संपादकीय

15-Feb-2021 7:19 PM 181

लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा द्वारा देश की न्यायपालिका की चौपट साख को लेकर किए हमले और मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के रिटायर होते ही राज्यसभा में मनोनयन को लेकर उठाए सवालों की गर्द अभी बैठी भी नहीं है कि रंजन गोगोई ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उसका जवाब दिया। उन्होंने मोदी सरकार द्वारा उन्हें राज्यसभा भेजने के बारे में कहा- अगर मुझे सौदा ही करना होता तो क्या मैं एक राज्यसभा सीट से मानता? राज्यसभा अच्छा सौदा नहीं है। यदि सौदेबाजी भी करनी होती तो किसी बड़ी चीज की मांग की जाती, न कि राज्यसभा की। उन्होंने कहा कि वे पहले ही यह लिखकर दे चुके हैं कि अपने राज्यसभा-कार्यकाल के दौरान वेतन नहीं लेंगे। 

रंजन गोगोई से पूछा गया था कि क्या वे महुआ मोइत्रा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे क्योंकि उन्होंने कहा था कि गोगोई ने खुद पर लगे यौन उत्पीडऩ के आरोपों का फैसला करके न्यायपालिका को बदनाम कर दिया, इस पर गोगोई का कहना था- अगर आप अदालत जाते हैं तो आपको इंसाफ नहीं मिलेगा। 

हिन्दुस्तान के मुख्य न्यायाधीश रहे रंजन गोगोई की ये दोनों बातें सदमा पहुंचाने वाली हैं, और लोकतंत्र के लिए भयानक अपमानजनक भी हैं। देश की संसद के उच्च सदन, राज्यसभा, को वे यह कहते हुए नीची नजर से ही देखते हैं कि अगर सौदा होता तो सिर्फ राज्यसभा सीट पर बात नहीं बनती, वे सिर्फ एक राज्यसभा सीट से क्यों मानते, सौदेबाजी होती तो किसी बड़ी चीज की मांग की जाती, न कि राज्यसभा सीट की। भारत के लोकतंत्र में सबसे ऊंचे सदन की सदस्यता को इस कदर नाकाफी करार देना लोकतंत्र के प्रति एक अपमान की बात है। इसी राज्यसभा सदस्यता से लोगों को ढेर सारी सहूलियतों के अलावा ऐसा विशेषाधिकार भी मिलता है जो उन्हें देश के बाकी नागरिकों के मुकाबले अधिक अधिकार देता है। यह भी अगर रंजन गोगोई को काफी नहीं लग रहा है, तो लोकतंत्र के लिए उनके मन में सम्मान नहीं है, हिकारत है। लेकिन बात यही पर नहीं रूकी, उन्होंने जिस तरह अदालत जाने के बारे में कहा कि अदालत जाने पर इंसाफ नहीं मिलता, यह बात भी उस संस्थान के लिए भारी बेइज्जती की है जहां से रंजन गोगोई ने बरसों तक रोटी और घी-मक्खन कमाया है। इसी संस्थान के विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए वे मातहत कर्मचारी के यौन शोषण के आरोपों पर रियायत पाते रहे, और पूरी दुनिया ऐसी कोशिशों को धिक्कार रही थी। 

इसी जगह पर दो-तीन दिन पहले ही हमने यह लिखा है कि अफसरों और जजों के रिटायर होने के बाद उन्हें किसी किस्म का पुनर्वास नहीं मिलना चाहिए, और रंजन गोगोई की मिसाल उसमें भी दी थी कि सरकार को पसंद आने वाले लगातार कई फैसलों के बाद राज्यसभा की सदस्यता पाना उनकी खुद की नजर में कितनी ही सच्ची बात हो, जनता की नजर में यह एक बहुत बड़ा तोहफा है। लोकतंत्र की इज्जत के लिए और न्यायपालिका की साख के लिए सस्ते या महंगे तोहफों का यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। हिन्दुस्तान के ही बहुत से ऐसे जज रहे हैं जिन्होंने सरकार से अपनी दूरी बनाए रखी है, और जो किसी पुनर्वास के फेर में सरकार को खुश करने में नहीं लगे रहे। 

वैसे तो आज देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर अधिक फिक्र करना देश से गद्दारी में गिना जा रहा है, फिर भी जब कभी भारतीय संसद का इतिहास दर्ज होगा, उसमें यह अच्छी तरह दर्ज होगा कि देश का एक मुख्य न्यायाधीश देश के सर्वोच्च सदन को कितना सस्ता सामान समझते रहा है। अपने पुराने गलत फैसलों, और गलत चाल-चलन का बचाव करते हुए लोग किस तरह आगे और गलत काम करते चलते हैं, यह मिसाल देश के लोगों को भूलना नहीं चाहिए। 
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14-Feb-2021 5:43 PM 104

आज प्रेम का त्यौहार वेलेंटाइन डे है, और इसके लिए प्रेमी दिलों ने फूलों और तोहफों की तैयारी कर रखी है, दूसरी तरफ प्रेम से नफरत करने वालों ने प्रेमियों को मारने के लिए लाठियों को तेल पिला रखा है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में प्रशासन और पुलिस गुंडों को रोकने और जेल भेजने के बजाय बाग-बगीचों से लडक़े-लड़कियों को, दोस्तों और प्रेमी जोड़ों को बाहर रखने के लिए हथियार लेकर जवान तैनात कर रखेंगे। नतीजा यह है कि गुंडागर्दी रोकने के बजाय, नफरत और हिंसा रोकने के बजाय, सरकार की पूरी ताकत प्रेम को रोकने में झोंक दी जाएगी।

इस राज्य में कुछ बरस पहले, उस वक्त बापू कहलाने वाले, और अब आसाराम रह गए एक आदमी ने सरकार को सलाह दी थी कि वेलेंटाइन डे को मनाना बंद करके 14 फरवरी के इस अंग्रेजी तारीख वाले त्यौहार के दिन मातृ-पितृ दिवस मनाया जाए। चूंकि उस वक्त आसाराम, बापू भी कहलाता था इसलिए उस वक्त की भाजपा सरकार ने उसके पांव छूते हुए वह राय मान ली थी, और सरकारी स्तर पर, सरकारी खर्च पर, स्कूलों में यह नए मुखौटे वाला त्यौहार शुरू हो गया था। यह फेरबदल करते हुए सरकार ने किसी भी समाजशास्त्री या मनोवैज्ञानिक से यह सलाह नहीं ली थी कि नौजवान पीढ़ी को, लडक़े-लड़कियों को अगर स्वाभाविक प्रेम से रोका जाएगा, तो उनके मानसिक विकास पर क्या फर्क पड़ेगा। 

यह देश इसी तरह के धर्मान्ध पाखंडियों की राय पर अपनी रीति-नीति बदलते रहता है, और यही वजह है कि नौजवान पीढ़ी से लेकर बच्चों तक को अंतहीन बलात्कारों का शिकार होना पड़ता है, कुंठाओं में जीना पड़ता है, और अपनी स्वाभाविक संभावनाओं से कोसों पीछे रहकर मन मारकर दूसरे सभ्य देशों को हसरत से देखना पड़ता है।

इस देश के इतिहास में इस किस्म की इतनी बड़ी मूर्खता कभी नहीं हुई थी कि नौजवान लडक़े-लड़कियों को प्रेम से रोका जाए। सैकड़ों बरस पहले का संस्कृत साहित्य प्रेम की कहानियों से, प्रेम की बातों से ऐसा लबालब है कि उसमें से मादक रस टपकते ही रहता है। एक तरफ तो अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति, और अपनी संस्कृत भाषा की रक्षा के लिए भारतीय संस्कृति के ठेकेदार लाठियां लेकर चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं, और दूसरी तरफ अपने ही देश के सांस्कृतिक इतिहास में प्रेम की जो लंबी परंपरा रही है, कृष्ण के गोपियों के साथ रास की जो कविताएं, जो तस्वीरें सैकड़ों बरस से चली आ रही हैं, उन सबको अनदेखा करके प्रेम को कुचलना भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म साबित किया जा रहा है। बंगाल से लेकर आज के बांग्लादेश तक जिस तरह प्रेम में भीगा हुआ वसंतोत्स्व मनाया जाता है, और जिस तरह भारत के इतिहास में प्रेम और सेक्स के पर्व, मदनोत्सव को मनाने की परंपरा पश्चिम के वेलेंटाइन डे से भी बहुत पुरानी है, उसे याद रखना चाहिए। 

नौजवान दिलों की भावनाओं को कुचलकर उससे उनके मां-बाप के लिए सम्मान का प्रतीक चिन्ह नहीं गढ़ा जा सकता। इंसान की जिंदगी में मां-बाप की जरूरत भी होती है, बच्चों की जरूरत भी होती है, और प्रेम या/और सेक्स की जरूरत भी होती है। इनमें से कोई भी जरूरत एक-दूसरे का विकल्प नहीं होती, जिस तरह जिंदगी मौत का विकल्प नहीं होती, मौत जिंदगी का विकल्प नहीं होती, भजन भोजन का विकल्प नहीं होता, और भोजन भजन का विकल्प नहीं होता। जिंदगी में हर बात की अलग-अलग जगह और जरूरत होती हैं। इनको एक-दूसरे से गड्डमड्ड करके कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। जिस आसाराम ने वेलेंटाइन डे के खिलाफ, नौजवानों के प्रेम के खिलाफ बकवास की थी, वही आसाराम मन में कैसी हिंसक भावनाएं रखता था, यह उसके बलात्कार की शिकार नाबालिग बच्ची के बयान में खुलकर सामने आया है। प्रेम के ऐसे दिनों पर होने वाली गुंडागर्दी को भी खत्म करना चाहिए जो कि हिन्दू धर्म, हिन्दुत्व, और भारतीय संस्कृति, इन सबको बदनाम करती है। नौजवान अगर प्रेम नहीं कर पाएंगे, तो कुंठा और भड़ास में वे हिंसा की तरफ बढ़ेंगे। मां-बाप की इज्जत करने के लिए प्रेमी दिलों की इज्जत का कत्ल जरूरी नहीं है। और जहां तक एक लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी की बात है, तो किसी भी दिन बाग-बगीचे में, तालाब के किनारे जाकर बैठने वाले प्रेमियों को रोकने के बजाय सरकार को अपनी बंदूकें उन गुंडे-मवालियों पर ताननी चाहिए जो कि धर्म और सांस्कृतिक इतिहास का नाम लेकर अपनी दुकानदारी चलाते हैं, और हिंसा करते हैं। सरकार को तो यह खुली मुनादी करनी चाहिए कि सार्वजनिक जगहों पर शिष्टता की सीमा में मिलने वाले सारे लोगों को सुरक्षा दी जाएगी। बलात्कारी आसाराम के भक्त और अनुयायी उसके जुर्म, उसके करतूत के बावजूद अपने परिवार और बच्चों को लेकर आसाराम के प्रति आस्था का सार्वजनिक जलसा करते हैं, और आज के दिन के लिए हफ्ते भर से उसके पोस्टर-होर्डिंग लगाए गए हैं कि 14 फरवरी को मातृ-पितृ दिवस मनाया जाए। एक बलात्कारी के गौरवगान के ऐसे होर्डिंग और पोस्टर को हटाना भी सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार भी सजायाफ्ता कैदी आसाराम के फतवे को सार्वजनिक जगहों से नहीं हटा रही है, देश भर में आसाराम का साथ देने वाली भाजपा की सरकारें भला ये पोस्टर क्यों हटाएंगी? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


13-Feb-2021 5:55 PM 130

आज एक वेबसाईट पर जब एक खबर की हैडिंग दिखाई पड़ी कि पांच साल में पहली बार बिना किसी नियुक्ति के रिटायर हो सकते हैं जस्टिस बोबडे, तो इस हैडिंग से यह धोखा हुआ कि जस्टिस बोबडे की रिटायरमेंट के बाद की कोई पोस्ट अभी तय नहीं हुई है। समाचार आगे पढऩे पर समझ आया कि सुप्रीम कोर्ट का अगला मुख्य न्यायाधीश तय होने के पहले वर्तमान सीजेआई के रिटायर हो जाने की आशंका है, और ऐसा पांच बरस में पहली बार होगा। आमतौर पर अगला सीजेआई पहले तय हो जाता है। 

अभी चार दिन पहले संसद में अपने एक धमाकेदार और शानदार भाषण में तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने हाल ही में न्यायपालिका की साख चौपट होने को लेकर जिस तरह का हमला बोला, उसके बाद आज की यह हैडिंग ऐसी गलतफहमी पैदा कर रही थी। उन्होंने सेक्स शोषण के आरोपों से घिरे पिछले एक सीजेआई पर हमला बोला था, और कहा था कि वे खुद अपने खिलाफ हुई शिकायत की सुनवाई के जज बनकर बैठे थे, और रिटायर होते ही राज्यसभा में चले गए। महुआ मोइत्रा की बात एकदम खालिस खरी थी, इस एक मुख्य न्यायाधीश के ऐसे फैसलों से, और ऐसी संसद सदस्यता लेने से अदालत की साख पूरी चौपट ही हो गई है। लेकिन सच तो यह है कि राज्यसभा न जाने पर भी सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने वाले जज देश के बहुत से आयोग या ट्रिब्यूनल के मुखिया बन जाते हैं, और देश में 50 से अधिक ऐसी कुर्सियां हैं जिनमें रिटायर्ड बड़े जज ही आ सकते हैं। नतीजा यह होता है कि दिल्ली में सबसे शाही बंगलों पर पांच बरस और कब्जा बनाए रखने के लिए, सहूलियतों और दबदबे के लिए लोग, जज और नौकरशाह, फौजी और नेता, रिटायर होने के पहले समझौते करते हैं ताकि रिटायरमेंट के बाद वे शाही दिल्ली से लेकर प्रदेशों के राजभवनों तक कहीं काबिज रह सकें। 

लेकिन यह बात महज न्यायपालिका तक सीमित नहीं है। राज्यों में देखें तो बहुत से ऐसे मामले लगातार सामने आते हैं जिनमें रिटायर होने वाले अफसर अपने आखिरी बरसों में वर्तमान सरकार को खुश करने के काम में लगे रहते हैं, उनके विवेक के फैसले सत्ता की पसंद के होते हैं ताकि वे रिटायर होने के बाद राज्य में पांच बरस के लिए कोई और कुर्सी-बंगला पा सकें। यह सिलसिला लोकतंत्र में भ्रष्टाचार का एक बड़ा जरिया हो गया है, एक बड़ी वजह हो गई है। इस सिलसिले के खिलाफ किसी सामाजिक कार्यकर्ता को अदालत जाना चाहिए कि जज और अफसर जिस राज्य में काम करते हुए रिटायर हुए हैं, उस राज्य में उन्हें बाद में कोई नियुक्ति न मिले। ऐसी नियुक्तियां हितों के टकराव को बढ़ाती हैं, भ्रष्टाचार को बढ़ाती हैं। 

हालांकि यह सुझाते हुए भी हमें अदालतों से बहुत उम्मीद नहीं है क्योंकि राज्यों के हाईकोर्ट के जज भी राज्य के मानवाधिकार आयोग जैसी कुर्सियों पर आते ही हैं, और जनता के बीच ऐसी धारणा बनी रहती है कि अदालती फैसले सरकार की मनमर्जी के होने से जजों को बाद में ऐसी कुर्सियां मिलती हैं। शासन हो या न्यायपालिका, इनको न सिर्फ अपनी निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए, बल्कि वह निष्पक्षता दिखनी भी चाहिए। अब देश भर में जनधारणा की कीमत बुझाकर फेंकी गई सिगरेट जितनी भी नहीं रह गई है। अब सुप्रीम कोर्ट की किसी संवैधानिक बेंच तक पहुंचने के बाद ही हो सकता है कि ऐसी किसी जनहित याचिका को इंसाफ मिल सके। 

राज्यों के स्तर पर तो यह आसानी से मुमकिन है कि जिन कुर्सियों पर रिटायर्ड अफसर या रिटायर्ड जज को रखने की मजबूरी हो, वहां यह नियम लागू कर दिया जाए कि इसके लिए हर प्रदेश अपने प्रदेश से बाहर के लोगों में से लोगों को छांटे। इससे भ्रष्टाचार कुछ हद तक कम होगा, और पक्षपात का खतरा भी घटेगा। आज तो हालत यह है कि जज और अफसर रिटायर होने के पहले से ऐसी कुर्सियों पर निशाना लगाकर चलते हैं कि उन्हें अपना पुनर्वास कहां पर चाहिए। बहुत से मामले तो ऐसे हैं जिनमें एक-एक बरस पहले से अखबारों में यह छपने लगता है कि किस कुर्सी पर कौन काबिज होने वाले हैं, और होता भी वैसा ही है। यह पूरा सिलसिला पूरी तरह से अनैतिक, और हितों के टकराव के आधार पर असंवैधानिक भी है। आज जजों की निजी दिलचस्पी अगर ऐसे मनोनयन और नियुक्तियों में नहीं होती, तो शायद हितों के टकराव के खिलाफ जज बड़ी कड़ी बातें किसी फैसले में लिखते। आज भी इस सिलसिले को खत्म करने के लिए लोगों को ही अदालत जाना होगा, क्योंकि इस भ्रष्टाचार पर पहला पत्थर मारने का हक न सरकार में किसी को है, न अदालत में। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


12-Feb-2021 5:08 PM 153

चीन की बाढ़, अमरीका का सूखा, वहीं पर तूफान, जापान में एक साथ सुनामी और बाढ़, उत्तराखंड में ताजा आपदा, इस तरह के कुदरत के कहर का सिलसिला पिछले बरसों में लगातार बढ़ते चल रहा है, और मौसम के इन तीखे तेवरों को लेकर अब एक सवाल यह उठ रहा है कि कौन से देश, कौन से प्रदेश और कौन से शहर इससे निपटने के लिए कितना खर्च करें? ऐसी नौबत साल में शायद दस-बीस दिन ही किसी इलाके को झेलनी पड़ती है। कुछ जगहों पर हमेशा से ज्वालामुखी या भूकंप के खतरे बने रहते थे, लेकिन अब नई-नई जगहों पर नई-नई कुदरती मुसीबतें सामने आ रही हैं, और इनका दर्जा भी पहले से बहुत ऊंचा हो चुका है। जो नए ढांचे खड़े हो रहे हैं, उनके लिए तो इस दर्जे की तैयारियां काफी अधिक दाम पर भी की जा रही हैं, लेकिन जहां पहले ऐसी कोई आशंका नहीं थी, वहां पर तो कोई तैयारी भी नहीं थी। इसलिए दुनिया के मौजूदा ढांचे में किस तरह कोई फेरबदल करके इन नई मुसीबतों के लिए तैयारी कर सकते हैं? पिछले कुछ सालों में ही योरप में ज्वालामुखी से निकलने वाली राख ने कुछ हफ्तों के लिए वहां जिंदगी तहस-नहस कर दी थी। योरप में ही जिस तरह से हिमयुग की वापिसी दिख रही थी उससे भी लोग हैरान थे क्योंकि दुनिया भर में तो ग्लोबल वॉर्मिंग की बातें चल रही हैं। अमरीका में लोग लू से मारे जा सकते हैं, यह पहले किसने सोचा था? दूसरी तरफ रूस की बाढ़ में डेढ़-दो सौ लोग मारे गए और ब्रिटेन बेमौसम की बरसात की मार झेलता रहा।

हिंदुस्तान की एक सबसे बड़ी पर्यावरण-जानकार सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार सुनीता नारायण ने अपनी पत्रिका डाऊन टू अर्थ के संपादकीय में उन्होंने बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन में रिश्ता समझने का वक्त गिनाया था। उन्होंने लिखा था-सच बात तो यह है कि बदलाव हमारे वर्तमान और भविष्य में होंगे ही। चूंकि दुनिया ने बढ़ते तापमान का असर अभी देखना शुरू ही किया है, चरम मौसमी घटनाओं के कारण समझाने वाले  पिछले कई सालों के आंकड़े अस्तित्व में ही नहीं हैं। इसलिए ज्यादा से ज्यादा यही किया जा सकता है कि एक मॉडल के आधार पर  दुनिया भर में बढ़ रहे तापमान के असर की भविष्यवाणी की जाए।
  
हम बात वहां से कुछ अलग भी ले जाना चाहते हैं। इंसान जितने किस्म से कुदरत को कुचल रहे हैं, उसे देखते हुए यह माना जाना चाहिए कि कुदरत भी इसका हिसाब आगे-पीछे चुकता करेगी। और यह सब तो तब है जब आज धरती पर अमीरी और गरीबी के बीच का फासला एक सीमा तक ही पहुंचा है और यह आगे बढ़ते जाना तय है। जब यह फासला और अधिक भयानक हो जाएगा, तब अमीर तबके की खपत भी भयानक बढ़ जाएगी। और उससे धरती के गर्म होने, यहां पर प्रदूषण बढऩे की नौबत भी अधिक भयानक हो जाएगी। उनका एक नतीजा इस तरह के चरम मौसम की शक्ल में भी सामने आएगा। लेकिन इंसान के बनाए हुए इस खतरे से परे अगर दुनिया की इस आकाशगंगा में कुछ ऐसे फेरबदल हों जो इंसान काबू से परे हों तो क्या होगा?

आज तो यह धरती इंसानों के बिगाड़े हुए माहौल की मार को नहीं झेल पा रही है, इस पर उम्मीद से परे की कोई और मार पड़े तो क्या होगा?
हिंदुस्तान के मामले में देखें तो यह बात कई तरह के बहस के लायक लगती है कि देश के एक हिस्से में बाढ़ और दूसरी हिस्से में सूखे से निपटने के लिए नदी-जोड़ योजना का नफा क्या होगा, और नुकसान क्या होगा? यह मामला बहुत अधिक जानकार लोगों के बीच के तर्क -वितर्क का है इसलिए इस बारे में हमारी अपनी कोई विशेषज्ञ राय नहीं है। पहली नजर में यह ठीक लगता है कि पानी को सूखे इलाकों की तरफ मोड़ा जाए। लेकिन इससे इन इलाकों के पर्यावरण पर पडऩे वाले असर का ठीक-ठीक अंदाज लगाना क्या आज मुमकिन है? और यह भी कि क्या इतनी बड़ी योजना से कम कोई ऐसी योजना बन सकती है जिसका असर सीमित हो? यह कुछ उसी तरह की बात है जिस तरह कि बड़े बांधों के मुकाबले पर्यावरणवादी लोग छोटे बांधों की वकालत करते हैं। लेकिन यह जरूर है कि भारत के एक हिस्से में बाढ़ को कम करके, दूसरे हिस्से से सूखे को कम किया जा सके, और सारे सूखे हिस्से में जमीन के भीतर भी रिसकर जाने वाला पानी अधिक पहुंचे, तो उसके कई फायदे भी हो सकते हैं।

मौसम के कोड़े को आज दुनिया के बहुत से हिस्से बहुत बुरी तरह झेल रहे हैं। और अमरीका जैसा ताकतवर देश भी इस मार को हल्का करने का कोई तरीका नहीं निकाल पा रहा है। भारत को भी यह सोचना शुरू करना चाहिए कि वह कुदरत को पहुंचाए जा रहे नुकसान को कम कैसे करे। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी जरूरी बात यह भी रहेगी कि विकसित और संपन्न देशों की मतलबपरस्ती के चलते कुदरत को जो बड़ा नुकसान पहुंचाया जाता है, उसे रोकने के लिए ऐसे देशों पर दबाव कैसे बढ़ाया जाए।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


11-Feb-2021 7:03 PM 100

उत्तराखंड और उत्तर भारत के कुछ और राज्यों में कुदरत के कहर को लेकर चल रही बहस में अधिक गंभीर लोग पर्यावरण को इंसानों द्वारा पहुंचाए गए नुकसान को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। यह नुकसान लंबे समय में पहुंचाया जाता है, और उससे बहुत लंबे समय के लिए कुदरती कहर झेलना भी पड़ता है, शायद हमेशा के लिए। लेकिन इस नजरिए को ही सब कुछ मान लेने से एक नुकसान यह होगा कि पर्यावरण को बचाने को एक पूरा इलाज मान लिया जाएगा, वह भी सही नहीं होगा।
 
यह भी समझने की जरूरत है कि धरती, या धरती से परे की बाकी दुनिया भी, एक चट्टान की तरह की स्थायी व्यवस्था नहीं है। धरती अपने आपमें इंसानों के आने के पहले से कई तरह के फेरबदल देखती आई है, और इस पर ज्वालामुखियों का, भूकंप का, बाढ़ का इतिहास इंसानों के और लाखों बरस पहले का रहा है। मतलब यह कि जब इंसान नहीं थे, जब उन्होंने धरती को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था, उस वक्त भी धरती में ऐसे बदलाव आते थे कि उनके आसपास अगर उस वक्त भी इंसान बसे होते, तो वे थोक में मारे गए होते। आज की एक दिक्कत यह है कि किसी इलाके की सीमाओं को समझे बिना, या उनको अनदेखा करके, उन इलाकों की सरकारें वहां की संभावनाओं के नगदीकरण में जुट जाती हैं। नतीजा यह होता है कि कुदरत की सीमाएं इतनी लांघी जाती हैं, कि उसके खतरे इंसानों पर छाने लगते हैं। हर बार ऐसा भी नहीं होता कि कुदरत कोई बदला निकालती हो। लेकिन कुदरत किसी फौलाद का ढांचा नहीं है कि हावड़ा ब्रिज की तरह उस पर सैकड़ों बरस के लिए भरोसा किया जा सके। दुनिया के किसी हिस्से में ज्वालामुखी से, कहीं पर भूकंप से, कहीं पर बाढ़ से, कहीं पर सुनामी से, कहीं पर तूफान और चक्रवात से, कहीं पर आसमानी बिजली से, और कहीं पर सूखे से, तबाही आती है, और यह तबाही रूकने लायक नहीं होती। इंसानों के पहुंचाए नुकसान से यह तबाही बढ़ती है, लेकिन धरती और दुनिया का इतिहास ऐसे नुकसान के बिना भी आने वाली कुदरती तबाही को देखते आया है। इंसानों ने तो धरती को जितना भी नुकसान पहुंचाया हो, वह तो पिछले कुछ सौ बरस की ही बात है। लेकिन धरती का इतिहास तो लाखों-करोड़ों बरस पुराना है, और जमीन के नीचे जब चट्टानें खिसकती हैं तो बड़े-बड़े इलाके तबाह हो जाते हैं। आज  इसलिए कि ऐसे इलाकों में लोग बसे हुए हैं, ढांचे खड़े हुए हैं, इसलिए तबाही अधिक दिखती है।

लोग कहीं पर मंदिर-मस्जिद बनाएं, या गुरुद्वारे और चर्च, कहीं पर सैर-सपाटे की जगहें बनाएं, या पहाड़ के ऊपर और समंदर के करीब रहने की जगह, उनको धरती की सीमाओं को भी समझना होगा कि उसमें फेरबदल कभी भी आ सकता है, इंसानों के पहुंचाए जख्मों से परे भी धरती कराह सकती है, आसमान का लहू बरस सकता है। प्रकृति की इन सीमाओं के खतरों को समझे बिना अगर किसी इलाके में लाखों तीर्थयात्री या सैलानी इस तरह जाएंगे, और वहां पर मौसम की कोई मार पड़ेगी, तो उसे न तो सिर्फ मानवनिर्मित विनाश कहना ठीक होगा, और न ही ऐसी किसी जगह की सरकारों को उसके लिए जिम्मेदार ठहराना ठीक होगा। ऐसी तबाही में उनका हिस्सा इसे बढ़ाने वाला तो हो सकता है, लेकिन इसे खड़ा करने वाला नहीं हो सकता। कुदरत के कहर की मार तो इंसानों के कुकर्मो से बढ़ सकती है, लेकिन कुदरत का अपना मिजाज ऐसे फेरबदल का है जो कि धरती, समंदर, आसमान और दूसरे ग्रहों पर होते चलता है, और वह इंसान को देखकर नहीं होता। कुदरत को जो लोग मां मान लेते हैं, वे यह समझने की चूक कर बैठते हैं कि जिस तरह कोई मां अपने बच्चों का ख्याल रखती है, उसी तरह कुदरत भी इंसानों का ख्याल रखती है। कुदरत का इंसानों से ऐसा कोई रिश्ता नहीं है, और उससे ऐसी उम्मीद एक ऐसी नाउम्मीदी और सदमे की गारंटी कर देगी जैसी कि आज उत्तराखंड में लोगों को हो रही है, या जैसी कि अमरीका में पिछले बरसों में तकरीबन हर महीने-दो महीने में लोगों को किसी तूफान या बवंडर से हो रही है।

इसलिए प्राकृतिक विपदाओं को सिर्फ इंसानों की खड़ी की हुई, या बढ़ाई हुई मान लेना गलत होगा। इंसानों के किए हुए से परे भी, कुदरत ने धरती के हर हिस्से को ऐसा नहीं बनाया है कि उन जगहों पर मनचाही गिनती में लोग बसें या पहुंचें, और मनचाहे काम करें। लोगों को धरती और आसमान के, समंदर और नदियों के, खतरों को समझते हुए ही उन जगहों पर रहना या आना-जाना तय करना पड़ेगा। आज इंसानों ने अपने सुख के लिए, शौक के लिए, या रोजगार के लिए ऐसी जगहों पर ऐसे-ऐसे काम शुरू किए हैं, जो कि कभी भी खतरों से खाली नहीं रहेंगे। और इसे कुदरत की मार कहना भी इसलिए गलत होगा कि कुदरत सोच-समझकर वार या मार करने वाली ताकत नहीं है। उसमें अपने आपमें जो तब्दीलियां आती हैं उन पर उसका अपना कोई बस नहीं रहता। आज उत्तराखंड के बहुत ही कमजोर, नाजुक, और अविश्वसनीय प्राकृतिक ढांचे पर इस कदर का भरोसा कर लिया गया है, कि उसका किसी भी दिन टूट जाना हैरानी की बात नहीं होता। और वही हुआ। जिस तरह लोग आग के करीब पेट्रोल नहीं रखते, बिजली के तारों के नीचे खुद नहीं बसते, उसी तरह धरती के खतरनाक हिस्सों के खतरों को समझकर उनसे दूर रहना, दूर बसना ही बेहतर होगा। आज उत्तराखंड में अनगिनत ऐसी शहरी इमारतें बह गई हैं, या गिर गई हैं, जो कि नदी के किनारे गैरकानूनी बनी हुई थीं। ऐसी सड़कें बह गई हैं, या गिर गई हैं, जो कि पहाड़ को चीरकर बनाई गई थीं। ऐसे खतरे खुद खड़े करके इंसान अगर उनके बीच जिएंगे, वहां घूमने जाएंगे, तो वह खतरे का काम तो रहेगा ही।  आज का विज्ञान, आज का सरकारी इंतजाम, ऐसे कुदरती खतरों के बाद होने वाले नुकसान को कम करने का काम ही कर सकते हैं, उसे रोक नहीं सकते।

एक वक्त था जब ऐसे तीर्थों पर जाते हुए लोग यह मानकर चलते थे कि वहां से पता नहीं लौटें, या न लौटें। साल-छह महीने न लौटने वालों के श्राद्ध भी कर दिए जाते थे। तब से अब तक वहां की धरती की हालत पहले से खराब ही हुई है, पहले से अच्छी नहीं हुई, लेकिन वहां जाने वाले लोग अब शायद लाखों गुना अधिक बढ़ गए हैं। ऐसे में एक नाजुक इलाके में इतना ही ढांचा विकसित हो सकता है, जो कि कुदरत के किसी बड़े फेरबदल के पहले तक लोगों का साथ दे दे। लोग जिसे प्रकृति की विनाशलीला या कुदरत का कहर कहते हैं, वह कुदरत का एक मामूली और नियमित-अनियमित फेरबदल अधिक है, इंसानों का खरीदा हुआ कहर कम है। इसलिए लोगों को धरती और आसमान की सीमाओं को समझकर अपनी हिफाजत खुद करनी होगी। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमरीका में ही बवंडर से आने वाली तबाही को रोकने का कोई जरिया नहीं है, तूफान से अपने लोगों को बचाने का कोई जरिया नहीं है। बचाव की सीमा है, कुदरत की सीमा है, इंसानों की हसरत असीमित है, इसलिए लोग अधिक खतरे झेल रहे हैं। यह लोगों को खुद समझना है कि वे कितने खतरे झेलकर अपने शौक, अपने सुख, या अपने आस्था को पूरा करना चाहते हैं।

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10-Feb-2021 5:15 PM 110

हिन्दुस्तान में आमतौर पर मुस्लिमों के बीच न तो कन्या भ्रूण हत्या का चलन सुनाई पड़ता, न ही किसी की बलि देने जैसी धर्मान्धता सुनाई पड़ती। लेकिन पिछले चार दिनों में दो ऐसी दिल दहलाने वाली खबरें सामने आई हैं जिनकी वजह से न सिर्फ मुस्लिमों में, बल्कि भारत के बहुत से दूसरे सम्प्रदायों में ऐसी निजी हिंसा के बारे में लिखने की जरूरत महसूस हो रही है। पहली खबर इतवार के दिन केरल से आई जहां पर एक गर्भवती मदरसा-शिक्षिका ने अल्लाह को खुश करने के नाम पर अपने छह बरस के बेटे का गला काटकर उसे मार डाला। इसके बाद उसने खुद पुलिस को फोन करके खबर की कि उसने अपने बेटे को अल्लाह को कुर्बान कर दिया। केरल न सिर्फ हिन्दुस्तान का सबसे पढ़ा-लिखा राज्य है, बल्कि यह सेक्स अनुपात में देश में सर्वाधिक कन्या-आबादी वाला राज्य भी है। हालांकि मां के हाथों बेटे के इस कत्ल का लडक़े-लड़कियों से कोई लेना-देना नहीं है, और यह सिर्फ धार्मिक अंधविश्वास के चलते हुई पारिवारिक हिंसा है। जब इस महिला ने बेटे को मारा, तो बगल के कमरे में उसका पति उनके दो दूसरे बच्चों के साथ सोया हुआ था। इसके दो हफ्ते पहले आन्ध्रप्रदेश से अंधविश्वास से जुड़ी पारिवारिक हिंसा की एक दूसरी खबर आई थी जिसमें दो पढ़े-लिखे मां-बाप ने अपनी दो जवान पढ़-लिख रही बेटियों को मार डाला था कि वे मरने के बाद फिर जिंदा होकर लौट आएंगी। आज की ताजा खबर हरियाणा से है जहां एक महिला अभी दो महीने बाद गिरफ्तार हुई है। यह महिला हरियाणा की सबसे घनी मुस्लिम आबादी वाले इलाके मेवात की रहने वाली है, और उसे चार बेटियां हो चुकी थीं, लेकिन बेटा नहीं हुआ था। ऐसे में उसने पारिवारिक प्रताड़ऩा झेलते हुए तनाव में चारों बेटियों की गला काटकर हत्या कर दी थी, और खुद का भी गला काटने की कोशिश की थी। अस्पताल से अब छूटने पर उसे चार बेटियों की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है। 

पारिवारिक हिंसा के ये तीनों मामले अंधविश्वास और सामाजिक-पारिवारिक प्रताड़ऩा से जुड़े हुए हैं। शुरू के दो मामले अंधविश्वास में अपने ही बच्चों को मार डालने के हैं, और हरियाणा का मामला लडक़े की चाह वाले परिवार के दबाव में तनाव से की गई हत्याओं का है। इन तीन घटनाओं से दो अलग-अलग मुद्दे जुड़े हुए हैं, लेकिन ऐसी पारिवारिक हिंसा को एक साथ भी देखने की जरूरत है। धार्मिक अंधविश्वास लोगों को किस हद तक हिंसक-आत्मघाती बना देता है, उसकी कोई सीमा नहीं दिखती है। लोग अपने बच्चों को मार डालते हैं, देवी-देवता को खुश करने के लिए अपने शरीर का कोई अंग काटकर चढ़ा देते हैं, या खुदकुशी कर लेते हैं। एक तरफ तो यह दुनिया 21वीं सदी में पहुंची हुई है जब यहां के इंसान जाकर चांद को रौंद आए हैं, दूसरे ग्रहों पर जाने के रास्ते पर हैं, विज्ञान ने लोगों की बीमारियों को दूर किया है, जगह-जगह विज्ञान की पढ़ाई हो रही है, और उस बीच अंधविश्वास में ऐसी हिंसा हो रही है! एक तरफ धर्मशिक्षा देने वाले मदरसे की शिक्षिका अपने बच्चे को अल्लाह को कुर्बान कर रही है, दूसरी तरफ आन्ध्र में उच्च शिक्षित मां-बाप अपनी उच्च शिक्षा पा रही जवान बेटियों को मार डाल रहे हैं कि वे जिंदा हो जाएंगी। ऐसी नौबत में सिर्फ धर्म की शिक्षा को क्या कोसा जाए? धर्म की शिक्षा से परे उच्च शिक्षा भी लोगों के दिमाग के अंधविश्वास खत्म नहीं कर पा रही है। आज हिन्दुस्तान का सारा माहौल ही वैज्ञानिक सोच के खिलाफ हो चुका है, और इसका असर भी समाज में जगह-जगह देखने मिल रहा है। 

हरियाणा पहले भी कन्या भ्रूण हत्या के लिए बदनाम राज्य रहा है, और वहां आबादी में लड़कियों का अनुपात लडक़ों के मुकाबले खासा कम रहा है। वहां पर इस मुस्लिम परिवार में चार लड़कियों के बाद मां पर बेटा पैदा करने के लिए दबाव इतना बढ़ा कि उसने चारों लड़कियों के गले काटकर खुद का भी गला काटा, लेकिन वह जख्मी होकर रह गई, और बाकी जिंदगी का पता नहीं कितना हिस्सा जेल में जाएगा। हरियाणा एक ऐसा राज्य है जहां खाप पंचायतों से लेकर मौजूदा मुख्यमंत्री तक लगातार लड़कियों के खिलाफ तरह-तरह के फतवे देते आए हैं, और राज्य की आम सामाजिक सोच लड़कियों के लिए हिकारत की है। जबकि हिन्दुस्तान में ओलंपिक से भी मैडल लेकर आने वाली लड़कियां हरियाणा की भी रही हैं। 

समाज के लोगों को ऐसी घटनाओं से महज सतह पर तैरते हुए लक्षण मानना चाहिए जिनकी बीमारी सतह के नीचे है, और मरने-मारने से कम दर्जे की हिंसा सामने नहीं आ पाती है। लोगों को यह समझना चाहिए कि हिंसा की पराकाष्ठा के कुछ मामले जब सामने आते हैं, तो उससे कम दर्जे की हिंसा के हजारों मामले और रहते हैं जो कि पुलिस और अखबार तक नहीं पहुंचते, घर की चारदीवारी के भीतर  जिनका दम घुटकर रह जाता है। ऐसी आत्मघाती या पारिवारिक हिंसा से उबरने के लिए लोगों के बीच एक वैज्ञानिक सोच विकसित होना जरूरी है, और समाज के भीतर लड़कियों और महिलाओं के लिए सम्मान बढऩा भी जरूरी है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में स्थित डॉ. दिनेश मिश्रा जैसे जीवट सामाजिक कार्यकर्ता लगातार अंधविश्वास के खिलाफ अपना वक्त और अपनी मेहनत लगाकर काम कर रहे हैं। अलग-अलग प्रदेशों में ऐसे और लोग भी हैं। लेकिन पुणे से लेकर बेंगलुरू तक अंधविश्वास और धर्मान्धता के खिलाफ काम करने वाले लोगों का साम्प्रदायिक कत्ल भी हो रहा है। ऐसे में अधिक संख्या में जागरूक लोगों को अधिक मेहनत करने की जरूरत है क्योंकि जब देश में कुछ ताकतें लगातार लोगों को धर्मान्ध और अंधविश्वासी बनाने के लुभावने काम में लगी हुई हैं, तब न्यायसंगत लोगों को जुटना होगा, वरना लोगों को अंधविश्वासी और धर्मान्ध बनाना तो एक अधिक आसान काम है ही। 

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09-Feb-2021 5:54 PM 240

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्यसभा में देश में चल रहे आंदोलनों के संदर्भ में आंदोलनकारियों पर बड़ा हमला किया। उन्हें परजीवी भी कहा, यानी जो दूसरों पर पलते हैं, और यह भी कहा कि देश को ऐसे आंदोलनजीवी लोगों से बचाकर रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जिस तरह पहले श्रमजीवी या बुद्धिजीवी शब्द सुनाई पड़ते थे, देश में अब एक नई बिरादरी खड़ी हो गई है आंदोलनजीवियों की। किसी का भी आंदोलन चलता रहे ये जाकर उसमें पर्दे के सामने से या पर्दे के पीछे से शामिल हो जाते हैं। उन्होंने आंदोलनों को समर्थन देने वाले ऐसे लोगों की जमकर खिल्ली उड़ाते हुए मोदी ने देश को इन लोगों से सावधान रहने को कहा, देश को इनसे बचाकर रखने कहा। 

पहली नजर में ऐसा लगा कि मानो भरोसेमंद मीडिया ने भी मोदी की बात को तोड़़-मरोडक़र लिखा है, और भला किस लोकतंत्र में प्रधानमंत्री आंदोलनों को लेकर इतनी ओछी बात कर सकता है। लेकिन जल्द ही यह खुलासा हो गया, और राज्यसभा का वीडियो भी चारों तरफ फैल गया कि मोदी ने सचमुच ऐसा ही कहा था। यह बात किसी भी लोकतंत्र को सदमा पहुंचाने वाली है कि वहां के आंदोलनों के संदर्भ में उस लोकतंत्र का प्रधानमंत्री ऐसी सोच रखता है। खासकर आज जब देश में कुल एक, किसान आंदोलन की चर्चा है, और इन आंदोलनकारियों को खालिस्तानी, पाकिस्तानी, चीन समर्थक, और देश का गद्दार करार देने की भरपूर कोशिश चल ही रही है। इस बीच में प्रधानमंत्री का ऐसा कहना देश के तमाम लोकतंत्रवादियों का भयानक अपमान छोड़ और कुछ नहीं है। 

देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जो कि हर कुछ हफ्तों या महीनों में किसी आंदोलन को समर्थन देते हैं, उसकी हिमायत में बयान जारी करते हैं, या उसके समर्थन में किसी प्रदर्शन में शामिल होते हैं। ऐसा इसलिए नहीं होता कि ये लोग भाड़े पर ट्वीटने वाले लोगों सरीखे भाड़े के आंदोलनजीवी हैं। ये लोग लोकतंत्र पर भरोसा रखते हैं, और हिन्दुस्तान जैसे विशाल देश में, यहां के दर्जनों प्रदेशों में, यहां के लाखों शोषणकर्ताओं के राज में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन तो चलते ही रहते हैं, और जिनका भरोसा लोकतंत्र पर है, उनका भरोसा ऐसे एक से अधिक बहुत से आंदोलनों पर हो सकता है, और रहता है। आज कोई जेएनयू के छात्रों के साथ हैं, तो हो सकता है कि यह उनका धंधा न रहते हुए भी वे शाहीन बाग के आंदोलन के साथ हो सकते हैं, वे यूपी और बिहार में बलात्कार के बाद जबरिया अंतिम संस्कार करने वाली पुलिस के खिलाफ आंदोलन के साथ भी हो सकते हैं, किसानों के आंदोलन के साथ भी हो सकते हैं, और किसी कॉमेडियन की गिरफ्तारी के खिलाफ आंदोलन के साथ भी हो सकते हैं। इसका मतलब यह कहीं भी नहीं रहता कि वे पेशेवर आंदोलनकारी हैं, या आंदोलन पर पलने वाले परजीवी धंधेबाज हैं। 

लोकतंत्र में आंदोलनों और आंदोलनकारियों को इतनी हिकारत से देखना बहुत ही नाजायज बात है। अटल-अडवानी के वक्त से जनसंघ और भाजपा गौरक्षा के लिए आंदोलन करते आए हैं, या कुछ दूसरे हिन्दू संगठनों के चलाए जा रहे गौरक्षा आंदोलन का साथ देते आए हैं। जनसंघ और भाजपा कश्मीरी पंडितों के मुद्दे से लेकर कश्मीर से धारा 370 हटाने तक के मुद्दों पर आंदोलन भी करते आए हैं, और इन मुद्दों के दूसरे आंदोलनकारियों के साथ भी खड़े रहे हैं। जनसंघ के लोग आपातकाल के खिलाफ चले आंदोलन में समाजवादियों, और माक्र्सवादियों के साथ इंदिरा-विरोधी आंदोलन में शामिल रहे हैं, ये लोग कहीं हिन्दी भाषा के आंदोलन में शामिल रहे हैं, तो कहीं धर्मांतरण के बाद ऑपरेशन घरवापिसी के साथ खड़े रहे हैं। प्रधानमंत्री के बयान के जवाब में सोशल मीडिया ने उबलते हुए सैकड़ों ऐसी तस्वीरें पेश की हैं जिनमें नरेन्द्र मोदी से लेकर स्मृति ईरानी तक, और अरूण जेटली से लेकर सुषमा स्वराज तक तरह-तरह के आंदोलनों में हिस्सा लेते दिख रहे हैं। खुद मोदी धारा 370 के खिलाफ आंदोलन के मंच पर बैठे दिख रहे हैं, अटल बिहारी वाजपेयी पेट्रोल की महंगाई के खिलाफ बैलगाड़ी पर संसद जाते दिख रहे हैं, और स्मृति ईरानी तो गैस सिलेंडर की महंगाई के खिलाफ आंदोलन में सबसे आगे, लेकिन यूपीए सरकार तक, दिख रही हैं। जो पार्टी या जो नेता पूरी जिंदगी किसी न किसी लोकतांत्रिक आंदोलन से जुड़े रहे, उनका आज का मुखिया आंदोलनकारियों को अगर परजीवी कहे, तो यह उस नेता की अपनी पार्टी की विरासत का अपमान भी है। 

कोई भी लोकतंत्र जब तक बेइंसाफी के खिलाफ, हक के लिए, लोकतांत्रिक मुद्दों के लिए आंदोलन नहीं देखता, तब तक वह एक मुर्दा लोकतंत्र रहता है, जिसका रहना न रहना एक बराबर होता है। आज हिन्दुस्तान के जो तथाकथित देशप्रेमी स्वीडन की एक किशोरी, ग्रेटा थनबर्ग पर उबल रहे हैं कि उसने हिन्दुस्तानी किसानों के पक्ष में ट्वीट करके हिन्दुस्तानी घरेलू मामलों में दखल दी है, उन्हें दुनिया के विकसित और सभ्य लोकतंत्रों के माहौल को भी समझना चाहिए जो कि आज भारत में नहीं रह गया है। स्वीडन की यही किशोरी ग्रेटा थनबर्ग 15 बरस की उम्र में अपने देश की संसद के बाहर पर्यावरण बचाने के मुद्दे पर धरने पर बैठी, और उसने पूरी दुनिया के लोगों का ध्यान खींचा, और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से गालियां खाईं। लेकिन उसने अपने देश में अकेले जो धरना और विरोध-प्रदर्शन शुरू किया उसने पूरी दुनिया को प्रभावित किया। दुनिया के देशों में जगह-जगह उसकी प्रेरणा से लोग पर्यावरण बचाने के लिए प्रदर्शन करने लगे। इस लडक़ी ने 2019 में 16 बरस की उम्र में एक समुद्री नौका से इंग्लैंड से न्यूयॉर्क तक सफर किया ताकि संयुक्त राष्ट्र पहुंचकर वह जलवायु पर खतरे के मुद्दे को उठा सके। पन्द्रह दिनों का यह सफर इसने सौर ऊर्जा से चलने वाली इस नौका से तय किया था और न्यूयॉर्क पहुंचकर उसने संयुक्त राष्ट्र के बैनरतले एक प्रेस कांफ्रेंस में दुनिया को प्रभावित किया। लोकतंत्र ऐसे ही आंदोलनों का नाम है, ये आंदोलन अपने देश की सरहद के भीतर हो सकते हैं, और अपने देश की सरहद के बाहर भी। गांधी ने दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद के खिलाफ अपनी जिंदगी का पहला आंदोलन शुरू किया था, न तो वे वहां के नागरिक थे, और न ही वहां आंदोलन उनका हक था। आज हिन्दुस्तानी पुलिस ग्रेटा थनबर्ग को हिन्दुस्तान की दुश्मन करार देकर अपने देश के बावले लोगों को नारे लगाने का एक मौका जरूर दे रही है, लेकिन दुनिया में हिन्दुस्तान मखौल का सामान बन गया है। 

देश के चुनावों में सबसे कामयाब नेता होने से भी नरेन्द्र मोदी को यह हक नहीं मिल जाता कि वे इस महान लोकतंत्र में आंदोलन नाम के लोकतांत्रिक हक को एक गाली की तरह इस्तेमाल करें। हो सकता है कि इसके बाद भी उनकी चुनावी संभावनाओं पर कोई फर्क न पड़े, या चुनावी संभावनाएं बढ़ भी जाएं, दुनिया के इतिहास में चुनावी आंकड़ों के मुकाबले लोकतांत्रिक फैसले अधिक मायने रखेंगे। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


08-Feb-2021 6:03 PM 90

केदारनाथ में आई विनाशकारी बाढ़ की याद दिलाते हुए कल उत्तराखंड में एक बार फिर प्राकृतिक विपदा आई, लेकिन कुदरत इस बार मेहरबान रही, और शायद कुछ दर्जन मौतों पर ही बात रूक गई। फिर भी ऊपर पहाड़ पर किसी झील में बर्फ टूटी, या कुछ और हुआ जिससे कि पानी एकदम से नदी में आया, और बन रहे एक जल बिजलीघर को बहाते हुए आगे बढ़ गया। जैसा कि किसी भी बड़े हादसे में होता है, इसमें भी मरने वाले अधिकतर लोग गरीब मजदूर थे जो कि शायद इसी जल बिजलीघर की सुरंग में काम कर रहे थे, और ऊपर से बहकर आए मिट्टी के सैलाब में दर्जनों मजदूर दब गए। लाशों का मिलना और मौतों की गिनती अभी जारी है, लेकिन उनके कम-अधिक होने से बहुत फर्क नहीं पड़ता, फर्क की बात सिर्फ यह है कि कुदरत के साथ चल रहा यह खिलवाड़ इस ताजा हादसे के बाद भी लोगों की आंखें खोल सकेगा या नहीं? 

उत्तराखंड में ऊपर हिमालय की जमी हुई झीलों की बर्फ धरती की बढ़ती हुई गर्मी से वैसे भी अधिक पिघल रही थी, और मौसम के बदलाव की वजह से वहां बर्फ जमना भी शायद कम हो रहा था। ऐसे में बादल फटने से, या धरती में कोई और फेरबदल होने से बर्फ का बड़ा टुकड़ा टूटकर नीचे आया और रास्ते के सब कुछ को बहाते हुए ले गया। यह तो अच्छी बात रही कि यह सुबह-सुबह हुआ, अगर यही हादसा देर रात हुआ होता, तो लोग बेखबर ही मारे जाते। लेकिन इससे सबक लेने की जरूरत यह है कि धरती के भीतर, धरती पर, या आसमान में आए किसी भयानक फेरबदल से उत्तराखंड जैसा पहाड़ी राज्य इतने बड़े खतरे में पड़ सकता है कि जिसके सामने केदारनाथ की बाढ़ की पांच हजार से अधिक मौतें भी फीकी पड़ जाएं। कुछ तो धरती की बनावट ऐसी है कि हर बात इंसान के काबू में नहीं है, और कुछ इंसान धरती को बर्बादी की तरफ धकेलने में लगे रहते हैं। इन दो बातों में से कम से कम इंसानी हरकतें तो काबू में लाई जा सकती हैं। 

धरती के गर्म होने के लिए जिम्मेदार अनगिनत इंसानी हरकतों के व्यापक असर को पल भर के लिए अलग रखें, तो उत्तराखंड में इंसानों की लाई हुई तबाही को, और आगे आने वाले खतरे को देखा जा सकता है, और उसे आगे बढ़ाने से थमा भी जा सकता है। आज हिन्दुस्तान के गिने-चुने पहाड़ी राज्यों में बांध बनाकर सस्ती बिजली बनाने की कोशिशें कुछ जानकारों की नजरों में खतरे से खेलने के अलावा और कुछ नहीं है। लोग लंबे समय से उत्तराखंड जैसे राज्य में बांध में पानी अधिक इक_ा करने को धरती के लिए बड़ा खतरा मानकर चल रहे थे, और इसके खिलाफ आंदोलन भी कर रहे थे। इसी उत्तराखंड में सुंदरलाल बहुगुणा पेड़ों की कटाई का विरोध करते हुए पूरी जिंदगी चिपको आंदोलन चलाते रहे, और चाहे किसी पार्टी की सरकार रही हो, उसे कंस्ट्रक्शन के ठेकों के लिए पेड़ों को काटना सुहाता रहा। किसी भी पार्टी की सरकार का नजरिया धरती की तबाही को लेकर जरा भी अलग नहीं रहा, और उत्तराखंड ने कुछ बरस पहले केदारनाथ की बाढ़ ऐसी ही वजहों से झेली थी। 

हिन्दुस्तान के ये पहाड़ी राज्य अपने स्थानीय शासन को अधिकारों के तहत पर्यटन को किसी भी सीमा तक बढ़ाने के लिए आजाद हैं, और इन राज्यों में कमाई का एक बड़ा जरिया पर्यटक हैं। लेकिन पड़ोस का हिमाचल प्रदेश अंधाधुंध बढ़ाए गए पर्यटन के बोझतले दम घुटते दिख रहा है। अब वैसा ही हाल उत्तराखंड का होने जा रहा है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि अंधाधुंध कमाई के लिए एवरेस्ट को कूड़े का ढेर बना दिया गया है। पहाड़ी रास्तों पर सडक़ें चौड़ी की जा रही हैं, उत्तराखंड को देवभूमि कहते हुए वहां अधिक से अधिक तीर्थयात्रियों का आना-जाना आसान करने के लिए ढेरों सडक़ें बनाई जा रही हैं, और उनमें से एक प्रोजेक्ट का नाम भी चारधाम महामार्ग रखा गया है। इस पहाड़ी प्रदेश में सात सौ किलोमीटर से अधिक लंबाई की यह टू-लेन नेशनल हाईवे बनाई जा रही है, और यह अंदाज लगाना अधिक मुश्किल नहीं है कि यहां आवाजाही बढऩे से वाहनों के धुएं का प्रदूषण बढ़ेगा, और उससे पर्यावरण के होने वाले नुकसान की भरपाई भी इंसानों को आगे चलकर करनी पड़ेगी। दरअसल कोई देश या प्रदेश अपनी तात्कालिक जरूरतों और संभावनाओं को देखते हुए धरती पर होने वाले दीर्घकालीन नुकसान को अनदेखा करने के आदी हो चुके हैं। उन्हें पांच साल के अपने कार्यकाल से परे की फिक्र खत्म हो गई है। केदारनाथ की बाढ़ के मुकाबले चूंकि इस बार मौतें बहुत कम हैं, इसलिए इस बार की कुदरत की चेतावनी को सरकारें तेजी से भुला देंगी। नतीजा आने वाली पीढिय़ां भुगतेंगी। 

केन्द्र सरकार और उत्तराखंड सरकार पर इस बात को लेकर दबाव बनाना चाहिए कि विकास के नाम पर इस पहाड़ी राज्य, या दूसरे पहाड़ी राज्यों की कुदरती सीमाओं के साथ खिलवाड़ खत्म किया जाए। यह पूरे देश की जिम्मेदारी है कि पहाड़ी राज्यों पर कुदरती खतरा न बढ़ाने के एवज में उन राज्यों को केन्द्र से अतिरिक्त मदद दी जाए। हिन्दुस्तान में कई राज्यों को फौजी जरूरतों के मुताबिक या सरहदी रणनीति के चलते ऐसी मदद दी भी जाती रही है, और आज भी उत्तर-पूर्व जैसे राज्यों को कई तरह की रियायत मिलती है, और अनुदान मिलते हैं। भारत के पहाड़ी राज्यों को देश का फेंफड़ा बने रहने के एवज में इसकी भरपाई मिलनी चाहिए, और इसके साथ ही वहां पर धरती पर अधिक जुल्म भी खत्म होने चाहिए। अब हिन्दुस्तान की देश-प्रदेश की सरकारों में पर्यावरण के लिए आपराधिक लापरवाही दिखाई दे रही है, और ऐसे में धरती को बचाने की नसीहतों की जगह सरकारी दफ्तरों की कचरे की टोकरी के अलावा कुछ नहीं रहेगी। फिर भी लोगों को बोलने की अपनी जिम्मेदारी जारी रखनी चाहिए। ये पहाड़ी इलाके इंसानों का, आवाजाही का, बांधों का इतना बोझ ढोने के हिसाब से बने हुए नहीं हैं, और यहां की धरती अपने जंगलों के बिना हिफाजत से नहीं रह सकती। इन बातों को देखते हुए ऐसे पहाड़ी इलाकों की संभावनाओं की सीमाओं पर गौर करना जरूरी है।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


07-Feb-2021 6:09 PM 101

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज इस वक्त असम और पश्चिम बंगाल के दौरे पर हैं। इन दो चुनावी राज्यों में वे कई शिलान्यास और लोकार्पण करने वाले हैं। इस बार के केन्द्रीय बजट में देश के चुनावी राज्यों के लिए इतना खास इंतजाम किया गया है कि लोग सोशल मीडिया पर उसका मजाक भी बना रहे हैं। पश्चिम बंगाल का चुनाव सबसे अधिक उत्तेजना से भरा हुआ है, क्योंकि वहां पहले तो वामपंथियों और ममता बैनर्जी के समर्थकों के बीच हिंसक टकराव होते रहता था, अब वामपंथियों के किनारे हो जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस का टकराव भाजपा से होता है जो कि राज्य में अगली सरकार बनाने का दावा कर रही है। इस मुद्दे पर आज लिखने की जरूरत इसलिए है कि बंगाल में प्रधानमंत्री के एक सरकारी कार्यक्रम में शामिल होने का न्यौता मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को भी भेजा गया था, लेकिन वे उसमें शामिल नहीं हो रही हैं। पखवाड़े पहले नेताजी सुभाषचंद्र बोस की 125वीं जयंती के राष्ट्र स्तर के समारोह में बंगाल में प्रधानमंत्री के साथ ममता बैनर्जी भी मौजूद थीं, और उसमें जब ममता बोलने के लिए खड़ी हुईं, तो भाजपा के कार्यकर्ताओं ने उनका भाषण शुरू होते ही जयश्रीराम के नारे लगाने शुरू कर दिए थे। उस पर ममता ने अपनी बात खत्म कर दी, और सार्वजनिक रूप से इस बर्ताव पर विरोध जाहिर किया था। देश के मीडिया के एक बड़े हिस्से ने इस घटना पर भाजपा के नेताओं के इस बयान को खूब बढ़-चढक़र दिखाया और छापा कि जयश्रीराम सुनने पर ममता के तन-मन में आग लग जाती है, या वे भडक़ जाती हैं। जबकि जिम्मेदार मीडिया में यह तथ्य साफ-साफ छपा था कि ममता को बोलते एक मिनट ही हुआ था कि कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मौजूद भाजपा के कार्यकर्ताओं में से जयश्रीराम के नारे लगने लगे थे। 

यह घटना और इससे एक पखवाड़े बाद आज इस राज्य में केन्द्र सरकार के एक सरकारी कार्यक्रम में जाने से ममता के इंकार को समझने की जरूरत है। भारत के संघीय ढांचे में ऐसा होते ही रहेगा कि केन्द्र में किसी पार्टी या गठबंधन की सरकार रहेगी, और अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों और गठबंधनों की। बहुत से ऐसे सार्वजनिक मौके रहेंगे जब एक सरकार के कार्यक्रम में दूसरी सरकार के लोगों को न्यौता दिया जाएगा, और सार्वजनिक जीवन के शिष्टाचार का यह तकाजा भी रहेगा कि दलगत पसंद-नापसंद से परे लोग ऐसे कार्यक्रमों में जाएं, और ऐसा आमतौर पर होता भी है। लेकिन बंगाल उन राज्यों में से है जहां पर सत्तारूढ़ पार्टी और उसकी मुखिया मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के साथ केन्द्र के सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया भाजपा का बहुत कड़वाहट भरा टकराव चल रहा है। ममता बैनर्जी भी अपना आपा जल्दी खोने के लिए जानी जाती हैं, और दूसरी तरफ भाजपा के मंत्री और दूसरे नेता बंगाल में ममता को भडक़ाने का कोई मौका चूकते नहीं हैं। देश की संघीय व्यवस्था का तकाजा यह था कि जब कलकत्ता में प्रधानमंत्री की मौजूदगी में केन्द्र सरकार का एक कार्यक्रम चल रहा था, तो उसमें आमंत्रित और मौजूद मुख्यमंत्री के भाषण के बीच उन्हें हूट करना बदतमीजी भी थी, और अतिथि सत्कार की परंपरा के खिलाफ बात भी थी। लेकिन अपनी आंखों के सामने ऐसा होते देखकर भी प्रधानमंत्री की खामोशी को हुड़दंगियों को मौन सहमति के अलावा और तो कुछ समझा भी नहीं जा सकता है। खासकर जब केन्द्र और राज्य के बीच राजनीतिक और सरकारी संबंध तनातनी के चल रहे हैं, तब अपने कार्यक्रम में बुलाकर ममता बैनर्जी को पहले तो हूट करना, और फिर इस बात को ममता बैनर्जी के हिन्दू-विरोधी होने की तरह प्रचारित करना कोई अच्छी बात नहीं थी। 

भारत में केन्द्र और राज्य के बीच संबंधों में कई बातें पारंपरिक शिष्टाचार पर आधारित रहती हैं। यह कहीं लिखा हुआ नहीं है कि राज्य के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में जाना ही होगा, यह सिर्फ शिष्टाचार का मामला है। केन्द्र के कार्यक्रम में आमंत्रित मुख्यमंत्री के साथ प्रधानमंत्री की नजरों के सामने की गई एक बड़ी अशिष्टता के बाद शिष्टाचार की परंपरा का तकाजा नहीं दिया जा सकता। लोकतंत्र में असहमतियों के बीच परस्पर सम्मान की दरियादिली अगर खत्म हो जाती है, तो दिलों को जोडऩे के लिए किसी कानूनी बंदिश की मदद नहीं ली जा सकती। चुनाव तो आते-जाते रहते हैं, चुनावी भाषणों में कई किस्म की गंदगी भी उगली जाती है, लेकिन आमंत्रित अतिथियों के साथ बदसलूकी कोई इज्जत नहीं दिलाती, फिर चाहे यह बदसलूकी कोई भी क्यों न करे। 

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06-Feb-2021 5:15 PM 100

सत्ता पर बैठे लोग, समाज के ताकतवर लोग, सार्वजनिक संस्थाओं और ओहदों पर काबिज लोग अगर किसी बात पर सबसे अधिक विचलित होते हैं तो वह आरटीआई है, यानी सूचना का अधिकार। हाल के बरसों में इस कानून का जितना इस्तेमाल हुआ है, उसका एक बड़ा हिस्सा बेजा इस्तेमाल का है। लेकिन लोकतंत्र में कौन सा ऐसा कानून होता है जिसका बेजा इस्तेमाल न होता हो? इसलिए आरटीआई का इस्तेमाल करके ब्लैकमेलिंग की जाती है, और इसलिए आरटीआई कानून को कमजोर किया जाए, यह एक निहायत अलोकतांत्रिक सोच है। पार्षदों से लेकर सांसदों तक के चुनाव में लोग अमूमन कानून तोडक़र ही चुनाव जीतते हैं इसलिए क्या चुनाव व्यवस्था खत्म कर दी जाए? संसद और विधानसभाओं में अपराधी लगातार बढ़ते चले जा रहे हैं तो क्या इन सदनों को खत्म कर दिया जाए? सरकारें आमतौर पर भ्रष्ट रहती हैं, तो क्या निर्वाचित लोगों के मुकाबले फौज को सत्ता दे दी जाए? जब कभी लोग लोकतंत्र की छूट के बेजा इस्तेमाल से थकते हैं, वे तुरंत उस छूट को खत्म करने की बात करने लगते हैं। वे बेजा इस्तेमाल खत्म करने के बजाय छूट को खत्म करने की बात करते हैं। इसी तरह गुजरात में अभी राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त ने एक जिले के स्वास्थ्य विभाग के जनसूचना अधिकारियों को निर्देश दिया है कि बहुत अधिक आरटीआई लगाने वाले एक परिवार के तीन सदस्यों को अगले पांच बरस के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया जाए, और उनसे कोई आवेदन या अपील मंजूर न करें। 

हर दिन हिन्दुस्तान में कोई न कोई ताकतवर व्यक्ति ऐसा आदेश देते हैं जो कि सुप्रीम कोर्ट में घंटे भर भी खड़ा न हो। बिहार सरकार ने पिछले पखवाड़े दो ऐसे आदेश दिए जो कि लोकतंत्र के खिलाफ थे। बिहार सरकार ने यह आदेश जारी किया कि अगर सोशल मीडिया पर कोई जनप्रतिनिधि या सरकारी अधिकारी पर अमर्यादित टिप्पणी करेंगे, तो उस पर पुलिस सख्ती से कार्रवाई करेगी। उसके बाद बिहार का यह नया फैसला सामने आया है कि अगर राज्य में किसी विरोध-प्रदर्शन या सडक़ जाम में कोई शामिल होते हैं, और पुलिस उनके खिलाफ मामला पेश करती है, तो उन्हें न कोई सरकारी नौकरी मिल पाएगी, न ही कोई सरकारी ठेका मिल पाएगा। इसके खिलाफ हमने दो दिन पहले लिखा ही था, और अब आज गुजरात का यह आदेश आया है जो कि सूचना आयोग की बुनियादी जिम्मेदारी के ठीक खिलाफ है। अगर कोई परिवार किसी एक विभाग में अपनी निजी वजहों से भी बहुत अधिक संख्या में अर्जियां लगाता है, तो भी उसे ब्लैकलिस्ट करने का कोई अधिकार सूचना आयोग के पास नहीं है। 

अब जब कोरोना और लॉकडाऊन के पिछले करीब एक बरस में हिन्दुस्तान की तमाम सरकारों ने डिजिटल और ऑनलाईन कामकाज अधिक दूर तक सीख लिया है, तो सूचना के अधिकार की जरूरत घटनी चाहिए। सरकार के हर विभाग को अपनी फाईलों को ऑनलाईन करते जाना चाहिए ताकि लोगों को उसकी कॉपी मांगने के लिए धक्के न खाने पड़ें। सरकारी कामकाज में जिन फाईलों में सबसे अधिक भ्रष्टाचार होता है, उन फाईलों की कॉपियां देने में सबसे अधिक आनाकानी की जाती है। चूंकि सूचना आयोगों में ही भूतपूर्व सरकारी अफसरों को रखा जाता है, इसलिए उनकी एक प्राकृतिक सहानुभूति सरकारी अमले के साथ रहती है जो कि किसी को भी कोई कॉपी देना नहीं चाहते। बहुत सी जगहों पर परले दर्जे के भ्रष्ट रिटायर्ड अफसर सूचना आयोगों पर काबिज हो जाते हैं, और वे सरकार के संगठित भ्रष्टाचार को दबाए-छुपाए रखने की कोशिशों को बचाने का काम करते हैं, और सूचना मांगने वाले लोगों को तरह-तरह से परेशान करते हैं। हो सकता है कि गुजरात सूचना आयोग का यह अलोकतांत्रिक आदेश ऐसे ही सिलसिले का एक नतीजा हो। 

अब डिजिटल कामकाज के चलते हुए सरकारों को सूचना मांगने की जहमत खत्म करनी चाहिए, और सूचना के अधिकार को सूचना की जिम्मेदारी में बदलना चाहिए। सरकारी कामकाज जब तक राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कोई गोपनीय दस्तावेज न हो, सूचना के अधिकार के तहत खुले हुए हर कागज को विभागों की वेबसाईटों पर डालने की जिम्मेदारी उन विभागों की होनी चाहिए। एक वक्त था जब पुलिस विभाग कोई एफआईआर करता था, तो वह एक रहस्य की तरह छुपी हुई बात रहती थी। अब एफआईआर को इंटरनेट पर डालना सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पुलिस की जिम्मेदारी हो गई है, इसलिए तकरीबन हर एफआईआर देखी जा सकती हैं। ऐसा ही हाल हर सरकारी दस्तावेज का होना चाहिए ताकि आम जनता को या आरटीआई एक्टिविस्ट को महीनों तक धक्के खिलाने के बाद अगली अपील की तरफ न धकेला जाए। हो सकता है कि आरटीआई का इस्तेमाल कुछ लोग ब्लैकमेलिंग के लिए भी करते हों। लेकिन कई लोग तो मीडिया का इस्तेमाल भी ब्लैकमेलिंग के लिए  करते हैं, और दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ में एक न्यूज पोर्टल के पत्रकार को एक मंझले दर्जे के वन अफसर से एक करोड़ रूपए के आसपास उगाही के मामले में गिरफ्तार किया गया है। तो ब्लैकमेलिंग को देखते हुए क्या मीडिया को बंद कर दिया जाए? लोकतंत्र में हर कानून के बेजा इस्तेमाल का रास्ता लोग निकालते हैं, लेकिन इस वजह से कोई भी कानून कमजोर करना नाजायज बात होगी। सूचना के अधिकार ने सरकार के भीतर की गंदगी को उजागर करने, और कम करने की कोशिश की है। जब ऐसी कोशिशों के बाद भी न सरकारों को कोई शर्म रहे, और न ही अदालतों की अधिक दिलचस्पी भ्रष्टाचार घटाने में रहे, तो फिर सूचना का अधिकार अकेले कौन सा भाड़ फोड़ सकता है? लेकिन भ्रष्ट लोकतंत्र के भीतर अपनी सीमित संभावनाओं के साथ सूचना का अधिकार एक बड़ा सकारात्मक बदलाव लेकर आया है, और इस कानून को खोखला करने की तमाम कोशिशों के खिलाफ लडऩा चाहिए। यह एक अलग बात है कि सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश भी सूचना के अधिकार को कमजोर करने वाला आया है, और उसने लोगों को बड़ा निराश भी किया है। कई बरस पहले, 2010 में, दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की इस दलील को खारिज कर दिया था कि मुख्य न्यायाधीश के दफ्तर को आरटीआई के दायरे में लाने से न्यायिक स्वतंत्रता में अड़चन आएगी। मामला दिलचस्प था कि जब हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई दफ्तर के तर्कों के खिलाफ फैसला दिया था। बाद में उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील हुई और वहां पर पांच जजों की बेंच ने एकमत होकर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सही कहा था, और सीजेआई दफ्तर के तर्कों को गलत माना था।  

हमें पक्का भरोसा है कि गुजरात सूचना आयोग का यह आदेश अदालत में तुरंत खारिज हो जाएगा।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


05-Feb-2021 2:28 PM 131

छत्तीसगढ़ में इस बरस बोरों की दिक्कत के बीच भी 92 लाख टन धान की खरीदी हुई है जो कि इस राज्य के अस्तित्व के 20 बरसों में सबसे अधिक है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इसका कुछ हिस्सा पड़ोसी राज्यों से तस्करी से लाए गए धान का भी है क्योंकि तमाम पड़ोसी राज्यों में धान का समर्थन मूल्य कम है, और छत्तीसगढ़ में सरकार बाद में किसानों को अतिरिक्त भुगतान करके देश का सबसे ऊंचा दाम देती है। पड़ोसी राज्यों से छत्तीसगढ़ में धान की तस्करी कोई नई बात नहीं है, और बीते बरसों में भाजपा के राज में भी यह सिलसिला चल रहा था, और उसी दौरान छत्तीसगढ़ को धान की उत्पादकता में बढ़ोत्तरी का राष्ट्रीय सम्मान भी हासिल हुआ था। 

अब जब इस राज्य के किसान संतुष्ट हैं, और उनका तकरीबन तमाम धान बिक चुका है, तब सरकार को कुछ बातों पर सोचना भी चाहिए। धान की फसल किसान के लिए सबसे आराम की फसल मानी जाती है जिसे बोने के बाद मेहनत दूसरी फसलों के मुकाबले बहुत कम लगती है। छत्तीसगढ़ में पानी कुदरत भरपूर देता है, और नहरों से भी कई इलाकों में पानी आता है, सरकार की मुफ्त, या तकरीबन मुफ्त बिजली के साथ-साथ सोलर पैनल से चलने वाले पंप भी धरती का पेट खाली करके धान की फसल को बढ़ाते हैं। लेकिन कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ के किसान अपनी फसल बेचने के लिए, किसी भी किस्म की कमाई के लिए मोटे तौर पर राज्य सरकार के मोहताज रहते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि किसान को सरकार-आश्रित बनाए रखने के बजाय कौन सा दूसरा काम किया जा सकता है, जो कि हो सकता है शुरू में कुछ अलोकप्रिय हो, लेकिन जो लंबे सफर में किसानों का अधिक मददगार हो। 

छत्तीसगढ़ में जहां-जहां मिट्टी और हवा-पानी साथ दें, वहां-वहां किसानों को धान से परे भी देखने के लिए कहना चाहिए। आसान धान लोगों की कल्पना को कुचल चुका है। किसान और दूसरी फसलों की तरफ देखना भी भूल गए हैं। यह बात धरती के लिए भी ठीक नहीं है, और दूसरी फसलों के लिए भी ठीक नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी कुछ हिस्सों में चने की फसल ली जाती थी जो कि किसानों को सरकार को मोहताज भी नहीं रखती थी, और किसी समर्थन मूल्य की फिक्र भी उसे नहीं रहती थी। इस प्रदेश के बनने के भी दशकों पहले तो यहां कृषि विश्वविद्यालय है, और अब तक इसने किसानों के बीच दूसरी फसलों को लोकप्रिय करने का काम कर देना था, लेकिन प्रयोगशाला से सरकार तक होते हुए खेतों तक पहुंचने का सफर, और फिर फसल के मंडी या बाजार तक पहुंचने का सफर बहुत से रोड़ों भरे रास्ते से गुजरता है। धान से परे लोगों ने सोचना बंद कर दिया, और सरकार भी एक लोकप्रिय चुनावी नारे और कार्यक्रम से परे कोई प्रयोग करने के बारे में नहीं सोचती।

लेकिन बात महज किसी और फसल की नहीं है, बात खेती और किसानी की अर्थव्यवस्था की व्यापक तस्वीर की है, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की भी है जो कि बुनियादी रूप से किसानों पर ही टिकी हुई है। छत्तीसगढ़ में जहां-जहां लोगों ने फल-सब्जी के प्रयोग किए, मशरूम या शहद के प्रयोग किए, उन्हें धान की फसल के मुकाबले अधिक कमाई भी हुई है। यह एक अलग बात है कि ऐसे प्रयोगों में सरकार की भूमिका बड़ी सीमित रही है, और लोगों की उपज के लिए बाजार जुटाने का काम सरकार नहीं कर पाई। छत्तीसगढ़ में वन विभाग ने वनोपज के दाम शायद देश में सबसे अधिक दिए, लेकिन वनोपज इस प्रदेश से कच्चे माल की तरह ही बाहर जाती है, उसके लिए कोई प्रोसेसिंग यूनिट यहां नहीं लग पाई। यही हाल फल-सब्जी के साथ हुआ, यही हाल कुछ दूसरी फसलों का हुआ। आज छत्तीसगढ़ में जगह-जगह होने वाले कोदो-कुटकी का कोई स्थानीय संगठित बाजार नहीं है, दूसरी तरफ यह देशी-विदेशी ऑनलाईन बाजार में महंगे दामों पर बिकता है। यह एक फासला राज्य सरकार जैसी संगठित कोशिश के बिना पट नहीं सकता। किसान को सरकार-आश्रित रखने के बजाय उसे तरह-तरह की आर्थिक गतिविधियों से जोडऩा होगा ताकि वह सरकारी बजट पर भी कम बोझ रहे। 

आज आखिर क्या वजह है कि गुजरात के एक सिरे पर बसे आनंद से अमूल का दूध और बाकी डेयरी प्रोडक्ट निकलकर 1100 किलोमीटर से अधिक का रास्ता तय करके छत्तीसगढ़ आते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की डेयरी संभावनाएं पूरी तरह टटोली नहीं जातीं। राज्य का दुग्ध महासंघ राजनीति और भ्रष्टाचार के लिए ही खबरों में अधिक आता है, राज्य में डेयरी और दूध का कलेक्शन और मार्केटिंग नेटवर्क बनाने में इसे कामयाबी मिली थी। अब कुछ निजी कारोबारियों ने बड़े-बड़े डेयरी उद्योग स्थापित किए हैं जो कि कामयाब भी बताए जा रहे हैं, और उनसे जुडक़र गांव-गांव में लोग दुधारू जानवर भी पाल रहे हैं।
 
राज्य सरकार को किसी कारोबार में पड़े बिना लोगों को तरह-तरह की प्रोसेसिंग यूनिट लगाने में मदद करनी चाहिए ताकि गांव के लोग धान और अनाज से परे भी कमाई कर सकें, जंगलों के लोग वनोपज और लघु वनोपज को कच्चे माल की शक्ल में बेचने को मजबूर न हों, और प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था धान से परे भी धनवान हो। यह बात सुझाना आसान है, लेकिन ऐसा करना धान खरीदने के मुकाबले कई गुना अधिक मेहनत का काम है। छत्तीसगढ़ सरकार को ऐसी कोशिश करनी चाहिए कि किसान धान से परे भी सोच सकें, और गांव सरकारी योजनाओं से परे भी अपने पैरों पर खड़े हो सकें। राज्य सरकार को धान से इतर अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के बारे में भी सोचना चाहिए।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


04-Feb-2021 5:52 PM 266

पश्चिम की एक पॉप गायिका रिहन्ना ने भारत के किसान आंदोलन के समर्थन में एक ट्वीट क्या कर दिया, बात की बात में हिन्दुस्तानी राष्ट्रभक्त रिहन्ना की कम से कम कपड़ों वाली तमाम तस्वीरें निकाल लाए जो वे खुद ही अपने सोशल मीडिया पन्नों पर पोस्ट करती हैं। और हाल के महीनों में भारत नहीं, भारत सरकार की निजी सुरक्षा के लिए तैनात देश के सबसे घातक परमाणु हथियार ने भी इस अंतरराष्ट्रीय गायिका पर खुला हमला बोल दिया। यह हथियार एंटी मिसाइल, और एंटी एयरअटैक डिफेंस सिस्टम की तरह भारत सरकार की आलोचना पर खुद होकर पल भर में सक्रिय हो जाता है, और ट्विटर पर जवाबी परमाणु हमला शुरू कर देता है। कुछ लोग इस डिफेंस सिस्टम को कंगना रनौत नाम से भी बुलाते हैं। अभी इस डिफेंस सिस्टम की तरफ से पश्चिम की इस गायिका की चुनिंदा तस्वीरें पोस्ट करने पर लोगों ने इस देशी डिफेंस सिस्टम की भी टक्कर की तस्वीरें पोस्ट करना शुरू किया है, और ट्विटर का कम्प्यूटर बदन की भरमार वाली तस्वीरों को नंगी करार देते हुए बावला हो गया है। 

खैर, सोशल मीडिया के बकवासी हमलों पर लिखने जैसा कुछ है नहीं क्योंकि एक दशक पहले पखाने के दरवाजे के भीतर गालियां कुरेदते हुए लोग डरते भी थे, अब तो सोशल मीडिया पर अपने नाम, पहचान, और तस्वीर सहित बलात्कार की धमकियां भी लिख देते हैं, उनकी हम अब क्या आलोचना करें। लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने की बात इसलिए आन पड़ी है कि भारत सरकार ने खुलकर मशहूर विदेशियों के लिखे का विरोध किया है, और भारत के किसान आंदोलन को भारत का आंतरिक मामला बताया है। इस गायिका के अलावा दुनिया की सबसे मशहूर पर्यावरणवादी किशोरी ग्रेटा थनबर्ग सहित कई और चर्चित लोगों ने किसानों के शांतिपूर्ण आंदोलन का समर्थन किया है, और भारत सरकार ने इन सबकी बोलती बंद कर देने के अंदाज में अपनी प्रतिक्रिया ट्वीट की है। 
यह बात बड़ी दिलचस्प है कि किसी देश की कौन सी बात उसकी आंतरिक बात रहती है, और बाहर के लोगों के दखल के लायक नहीं कही जाती है। हमारी मामूली समझ तो अभी पिछले ही महीने तकरीबन इन्हीं दिनों अमरीका के संसद भवन पर हुए हमले पर भारतीय प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया को देखते आई है जिसमें अमरीकियों द्वारा, मौजूदा अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के उकसावे और भडक़ावे पर देश की संसद पर हमला किया गया था, और वहां गिने जा रहे वोटों को नष्ट करने की कोशिश की गई थी। मारने वाले और पांच मरने वाले सभी अमरीकी थे, संसद भी अमरीका की थी, भडक़ाने वाला अमरीकी राष्ट्रपति था, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वहां लोगों को शांति की नसीहत दी थी। अब मोदी के ही मित्र रहे हुए डोनल्ड ट्रंप को अमरीकी जनता ने नमस्ते-ट्रंप कह दिया था, तो भडक़कर इस ट्रंप ने अपने लोगों को संसद पर हमला करने का फतवा देकर भेजा था। इस मामले में कुछ भी भारतीय नहीं था, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री ने शांति की नसीहत दी थी। अब सवाल यह है कि मोदी यह नसीहत देते हुए जितने अमरीकी थे, या अबकी बार ट्रंप सरकार का नारा देते हुए जितने अमरीकी थे, उतनी ही भारतीय रिहन्ना भी है। आज अगर उसने भारतीय किसान आंदोलन को लेकर कुछ अहिंसक बात कही है, तो यही बात तो ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, और अमरीका जैसे कई देशों से सांसद पहले बोल चुके हैं, इस आंदोलन का साथ दे चुके हैं। लेकिन चूंकि इस बार की यह ट्वीट अमरीकी मनोरंजन-दुनिया की एक सबसे चर्चित और कामयाब महिला की तरफ से आई थी, यह जायज था कि भारत की मनोरंजन-दुनिया की अपने को सबसे चर्चित और सबसे कामयाब मानने वाली महिला जवाबी हमला करती। इस तरह कंगना रनौत ने भारत (देश नहीं) सरकार को नापसंद किसान आंदोलन के समर्थन के खिलाफ तमाम परमाणु मिसाइलों को लेकर हमला शुरू कर दिया। 

चूंकि भारत में आज सक्रिय कंगनाएं अपनी तमाम ऊर्जा मोदी के आलोचकों पर हमले में लगाती हैं, इसलिए उनके पास यह वक्त नहीं रहता कि यह भी पढ़ सकें कि मोदी क्या लिखते हैं। मोदी ने अमरीका के हिंसक हमलावरों को शांति की नसीहत देकर एकदम जायज काम किया था, उसके लिए उनका अमरीकी होना जरूरी नहीं था। लेकिन कंगनाओं के साथ-साथ मोदी सरकार के लोग भी हिंसक अमरीकियों को मोदी की नसीहत लगता है नहीं पढ़ पाए। इसलिए आज वे दुनिया के मशहूर लोगों की मामूली अहिंसक ट्वीट पर भी भारत सरकार की तरफ से हमला कर रहे हैं कि किसान आंदोलन भारत का आंतरिक मामला है इससे बाहर के लोग दूर रहें। अब भारत सरकार के लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इसी तर्क का इस्तेमाल करते हुए अमरीका के हिंसक ट्रंपवादी मोदी से सवाल कर सकते हैं कि कैपिटल हिल के अंगने में तुम्हारा क्या काम है? 

जिनके दिमाग का दीवालिया निकल चुका है, महज वे ही लोग आज दुनिया को ऐसी सरहदों में बांटने की कल्पना कर सकते हैं जिनके आरपार लोग बयान भी न दें। अगर पश्चिम के देशों का दबाव न होता और वहां हिन्दुस्तानी बाल मजदूरों के बुने कालीनों का बहिष्कार न हुआ होता, तो क्या हिन्दुस्तान में कालीन उद्योग में बाल मजदूर घटे होते? ऐसे कितने ही मामले हैं जिनमें दूसरे देश या कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन अपने दबाव से किसी देश में फेरबदल लाते हैं। बांग्लादेश में कपड़े बनाने वाले मजदूरों की बदहाली और उनकी बहुत ही कम मजदूरी के खिलाफ पश्चिम के देशों ने खुद अपने कारोबारियों का जमकर विरोध किया, और उन्हें मजबूर किया कि वे बांग्लादेश के कारखानेदारों से वहां के मजदूरों को अधिक मजदूरी दिलवाएं। यह तो आज की दुनिया में सभ्य और विकसित लोकतंत्रों की पहचान है कि वे अपने निजी स्वार्थों और अपनी तंग-सीमाओं से बाहर जाकर दूसरों के लिए कितना कुछ कर सकते हैं। और यह कोई नई बात भी नहीं है, हिन्दुस्तान जब आजाद हुआ उसके पहले से गांधी लगातार फिलीस्तीनियों के पक्ष में और इजराइल के खिलाफ लिखते थे। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद का गांधी का विरोध तो उस देश की आंतरिक व्यवस्था पर सीधा हमला था, लेकिन हिन्दुस्तान उस पर गर्व करता है। गांधी न तो दक्षिण अफ्रीकी थे, न ही वहां आंदोलन का उनका कोई कानूनी हक बनता था। लेकिन वे उस पिछली सदी में भी एक जागरूक विश्व नागरिक थे, और इस नाते वह हक न होते हुए भी उनकी जिम्मेदारी थी। आज हिन्दुस्तान के जो कमअक्ल और अधिक बदनीयत वाले लोग गैरहिन्दुस्तानियों की आलोचना पर हिंसक हमले कर रहे हैं, उन्हें यह समझने की जरूरत है कि ऐसा करते हुए वे गांधी की डाली हुई गौरवशाली परंपराओं को खारिज भी कर रहे हैं। जो लोग हिन्दुस्तान की सरकार की आलोचना को हिन्दुस्तानियों का देशद्रोह मानते हैं, और गैरहिन्दुस्तानियों की नाजायज दखल मानते हैं, वे गांधी के युग की दुनिया को भी नहीं समझते, आज की दुनिया तो दूर की बात है। दिक्कत यह है कि दुनिया को बचाने की फिक्र करने वालों की गिनी-चुनी ट्वीट के मुकाबले दुनिया को तबाह करने पर आमादा लोगों की ट्वीट लाखों गुना है। हिंसा की सुनामी के बीच भले लोगों के पांव जमीन पर टिके रहें, ऐसा खासा मुश्किल है। लेकिन फिर भी दुनिया का इतिहास है कि वह ऐसी ही नफरत और हिंसा के बीच से उबरकर एक बेहतर दुनिया बनी है। और इतिहास की मिसालों से परे इस दुनिया में ऐसी संभावनाएं हैं कि वह आज से बेहतर बन सकती है। आज दुनिया के किसी भी लोकतंत्र को यह भूल जाना चाहिए कि वे थ्यानमान चौक पर, हांगकांग में, सीरिया में या सिंघु बॉर्डर पर कुछ मनमानी करके बिना आलोचना, बिना प्रतिक्रिया रह सकते हैं। अंदरूनी मामला तो इतिहास के हर मामले को कहा जा सकता है, हिटलर अपने देश के भीतर दसियों लाख यहूदियों को मार रहा था, और वह भी उसका अंदरूनी मामला था। 21वीं सदी की दुनिया में इतना अंदरूनी कुछ भी नहीं रह गया है कि जिस पर सरहद के बाहर के लोग मुंह न खोलें। भारत सरकार के डिफेंस सिस्टम के दिमाग में यह बुनियादी बात बैठाने की जरूरत है। 

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03-Feb-2021 5:26 PM 265

एक पखवाड़े में बिहार सरकार का लोकतंत्र के खिलाफ एक दूसरा फैसला सामने आया है। कुछ दिन पहले ही राज्य सरकार ने यह आदेश जारी किया है कि अगर सोशल मीडिया पर कोई जनप्रतिनिधि या सरकारी अधिकारी पर अमर्यादित टिप्पणी करेंगे, तो उस पर पुलिस सख्ती से कार्रवाई करेगी। अब कल यह नया फैसला सामने आया है कि अगर बिहार में किसी विरोध-प्रदर्शन या सडक़ जाम में कोई शामिल होते हैं, और पुलिस उनके खिलाफ मामला पेश करती है, तो उन्हें न कोई सरकारी नौकरी मिल पाएगी, न ही कोई सरकारी ठेका मिल पाएगा। नीतीश सरकार के ये दोनों फैसले लोकतंत्र को कुचलने वाले कहे जा रहे हैं, और इनके खिलाफ लगातार राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया आ रही हैं। 

बिहार भारत के लोकतंत्र में एक मजबूत स्तंभ रहा है। खुद नीतीश कुमार से लेकर लालू यादव तक बहुत से नेता आपातकाल का विरोध करते हुए छात्र राजनीति और राजनीति में आगे बढ़े, और बड़े नेता बने। आपातकाल के जॉर्ज फर्नांडीज जैसे बड़े नेता बिहार से चुनाव लडक़र संसद में बड़े नेता बने थे। ऐसे में अगर कोई राज्य लोकतंत्र को कुचलने का काम करता है, तो वह अदालत में भी नहीं टिक पाएगा, और जनता की अदालत में तो उसकी थुक्का-फजीहत शुरू हो ही चुकी है। दरअसल अपने चौथे कार्यकाल में नीतीश कुमार को शायद अब यह लग रहा है कि उनके पास खोने को कुछ नहीं है, और पाने को भी इससे अधिक कुछ नहीं है, और यह भी कब तक जारी रहता है, वह भी साफ नहीं है, इसलिए वे शायद लोकतंत्र पर आस्था खो चुके हैं। वैसे भी देश का माहौल कुल मिलाकर लोकतंत्र को एक निहायत ही अवांछित सामान मानकर चल रहा है कि वह सीढ़ी चढक़र सत्ता तक पहुंच गए, और अब उस सीढ़ी को लात मारकर गिरा देने में कोई हर्ज नहीं है। 

आज जब दुनिया के तमाम सभ्य लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तमाम तरीकों का सम्मान बढ़ाते चल रहे हैं, तब हिन्दुस्तान का यह एक सबसे बड़ा राज्य अपनी सरहद में लोकतंत्र को इस तरह खत्म करने में जुटा है। जो नौजवान देश के तमाम राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों की रीढ़ की हड्डी रहते आए हैं, उनको ऐसे आंदोलनों में जाने से रोकने के लिए उनका नौकरी का हक छीनना एक ऐसी नाजायज बात है जो कि अदालत में नहीं टिक पाएगी। अगर आंदोलनों में सडक़ों पर उतरना ऐसा जुर्म है, तो फिर लालू यादव से लेकर नीतीश कुमार तक इन सबको मुख्यमंत्री बनने के लिए भी अपात्र कर देना चाहिए क्योंकि इनके ऊपर भी आंदोलनों के अपने दिनों में कई जुर्म कायम हुए होंगे। जो बात किसी को क्लर्क बनने के लिए भी अपात्र ठहराती है, वह बात सांसद और विधायक बनने की अपात्रता भी रहनी चाहिए। दरअसल नीतीश सरकार लोगों को धमकाने में लगी है। सोशल मीडिया पर लोग जनप्रतिनिधियों और अफसरों के बारे में नहीं लिखेंगे तो क्या वे जागरूक नागरिक रह जाएंगे? और अगर वे कोई गलत बात लिखते हैं तो उसके लिए सरकार के पास अलग से तरह-तरह के कानून हैं। इस पर पुलिस कार्रवाई के लिए अलग से आदेश निकालना अपने लोगों को धमकाने के अलावा कुछ नहीं है। पिछले बरसों में सुप्रीम कोर्ट बार-बार इस बात को कह चुका है कि सोशल मीडिया को लेकर सरकारों की की गई बहुत सी कार्रवाई नाजायज है और उसमें आईटी एक्ट की कुछ धाराओं को खारिज भी किया है। बिहार सरकार के ये दोनों ही मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर खारिज होंगे, इनसे सरकार का कोई भला नहीं होना है, और धमकाने का यह तरीका अदालती फैसला आने तक का ही है। देश में आज लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने का अभियान चल रहा है, और नीतीश कुमार उसी लहर पर सवार चल रहे हैं। वे अपने राजनीतिक जीवन की सबसे ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं, और अब न सिर्फ राजनीति का, बल्कि उनकी नैतिकता का भी उतार चल रहा है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


02-Feb-2021 5:15 PM 142

सोशल मीडिया के एक तबके की बात छोड़ दें, तो भारत का किसान आंदोलन चल भी रहा है, इसकी खबर मीडिया के कम ही हिस्से में देखने मिलती है। कुछ तो देश का प्रमुख मीडिया सोशल मीडिया के दबाव में भी काम करता है कि वहां कौन सी बातें लिखी जा रही हैं। क्योंकि दोनों के ग्राहक तो एक ही हैं। लोग फेसबुक और ट्विटर पर किसान आंदोलन की दिल दहलाने वाली खबरें पढ़ लेंगे, और अगर उन्हें बड़े समाचार चैनलों और अखबारों से निराशा मिलेगी, तो ऐसे मीडिया के ग्राहक भी टूटेंगे। इस दबाव में भी किसानों की खबरें दिखाई जा रही हैं। 

लेकिन मौजूदा किसान आंदोलन दिल्ली के इर्द-गिर्द, पंजाब और हरियाणा, और अब कुछ हद तक लगे हुए उत्तरप्रदेश के किसानों पर टिका हुआ है। कहने के लिए तो मुम्बई से चलकर शिवसेना के एक सबसे ताकतवर नेता संजय राऊत भी किसानों के समर्थन के लिए दिल्ली के पास किसान आंदोलन पहुंचे, लेकिन मोटेतौर पर बाकी देश में किसानों का समर्थन प्रतीकात्मक अधिक चल रहा है, जमीन पर कम। कांग्रेस के एक प्रमुख नेता दिग्विजय सिंह बार-बार सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से कह रहे हैं कि किसानों के समर्थन में सडक़ों पर निकलें, लेकिन महाराष्ट्र में शरद पवार, पंजाब में सुखबीर बादल, और बाकी प्रदेशों में वामपंथी पार्टियां, कार्यकर्ता किसानों के साथ सामने आए हैं। अगर दिल्ली को इस तरह घेरने की ताकत इस किसान आंदोलन में न होती, तो देश के किसी दूसरे हिस्से में ऐसा आंदोलन अब तक दम तोड़ चुका होता। 

यह सोचने की जरूरत है कि जो किसान और जो किसानी देश के लोगों के जिंदा रहने के लिए सबसे जरूरी बातें कही जा रही हैं, वे खुद भी इस आंदोलन में पूरे देश में सामने क्यों नहीं हैं? हिन्दुस्तान में किसानी के काम में लगे हुए करोड़ों खेतिहर मजदूर किसानी पर जिंदा तो हैं, लेकिन वे खुद किसान नहीं हैं, महज मजदूर हैं। और फिर यह मजदूरी भी इतनी अनियमित, इतनी असंगठित, और अनिश्चित है कि ये ही खेतिहर मजदूर मनरेगा जैसी ग्रामीण मजदूरी योजना पर निर्भर रहते हैं। दूसरी बात किसानी करने वाले लोगों में भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो कि भूस्वामी से खेत ठेके पर या किसी और अनुबंध के तहत लेकर मजदूर की तरह उस पर काम करते हैं, और कमाई साझा करते हैं। नतीजा यह है कि किसानी कानून के जितने किस्म के फायदे हैं, या नुकसान हैं, उनके ऐसे अधिया किसान सीधे प्रभावित नहीं होते हैं क्योंकि जमीन उनके नाम पर नहीं है। जमीन का मालिकाना हक किसान को ताकतवर भी बनाता है, और ऐसे आंदोलन में उसे जोडक़र भी रखता है। लेकिन आज हिन्दुस्तान के बाकी हिस्सों में किसान आंदोलन अगर मजबूत नहीं है, जमीन पर नहीं है, तो इसकी एक वजह यह है कि जमीन के मालिकाना हक वाले किसान अपने इलाकों में जरा भी संगठित नहीं हैं, और किसी लंबे आंदोलन के लायक उनकी आर्थिक स्थिति भी नहीं है। अधिकतर किसान बहुत मामूली कमाई, या बिना कमाई की खेती बस करते ही आ रहे हैं, उनके पास किसी लंबे आंदोलन की ताकत भी नहीं है। वे मजबूत किसानों के आंदोलनों के फायदों की ओर तो नजर लगाए हुए हैं, लेकिन खुद अधिक ताकत के ऐसा कोई आंदोलन न शुरू कर सकते, न उसमें शामिल हो सकते। 

गणतंत्र दिवस के पहले तक दिल्ली के राजधानी क्षेत्र की सरहद पर चल रहा यह आंदोलन सिक्ख किसानों पर केन्द्रित था, और आंदोलन को चलाने के लिए जो बड़ा समर्थन मिला हुआ था, वह भी सिक्ख संगठनों की तरफ से था। दिल्ली में गणतंत्र दिवस पर किसानों के नाम पर जो तोडफ़ोड़ हुई, और लाल किले पर प्रदर्शन हुआ, उसके बाद से सिक्ख किसानों को कुछ चुप देखा जा रहा है। और इसके बाद की तमाम खबरों में उत्तरप्रदेश के किसान नेता राकेश टिकैत की अगुवाई दिख रही है। यह एक बड़ा फर्क गणतंत्र दिवस के बाद से आया है, लेकिन यह आंदोलन को किसी तरफ ले जाएगा, उस पर क्या फर्क पड़ेगा, यह समझना अभी मुश्किल है। 

आने वाले महीनों में देश में बंगाल सहित कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, और इसे ध्यान में रखकर कल के केन्द्रीय बजट में इन राज्यों के लिए खास इंतजाम किया गया है। लेकिन दिग्विजय सिंह के कहने के बावजूद इन राज्यों के राजनीतिक दल भी किसान आंदोलन का साथ देने के लिए सडक़ों पर उतर रहे हों ऐसा दिख नहीं रहा है। शिवसेना के संजय राऊत का आंदोलन में आकर लौटना भी छोटी बात नहीं है, यह महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन की अगुवा पार्टी का नैतिक समर्थन है जिसके अपने राज्य के भीतर भी शिवसेना-गठबंधन सरकार किसानों के साथ जुड़ती है। आज केन्द्र सरकार की रणनीति के मुताबिक जिस तरह किसानों और दिल्ली के बीच कटीले तारों के समंदर फैलाए जा रहे हैं, जिस तरह सडक़ों पर भालों सरीखी नोंक लगाई जा रही है, उससे केन्द्र सरकार और किसान आंदोलन के बीच एक बड़ा फासला बढ़ते दिख रहा है। ऐसे मौके पर बाकी राजनीतिक दलों को भी अपनी प्रतिबद्धता खुलकर सामने रखनी चाहिए कि वे कटीलें तारों के किस तरफ हैं। किसान आंदोलन और आज की नौबत एक बड़ा व्यापक मुद्दा है, हम आज इसे यहां पर छू भर रहे हैं और लोगों के सोचने के लिए इन पहलुओं को सामने रख रहे हैं। राजनीतिक दलों से परे भी समाज के दूसरे तबकों को किसानों के साथ आकर खड़ा होना होगा, वरना भूखों मरने के लिए तैयार रहना होगा। 

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01-Feb-2021 5:16 PM 217

भारत के पड़ोस में बसे हुए म्यांमार में आज सुबह हुई सैनिक बगावत के बाद वहां की सबसे बड़ी निर्वाचित नेता आंग सान सू की सहित बहुत से निर्वाचित नेताओं को सेना ने कैद कर लिया है और देश में एक बरस के लिए इमरजेंसी लागू करके सरकार संभाल ली है। दस बरस पहले म्यांमार के चुनावों में आंग सान सू की जीतकर आई थीं और उनकी पार्टी ने सरकार बनाई थी। वैसे तो लंबे समय तक नजरबंद रहते हुए आंग सान सू की को नोबल शांति पुरस्कार भी मिला था, लेकिन पिछले कई बरसों से उनकी अंतरराष्ट्रीय साख खत्म हो चुकी थी क्योंकि उनकी सरकार ने रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यकों का जिस बुरी तरह मानव संहार करके उन्हें देश से निकाला था, उसकी उम्मीद उनसे और उनकी सरकार से किसी ने नहीं की थी। म्यांमार पांच देशों के बीच बसा हुआ देश है। बांग्लादेश, भारत, चीन, लाओ, और थाईलैंड से उसकी सरहद जुड़ी है, और इन देशों में से रोहिंग्या मुस्लिमों को बांग्लादेश ही शरण पाने के लिए ठीक लगा था, और वे समंदर के रास्ते वहां पहुंचे। अभी बांग्लादेश म्यांमार से रोहिंग्या शरणार्थियों की वापिसी के लिए बातचीत कर ही रहा था कि म्यांमार सरकार चली गई, और वहां जो फौजी तानाशाह आज काबिज हुआ है, वह रोहिंग्या शरणार्थियों के व्यापक मानव संहार का मुजरिम माना जाता है। 

करीब साढ़े 5 करोड़ आबादी का यह देश वैसे तो भारत के एक औसत राज्य जितना बड़ा ही है, लेकिन चीन से लगी हुई लंबी सरहद के चलते म्यांमार भारत की विदेश और फौजी नीतियों में बड़ी नाजुक जगह रखता है। चीन की तरह ही म्यांमार बौद्ध बहुल देश है, और वहां सत्तारूढ़ बौद्ध ताकतों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों को कुचलकर भी रखा है। म्यांमार में 85-90 फीसदी बौद्ध हैं, और उनकी मार के आगे 4 फीसदी के करीब मुस्लिमों के बचने की गुंजाइश कम ही थी। नतीजा यह हुआ कि लाखों रोहिंग्या शरणार्थी उनके गांव जला दिए जाने के बाद, व्यापक हत्या और बलात्कार के बाद देश छोडऩे को मजबूर हुए थे। 

अंग्रेजों के वक्त से बर्मा कहे जाने वाले इस देश के साथ भारत के मजबूत रिश्ते रहे, लेकिन सांस्कृतिक रूप से आज का म्यांमार अपने बाकी बौद्ध बहुल देशों, चीन, लाओ, और थाईलैंड के अधिक करीब रहा। वैसे भी भारत और बांग्लादेश की सरहद से जुड़े म्यांमार में चीन की दिलचस्पी स्वाभाविक ही है, और नक्शे को देखें तो एक और वजह समझ आती है कि भारत और बांग्लादेश की करीब समुद्री सीमा भी म्यांमार से लगी हुई है, और वह चीन के लिए रणनीतिक रूप से जरूरी भी है। ऐसे में भारत के इस पड़ोसी देश का कमजोर लोकतंत्र जब घोषित रूप से फौजी तानाशाही बन रहा है, तो भारत के लिए यह एक बड़ी फिक्र की बात भी है। चीन के साथ कई मोर्चों पर भारत की तनातनी, और टकराहट जारी है। चीन और भारत के बीच एक दूसरे देश नेपाल को लेकर भी इन दोनों देशों में खींचतान है, और नेपाल से भी भारत के लिए कोई राहत की बात नहीं आ रही है, घूम-फिरकर नेपाल चीन के करीब ही दिखाई पड़ता है। 

म्यांमार में 2011 में चुनाव जीतकर सत्ता में आई शांति की प्रतीक दिखती आंग सान सू की म्यांमार के पिछले चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली की फौजी तोहमत भी झेल रही थीं। सरकार और सेना के बीच तनातनी चल रही थी, और आंग सान सू की की पार्टी की चुनावी जीत की आंधी को फौज ने धोखाधड़ी और धांधली करार दिया था। म्यांमार के पिछले दशकों को देखें तो यह जाहिर है कि वहां लोकतंत्र बहुत मजबूत नहीं था, और फौज जरूरत से अधिक बड़ा किरदार निभाते आ रहा था। 2011 के चुनाव के पहले 15 बरस आंग सान सू की नजरबंदी में थी, लेकिन इस पूरे लोकतांत्रिक संघर्ष की उनकी साख रोहिंग्या मुस्लिमों के जनसंहार से खत्म हो गई थी। 

भारत के पास आज म्यांमार को लेकर सार्वजनिक रूप से करने को कुछ नहीं है। भारत काफी पहले वह नैतिक ताकत खो चुका है जिससे वह दुनिया भर में दूसरे देशों के मामलों में भी खुलकर बोल पाता था। इसलिए आज जब दूर बैठा अमरीका म्यांमार के आज के फौजी सत्ता पलट पर भारी नाराजगी जाहिर करते हुए नेताओं की रिहाई की मांग कर रहा, और फौजी ताकतों को चेतावनी दे रहा है, तब भारत के करने का कुछ नहीं दिखता। भारत अपनी जमीन पर शरण पाए हुए रोहिंग्या मुस्लिमों को लेकर भी छुटकारा पाने की कोशिशों में लगा हुआ है, और बीते बरसों में इन मुस्लिमों का भारत में कुछ तबकों ने खुलकर विरोध भी किया था। आने वाला वक्त यह साफ करेगा कि म्यांमार की नई फौजी हुकूमत कितने वक्त तक चलती है, उसका रूख क्या रहता है, वहां पर चीन का दखल क्या रहता है, और इस फौजी हुकूमत का भारत के लिए क्या रूख रहता है। फिलहाल हम भारत के किसी भी पड़ोसी देश में लोकतंत्र के कमजोर होने को भारत के लिए एक बड़ी परेशानी मानते हैं, और उसे भारत के लिए एक खतरा मानते हैं।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


31-Jan-2021 5:59 PM 127

गणतंत्र दिवस पर देश में महीनों से चल रहे किसान आंदोलन का तनाव तो दोपहर बाद शुरू हुआ, लेकिन इसके पहले के एक-दो दिनों से देश आजादी और देशभक्ति के गानों में डूबा हुआ था। इन दिनों टीवी के अनगिनत चैनलों पर दर्जनों रियलिटी शो चलते हैं, जो कैलेंडर के मौसम को देखकर लोगों की भावनाओं पर अपनी उंगलियां धरते हैं। टीवी के कई कार्यक्रम रिटायर्ड फौजियों से भरे हुए थे, जिनकी जंग की हसरत पंचतत्वों में विलीन हो जाने के बाद भी कायम रहेगी। दूसरी तरफ गणतंत्र दिवस पर सम्मान के नाम पर मौजूदा फौजियों को स्टूडियो में बिठाकर सम्मान किया गया, और उनकी बहादुरी या शहदत की कहानियां दोहराकर टीवी के दर्शकों को खासा रूलाया भी गया। यह मौका गणतंत्र दिवस का था, जिस दिन देश का संविधान लागू हुआ था, न कि जिस दिन देश आजाद हुआ था। लेकिन किसी भी राष्ट्रीय पर्व को युद्धोन्माद, देशभक्ति, और समर्पण से जोडऩे की जो संस्कृति पैर मजबूत जमा चुकी है, वहां हर मौके पर फौज और शहादत का महिमामंडन करने में लग जाती है। इसमें कोई दिक्कत नहीं है सिवाय इसके कि बहादुरी की कहानियों और आंसुओं के बीच एक रूखा-सूखा शब्द, संविधान, खो जाता है। 

अगर निशाना टीआरपी न होता, दर्शक संख्या बढ़ाने की अर्नबी फिक्र न होती, तो शायद गणतंत्र दिवस पर अमल किए गए संविधान पर भी कुछ चर्चा हो सकती थी। लेकिन देश में आज न सिर्फ टीवी-मीडिया, बल्कि सत्ता के कब्जे की कमाल और संस्थाओं की नीयत संविधान को फर्श पर पड़े बाकी कचरे के साथ बुहारकर पड़ोसी के घर के सामने फेंक देने की रहे, तो फिर संविधान पर चर्चा ही क्यों छेड़ी जाए? फिर यह तो बहुत खतरनाक बवाल की बात है कि संविधान पर चर्चा होगी तो फिर यह भी बात होगी कि इस देश में वह किस कदर नाकामयाब हो चुका है, ताकतों ने उसे किस हद तक खारिज कर दिया है। नाकामयाबी की बातों से भी भला कहीं टीआरपी बढ़ती है? न चैनल की बढ़ती, न ही मुल्क की सरकार की। इसलिए यह कोई मासूम चूक नहीं थी कि संविधान लागू होने के दिन फिर तो झंडे से जोड़ा गया, डंडे से तोड़ा गया, सरहदों पर दुश्मन से खतरे से जोड़ा गया, लेकिन संविधान से नहीं जोड़ा गया। इस दिन को किसानों को बदनाम करने के लिए तो इस्तेमाल किया गया, लेकिन संविधान को श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं किया गया। वोटों की मंडी में तिजारत करने वाले बड़े धूर्त होते हैं, और वे जानते हैं कि जलते-सुलगते मुद्दों को किस तरह किनारे धकेला जा सकता है। वे देशभक्ति के नाच-गाने से लेकर, बदन का कोई हिस्सा खो चुके किसी फौजी की बहादुरी तक का इस्तेमाल कर लेते हैं, लेकिन देश में कहां-कहां संविधान को कुचला जा रहा है, किन तबकों के संवैधानिक अधिकार छीने जा रहे हैं, उस तक कल्पना को नहीं आने दिया जाता। 

जिन तबकों को संविधान ने कुचलने के सिवाय और कुछ नहीं किया है, उन तबकोंं को यह दिन नजरों से उसी तरह दूर रखना चाहता है जिस तरह अहमदाबाद के फुटपाथी बेघरों को दीवार बनाकर ट्रंप की नजरों से दूर रखा गया था, या जिस तरह देश के सबसे साफ शहर एमपी के इंदौर में बेघर-बेसहारा बुजुर्गों को म्युनिसिपल ने कचरा गाड़ी में लादकर शहर के बाहर फेंककर साफ शहर के बाशिंदों की नजरों से दूर कर दिया गया था। कुछ लोगों ने इंदौर में बेघर-बुजुर्ग नाम की गंदगी को हटाने के वीडियो बनाए, और जिन्हें देखकर देश के लोग हिल गए। लेकिन देश के लोगों के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी इस तरह कुछ मिनटों के वीडियो पर कैद नहीं हो सकती, इसलिए देशभक्ति के वीडियो का सैलाब स्टूडियो से शुरू होकर लालकिले तक बहता रहा। 

लोकतंत्र में जब कुछ खास दिनों की अहमियत को पूरी तरह अनदेखा करके उनसे ठीक अलग किस्म के गैरमुद्दों की ओर लोगों को ध्यान खींच लिया जाए, तो वह उस दिन को कुचलने की साजिश की कामयाबी होती है। संविधान पर चर्चा आज भला कौन चाहते हैं? सत्ता पर बैठे लोग तो नहीं चाहते, और इसलिए देश में जनमत और जनधारणा बनाने की ताकत रखने वाली अधिकतर संस्थाएं भी नहीं चाहतीं, ताकतवर मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी नहीं चाहता। जब लोग चुनावों के ठीक पहले के बरसों में मुगलों की जुल्म की कहानियां बताने वाले टीवी सीरियल का वक्त मासूम समझते हैं, वे गणतंत्र दिवस पर देशभक्ति के सैलाब को भी मासूम समझ सकते हैं, या बता सकते हैं। गणतंत्र दिवस तो एक आजाद देश को आजाद हुए बरसों हो जाने के बाद उसके संविधान के लागू होने का दिन है, और आज उस संविधान की हत्या करते हुए भी इस दिन का जश्न महज आजादी पर फोकस रखना कोई मासूम काम नहीं है।

हिन्दुस्तान में एक भी टीवी चैनल ऐसा रहा हो तो हम उसके बारे में जरूर जानना चाहेंगे जिसने गणतंत्र दिवस पर अपनी बहस इस देश में संविधान की कामयाबी या नाकामयाबी पर केन्द्रित रखी हो। स्कूल-कॉलेज या किसी और दफ्तर में जहां कहीं झंडे के सामने भाषण हुए हों, क्या वहां पर कोई भी चर्चा देश के कमजोर तबकों के संवैधानिक अधिकारों पर हुई होगी? सच तो यह है कि संविधान लागू होने की सालगिरह के तुरंत बाद गांधी की हत्या का दिन आता है, और अब तो लोग यह भी भूल चले हैं कि गांधी की हत्या संविधान के तहत बने कानूनों के खिलाफ थी। अब तो देश में खुलेआम एक तबका इतना मुखर है कि उसे गांधी को कोसने और गोडसे को पूजने को छुपाने की जरूरत भी नहीं लगती है। ऐसा क्या गणतंत्र दिवस मनाना जो गोडसे की पूजा पर फिक्र के बिना पार हो जाए? किसी भी मौके की सालगिरह अगर उस मौके और वजह की अनदेखी करते हुए हो, तो उससे अच्छा है कि वह न ही हो। धूमिल ने शायद दशकों पहले इस नौबत का अंदाज लगा लिया था और लिखा था- क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है जिन्हें एक पहिया ढोता है, या इसका कोई खास मतलब होता है? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


30-Jan-2021 1:46 PM 244

हिन्दुस्तान का एक सबसे बड़ा पाखंड कल शुरू होने के पहले ही खत्म हो गया। एक किस्म से अन्ना हजारे का किसानों के पक्ष में अनशन शुरू न होना किसानों के लिए अच्छा ही रहा। इस अनशन को समर्थन जुटता, उसे साथ मिलती, उसके बाद अन्ना हजारे इस साख को बेचकर निकल पड़ते तो किसानों के मुद्दे का बड़ा नुकसान होता। खादी की खाल ओढ़े हुए यह स्वघोषित गांधीवादी कल खुद ही उजागर हो गया जब उसने अपने कई हफ्तों पहले के घोषित कृषि कानूनों के खिलाफ अनशन को खुद होकर रद्द कर दिया। उन्होंने मोदी सरकार के तीन विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ शनिवार से भूख हड़ताल की घोषणा की थी, लेकिन महाराष्ट्र के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता देवेन्द्र फडनवीस की मौजूदगी में उन्होंने इसे रद्द करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को 50 फीसदी तक बढ़ाने का फैसला लिया है इसलिए वे अपना अनशन वापिस ले रहे हैं। 

देश को अच्छी तरह याद है कि कोई एक दशक पहले दिल्ली में अन्ना हजारे ने जन लोकपाल बनाने का एक आंदोलन छेड़ा था। उस वक्त केन्द्र में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार का राज था। वह आंदोलन बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ाया गया, उसमें अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, और बाबा रामदेव सरीखे लोग शामिल हुए, और इस आंदोलन का कोई नतीजा निकले इसके पहले केजरीवाल राजनीति में आ गए, और दिल्ली में कांग्रेस सरकार के खिलाफ उन्होंने चुनाव लड़ा, और अपनी सरकार बनाई। बाबा रामदेव ने योग और आयुर्वेद का कारोबार बढ़ाते हुए साबुन तेल और टूथपेस्ट तक उसका विस्तार किया और विदेश के एक सबसे बड़े नवोदित कारोबारी बन गए। इसी आंदोलन में हाथ बंटाने के लिए कर्नाटक से निकलकर स्वघोषित श्रीश्री रविशंकर भी पहुंचे जो कि कर्नाटक में भाजपा के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के भयानक भ्रष्टाचार पर आंखें बंद किए हुए बैठे थे, लेकिन दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में वे लगातार जुटे रहे। यूपीए सरकार को भ्रष्ट साबित करते हुए अन्ना हजारे और उनकी टोली ने जो आंदोलन चलाया था, वह यूपीए के विसर्जन के साथ पूरा हो गया, और सत्ता पर आई मोदी सरकार ने पांच बरस तक उस लोकपाल का गठन नहीं किया जिसके बिना अन्ना हजारे सांस नहीं ले पा रहे थे। लेकिन अन्ना हजारे ने ऊफ भी नहीं किया। 

हिन्दुस्तान में खादी एक सबसे बड़ा धोखा है। कहावतों में जिस तरह भेडिय़ा भेड़ की खाल ओढक़र हमले करता है और लोगों को शक नहीं होता, उसी तरह इस देश में सबसे बड़े जुर्म खादी पहनकर किए जाते हैं, और लोग ऐसे लोगों को गांधीवादी मानते हुए उनके जुर्म की कोई साजिश भी नहीं समझ पाते। अन्ना हजारे ऐसे ही एक धूर्त हैं जिन्हें चुनिंदा पार्टियों और नेताओं के भ्रष्टाचार पर हमला तो देश का सबसे जरूरी मुद्दा लगता है, लेकिन दूसरे लोगों के भ्रष्टाचार, दूसरी पार्टियों के भ्रष्टाचार, गैरआर्थिक भ्रष्टाचार और जुर्म से अन्ना हजारे को कोई शिकायत नहीं रहती। अपने आपको गांधीवादी कहते हुए यह आदमी जिस तरह खादी और गांधी टोपी के नकाब के पीछे से अपनी नीयत के काम करता है, उसकी शिनाख्त करने की ताकत हिन्दुस्तान की जनता में नहीं रह जाती। क्योंकि वह गांधी से परे आमतौर पर नहीं देख पाती। यही वजह है कि हिन्दुस्तान की राजनीति में कई किस्म की पार्टियां हैं, गांधी के कत्ल से सहमत पार्टियां भी हैं, लेकिन खादी पहनना इनमें से अधिकतर की मजबूरी हो जाती है क्योंकि हिन्दुस्तानी चेतना में खादी से परे कोई और पोशाक जनसेवक की हो नहीं सकती।

आज किसानों के मुद्दे गणतंत्र दिवस के पहले के मुकाबले अधिक मुखर हैं, केन्द्र सरकार के साथ किसानों का टकराव और बढ़ा हुआ है, अब आंदोलनकारी किसानों को मुल्क का गद्दार साबित करने की खुली कोशिश हो रही है, किसानों ने राजधानी के आसपास सडक़ों पर तमाम सर्द मौसम के महीने गुजारते हुए दर्जनों साथियों को खोया भी है, लेकिन ऐसे नाजुक मोड़ पर पहुंचे हुए किसानों का मुद्दा अगर इस पाखंडी अन्ना हजारे को सुलझा हुआ दिख रहा है, तो यह बहुत अच्छा हुआ कि इसका पाखंड इतनी जल्द खत्म हो गया। अगर यह किसानों का हमदर्द होकर कुछ और दूर तक उनके साथ चला होता, तो यह उन साख को चौपट कर जाता। लेकिन किसानों ने भी जिंदगी में बहुत से अच्छे काम किए होंगे जो इस बहुरूपिए से उनका छुटकारा पहले ही दिन हो गया।
 
हिन्दुस्तान में, और बाहर भी, एक कहावत चलती है कि हर चमकती हुई चीज सोना नहीं होती, हिन्दुस्तानी जनता को यह याद रखना चाहिए कि खादी की हर खाल के पीछे गांधीवाद समाजसेवक नहीं होते, इसके पीछे अन्ना हजारे जैसे भाड़े पर काम करने वाले लोगों की तरह के लोग भी होते हैं, जिनको भाड़ा पता नहीं किस शक्ल में दिया जाता है, लेकिन जो सरकार गिराने या किसी नेता को हराने की सुपारी लेते हैं। अब जैसा कि अन्ना हजारे ने खुद ही घोषणा की थी, यह उनके जीवन का आखिरी अनशन होने वाला था, अपनी जिंदगी के इस आखिरी नाटक का अन्ना हजारे पर्दा ही नहीं उठा पाए। लोगों को यह मनाना चाहिए कि यह खादी की खाल में जनआंदोलनों के नाम की साजिशों का एक अंत हो। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


29-Jan-2021 2:13 PM 239

यह तो अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने बाम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले को रोक दिया है जिसमें वहां की एक महिला जज, जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने एक बच्ची के साथ सेक्स की कोशिश कर रहे एक अधेड़-बुजुर्ग की सजा घटा दी थी कि जब तक सेक्स की नीयत से चमड़ी का चमड़ी से संपर्क न हो तब तक कपड़ों के ऊपर से बच्ची के सीने को दबोचना यौन शोषण के दर्जे में नहीं आता। खबर आने के कुछ घंटों के भीतर ही इसी जगह पर हमने लिखा था कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट को तुरंत खारिज करना चाहिए वरना इसकी मिसाल देश भर में बलात्कारी देने लगेंगे। यह तो अच्छा हुआ कि दो-चार दिन के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी। लेकिन कुछ हफ्ते पहले का मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का एक दूसरा आदेश इसी तरह खबरों में आया था जिसमें जेल में बंद बलात्कार के एक आरोपी की जमानत के लिए जज ने शर्त रखी थी कि वह जाकर शिकायतकर्ता बलात्कार की शिकार से राखी बंधवाकर आए तब उसे जमानत मिलेगी। जजों का यह पूरा का पूरा सिलसिला ही इसलिए खतरनाक है कि यह हाईकोर्ट या उससे भी ऊपर की जजों को तानाशाह किस्म के अधिकार देता है, और जज बनने के लिए सामाजिक सरोकार, सामाजिक समझ इसकी अनिवार्यता नहीं रखता है। 

दुनिया के सामने अदालतों और जजों को लेकर लोकतांत्रिक देशों में कई किस्म की मिसालें हैं, और देशों को एक-दूसरे से सीखना चाहिए। अमरीकी न्यायपालिका में सबसे बड़ी अदालत में अगर किसी जज की तैनाती होनी है, तो उससे वहां की संसद की कमेटी, या कमेटियां, लंबी पूछताछ करती हैं। यह सुनवाई सार्वजनिक होती है, और इसे बाकी लोग भी देख सकते हैं। जज बनने की कगार पर खड़े हुए लोगों से सांसद उनकी धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक सोच के बारे में लंबे सवाल-जवाब करते हैं, और उनकी जिंदगी के बारे में पता लगी किसी विवादास्पद बात के बारे में भी। जज बनने के पहले लोगों को अपना दिल-दिमाग सांसदों के सामने खोलकर रखना पड़ता है, वे गर्भपात जैसे विवादास्पद अमरीकी मुद्दे पर क्या सोचते हैं यह भी सामने रखना पड़ता है। 

भारत में किसी का हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज बनना एक बड़ा रहस्यमय सिलसिला है। इस देश के सुप्रीम कोर्ट ने अपनी खुद की कॉलेजियम नाम की एक संस्था बना ली है जो निचली अदालतों के जजों, और बड़ी अदालतों के वकीलों में से हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज बनाने लायक नाम छांटती है। जिसके बाद ये नाम सरकार को भेजे जाते हैं, और सरकार इन नामों की छानबीन करके इनमें से कुछ को मंजूरी देती है, और कुछ नामों को ठोस आधार पर रोकती है। यह सिलसिला गोपनीय रहता है, और इसी नाते रहस्यमय भी रहता है। बीती कई सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट के इस तानाशाह-एकाधिकार को तोडऩे की कोशिश भी की कि जज खुद ही जज नियुक्त न करें, और उसमें सरकार या संसद की भी भूमिका रहे। हम इसमें सरकार के दखल के तो हिमायती नहीं हैं क्योंकि भारत में आम समझ यह कहती है कि सरकार अदालत से अधिक भ्रष्ट है। लेकिन जजों की नियुक्ति न्यायपालिका का एकाधिकार रहे, यह बात भी ठीक नहीं है। 

जिन दो फैसलों को लेकर हम आज इस मुद्दे पर लिख रहे हैं, वे दो फैसले महज नमूना हैं। वैसे और भी बहुत से मनमाने फैसले हैं, या जजों की कही गई ऐसी बातें हैं जो कि सामाजिक न्याय की उनकी बहुत कमजोर समझ का सुबूत भी हैं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज बनाए जाने के पहले संसद की कमेटियां इनकी औपचारिक सुनवाई करें, और उनसे पूछे गए सवाल, उनके दिए गए जवाब रिकॉर्ड में लाए जाएं, उसके बाद ये दस्तावेज एक बार कॉलेजियम को भेजे जाएं, ताकि वह अपनी सिफारिशों पर फिर से गौर कर सके, और उसके बाद ही वे नाम सरकार को कमेटी की कार्रवाई के दस्तावेज सहित भेजे जाएं ताकि सरकार भी उन पर गौर करते हुए कमेटी की कार्रवाई को देख सके। 

ऐसे किसी भी फेरबदल या सुधार के खिलाफ एक बड़ा तर्क खड़ा कर दिया जाता है कि देश के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों के सैकड़ों पद खाली पड़े हुए हैं, और उन्हें भरने में देर होने से मामलों के गट्ठे और बढ़ते चल रहे हैं। जजों की ये खाली कुर्सियां रातोंरात तो खाली हुई नहीं है, यह बरसों की लापरवाही और अनदेखी का नतीजा है। इन्हें भरते हुए कमजोर सामाजिक समझ के लोगों को जज बना देना कोई बहुत अच्छी बात भी नहीं रहेगी क्योंकि वैसे जज रिटायर होने तक बेइंसाफी करते रहेंगे। हमारी सलाह से यह पूरा सिलसिला कुछ महीने और लेट हो सकता है, लेकिन उससे बेहतर जज तैनात होंगे और देश में बेहतर इंसाफ होगा। 

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28-Jan-2021 5:00 PM 287

दिल्ली के लालकिले पर कुछ लोगों द्वारा किया गया हंगामा अब साफ होते चल रहा है, और गणतंत्र दिवस की शाम देश भर में फैलाई गई यह खबर पूरी तरह झूठी साबित हो चुकी है कि लालकिले पर तिरंगे झंडे को हटाकर उसकी जगह खालिस्तानी झंडा फहराया गया था, और यह काम किसानों ने किया था। अब यह जाहिर हो चुका है कि लालकिले पर सिक्ख पंथ का झंडा फहराने का फतवा भाजपा के प्रचारक रहे हुए एक पंजाबी फिल्म अभिनेता दीप सिद्धू ने दिया था, और तिरंगे झंडे को छुआ भी नहीं गया था। लेकिन इस साजिश के पीछे चाहे जिसकी बदनीयत रही हो, इसे अपना असर दिखा दिया, और किसान आंदोलन में फूट पड़ गई, वह कमजोर हो गया, कुछ संगठनों ने डेरा उठा लिया, और मौके की कमजोरी को भांपकर कुछ जगहों पर भाजपा की राज्य सरकारों ने आंदोलन खत्म करवाने के हिसाब से कार्रवाई शुरू कर दी। किसानों के एक मोर्चे पर बीती आधी रात से बिजली काट दी गई, और कुछ दूसरी जगहों पर दूसरी असुविधा खड़ी की गई। आज किसानों के बीच आपस में तू-तू-मैं-मैं शुरू हो गई कि लालकिले पर हुए हंगामे के बाद अब आंदोलन कैसे चलाया जाए? 

हिन्दुस्तान में लंबे चलने वाले आंदोलनों को कमजोर करना सत्ता की पहली नीयत होती है। और यह बात किसी एक पार्टी की नहीं होती, बल्कि यहां जिसकी सरकार रहे, वहां उसकी यही नीयत होती है। पार्टियां तो आती-जाती रहती हैं लेकिन किसी भी सरकार में जो हमेशा बने रहते हैं वो अफसर रहते हैं। अफसरों का लोकतंत्र से वैसे भी बहुत कम लेना-देना होता है, और आमतौर पर वे सत्तारूढ़ पार्टी के वफादार बने रहते हैं, और इस नाते भी वे सरकार के लिए दिक्कत बने हुए किसी भी आंदोलन के खिलाफ रहते हैं। नेताओं के मुकाबले अफसरों को यह हुनर कुछ अधिक हासिल रहता है कि आंदोलन को कैसे तोड़ा जाए। सत्ता पर बैठे नेता अपनी खूबियों का इस्तेमाल करते हुए, और अफसर अपने तजुर्बे का इस्तेमाल करते हुए आंदोलन तुड़वाने में लगे रहते हैं, और आमतौर पर कामयाब भी होते हैं। फिर इस बार तो आंदोलनकारी किसानों के इतने सारे अलग-अलग संगठन एक ढीला-ढाला ढांचा बनाकर चल रहे थे जो कि अपने आपमेें बहुत मजबूत नहीं था। इन किसानों का आंदोलनों का लंबा इतिहास भी नहीं था, और न ही ये किसी संगठित मजदूर संगठन या राजनीतिक दल के मातहत थे। इनके बीच  सिक्ख पंथ को सब कुछ मानने वाले कट्टर धार्मिक लोग भी थे, और लाल झंडे वाले कम्युनिस्ट नेता भी थे। परस्पर वैचारिक असहमति के बावजूद ये महीनों से कामयाबी सहित आंदोलन को चला रहे थे कि गणतंत्र दिवस पर टै्रक्टर रैली राह से भटक गई, या भटका दी गई, और लालकिले पर झंडे-डंडे लेकर एक फतवेबाज नेता की अगुवाई में यह आंदोलन, या इसके नाम पर साजिश कर रहे कुछ लोग टूट पड़े, और लालकिले को खबरों में ले आए। यह एक और बात है कि लालकिले पर हंगामे का जो सबसे बड़ा खलनायक रहा वह भाजपा के फिल्मी, और गैरफिल्मी नायकों के साथ अपनी तस्वीरें फैलने का मजा ले रहा है, और किसान नेताओं को सार्वजनिक रूप से धमका रहा है, लालकिले पर हमले या हंगामे का लीडर खुद होने का दावा भी खुद ही कर रहा है। 

किसान आंदोलन को हिंसक और मुल्क का गद्दार साबित करने की जो मीडिया-मुहिम गणतंत्र दिवस के नाजुक मौके पर शुरू हुई, तो वह अब तक जारी है, और वे तमाम लोग जो अपनी हर किस्म की कमीनगी के साथ भागकर तिरंगे झंडे के पीछे छुपते आए हैं, आज तिरंगे झंडे के सबसे बड़े हमदर्द हो गए हैं, और उनकी भावनाएं इस तरह उबल रही है कि लालकिले के पत्थर गारे से नहीं जोड़े गए, इन्हीं लोगों के लहू से जोड़े गए थे। ऐसा करते हुए देश के झंडे के झूठे अपमान से लेकर सिक्ख पंथ के झंडे को खालिस्तानी झंडा बताने के सच्चे अपमान तक सब कुछ किया जा रहा है। यह सिलसिला एक आंदोलन को ऐसे बूटों से कुचलने का है जो कि दिख भी नहीं रहे हैं। 

सैकड़ों मील के इलाकों में बिखरे हुए इस आंदोलन को राजधानी में बैठी सत्ता ने घेरकर मारा दिखता है। राजधानी उनका अपना इलाका है, वहां की पुलिस केन्द्र सरकार की अपनी है, और संगीनों के साए में रहने वाला लालकिला भी उनकी ही अपनी हिफाजत में था। ट्रैक्टरों को कहां रोका गया, और कहां से आगे बढऩे दिया गया, यह सब भी दिल्ली की पुलिस के हाथ था। इसलिए किसानों की इस तोहमत की जांच भी जरूरी है कि रैली के लिए जो सडक़ें तय की गई थीं, उन पर बैरियर लगे थे, और जिन सडक़ों पर नहीं जाना था, उन सडक़ों को खोलकर रखा गया था। अगर सच में ही ऐसा हुआ है, तो इसमें कुछ भी अविश्वसनीय नहीं है क्योंकि सत्ता का मिजाज किसी भी देश-प्रदेश में ऐसा ही होता है। नेताओं का भी, और अफसरों का भी।
 
हाल ही के बरसों में इस देश में जेएनयू से लेकर जामिया मिलिया तक, और शाहीन बाग तक बहुत से आंदोलनों की ऐसी भ्रूण हत्या देखी है। केन्द्र सरकार के खिलाफ यह एक सबसे मजबूत आंदोलन खड़ा हुआ था, और किसानों की दर्जनों शहादत के बाद भी डटा हुआ था। इसे खत्म करवाने के लिए लालकिले और तिरंगे झंडे का गणतंत्र दिवस पर जैसा इस्तेमाल किया गया है, वह बहुत ही खतरनाक तरीका रहा है, उसने देश के अमन-पसंद लोगों के हौसले को तोड़ दिया है। दिक्कत यह है कि लालकिले पर ऐसे हमले या हंगामे का खलनायक आज भी पूरे किसान आंदोलन को खुली सार्वजनिक धमकी देते हुए खुला घूम रहा है, और यह जाहिर भी है कि उसके ऐसा करने के पीछे ठोस वजहें हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


27-Jan-2021 5:00 PM 280

दिल्ली में कल गणतंत्र दिवस के मौके पर लाल किले पर जो अभूतपूर्व बल प्रदर्शन हुआ है उसने देश के एक सबसे मजबूत आंदोलन, किसान आंदोलन को कमजोर करने का काम किया है। यह समझने की जरूरत है कि सिख पंथ के झंडे को लाल किले के एक खंबे या किसी गुंबद पर फहरा कर किसका भला किया गया है? यह बहुत मासूम बल प्रदर्शन नहीं था। किसान तो महीनों से सबसे सर्द मौसम को खुले में झेलते हुए अपना आंदोलन चलाए हुए थे। गणतंत्र दिवस के मौके पर वह देश की राजधानी में एक ट्रैक्टर रैली निकालकर किसानों की ताकत का प्रदर्शन करना चाहते थे जो कि किसी भी लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलन के प्रतीकात्मक तरीकों जैसा ही एक तरीका था। लेकिन ऐसे में किसानों के मोटे तौर पर शांत रहते हुए भी उनके बीच के कुछ लोग एक गैर किसान नेता की अगुवाई में जिस तरह लाल किले पर पहुंचे और वहां उन्होंने सिख पंथ का झंडा फहराया उससे देशभर में किसानों को धिक्कारने का दौर शुरू हो गया। यह समझने की जरूरत है कि बिना किसी हिंसा के जो किसान महीनों से सडक़ों पर बैठे हुए हैं और जिनमें से दर्जनों किसानों की शहादत इस आंदोलन में अब तक हो चुकी है, कल उनमें से कुछ लोग एकाएक ऐसे बल प्रदर्शन पर क्यों उतारू हो गए? 

यह एक खुला तथ्य है कि कल लाल किले पर जो बल प्रदर्शन किया गया वह भाजपा से जुड़े हुए पंजाबी फिल्मों के एक अभिनेता की अगुवाई में हुआ और उसने कल शाम फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट करके लाल किले की कार्रवाई का जिम्मा भी लिया। दीप सिद्धू नाम का यह पंजाबी अभिनेता भाजपा के नेताओं से जुड़ा हुआ है, वह पिछले महीनों में कई बार ऐसी कोशिश कर चुका है कि उसे किसान आंदोलन में घुसपैठ करने मिले। किसानों ने औपचारिक रूप से दीप सिद्धू के दाखिले को रोका, उसे बार-बार कहा कि किसान आंदोलन में उसकी कोई जगह नहीं है। कल ट्रैक्टर रैली के चलते हुए वह एक पीछे के दरवाजे से इस आंदोलन में दाखिल हुआ, लाल किले पर हुई कार्रवाई की अगुवाई की, अपने खुद के वीडियो बनाए, सेल्फी ली, और उन्हें पोस्ट किया। 

किसानों का जो आंदोलन महीनों से शांतिपूर्ण चल रहा था उसके बारे में कल मीडिया के एक हिस्से से लेकर सोशल मीडिया तक फर्जी तस्वीरों के साथ ऐसी जानकारी फैलाई गई कि किसानों ने लाल किले से तिरंगा झंडा निकालकर फेंक दिया और खालिस्तानी झंडा फहरा दिया। यह बात गणतंत्र दिवस के दिन लोगों को भडक़ाने के लिए काफी थी। दिक्कत यह थी कि अफवाहों की कुछ घंटों की जिंदगी के बाद यह सच सामने आना ही था कि तिरंगे झंडे को किसी ने छुआ नहीं था, और ना ही कोई खालिस्तानी झंडा लाल किले पर फहराया गया था। आंदोलनकारी किसानों के बीच कम्युनिस्टों के लाल झंडे से लेकर सिख पंथ के निशान साहब वाले झंडों की जगह बनी हुई थी, और उनमें से ही निशान साहब वाले सिख पंथ के कुछ झंडे कल लाल किले के कुछ  खंभों पर, और कुछ गुंबद ऊपर फहराए गए। यह बात जब तक साफ हो पाती कि तिरंगे झंडे का किसी ने अपमान नहीं किया, और ना ही कोई खालिस्तानी झंडा फहराया गया, तब तक तो देश के लोगों ने किसान आंदोलन को ही धिक्कारना शुरू कर दिया था। 

यह बात समझने की दिमागी हालत देश के लोगों की बची नहीं है कि जो आंदोलनकारी लाल किले तक पहुंचे भी थे उनमें से भी बहुत से लोग देश का तिरंगा झंडा न सिर्फ लहरा रहे थे बल्कि वे अपने बदन पर भी तिरंगे झंडे को लपेट कर रखे हुए थे। हिंदुस्तान में शक्ति प्रदर्शन का इतिहास नया नहीं है। 1996 में जब बाबरी मस्जिद को गिराया गया तब वह सोची-समझी साजिश थी, और उसके नेता सामने एक मंच पर इक_े होकर खुशियां मनाते हुए यह काम कर रहे थे। इसके बाद कई ऐसे मौके आए जब लोगों ने इस किस्म का बल प्रदर्शन किया। राजस्थान में एक मुस्लिम मजदूर को जिंदा जलाने वाले एक घोर सांप्रदायिक हत्यारे हिंदू को बचाने के लिए उदयपुर की जिला अदालत पर हिंसक लोगों की भीड़ ने हमला किया था और अदालत पर भगवा झंडा फहरा दिया था। देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को, कानून को चुनौती देते हुए जब भी कानून के राज को  चुनौती दी जाती है तो वह कई दूसरी शक्लों में, कई दूसरी जगहों पर भी सामने आती है। लेकिन किसानों के महीनों से चले आ रहे शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करने के लिए उसे हिंसक, देशद्रोही बताने के लिए जो अभियान कल दोपहर शाम से ही शुरू हो गया है, वह भयानक है। देश के तिरंगे झंडे को निकालकर फेंक देने की अफवाह को जिस तरीके से फैलाया गया उससे यह जाहिर है कि यह हमला, यह शक्ति प्रदर्शन बहुत मासूम नहीं था। इसके पीछे इस आंदोलन को खत्म करने की एक साजिश भी थी। जिस दीप सिद्धू नाम के पंजाबी अभिनेता ने कल के इस हमले की अगुवाई की और दावा भी किया वह दीप सिद्धू लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार सनी देओल का चुनाव एजेंट था और सनी देओल के साथ प्रधानमंत्री से उसकी मुलाकात की तस्वीरें कल से सामने आई है। इन तमाम बातों को अलग करके देखना मुमकिन नहीं है। किसानों के इस आंदोलन को हरियाणा सरकार के मंत्री कभी पाकिस्तानी बता रहे थे तो कभी चीनी, और खालिस्तानी तो बताया ही जा रहा था। यह सिलसिला भी जब किसानों को नहीं तोड़ पाया तो कल के उनके प्रतीकात्मक आंदोलन, ट्रैक्टर रैली बदनाम करने के लिए लाल किले पर यह हमला हुआ, और उसे देश के गौरव के प्रतीक तिरंगे झंडे से जोडक़र किसानों को बदनाम करने की एक और कोशिश हुई। आज केंद्र सरकार पर दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी भी है, वह केंद्र सरकार के मातहत ही काम करती है कम ऐसे में भाजपा से जुड़े एक नेता ने जब कल लाल किले पर हमले की जिम्मेदारी ली है, तो यह केंद्र सरकार का जिम्मा बनता है कि वह इस पर कार्रवाई करें। किसानों का यह आंदोलन ऐतिहासिक है, और इसे शांतिपूर्ण तरीके से जारी रहने देना चाहिए।

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