संपादकीय

Date : 23-Aug-2019

बिहार में अभी वहां के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र गुजरे तो किसी भी राज्य की आम परंपरा के मुताबिक उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार नसीब हुआ। यह एक अलग बात है कि उनका नाम भ्रष्टाचार के मामलों में उलझा हुआ था, लेकिन मौत के बाद तो कानून के लंबे हाथ भी इंसान तक नहीं पहुंच सकते इसलिए परंपरा अधिक कायम रहती है, कानून धरे रह जाता है। इस मौके पर एक अटपटी बात यह हुई कि राजकीय सम्मान के एक हिस्से की तरह बंदूकों से सलामी दी जाती है, और सलामी की 22 रायफलों में से एक से भी धमाके की गोली नहीं चली। मुख्यमंत्री और राज्य के तमाम बड़े लोग वहां मौजूद थे, और उनकी मौजूदगी में पुलिस की रायफलों और कारतूसों का यह हाल सामने आया है। 

हमें इस बात पर जरा भी अफसोस नहीं है कि किसी को सलामी देने के लिए चलाई जाने वाली गैरजरूरी गोलियां काम न करें। अगर ये चलतीं, तो सिवाय प्रदूषण फैलाने के और कुछ नहीं करतीं। यह एक पूरे का पूरा सामंती सिलसिला है कि किसी को इस तरह की सलामी दी जाए। सरकार इस तरह किसी का सम्मान करने का फैसला करे, वह भी भला क्या सम्मान होगा? सम्मान तो किसी नेता का वह हो सकता है कि उसके अंतिम संस्कार में लोग खुद होकर पहुंचें। सरकार से सामंती सोच का खात्मा होना चाहिए। छत्तीसगढ़ के राजभवन में जब एक सभागृह बनाया गया, और उसका नाम दरबार हॉल रखा गया, तब भी हमने उस भाषा के खिलाफ लिखा था कि लोकतंत्र में दरबार शब्द अपमानजनक है, और इसका इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जब म्युनिसिपल की बिल्डिंग महल की तरह बनाई गई, तब भी उस डिजाइन के खिलाफ हमने लिखा कि जिस स्थानीय संस्था की बुनियादी जिम्मेदारी जनसेवा की है, उसे खुद महल की तरह की इमारत में क्यों बैठना चाहिए? पिछले बरसों में कई बार हमने यह सलाह दी थी कि जिला कलेक्टरों का पदनाम बदलकर जिला जनसेवक रखना चाहिए जिससे उन्हें उनकी भूमिका और उनकी जिम्मेदारी का अहसास रहे। इस कुर्सी पर बैठे लोग अंग्रेजों के वक्त लगान कलेक्ट करते रहे होंगे, लेकिन आज तो वे कलेक्ट करने से अधिक जनता पर खर्च करने के लिए बिठाए गए हैं, लेकिन वह सामंती पदनाम उसी सोच के साथ अब तक चले आ रहा है। 

सत्ता को जिस किस्म का तामझाम जिंदा रहने तक, और गुजर जाने पर भी राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की शक्ल में सुहाता है, वह सारा तामझाम जनता के पैसों पर पूरा होता है। और तामझाम की लत ऐसी होती है कि एक गंजेड़ी के धुएं के दायरे में बैठे लोग भी गांजा पीने लग जाते हैं, लोग सत्ता के किसी भी पहलू के सामंती तामझाम को देखकर खुद भी उसी में घिर जाते हैं। यह सब कुछ उस गरीब जनता के पैसों पर होता है जो कि सरकारी रियायती राशन मिलने पर जिंदा रह पाती है। अभी पिछले दिनों जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को राजधानी नवा रायपुर में बनने वाले मंत्री-मुख्यमंत्री बंगलों की योजना दिखाने ले जाया गया, तो वे इस बात पर भड़क गए कि सीएम के लिए बंगला 16 एकड़ पर क्यों बन रहा है? उन्होंने इसे घटाकर 6 एकड़ करने कहा। हिन्दुस्तान में आमतौर पर सत्ता पर बैठे लोग किसी किफायत की बात नहीं सोचते जबकि सत्ता के अधिकतर सुख केवल सत्ताकाल के लिए रहते हैं, और बाद में उनमें से अधिकतर सुख छोडऩे पड़ते हैं। ऐसे में भी कुछ लोग सत्ता सुख को हर-हमेशा का मान बैठते हैं और अपने जाने के बाद सलामी की बंदूकों की हसरत भी लिए जाते हैं, फिर चाहे उन बंदूकों के कामयाब या नाकामयाब कारतूसों की आवाज या सन्नाटा सुनने के लिए वे न भी रहें। 

सत्ता पर बैठे लोगों को ऐसी सामंती सोच से बचना चाहिए क्योंकि यह पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है, और सबसे गरीब जनता का पेट काटकर जुटाई जाती है। सत्ता या विपक्ष, जहां कहीं नेता हों, या राजभवन में हों, या बड़ी अदालतों में हों, तमाम ताकतवर लोगों को अपनी हसरतों से ऊपर लोकतांत्रिक मूल्यों को रखना चाहिए, और जनता के पैसों के मामले में अधिक से अधिक किफायत बरतना चाहिए। यह बात सुनने में कम ही ताकतवर लोगों को अच्छी लगेगी, लेकिन हम हर कुछ महीनों में किसी न किसी मौके पर यह बात याद दिलाते रहते हैं कि यह गांधी का देश है जिन्होंने  किफायत की मिसाल पूरी दुनिया के सामने रखी थी, यह नेहरू का देश है जिन्होंने अपनी निजी संपत्ति देश को दान कर दी थी, यह लालबहादुर शास्त्री का देश है जो गरीबी में जिए, और गरीबी में ही मर गए। यह देश सरकारी सादगी से जीने वालों को याद रखता है, उन्हीं का सम्मान करता है। अब जगन्नाथ मिश्र गुजर चुके हैं, इसलिए उनके बारे में कोई कड़वी बात कहना हिन्दुस्तानी संस्कृति के खिलाफ माना जाएगा, लेकिन फिर भी हम तो यह बात कहेंगे ही कि राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की सलामी की 22 बंदूकें मान लीजिए चल भी गई होतीं, तो क्या उन 22 धमाकों से जगन्नाथ मिश्र को भ्रष्टाचार में मिली कई साल की कैद की खबर दब गई होती? 
-सुनील कुमार


Date : 22-Aug-2019

छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उईके के फर्जी दस्तखत से एक चिट्ठी छत्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी विधायकों को भेजी गई जिनमें राज्यपाल नियुक्त होते ही उनकी तरफ से कांग्रेस विधायकों की खरीद-फरोख्त की बात कही गई थी। वे खुद भाजपा की नेता रही हैं और छत्तीसगढ़ की राज्यपाल बनने के पहले वे राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में मनोनीत उपाध्यक्ष थीं। ऐसे में छत्तीसगढ़ के कांग्रेस विधायकों को खरीदने की बात लिखकर उनको बदनाम करने की कोशिश जरूर की गई है, लेकिन वह कोशिश इतनी बचकानी, फूहड़, और अविश्वसनीय हो गई है कि साधारण समझ वाले लोग भी इसे फर्जी ही मानेंगे। लेकिन आजकल लोग अपनी समझ से अधिक भरोसा वॉट्सऐप पर आई हुई अफवाहों पर करते हैं, गढ़े हुए झूठों पर करते हैं, इसलिए ऐसी साजिश का भांडाफोड़ भी जरूरी है। आज जब हम अपने अखबार में इस समाचार को सबसे पहले उजागर कर रहे थे, तो सरकार के कुछ लोगों को यह ठीक लगा कि इसे प्रकाशित न किया जाए। लेकिन इसे न छापने से वॉट्सऐप पर तैरती हुई जालसाजी का भांडाफोड़ तो नहीं हो पाता, और महज एक फर्जी चिट्ठी घूमती रहती, और हर कोई तो इसे जांच-परख नहीं पाते। इसलिए सच को रोकना ठीक नहीं होता, अगर सच घर बैठे रहता है तो झूठ पूरे शहर का फेरा लगाकर आ जाता है। 

आज महज इसी बात पर हम इस जगह इस मुद्दे पर नहीं लिखते, अगर इस देश में कश्मीर में आज खबरों पर लगी हुई रोकटोक इतनी लंबी न खिंच गई होती। केन्द्र सरकार ने धारा 370 हटाने और कश्मीर को केन्द्र प्रशासित प्रदेश बनाने के फैसले की घोषणा करने के पहले ही कश्मीर में सुरक्षा बलों की इतनी बड़ी तैनाती कर दी थी, पूरे फोन और इंटरनेट बंद कर दिए गए थे, लोगों की जिंदगी थाम दी थी, और खबरों पर पूरी रोक लगा दी थी। नतीजा यह हुआ कि वहां से निकलने वाली खबरों में क्या सच है और क्या नहीं इसका खुलासा करने के लिए सरकार अपने नजरिए से सच और झूठ स्थापित करती रही। दुनिया के कुछ विश्वसनीय समाचार स्रोतों के मुकाबले किसी भी सरकार की ऐसी हालत में विश्वसनीयता बहुत कम हो जाती है जिसने कि खबरों पर रोक लगाकर रखी है। इसलिए कश्मीर को लेकर जिन लोगों की भावनाएं केन्द्र सरकार के साथ है, उन्हें वहां की किसी खबर से कोई लेना-देना भी नहीं है। वे कश्मीर के हालात को लेकर फिक्रमंद भी नहीं हैं, और कश्मीरी लोग उनके जेहन में सबसे आखिर में आने वाली चीज हैं। लेकिन कम संख्या में रहने वाले जो लोग इंसाफ की बात सोचते हैं, कश्मीरियों के बुनियादी हकों को मानते हैं, वे वहां की सही खबरों को जानने की कोशिश करते हैं तो हिन्दुस्तान के मीडिया का एक छोटा हिस्सा ही उनको नसीब होता है जो कि सरकार की कार्रवाई की स्तुति का कीर्तन करने में नहीं लगा है। देश के बाहर का कुछ मीडिया मिलता है जो कि भारत सरकार के किसी किस्म के दबाव में नहीं है, जो सच को सामने रखने की हिम्मत रखता है, और पूरी ताकत से सच को जुटाने की कोशिश भी करता है। जब देश के अधिकतर मीडिया से लोगों को सच नहीं मिल पा रहा है, कश्मीर के आज के आंखों देखे हालात नहीं मिल पा रहे हैं, तो वे सच और झूठ का फर्क नहीं कर पा रहे हैं, और दोनों किस्म की अफवाहों के बीच अपनी भावनाओं से सच तय कर रहे हैं, आगे बढ़ा रहे हैं। 

कभी भी सच को दबाने या छुपाने से किसी का भला नहीं होता। इस देश में इंदिरा के वक्त आपातकाल देखा था, और छत्तीसगढ़ के विद्याचरण शुक्ल आपातकाल के सेंसर मंत्री के रूप में इतनी बदनामी पा चुके थे कि वे राष्ट्रीय राजनीति में कभी इस खोए हुए सम्मान को वापिस नहीं पा सके, और देश-दुनिया का मीडिया उनके आखिरी वक्त तक उनके खिलाफ रहा, इतिहास में सेंसरशिप का दौर सबसे अधिक बदनाम रहा। कश्मीर को लेकर सच को सामने आने देना चाहिए, और अभी वहां के बारे में अगर सोशल मीडिया पर कुछ लोग ऐसी बात करते हैं, तो भावनाओं के सैलाब पर आसमान पहुंचे हुए लोग उनके खिलाफ गालियों का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं। भीड़ की दी हुई गालियों से सच और हकीकत नहीं बदलते। कश्मीर में जैसी हिंसा की आशंका थी, वैसी कोई हिंसा नहीं हुई है, और अब केन्द्र सरकार को खुद अपनी साख के लिए कश्मीर को देश की मूलधारा में आने देना चाहिए। इतने लंबे समय तक उसे बाकी दुनिया से काटकर रखने से नफा कम नुकसान ज्यादा हो रहा है। 
-सुनील कुमार


Date : 21-Aug-2019

छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता दिवस के अपने पहले भाषण में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ओबीसी आरक्षण को बढ़ाकर 27 फीसदी कर दिया है, और कोई भी राजनीतिक दल इसका विरोध नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि ओबीसी तबका राज्य की तकरीबन आधी आबादी है, और इसे एक संगठित समुदाय माना जाता है, राजनीतिक रूप से ताकतवर भी। लेकिन मध्यप्रदेश कुछ महीने पहले ही इस काम को कर चुका था, और वहां जो  एक मांग उठी है, उस पर छत्तीसगढ़ को भी गौर करना चाहिए। मध्यप्रदेश में ओबीसी समुदाय के भीतर भी अतिपिछड़ों के लिए एक आरक्षण की मांग की जा रही है। दूसरी मांग मध्यप्रदेश ने पहले ही पूरी कर दी है, अनारक्षित तबकों में से आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए दस फीसदी आरक्षण, जो कि केन्द्र में मोदी सरकार पहले ही कर चुकी है। इस तरह अब छत्तीसगढ़ के सामने दो सवाल खड़े हुए हैं कि ओबीसी के भीतर अत्यंत पिछड़े लोगों के लिए आरक्षण का एक हिस्सा सुरक्षित करना जिससे कि अनारक्षित तबकों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। दूसरा मामला है अनारक्षित तबकों के भीतर गरीबों के लिए दस फीसदी का, जिससे कि गैरगरीब अनारक्षित लोगों के लिए नौकरी और शैक्षणिक संस्थाओं में अवसर सीमित होंगे। 

सामाजिक न्याय के नजरिए से इन दोनों बातों के बारे में सोचना जरूरी है, और चूंकि छत्तीसगढ़ में ओबीसी आरक्षण हाल ही में 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी किया गया है, इसलिए अगर जल्द ही इसके भीतर अतिपिछड़ों के लिए एक हिस्सा सुरक्षित किया जाता है, तो उसमें संपन्न ओबीसी तबके के अलावा किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है कि किसी भी आरक्षित तबके के भीतर जब उनकी आबादी का एक हिस्सा संपन्न और सक्षम हो जाता है, तो आरक्षण के तमाम फायदों को यही मलाईदार तबका खा लेता है। ऐसा सिर्फ ओबीसी के साथ होता हो वह भी नहीं, हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से दलितों और आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों के लिए भी यह मांग करते आ रहे हैं कि क्रीमीलेयर को इसके फायदों से बाहर किया जाए। जो लोग सांसद, विधायक या मंत्री बन चुके हैं, या अखिल भारतीय सेवा के अफसर या जज बन चुके हैं, या जिनकी कमाई एक सीमा से अधिक हो चुकी है, उनके बच्चों की तैयारी के मुकाबले उन्हीं के आरक्षित तबकों के गरीब बच्चे किस तरह मुकाबला कर सकते हैं, यह साफ समझ आता है। दिक्कत यह है कि दलित और आदिवासी आरक्षण से क्रीमीलेयर हटाने का अधिकार, और उसकी जिम्मेदारी जिस मलाईदार तबके पर है, उसके अपने हित ऐसे फैसले से सबसे पहले मारे जाएंगे। इसलिए न तो संसद-विधानसभा, और न ही सरकार या अदालत में बैठे ताकतवर लोग ऐसा होने दे रहे। जिस सामाजिक न्याय की सोच के साथ दलित-आदिवासी आरक्षण शुरू किया गया था, वह आरक्षित तबके के भीतर ही एक बहुत बड़ा सामाजिक अन्याय बन चुका है, और जब तक संपन्न-सक्षण तबके को हटाया नहीं जाएगा, सचमुच ही वंचित तबका आरक्षण का फायदा नहीं पा सकेगा। 

इसी तरह छत्तीसगढ़ में बढ़ाए गए ओबीसी आरक्षण के भीतर तुरंत ही अतिपिछड़ों के लिए इस बढ़े हुए आरक्षण को पूरे का पूरा अलग कर देना चाहिए। ओबीसी को पहले की तरह आरक्षण मिलता रहे, और यह नई बढ़ोत्तरी सिर्फ अतिपिछड़ों के लिए लागू की जाए, या 27 फीसदी का एक पर्याप्त हिस्सा अतिपिछड़ों के लिए लागू किया जाए। छत्तीसगढ़ राज्य में गरीबी के सर्वे के जो आंकड़े हैं, वे बताते हैं कि पिछड़े वर्ग के भीतर भी गरीबी रेखा के नीचे की एक बड़ी आबादी है। ऐसे लोग सक्षम और संपन्न  ओबीसी नेताओं, कारोबारियों, और बड़े किसानों के बच्चों का कोई मुकाबला नहीं कर सकते। अब रहा सवाल अनारक्षित तबके के भीतर आर्थिक कमजोर लोगों के लिए अनारक्षित सीटों में से 10 फीसदी को अलग रखने का। यह इसलिए जरूरी है कि अनारक्षित तबके का भी 90 फीसदी हिस्सा ऐसा होगा जो कि आर्थिक कमजोर होगा, लेकिन जो मुकाबले की तैयारी नहीं कर पाता। ऐसे 90 फीसदी हिस्से के लिए अगर 10 फीसदी सीटों को अलग कर भी दिया जाता है, तो उससे अनारक्षित तबके के भीतर भी किसी सक्षम से बराबरी के अवसर नहीं छिनेंगे क्योंकि सामान्य सीटों में से 90 फीसदी सीटें तो इन अनारक्षित तबके के 10 फीसदी लोगों के लिए मौजूद रहेंगी ही।

आरक्षण के मुद्दे पर जब सामाजिक न्याय की बात होती है तो वह चुनिंदा मुद्दों पर नहीं की जा सकती, सामाजिक न्याय को एक व्यापक अर्थ में और व्यापक दायरे में लागू करने पर ही न्याय हो सकता है। छत्तीसगढ़ सरकार को अपनी ताजा घोषणा के साथ जोड़कर इन दो बातों को तुरंत ही लागू करना चाहिए, और संविधान के दायरे में दलित-आदिवासी तबकों में से मलाईदार तबके को फायदे से बाहर करने की एक राजनीतिक पहल करनी चाहिए, क्योंकि संसद की सहमति के बिना शायद कोई राज्य उसे अपने स्तर पर न कर सके। आज जनता के भीतर से इंसाफ के लिए लडऩे वाले जो लोग हैं, उन्हें भी किसी भी तबके के फायदों से क्रीमीलेयर को अलग करने के लिए संघर्ष करना चाहिए ताकि सामाजिक न्याय सचमुच ही अन्याय के शिकार लोगों तक पहुंच सके। 
-सुनील कुमार


Date : 20-Aug-2019

-सुनील कुमार
सन् 2000 में जब छत्तीसगढ़ बना तो तीन बरस के लिए राज्य और सरकार चलाने का मौका उस वक्त के एक गैरविधायक सोनियापसंद अजीत जोगी को मिला, और उसी दौरान छत्तीसगढ़ की नई राजधानी की जगह छांटी गई, और उसकी बुनियाद रखी गई। सोनिया गांधी के हाथों रखी गई विशाल शिला इन दिनों एक विवाद की वजह भी बन गई है कि उसका रखरखाव ठीक नहीं हुआ, और वह जगह आईआईएम को दे दी गई, इसलिए एक सीनियर अफसर को अभी निलंबित भी कर दिया गया है। लेकिन वह आज की चर्चा का मुद्दा नहीं है। आज इस पर बात करने का मौका है कि जोगी सरकार के दौरान रखी गई बुनियाद पर रमन सिंह सरकार ने ऐसी राजधानी क्यों सोची और क्यों बनाई जो कि उसके कार्यकाल में किसी तर्कसंगत किनारे नहीं लग पाई? और यह कार्यकाल पांच बरस का एक निर्धारित कार्यकाल नहीं था, यह पांच के बाद अगले पांच बरस का, और उसके बाद पांच बरस के एक तीसरे कार्यकाल वाला डेढ़ दशक का कार्यकाल था जिसमें भी राजधानी न तो अपने पांवों पर खड़ी हो सकी, और न ही जिसका कोई भविष्य ही आज रह गया दिखता है। इससे परे एक दूसरी दिक्कत यह भी है कि सैकड़ों बरस पुरानी राजधानी रायपुर के साथ सरकार-निर्मित नई राजधानी का कोई रिश्ता अब तक कायम नहीं हो पाया। इसके लिए पिछली सरकार के दूसरे कार्यकाल में नया रायपुर के प्रशासनिक मुखिया, और भूतपूर्व मुख्य सचिव जॉय ओमेन ने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला भी की थी जिसमें दर्जन भर देशों के विशेषज्ञों ने आकर नए और पुराने शहर के बीच तालमेल की कई किस्म की योजनाएं बनाई थीं, और आज भी यह जाहिर है कि किसी किस्म की सोच या योजना इन शहरों को जोड़ नहीं पाई। पन्द्रह बरसों की कसरत के बाद भी नया रायपुर जाना पुराने रायपुर के लोगों के लिए एक बदमजा काम रहता है क्योंकि शहर से पच्चीस किलोमीटर दूर बसाए गए मंत्रालय तक पहुंचने के पचास मिनट हर किसी पर भारी पड़ते हैं, और लोग इस योजना के इस पहलू के पीछे के दिमाग पर तरस खाते हुए, उसे कोसते हुए आते-जाते हैं। लेकिन इससे परे भी एक बात है कि भरी दोपहर में भी इस सफर का अधिकतर हिस्सा ऐसे मरघटी सन्नाटे वाले रास्ते से तय होता है जिसके बारे में छत्तीसगढ़ी में कहा जाता है कि मरे रोवइया न मिले। फिर यह भी है कि हजारों एकड़ का यह ढांचा और उसकी सैकड़ों किलोमीटर सड़कें, दुगुने फुटपाथ उसी जनता के पैसों से बनाए गए जिस जनता की रोज दो वक्त खाने की औकात तभी हो पाई थी जब उसे एक रुपये किलो चावल मिलने लगा था। ऐसी गरीब जनता के पैसों से एक राज्य में निहायत गैरजरूरी ऐसा ढांचा एक विश्व रिकॉर्ड बनाने की नीयत से खड़ा किया गया जो कि महज नेता-अफसर-ठेकेदार का सपना होता है। यह बात इस संपादक ने रमन सरकार के दूसरे कार्यकाल में हुए इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन के जूरी की हैसियत से उस वक्त भी अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के बीच काफी खुलासे से रखी थी, और विकराल खर्च पर आपत्ति जाहिर की थी। इसे एक बिछा हुआ ताजमहल बताते हुए यह शक जाहिर किया था कि निकट भविष्य में इसके बसने के आसार नहीं रहेंगे। और आज उस बात के कई बरस बाद भी वही नौबत बनी हुई है।

आज इस पर चर्चा की जरूरत इसलिए है कि राज्य की नई कांगे्रस सरकार यह समझ नहीं पा रही है कि इस विकराल राजधानी का क्या करे? कैसे इसे बसाए, कैसे इसका रखरखाव करे, कहां से इसके लिए पैसे लाए, और इसकी किस-किस गड़बड़ी की जांच करे। यह नौबत कुछ उस किस्म की है कि पांच बरस के लिए किराए पर लिया गया मकान छोड़कर जाते हुए किराएदार अगले किराएदार के लिए तीन बरस का एक कुत्ता छोड़ जाए जिसे पालन भी मुश्किल हो, जिसका रखरखाव भी मुश्किल हो। किसी भी सरकार को अपने कार्यकाल से इतने अधिक लंबे समय तक चलने वाली विकराल योजना को कभी भी पूरे का पूरा शुरू नहीं करना चाहिए। और छत्तीसगढ़ में तो रमन सरकार को तीन-तीन कार्यकाल मिले, जिसके बाद आज तक अगर नया रायपुर एक महंगी पहेली बना हुआ खड़ा है, तो इस योजना की ऐसी विकरालता शुरू से ही सही नहीं थी।

आज इस बात को लिखने का मौका इसलिए भी है क्योंकि आंध्रप्रदेश में पिछले मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू ने अमरावती नाम की जगह पर जो नई राजधानी बनाना शुरू किया था, वह चंद्राबाबू की सरकार के डूबते ही बिना पानी डूब गई है। नए मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी विपक्ष में रहते हुए भी इस राजधानी के सख्त खिलाफ थे, और नई सरकार आते ही विश्व बैंक ने इस राजधानी के लिए मंजूर कर्ज देने से हाथ खींच लिया है, और एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक भी पीछे हट गया है। चंद्राबाबू के सपनों का यह उपग्रह आंध्र की छाती पर धूमकेतु की तरह आकर गिरा है। इन खबरों को देखते हुए लगता है कि पांच बरस के अपने कार्यकाल में चंद्राबाबू ने धरती की एक सबसे बड़ी राजधानी बनाने का जो महंगा सपना पाला था, उसका हक किसी एक सरकार को नहीं हो सकता। सरकारों को पांच बरस के ही सपने देखने चाहिए, तब तक जब तक कि वे किसी बांध, पुल, सड़क, बिजलीघर जैसे बुनियादी ढांचे के काम न हों। और राजधानियों जैसे सपने तो किसी सरकार को कागज पर चाहे देखना जायज हो, जमीन पर उसके उतने ही हिस्से को उतारना चाहिए जिसे कि अगली सरकार पाल सके, बढ़ा सके, या रोक भी सके। छत्तीसगढ़ का नया रायपुर इस बात की एक उम्दा मिसाल है कि किसी सरकार को कैसी-कैसी दीर्घकालीन योजना क्यों नहीं बनानी चाहिए, या कागजों पर बन भी जाए, तो भी उस पर जनता के पैसे खर्च करके ऐसा अमल नहीं करना चाहिए कि जिसे बाद में मिटाया भी न जा सके। छत्तीसगढ़ के इस नया रायपुर के और भी कई पहलुओं पर लिखने को बहुत कुछ है, और ताजा इतिहास के दस्तावेजीकरण के लिए वैसा लिखना जरूरी भी है, लेकिन इस कॉलम की सीमा इतनी ही है, और बाकी बातें फिर कभी।
 


Date : 19-Aug-2019

भारत के ऑटोमोबाइल उद्योग को लेकर रोज दिल दहलाने वाली खबरें आ रही हैं कि किस कंपनी ने अपने कितने कारखानों को कितने हफ्तों या महीनों के लिए बंद कर दिया, कौन सी ऑटो कंपनी कितने हजार कर्मचारियों की छंटनी कर रही है, और देश में पिछले तीन या छह महीनों में कितने हजार ऑटोमोबाइल डीलरशिप बंद हो चुकी हैं। हालत यह है कि आज कारखानों और डीलरों के अहातों में इक_ा दुपहिया-चौपहिया बिकने में अगले कई महीने लग जाएंगे, और ग्राहकी बढऩे के कोई आसार दिख नहीं रहे हैं। जाहिर है कि देश की अर्थव्यवस्था में मंदी का हाल यह है कि चड्डी-बनियान तक बिकना घट गया है, और इसकी खबरें दुनिया के एक मान्य सिद्धांत को भी बताती हैं कि जब पुरूषों के चड्डी-बनियान बिकना कम हो जाएं, तो वह अर्थव्यवस्था की बदहाली का सुबूत होता है। अब जब सावन खत्म हो चुका है, कांवड़ यात्रा निपट चुकी है, अमरनाथ यात्रा का वक्त भी खत्म हो गया है, कश्मीर बाकी देश का हिस्सा बना दिया गया है, देश की आबादी को काबू में करने का नया फतवा जारी हो गया है, और मानो उस फतवे के खिलाफ उसी खेमे के एक दूसरे वजनदार व्यक्ति ने हिन्दुओं को अपनी आबादी बढ़ाने का फतवा भी दे दिया है, तब देश की सब समस्याओं को खत्म मानते हुए, अर्थव्यवस्था पर भी थोड़ी सी चर्चा कर लेनी चाहिए। 

आज देश में जिस तरह फोन और इंटरनेट बाजार का एक बड़ा हिस्सा अंबानी के हाथ आ चुका है, और बाकी टेलीफोन कंपनियां एक-एक कर बिकती जा रही हैं। साल के आखिरी में देश की अर्थव्यवस्था के सरकारी आंकड़े दूरसंचार क्षेत्र की कमाई को बढ़ा हुआ जरूर बता देंगे, लेकिन उसमें कंपनियां घट चुकी रहेंगी, और एक अंबानी के हिस्से कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा रहेगा। देश का सकल राष्ट्रीय उत्पादन या जीडीपी एक धोखा खड़ा करने वाला आंकड़ा रहता है क्योंकि वह एक अंबानी, एक अदानी, और मनरेगा मजदूरों सबकी कमाई को मिलाकर उसका औसत निकालकर देश की औसत आय बता देता है, और उसकी कुल आय को वह सकल राष्ट्रीय उत्पादन बता देता है। इसलिए ये आंकड़े सफेद झूठ के और ऊपरी दर्जे का झूठ होते हैं, इनका कोई मतलब नहीं होता। लेकिन आज निजी गाडिय़ों की बिक्री का जो भट्टा बैठा हुआ है, उस बीच कुछ सोचने की भी जरूरत है। 

कहा जाता है कि जब बादल बहुत घने और काले रहते हैं, तो उन्हीं के किनारे से कहीं एक चमकीली लकीर उभरती है। ऐसी ही सिल्वर लाईनिंग आज ऑटोमोबाइल इस्तेमाल में हो सकती है। जब लोगों की औकात निजी गाडिय़ां खरीदने की रह नहीं गई हैं, तब सरकार और समाज दोनों के सामने यह मौका है कि सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा दिया जाए। शहरों में आवाजाही के लिए छोटी और बड़ी बसों का, मेट्रो या किसी और किस्म की ट्रेन का ऐसा ढांचा खड़ा किया जाए जो कि निजी गाडिय़ों की जरूरत को ही घटा दे। इससे यह हो सकता है कि कारों और दुपहियों का कारोबार घट जाए, लेकिन दुनिया में कई कारोबार घटते हैं, और कई कारोबार बढ़ते हैं। ऐसे ही लोगों के रोजगार भी एक जगह से हटकर दूसरी जगह चले जाते हैं। जब एटीएम शुरू हुए थे तो लोगों को लगता था कि बैंकों में कैशियरों की लाखों कुर्सियां छिन जाएंगी, लेकिन कोई नौकरी गई नहीं, और हर एटीएम के पीछे एक या दो चौकीदार लगने लगे। ऐसा ही हाल कार बनाने वाली कंपनियों का हो सकता है कि उनकी बढ़ोत्तरी रूक जाए, लेकिन बसें बनाने वाली कंपनियों का कारोबार खूब बढ़ सकता है, मेट्रो बनाने वाली निर्माण कंपनियों का काम खूब बढ़ सकता है। 

दरअसल ऑटोमोबाइल क्षेत्र की दिक्कत तो एक दिक्कत है, बड़ी दिक्कत दुनिया के शहरों में क्षमता की है कि वहां की सड़कें, वहां की पार्किंग कितनी गाडिय़ों को ढो सकती हैं। दुनिया को गाडिय़ों के बोझ और उनके जहर से बचाने के लिए यह जरूरी है कि लोगों की अपनी निजी गाडिय़ों पर निर्भरता घटाई जाए, और उनके सामने एक सस्ता, आसान, और सहूलियत का सार्वजनिक विकल्प उपलब्ध कराया जाए। भारत में सरकारें बहुत रफ्तार से ऐसा नहीं सोचती हैं, और अभी भी निजी गाडिय़ों को ही बैटरी से चलने वाली बनाने पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन इस बात को समझना चाहिए कि निजी गाडिय़ां लोगों के निजी घर में नहीं चलतीं, उनके लिए शहरीकरण की योजना और उसके ढांचे की जरूरत पड़ती है। इसलिए निजी वाहनों को निजी उपयोग की सुविधा के बजाय शहरों पर बोझ मानकर उस हिसाब से शहरी यातायात की एक नई योजना बनाना चाहिए जिसमें निजी गाडिय़ों को घटाना एक बड़ा मुद्दा हो। निजी गाडिय़ों की खपत घटने की फिक्र को मौका मानकर उसका इस्तेमाल करते हुए शहरी सार्वजनिक परिवहन की तरफ तेजी से जाना चाहिए।
-सुनील कुमार


Date : 18-Aug-2019

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में लोगों को मुफ्त में हेलमेट दे रही है। उसे ये हेलमेट अलग-अलग सामाजिक या कारोबारी संगठनों की तरफ से मिल रहे हैं, और वह कार्यक्रम करके इन्हें लोगों में बांट रही है। आज आम लोगों की एक मोटरसाइकिल भी औसतन 50 हजार रूपए की है। राजधानी एक महंगा और संपन्न शहर होने से यहां दसियों हजार मोटरसाइकिलें लाख रूपए से ऊपर की भी हैं। एक संपन्न शहर के संपन्न लोगों को उनकी खुद की हिफाजत के लिए जागरूक करने के लिए पुलिस और समाज मिलकर खर्च कर रहे हैं, जो कि एक बेतुकी मशक्कत है। कुछ सौ रूपए के ऐसे हेलमेट की मदद उन गरीबों के लिए तो ठीक है जो इसे खरीद नहीं सकते। लेकिन जिनके पास चलाने के लिए स्कूटर या मोटरसाइकिल है, उनके पास हेलमेट के लिए ही पैसे न होने का क्या तर्क है?जो लोग अपनी खुद की जिंदगी के लिए ऐसे लापरवाह हैं, उन्हें मुफ्त में हेलमेट देना पुलिस या संगठनों के पैसों की बर्बादी के सिवाय कुछ नहीं है। इस किस्म से जुटाया गया पैसा या सामान बेबस और गरीब लोगों की मदद में ही इस्तेमाल करना चाहिए, बेशर्म और लापरवाह लोगों की मदद में नहीं।

दरअसल दुपहिया पर चलने वालों के लिए हेलमेट उनकी अपनी हिफाजत का सामान है। लोग महंगी गाडिय़ां खरीद लेते हैं, महंगा पेट्रोल खरीदते हैं, गाड़ी का बीमा भी करवाते हैं, लेकिन अपनी खोपड़ी को टूटने से बचाने के लिए हेलमेट नाम का बीमा करवाने की फिक्र अगर उन्हें नहीं है, तो उन्हें कोई तोहफा देने के बजाय उन पर जुर्माना लगाना चाहिए। कोई बिना हेलमेट दुपहिया चलाए तो उससे सड़क पर बाकी लोगों की जिंदगी खतरे में नहीं पड़ती। इसलिए जिन्हें मरने का शौक है, उन्हें मौत के पहले जुर्माने से भला क्यों परहेज होना चाहिए? 

दरअसल हिन्दुस्तान में कई बातों को समाजसेवा मान लिया जाता है। किसी परिवार के मरीज अस्पताल में रहें, और परिवार के दस हट्टे-कट्टे रिश्तेदार अस्पताल में खड़े रहें, लेकिन खून की जरूरत पडऩे पर बाहर का दानदाता ढूंढें, तो वह दान नहीं है, वह लोगों की गैरजिम्मेदारी को बढ़ाने की एक सामाजिक गैरजिम्मेदारी है। उस परिवार के लोगों को खुद खून देने की अक्ल देना खून देने से बेहतर है। इसी तरह शहरी सड़कों पर हर बरस कम से कम दर्जन-दो दर्जन बार तरह-तरह के धार्मिक मौकों पर भंडारे लगते हैं। किसी पूजापाठ के बाद आस्थावान धर्मालु लोग सड़क किनारे पंडाल लगाकर दोना-पत्तल का इंतजाम करके लोगों को तरह-तरह का खाना खिलाते हैं। वहां से निकलते हुए खाते-पीते घरों के लोग भी स्कूटर-मोटरसाइकिल रोक-रोककर जमकर खाने लगते हैं, और खिलाने वालों को लगता है कि वे गरीब और भूखों को खिला रहे हैं। शहरों में दुपहियों पर घूमने वाले मेहनतकश हो सकते हैं, गरीब हो सकते हैं, लेकिन भूखे तो बिल्कुल ही नहीं हो सकते। इसलिए खाते-पीते लोगों को खिलाने से न तो किसी धर्म का भला होता है, और न ही मुफ्तखोरी के आदी हो चुके हिन्दुस्तानियों का इससे कुछ भला होता है। 

रायपुर पुलिस को खुद यह लग सकता है कि वह हेलमेट बांटकर लोगों की जिंदगी बचाने का काम कर रही है। लेकिन यह एक बहुत ही गैरजरूरी, महंगा, और बेतुका काम है। जिन लोगों की ताकत एक हेलमेट के दाम से अधिक जुर्माना पटाने की है, उन्हें भला कोई सामान मुफ्त में क्यों दिया जाए? मुफ्त में देना ही है तो साइकिलों पर रात-बिरात चलने वालों की साइकिलों पर रिफलेक्टर टेप लगाने जैसा कोई सस्ता और जरूरी काम किया जाए, किसी बहुत ही गरीब और असहाय के हित में कोई काम किया जाए, शारीरिक अक्षम गरीबों के तिपहियों के लिए कुछ किया जाए। जिस तरह राह चलते गैरगरीबों पर सरकार या समाज का पैसा बर्बाद किया जा रहा है, वह अब तक लापरवाह और गैरजिम्मेदार चले आ रहे लोगों को मुफ्तखोर भी बना देने का काम है, जिसकी कोई तारीफ नहीं की जा सकती। इन लोगों पर मोटा जुर्माना लगाकर उन्हें यह एहसास कराने की जरूरत है कि एक हेलमेट पर खर्च, और उसका इस्तेमाल करके वे रोजाना के जुर्माने से बच सकते हैं, और सिर बचाने में उनकी दिलचस्पी हो तो बचाएं, वरना उनके सिर के बारे में उनका परिवार सोचे। पुलिस को तो कानून को लागू करने की फिक्र करनी चाहिए, हेलमेट का ऐसा भंडारा किसी का भी भला नहीं कर रहा है। 
-सुनील कुमार


Date : 17-Aug-2019

छत्तीसगढ़ की रायपुर पुलिस के तीन सिपाहियों का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे एक छोटे से नाबालिग बच्चे को मिलकर पीट रहे हैं, और पीटते हुए उसका मजा भी ले रहे हैं। रेलवे पटरी के पास की इस हिंसा को ट्रेन में बैठे एक मुसाफिर ने कैमरे में कैद किया, और रेलवे के बोर्ड सहित वीडियो को सोशल मीडिया पर डाल दिया। नतीजा यह हुआ कि पुलिस को आनन-फानन इन सिपाहियों को निलंबित करना पड़ा। यह एक अलग बात है कि उन्हें राजधानी में ही लाईन अटैच किया गया है, और यहां रहते हुए उन्हें इस बात की पूरी सहूलियत रहेगी कि वे इस गरीब बच्चे के परिवार पर, उस बच्चे पर दबाव बना सकें। अब पुलिस की तरफ से यह कहानी पेश की जा रही है कि यह बच्चा जेब काटते पकड़ाया था, और पुलिस उससे पूछताछ कर रही थी। अगर कोई बच्चा जुर्म करते मिलता भी है, तो उसे किसी सुनसान इलाके में ले जाकर खुले में पीटकर कोई पूछताछ करने की इजाजत कौन सा कानून देता है? इन तीनों सिपाहियों की बर्खास्तगी से कम कुछ भी नहीं होना चाहिए क्योंकि जिनकी सोच ऐसी है, वे मौका मिलते ही फिर ऐसी दूसरी हरकत करेंगे। 

इसी शहर में रेलवे स्टेशन पर पुलिस की कई किस्म की कहानियां हाल के दशकों की दर्ज हैं। रेलवे पुलिस नाम की रेलवे की रहती है, उसमें तैनाती राज्य की पुलिस की होती है। इस राज्य में एक आईपीएस अफसर रमेश शर्मा की जब रायपुर रेलवे पुलिस में एसपी की तैनाती थी, उन्होंने प्लेटफॉर्म पर घूमने वाले बेघर और बेसहारा बच्चों के लिए एक स्कूल शुरू किया था जहां पुलिस उन बच्चों को पढ़ाती थी। जब तक वे रहे, तब तक स्कूल चलते रहा, बच्चों से धीरे-धीरे नशे की आदत भी छुड़वाने की कोशिश की गई, रमेश शर्मा ने कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी जोड़ा और इन बच्चों की जिंदगी बेहतर बनाने की कोशिश की। लेकिन जैसा कि किसी भी सरकारी नौकरी में होता है, एक वक्त के बाद उनका तबादला हो गया, और बाद में आए अफसर और उसके मातहत लोगों ने इन बच्चों के साथ वही सुलूक फिर शुरू कर दिया जो कि रमेश शर्मा के आने के पहले तक चलता था। स्टेशन के इलाके में मुजरिमों का एक बड़ा गिरोह चलाने वाली एक कुख्यात सरगना महिला स्टेशन पर पलने वाले बच्चों से जुर्म करवाती थी, और उस कमाई को गिरोह और पुलिस दोनों खाते थे। स्कूल बंद हो गई, और बच्चों को चेतावनी दे दी गई कि या तो वे गिरोह में काम करें, या फिर उन्हें किसी भी मामले में पकड़कर अदालत में पेश कर दिया जाएगा, और सुधारगृह भेज दिया जाएगा। पुलिस ने एक संगठित और पेशेवर मुजरिम गिरोह की तरह बच्चों को पूरी तरह मुजरिम बनाने का काम इतनी खूबी से किया कि स्टेशन के बेघर बच्चे उसके लिए मजबूर कर दिए गए। 

यह बात सुनने में एक फिल्मी कहानी लगती है, लेकिन यह हमारी देखी हुई हकीकत है, और इस बात को लिखने वाले संपादक ने ऐसे दर्जनों बच्चों से रूबरू बात की थी, और इन बच्चों को बचाने में लगे हुए एक सामाजिक संगठन के समर्पित कार्यकर्ताओं से भी पुलिस का यह जुर्म समझा था। अपने खुद के इस तजुर्बे के आधार पर हम यह बात लिख सकते हैं कि इस देश में बेघर और बेसहारा बच्चों को पेशेवर मुजरिम बनाने में, उन्हें सेक्स के धंधे में धकेलने में पुलिस का बड़ा हाथ रहता है। इसलिए अभी जो हिंसा का वीडियो सामने आया है उसे महज एक घटना मानकर नहीं चलना चाहिए, बल्कि उसे एक संकेत मानकर पुलिस की पूरी बीमारी का इलाज करना चाहिए। अपने बारे में ऐसी बातें मानना पुलिस के किसी अफसर को अच्छा भी नहीं लगता, अगर ऐसा वीडियो सुबूत के तौर पर लोगों के बीच तैर नहीं गया होता। इसके बाद अगर पुलिस खुद कार्रवाई नहीं करती, तो कोई अदालत कार्रवाई करती और वह महज सिपाहियों तक सीमित नहीं रहती। पुलिस को अपने आपको एक संगठित अपराधी गिरोह बनने से बचाना चाहिए, क्योंकि ऐसा गिरोह महज मुजरिमों के गिरोह के मुकाबले समाज के लिए कई गुना अधिक खतरनाक होगा। आज छत्तीसगढ़ में पुलिस जगह-जगह तरह-तरह के संगठित अपराध, अपराधी कारोबार बढ़ाने के लिए पेशेवर लोगों पर दबाव बनाते दिखती है ताकि सभी का फायदा हो सके। यह सिलसिला तुरंत थामने की जरूरत है। 
-सुनील कुमार


Date : 16-Aug-2019

अपने पहले स्वतंत्रता दिवस भाषण में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक नए जिले, और 25 नई तहसीलें बनाने की घोषणा की है। इसके साथ ही उन्होंने एसटी, एससी, और ओबीसी के आरक्षण के नए पैमानों की घोषणा भी की है। जिन लोगों को सरकारी नौकरियों, और स्कूल-कॉलेज के दाखिले में आरक्षण का लाभ पाने की जरूरत होती है, वे इसके महत्व को अधिक समझ सकते हैं। इसके साथ-साथ नई तहसीलों से लोगों की जिंदगी में क्या फर्क पड़ सकता है इसे भी वे लोग जान सकते हैं जो अपने गांव-कस्बे से दूर की तहसील पर अब तक जाते रहे हैं, उन्हें तहसील पास आने से दिक्कतों में बड़ी कमी आना तय है। यह एक अलग बात है कि आज प्रदेश की तहसीलों में आम जनता के कामकाज में पिछली सरकार के समय से चले आ रहा ढर्रा जारी है, और उसे सुधारे बिना महज तहसीलें बना देने से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन किसी जलसे की घोषणाओं में सेवाओं में बेहतरी को नहीं गिनाया जाता, सिर्फ नई बातों को, नई मंजूरी और नए निर्माण को गिनाया जाता है, इस हिसाब से 15 अगस्त का मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का यह भाषण इंसानों और पालतू, बेसहारा पशुओं के लिए कई किस्म की नई मदद लेकर आया है, और इस पर अमल पर मेहनत अगर होगी, तो प्रदेश के दसियों लाख लोगों की जिंदगी पर एक बड़ा असर पड़ सकता है। 

कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के पहले से अपना ग्रामीण और खेतिहर रूझान चुनाव प्रचार के दौरान ही खुलकर सामने रख दिया था, और सत्ता में आने के बाद रफ्तार से कर्जमाफी की गई, धान के दाम को बढ़ाया गया, और धान बोनस दिया गया। इन तीनों बातों से प्रदेश की आधी आबादी पर सीधा असर पड़ा, और प्रदेश की अर्थव्यवस्था का पहिया इससे उस वक्त भी घूमते रहा जब पूरे देश में ऑटोमोबाइल के पहिये थम से गए थे। बाजार का एक अंदाज बताता है कि जब पूरे देश में गाडिय़ों की बिक्री एक चौथाई घट गई थी, तब भी छत्तीसगढ़ में उस मंदी का असर नहीं पड़ा क्योंकि यहां किसान और आम लोगों के हाथ में सरकार से ताजा-ताजा मिला हुआ फायदा था, और पिछले महीनों में छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था बाकी देश की मंदी के मुकाबले कम प्रभावित रही। मुख्यमंत्री ने पिछले महीनों में राज्य सरकार की कई घोषणाओं पर अमल का ठोस ढांचा इस भाषण में गिनाया है, और राशन के पैमानों को शिथिल करते हुए अधिक चावल देने के साथ-साथ कुछ और चीजें भी कुछ इलाकों को देना शुरू किया है। 

आज जब छत्तीसगढ़ में विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनाव निपट गए हैं, तो सरकार इन बड़े चुनावों के दबाव से तो मुक्त है, लेकिन अभी नगरीय संस्थाओं और पंचायतों के चुनाव सामने हैं। ऐसे में महज यह जरूरी नहीं है कि विधानसभा की चुनावी घोषणाओं को लागू किया जाए, बल्कि यह भी जरूरी है कि नई नीतियों और कार्यक्रमों पर अमल को असरदार बनाया जाए। सरकार के बहुत से विभाग पिछले लंबे समय से एक अलग रफ्तार से काम करते आ रहे थे, और गले-गले भ्रष्टाचार में भी डूबे हुए थे। ऐसी हालत में मुख्यमंत्री ने यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम की घोषणा तो कर दी है, लेकिन सरकारी स्वास्थ्य सेवा के ढांचे का जो हाल है, उसे देखते हुए इस बात में गहरा संदेह खड़ा है कि क्या यह घोषणा पूरी हो पाएगी? कांग्रेस सरकार को सत्ता में आए कई महीने हो गए हैं, लेकिन सरकारी इलाज का हाल अभी मानो रमन सरकार के मातहत ही चल रहा है। 

मुख्यमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर यह गिनाया है कि स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए दो दशक बाद 15 हजार नियमित शिक्षकों की भर्ती की जा रही है। सरकार को यह भी ध्यान रखना होगा कि सरकारी नौकरियों में नियुक्ति का मामला कई राज्यों में उनके सबसे बड़े भ्रष्टाचार की वजह रहा है। छत्तीसगढ़ में ईमानदारी और पारदर्शिता से ये नियुक्तियां होनी चाहिए, और न सिर्फ शिक्षकों की नियुक्ति में, बल्कि सरकार की तमाम नौकरियों में राज्य सरकार को लोगों को समान अवसर देने की फिक्र करनी चाहिए, और चयन में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू से निगरानी भी रखनी चाहिए। इसी भाषण में मुख्यमंत्री ने प्रदेश में कुपोषण के शिकार बच्चों, और एनीमिया की शिकार माताओं का जिक्र किया है जिनके लिए पोषण आहार देने की शुरुआत की जा रही है, और यह शुरुआत गांधी जयंती से बढ़कर पूरे प्रदेश में लागू हो जाएगी। मुख्यमंत्री की और भी घोषणाएं हैं जो कि सरकार का एक ग्रामीण नजरिया सामने रखती हैं, लेकिन इन पर अमल खासा मुश्किल हो जाता है, और उस मोर्चे पर अधिक मेहनत करने की जरूरत है। आज सरकार का नजरिया किसान, ग्रामीण, गरीब, मजदूर, दलित-आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, कुपोषित मां-बच्चों के लिए हमदर्दी का दिख रहा है और चुनावी घोषणापत्र के वक्त से चले आ रहे इसी नजरिये ने राज्य में कांग्रेस को इतने बहुमत से आने में मदद की थी। अब यह नजरिया ठोस योजनाओं की शक्ल में सामने आ गया है, और इस पर अमल की कामयाबी या नाकामयाबी नगरीय-पंचायत चुनावों में नतीजों की शक्ल में साबित होगी। इसलिए राज्य सरकार को खासी मेहनत करने की जरूरत है। 
-सुनील कुमार


Date : 14-Aug-2019

आजादी की सालगिरह जैसे जो मौके साल में एक बार आते हैं, वे कई विरोधाभासों को याद दिला जाते हैं। प्रेस की आजादी की सालगिरह आती है, तो याद दिलाती है कि प्रेस किस-किस तरह आजाद नहीं है। संविधान की सालगिरह आती है तो याद पड़ता है कि संविधान को किस-किस तरह कुचला जा रहा है, किस-किस तरह उसे अनदेखा किया जा रहा है। इसी तरह आजादी की सालगिरह बताती है कि किन-किन चीजों में देश और इसके लोग आजाद नहीं हुए हैं। किस-किस चीज से आजादी मिलना बाकी है, या मिलना चाहिए, या मिली हुई आजादी खो चुकी है। ऐसी ही तमाम बातों के बीच हिन्दुस्तान की सालगिरह एक बार फिर आकर खड़ी हो गई है, और आज की सुबह-सुबह छत्तीसगढ़ की पुलिस के तीन सिपाही मिलकर एक छोटे से बच्चे को पीटते हुए नजर आ रहे हैं, और ऐसे वीडियो याद दिलाते हैं कि हिन्दुस्तानी पुलिस का किस तरह अंग्रेज सोच से आजाद होना अभी बाकी ही है। उसे अंग्रेजों ने गुलाम हिन्दुस्तानियों पर काबू और जुल्म करने के हिसाब से ढाला था, और आजाद हिन्दुस्तान ने इस सांचे को तोडऩे की कोशिश कभी इसलिए नहीं की कि सत्तारूढ़ लोगों को ऐसी जुल्मी पुलिस माकूल बैठती है, सुहाती है, उनके बड़े काम आती है। 
लेकिन कुछ दूसरे मुद्दों को देखें तो लगता है कि आज देश में हो रही बेइंसाफी, कमजोरों पर जुल्म देखते हुए सत्ता की जो चुप्पी जारी है, क्या उस चुप्पी से आजादी एकदम ही जरूरी नहीं है? एक तरफ तो यह चुप्पी अपने आपमें जब सत्ता की होती है, तो वह एक जुल्म की शक्ल में इतिहास में दर्ज होते चलती है। और दूसरी ओर इस चुप्पी को अनदेखा और अनसुना करने के लिए सत्ता कई किस्म के नाटक करती है जो कि आज देश में देखने मिल रहे हैं। देश के असल मुद्दों की अनदेखी की आजादी तो ताकतवर तबकों को मिल गई है, लेकिन कातिल चुप्पी से आजादी के कोई आसार नहीं है। देश के असल मुद्दे कहीं सिर न उठाने लगें, इसलिए एक के बाद दूसरी लुभावनी, भावनात्मक और भड़काऊ बातों का सैलाब समंदर के नमकीन पानी की लहर सरीखा लगातार जारी रखा जाता है ताकि नमकीन पानी से भरी आंखें कहीं असल मुद्दे देख न ले। लोगों के दिल-दिमाग लगातार एक ऐसे कीर्तन से घेरकर रखे जा रहे हैं कि समझदारी की कोई बात उन तक पहुंच न जाए, कोई सच, वैज्ञानिक सोच, न्यायसंगत आवाज पहुंच न जाए। 

यह एक ताजा गुलामी है, जो कि आजादी के पूरे हासिल पर छा चुकी है। सोच की यह गुलामी, विचारों की यह तंगदिली, तर्कशक्ति का यह तंगनजरिया एक राष्ट्रीय गौरव बनाकर पेश किया जा रहा है, और लोग इस हड़बड़ी में उसे निगले जा रहे हैं कि कहीं वे देश के गद्दार न करार दे दिए जाएं। देश की आम सोच को भावनात्मक उत्तेजना का गुलाम बनाकर इंसाफ की आजादी खत्म की जा रही है, और देश का बहुमत मानो इसी का जश्न मना रहा है। लोकतंत्र को महज एक जनमतसंग्रह बनाकर रख दिया गया है, और बहुमत को इंसाफ का विकल्प मान लिया गया है। अगर भारत के पुराने किस्से-कहानियों की जुबान में कहें तो आज कौरवों को यह हक हासिल है कि वे गिनती के गिने-चुने पांडवों की भीड़-हत्या कर दें, और वह जायज भी कहलाए। लोकतंत्र बहुमततंत्र में बदलने के बाद अब भीड़तंत्र की शक्ल में अपने सबसे हिंसक रूप के साथ हिन्दुस्तानियों के भीतर की हजारों बरस पहले की हिंसानियत के डीएनए सैकड़ों पीढ़ी बाद फिर हासिल कर रहा है, और इसके लिए राष्ट्रप्रेम के तमाम प्रतीकों का इस्तेमाल करके ऐसी हिंसानियत को देशभक्ति, देशप्रेम की ढाल भी मुहैय्या कराई जा रही है। 

आजादी की सालगिरह यह सोचने पर मजबूर करती है कि करीब एक सदी के संघर्ष से हासिल आजादी इस पौन सदी में ही कहां पहुंच गई है? लेकिन जिस तरह आधुनिक पर्यटन केन्द्रों में मशीनों से पानी में लहरें पैदा की जाती हैं, अधिक हिन्दुस्तानी दिमाग न्याय और तर्क की बातें सोचें, उसके पहले और कोई राष्ट्रवादी लहर आकर उनकी आंखों में नमकीन पानी भर देगी।
-सुनील कुमार


Date : 13-Aug-2019

क्रिकेट की दुनिया से एक खबर है कि बॉल में अब एक माइक्रोचिप लगने जा रहा है जिससे बॉलिंग की हर किस्म की जानकारी कम्प्यूटर पर दर्ज होते रहेगी। अंपायरों को भी फैसले लेने में इससे मदद मिलेगी। अभी वैसे भी क्रिकेट के बल्ले और विकेट में सेंसर लगा हुआ है, विकेट में तो कैमरा और माइक्रोफोन भी लगा हुआ है, और हाल ही में निपटे विश्वकप में यह देखने मिला कि अंपायरों के कई फैसलों को कम्प्यूटरों और कैमरों ने आनन-फानन गलत भी साबित कर दिया। एक वक्त अंपायर की ऊंगली आसमान की तरफ ठीक उसी तरह उठती थी जिस तरह फांसी देने वाले जल्लाद को इशारा करने के लिए जेलर की ऊंगली उठती थी, अब धीरे-धीरे हो सकता है कि अंपायर मैदान से गायब ही हो जाए।

दुनिया के दूसरे कई दायरों में अगर देखें, तो अब मीडिया के न्यूज रूम में खबरों को बनाने का काम करने वाले कम्प्यूटर-प्रोग्राम आ गए हैं जो कि तथ्यों को लेकर समाचार ड्राफ्ट कर देते हैं। धीरे-धीरे कैमरापरसन की जरूरत कम होते चल रही है क्योंकि लोग मोबाइल कैमरों से भी रिकॉर्डिंग करने लगे हैं। टीवी चैनलों की जरूरत कम हो चली है क्योंकि लोग खुद ही अपने यू-ट्यूब चैनल बनाकर उस पर आनन-फानन पोस्ट कर देते हैं, या फेसबुक और ट्विटर पर लाईव प्रसारण करने लगते हैं। कुल मिलाकर मशीनों ने इंसान की जरूरत को कई दायरों में घटाना शुरू कर दिया है, और यह बढ़ते ही चलना है। बहुत से दायरे ऐसे रहेंगे जिनमें आखिर तक इंसान लगेंगे ही लगेंगे, लेकिन बहुत से दायरों से वे बाहर होने जा रहे हैं। इसके अलावा यह बात समझने की जरूरत है कि आज क्रिकेट अंपायर के फैसलों को तकनीक जिस बारीकी से और जिस रफ्तार से सही या गलत साबित कर रही है, वैसा ही कई और दायरों में हो सकता है। अखबार में लिखी गई खबरों में से हिज्जों की गलती, व्याकरण की गलती, या तथ्यों की गलती निकालने वाले कम्प्यूटर-प्रोग्राम आज भी मौजूद हैं, और ये धीरे-धीरे कृत्रिम इंटेलीजेंस की मदद से और उत्कृष्ट होते चलेंगे।

इस मुद्दे पर आज लिखने का मकसद यह है कि इंसानों को अपने कामकाज को सुधारने और बेहतर बनाने की पहले से कहीं अधिक, बहुत अधिक जरूरत इसलिए आन खड़ी हुई है कि अब मशीनें उसके काम को तौलने लगेंगी। मोबाइल फोन से छोटा उपकरण यह बता देगा कि दीवार उठाने वाले राजमिस्त्री ने ईंटों को तिरछा तो नहीं लगाया है, या टाईल्स फिट करने वाले मिस्त्री ने सतह ठीक रखी है या नहीं। अब औना-पौना, कामचलाऊ काम आसानी से पकड़ में आ जाएगा। इसलिए टेक्नॉलॉजी जहां-जहां इंसानों को बेदखल नहीं भी करेगी, वहां-वहां उसकी चूक को, उसकी लापरवाही को पकड़ सकेगी।

इस सिलसिले में एक छोटी सी मिसाल देना ठीक होगा जिससे आज बहुत से लोग वाकिफ नहीं होंगे। हिंदुस्तान में बाजार में मौजूद छोटी कारों में से कुछ कारें ऐसी भी हैं जिनमें भीतर एक छोटा सा उपकरण लगा हुआ है जो कि किसी मोबाइल फोन से जोड़ा जा सकता है, और लोग अपने घर बैठे फोन पर देख सकते हैं कि उनकी कार कहां पर है, किस रफ्तार से चल रही है, उसमें ईंधन कितना बचा है, क्या उसकी कहीं टक्कर हुई है, या उसके इंजन में कोई बड़ी गड़बड़ी तो नहीं हो गई है। आज मौजूद बड़ी साधारण सी कार के लिए फोन पर एक सीमा तय की जा सकती है कि कार किस रफ्तार से अधिक पहुंचने पर फोन पर अलर्ट आ जाए, या कितने किलोमीटर के दायरे से बाहर निकलते ही फोन पर अलर्ट आ जाए। इस किस्म की निगरानी, इस किस्म की जांच धीरे-धीरे तमाम आम उपकरणों में आने जा रही है, और इनके साथ काम करने वाले इंसानों को अपने-आपको बेहतर करना होगा, क्रिकेट के अंपायरों की तरह।


Date : 12-Aug-2019

कश्मीर के हालात को लेकर मीडिया में इतनी अलग-अलग तस्वीरें आ रही हैं कि यह लगता ही नहीं है कि वे एक देश के एक प्रदेश की हैं। पश्चिम का मीडिया कश्मीर में विरोध-प्रदर्शन की जो तस्वीरें दिखा रहा है, और जो वीडियो दिखा रहा है, उसे हिन्दुस्तान के मीडिया का एक हिस्सा गलत बता रहा है, और हिन्दुस्तान के सोशल मीडिया पर राष्ट्रवादी लोग उबल पड़ रहे हैं, और बीबीसी जैसे मीडिया-संस्थान पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ भारत का बड़ा मीडिया तकरीबन पूरा का पूरा केन्द्र सरकार की पेश की हुई तस्वीर को सामने रख रहा है, और देश के कुछ गिने-चुने पत्रकार ऐसे हैं जो कि कश्मीर जाकर वहां देखी हुई, और दर्ज की हुई एक अलग तस्वीर सामने रख रहे हैं। हकीकत इनके बीच जहां भी हो, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि लोकतंत्र में मीडिया पर, संचार पर लगाई गई रोक के कैसे नुकसानदेह नतीजे होते हैं। 

कश्मीर से धारा 370 खत्म करने और उसे केन्द्र के मातहत एक प्रदेश बना देने का कश्मीर में जैसा विरोध होने का एक खतरा दिख रहा था, अब तक उतना बड़ा खतरा सामने नहीं आया है। अगर बीबीसी या न्यूयॉर्क टाईम्स की दिखाई जा रही तस्वीरें सही है, तो भी वे एक बड़े विरोध-प्रदर्शन को दिखा रही हैं, बड़े पैमाने पर कोई हिंसा नहीं दिखा रहीं, दोनों तरफ से किसी की हत्या करने या किसी मौत होने की खबरें नहीं हैं। पत्थरों से पटी हुई सड़कों की जो तस्वीरें दिख रही हैं, और पत्थर फेंकते हुए कश्मीरी नौजवानों के जो वीडियो दिख रहे हैं, उनमें से भरोसेमंद मीडिया में तो ये सही लगते हैं, लेकिन सतही मीडिया और सोशल मीडिया पर दुनिया के अलग-अलग देशों से छांटकर निकाले गए वीडियो और तस्वीरें चारों तरफ तैर रहे हैं। ऐसा झूठ महज कश्मीर के मामले में चल रहा हो ऐसा नहीं है, दूसरी तरफ पथराव कश्मीर में अभी पहली बार हो रहे हों ऐसा भी नहीं है। यह सब कुछ कश्मीर बरसों से झेलते आ रहा है, और वहां की एक पूरी नौजवान पीढ़ी पथराव का हिस्सा बने हुए बड़ी हुई है। इसलिए आज कश्मीर में हालात, वहां पर हिंसा, अभूतपूर्व नहीं हैं। वहां पर लगाई गई बंदिशें भी आज पूरे राज्य में फैली हुई जरूर हैं, लेकिन अभूतपूर्व नहीं है। कश्मीर ने इसके पहले भी कर्फ्यू देखा है, फोन-नेट पर रोक देखी है, और फौज तो हमेशा से देखी ही है। इसलिए कश्मीर, और बाकी देश दोनों के हित में यह है कि वहां की तस्वीर को सही संदर्भ में, और सही अनुपात में देखा जाए। न तो केन्द्र सरकार की उपलब्ध कराई गई उन वीडियो-तस्वीरों का अधिक वजन है जिनमें एक चुनिंदा जगह पर आधा दर्जन चुनिंदा लोगों के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बिरयानी खाते हुए, बात करते हुए दिख रहे हैं। और न ही ऐसी तस्वीरों का अधिक वजन है जिनमें सड़कों पर पथराव करते हुए नौजवान दिख रहे हैं। ऐसी दोनों ही किस्म की नौबतें न सिर्फ कश्मीर में, न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि पूरी दुनिया में आती हैं, और सरकारें जनधारणा को अपने पक्ष में करने के लिए ऐसी तस्वीरें प्लांट भी करती हैं। 

इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर ने पिछले एक हफ्ते में हिंसा पर जिस काबू को दर्ज किया है, वह भी कम नहीं है। लोगों के मन में आग सुलग रही होगी, यह एक अलग बात है, लेकिन सरकार का यह जिम्मा होता है कि उस आग की लपटें किसी देश-प्रदेश को न जलाएं, किसी शहर-कस्बे को न जलाएं। इसलिए कश्मीर को लेकर आज मीडिया की रिपोर्ट एक तो बिल्कुल सही और सच्ची होनी चाहिए, दूसरी ओर वह सही संदर्भ में और फौज से लेकर हिंसा तक के तथ्यों को सही अनुपात में बताने वाली भी होनी चाहिए। लोगों को अपने विचारों के कॉलम में लिखना चाहिए, और खबरों के लिए आंकड़ों को, तथ्यों को, तस्वीरों और वीडियो को, विचारों की मिलावट के बिना खालिस रखना चाहिए, और खालिस पेश करना चाहिए। यही पत्रकारिता होती है, और यही बात लोकतंत्र के हित में भी होती है। 

जिन लोगों की आज कश्मीर की जमीनी हकीकत तक पहुंच नहीं है, चाहे वह सरकार के रोके हो, चाहे वह किसी और वजह से, उन्हें अटकलबाजी में नहीं पडऩा चाहिए, और अपने हाथ लगे चुनिंदा तथ्यों को, सरकार द्वारा पेश किए गए चुनिंदा तथ्यों को सोच-समझकर ही पेश करना चाहिए। सच इन दोनों के बीच कहीं पर हो सकता है, और जब तक मीडिया के हाथ ऐसे सच के सुबूत न लगें, उसे बिना स्रोत बताए कुछ पेश नहीं करना चाहिए। मीडिया और लोकतंत्र के बाकी तबकों को अपने विचार लिखने की हमेशा ही आजादी रहनी चाहिए, और विचारों पर आज कोई रोक है नहीं। इसलिए लोग पुख्ता तथ्यों के आधार पर सच लिखें, खुलकर लिखें, लेकिन सच के अलावा कुछ न लिखें, जो पुख्ता न हो उसे न लिखें, और आगे न बढ़ाएं।
-सुनील कुमार