अन्तरराष्ट्रीय कानून का एक गम्भीर उल्लंघन होगा जिससे दो-राष्ट्र के समाधान की आशाओं और वार्ता शुरू होने की सम्भावनाओं को नुक़सान होगा।

मानवाधिकार प्रमुख मिशेल बाशेलेट ने महासचिव गुटेरेश की इस अपील का पुरज़ोर समर्थन किया है। 

यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने इसराइली सरकार से इलाक़े छीनने की अपनी योजना को छोडऩे की पुकार लगाई थी और हम उस अपील का 100 फ़ीसदी समर्थन करते हैं।

उन्होंने इसराइली लोगों से अपने पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों, जनरलों और दुनिया भर से उठी आवाज़ों को सुनने का आग्रह किया है जो इस ख़तरनाक रास्ते पर आगे ना बढऩे के लिए आगाह कर रही हैं। 

शान्ति प्रयासों को झटका

मानवाधिकार प्रमुख ने स्पष्ट किया कि ज़मीन हड़पे जाने की इस कार्रवाई के असल नतीजों का अनुमान फि़लहाल नहीं लगाया जा सकता। लेकिन ये नतीजे फ़लस्तीनियों, इसराइल, और व्यापक क्षेत्र के लिए विनाशकारी होने की आशंका है। 

उन्होंने कहा कि क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़ों को छीने जाने का कोई भी प्रयास ना सिफऱ् क्षेत्र में स्थाई शान्ति की सम्भावनाओं को क्षति पहुँचाएगा बल्कि इससे मानवाधिकार हनन के मामले बढऩे की भी आशंका है। 

आवाजाही की आज़ादी के अधिकार पर पाबन्दी होने से फ़लस्तीनी समुदाय के लिए मुश्किलें बढ़ जाने की आशंका है : उनके लिए अपने ही खेतों में काम करना, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ हासिल करना और मानवीय राहत हासिल करना और भी ज़्यादा मुश्किल हो सकता है। 

साथ ही उन पर छीने गए इलाक़ों से बाहर जाने का दबाव होगा और उन्हें जबरन अन्य इलाक़ों में भी भेजा जा सकता है।

छीने गए इलाक़ों से बाहर रहने वाले फ़लस्तीनियों का अपने प्राकृतिक संसाधनों तक पहुँचना बाधित हो सकता है और अपने ही देश को छोडऩे या लौटने की सम्भावनाओं पर भी असर पड़ेगा। 

पहले से क़ायम इसराइली बस्तियाँ अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का स्पष्ट उल्लंघन बताई गई हैं और अब उनका दायरा बढऩे से दोनों समुदायों के बीच पहले से पसरा तनाव और ज़्यादा गहरा सकता है।

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने चिन्ता जताई कि छोटे स्तर पर भी ज़मीन छीने जाने से हिंसा और लोगों की जि़न्दगियाँ जाने का ख़तरा है क्योंकि दीवारें खड़ी की जाएँगी, सुरक्षाकर्मी तैनात किये जाएँगे और दोनों जनसमूह एक दूसरे के आस-पास रहेंगे। 

एक ही क्षेत्र में दो स्तर वाले क़ानून की मौजूदा व्यवस्था और गहराई से समाहित होगी जिसका फ़लस्तीनियों के जीवन पर तबाहीपूर्ण असर होगा जिनके पास फि़लहाल क़ानूनी उपाय कम या ना के बराबर है। (news.un.org)