संपादकीय

13-Apr-2020

गैलीलियो धर्मविरोधी करार दिया गया था, मुकदमे का सामना करते हुए।

आज हिंदुस्तान में कोई है जिसकी जुबान पर तब्लीगी जमातियों का नाम कोरोना के नाम के साथ-साथ ही ना आ जाता हो? और ऐसा क्यों ना हो, जब हिंदुस्तान के कोरोनाग्रास्त मरीजों में से अधिकतर का किसी एक जगह से रिश्ता निकल रहा है तो वह तब्लीगी जमात ही है। दूसरी जिस बात से रिश्ता निकल रहा है वह विदेश से लौटने वालों से है। मुस्लिमों और तब्लीगियों को पल भर के लिए अलग रखकर देखें तो जमात के बीच कोरोना की घुसपैठ भी मोटे तौर पर, जाहिर तौर पर विदेश से आये तब्लीगी जमातियों से हुई दिखती है। विदेशों से लौटे हिन्दुस्तानी सैलानियों, कामगारों और पढऩे वाले बच्चों को देखें तो हिंदुस्तान के आम मजदूरों के मुकाबले वे सम्पन्नता के मामले में पूंजीवाले हैं। यही हाल हिंदुस्तान में बाहर से आये धर्मप्रचारकों का है, जो कि उनको सुनने-मानने वाले आम मुस्लिमों के मुकाबले पूंजीवाले हैं। इन लोगों को पूंजीवादी लिखने से हम बच रहे हैं, क्योंकि ये किसी वाद की तरह कमाई में नहीं लगे हैं, ये अधिक संपन्न देशों में मजदूरी कर रहे हैं, या वहां के पैसों से यहाँ धर्म प्रचार करने आए हैं। इस तरह हिंदुस्तान में कोरोना जिस रथ पर सवार होकर आया, धर्म और पूंजी उसके दो चक्के थे। 

अब हिंदुस्तान में कोरोना के खतरे के बीच जिस तरह तब्लीगी गुरुओं ने उनको मानने वालों को गुमराह करके रखा, जुटाकर, इक_ा करके रखा, वह धर्म की एक आम ताकत है, जो सभी धर्मों में कम या अधिक रहती ही है। मुस्लिमों की बीच इसकी ताकत अधिक रहने की एक वजह अशिक्षा और गरीबी लग सकती है, लेकिन यह मानना अतिसरलीकरण होगा। इटली में जिस चर्च से सैकड़ों लोगों को कोरोना आशीर्वाद के रूप में मिला, वहां न तो शिक्षा थी, ना ही गरीबी थी। इजराइल के जिस शहर को कोरोना ने अपनी जकड़ में ले लिया है, वह बहुत पढ़ी-लिखे और सम्पन्न लोगों का शहर है। अमरीका में ना तो पढ़ाई की कमी है, न ही सम्पन्नता की, यही हाल ब्रिटेन का है। इसलिए, हिंदुस्तान में तब्लीगियों से मुस्लिमों में अधिक फैले कोरोना की वजह अशिक्षा और गरीबी को मानना गलत होगा। यह धर्म का असर है कि वह लोगों को कानून से हिकारत सिखाता है, वह दूसरे धर्म के लोगों से हिकारत सिखाता है, और लोगों को खासकर विज्ञान से नफरत सिखाता है। इन्हीं सबके चलते तब्लीगियों के मन में कानून के लिए हिकारत रही, समाज के दूसरे लोगों के लिए मन में हिकारत रही। 

लेकिन ऐसा सिर्फ इसी धर्म के लोगों के बीच नहीं हुआ। कोरोना के बीच ही हिन्दुओं के मंदिरों में जुटने वाले भक्तों को पुलिस किस तरह लाठियों से मारकर भगा रही है, उसके वीडियो भी तैर रहे हैं, कल पंजाब में निहंग सिखों ने कफ्र्यूू पास मांगने पर एक पुलिस अफसर का हाथ ही काटकर अलग कर दिया। निहंग तो सिख धर्म में पूरे वक्त के धार्मिक काम करने वाले होते हैं। कल ही छत्तीसगढ़ के रायपुर में पुलिस को जाकर एक चर्च में इतवार की प्रार्थना सभा में जुटी भीड़ को भगाना पड़ा। दुनिया भर में धर्म अक्ल से, कानून से, सामाजिक समझदारी से टक्कर ले ही रहा है। इसलिए भी ले रहा है कि कोरोना एक वैज्ञानिक खतरा है, जिस विज्ञान के अस्तित्व को ही मानने से धर्म इंकार कर देता है। धर्म का बस चले तो वह कोरोना के पहले विज्ञान को मारे, क्योंकि कोरोना तो आगे-पीछे खत्म हो सकता है, विज्ञान तो हमेशा ही धर्म के सर पर तलवार की तरह टंगा ही रहेगा। इस बात के खिलाफ आसान तर्क एक यह दिया जा सकता है कि बहुत से वैज्ञानिक भी आस्थावान रहे। यहां पर धर्म को ईश्वर से अलग करके ही समझा जा सकता है। ईश्वर एक धारणा है, इसलिए उससे किसी को कोई खतरा नहीं है। लेकिन अमूर्त ईश्वर से परे धर्म का एक मूर्त रूप है, संगठित रूप है, उसका किसी भी अपराधी से अधिक बाहुबल है, इसलिए वह लोकतंत्र, अक्ल, विज्ञान, और इंसान, सबके लिए बहुत बड़ा खतरा है। धर्म अनिवार्य रूप से कट्टर, हिंसक, बेइंसाफी होता है, और मुसीबत के वक्त वह बर्बादी और सबसे बड़ा सामान हो सकता है। 

यह तो आज कोरोना के बीच तब्लीगी जमात आ गयी है, लेकिन हिन्दुस्तान में पारसियों को छोड़कर किस धर्म के लोग ऐसे किसी संकट के बीच विज्ञान और कानून की बात सुनते? कल्पना करें कि कुंभ के बीच कोरोना आया होता, नागपुर में बौद्ध लोगों के सालाना जैसे कि दस लाख लोगों के बीच कोरोना आया होता, तो क्या अधिक लोग कानून को मान लेते? हिन्दू धर्म तो लोकतंत्र, इंसानियत, इनके खिलाफ इतना नहीं हुआ होता, तो हिंदुस्तान में लोग बौद्ध बने ही क्यों होते? इसलिए आज तब्लीगी जमात, और उसके मरकज में शामिल मुस्लिमों के जुर्म को अलग रखें, तो हिन्दुस्तान में अधिकतर, या सभी धर्मों के लोग, किसी भी वैज्ञानिक मुसीबत के वक्त खुद भी मुसीबत ही रहेंगे। जिन पारसियों को ऊपर हमने रियायत दी है, उनकी नस्ल उसके भीतर की गिरती आबादी की वजह से खत्म होती दिख रही है, लेकिन इस धर्म में रक्तशुद्धता का हाल यह है कि किसी और धर्म के लोगों के लिए इसमें शामिल होने की कोई जगह नहीं है। विज्ञान के गिनाए गए, साबित हो चुके रक्तशुद्धता-खतरों के लिए इस धर्म के लोगों में भारी, और  पूरी तरह हिकारत है। 

लोग आज भूल रहे हैं, कि जब तब्लीगी जमात का दिल्ली का मरकज चल रहा था, उसी वक्त उत्तरप्रदेश में योगी सरकार रामनवमीं पर अयोध्या में दस लाख लोगों को जुटाने की मुनादी कर चुकी थी। उस वक्त भी हमने उसके खतरों  के बारे में लिखा था, बाद में वह जलसा रद्द किया गया। आज हिंदुस्तान में मुस्लिमों को कोसना ठीक है, लेकिन बाकी धर्मों के लोग भी विज्ञान, कानून, लोकतंत्र और इंसानियत के सामने वे किस तरह हथियार लेकर तैनात हैं। किसी भी मुसीबत में धर्म इंसान और इंसानियत पर, लोकतंत्र और विज्ञान पर सबसे बड़ा खतरा बनकर रहेंगे, आज भी हैं। दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि किस तरह धर्म ने विज्ञान की बुनियादी बातों को स्थापित करने वालों को सजा दी है। जिस गैलीलियो ने यह कहा था कि धरती सूरज का चक्कर लगाती है, उसके लिखे हुए को प्रतिबंधित करके उसे जिंदगी भर घर पर नजरबंद रखा गया था। गणित में जिस विख्यात गणितज्ञ और दार्शनिक पाईथेगोरस का सिद्धांत एक सबसे विख्यात काम माना जाता है, उसे भी धार्मिक सोच की वजह से सजा दी गई थी। चिकित्सा विज्ञान में तो जाने कितने ही लोगों को धार्मिक सरकारों ने सजा दी थी। और वह आज भी जारी है, धर्म के रहने तक जारी रहेगी। 
-सुनील कुमार


12-Apr-2020

स्कूल-कॉलेज के बच्चों की एक बरस की ठीक से पढ़ाई नहीं हो पाए, इम्तिहान नहीं हो पाए, तो क्या करना चाहिए? आज हिंदुस्तान में तकरीबन हर प्रदेश इसी समस्या के सामने खड़ा हुआ है। कॉलेज के  कुछ इम्तिहानों के बारे में कुछ जानकारों का कहना है कि अगर इम्तिहान नहीं हुई तो उनको मिलने वाली डिग्री की कीमत कम रह जाएगी। अब सवाल यह है कि किस बाजार में डिग्री की कीमत कम रह जाएगी? अमरीका, ब्रिटेन, इटली, जर्मनी, चीन सहित दर्जनों देशों का हाल तो हिंदुस्तान से अधिक खराब है, उनकी अपनी डिग्रियों के सामने भी यही दिक्कत है। अकेले हिंदुस्तान के कॉलेज तो बिना पढ़ाई के नहीं रह जाने वाले। 

स्कूलों के अधिकतर इम्तिहान तो टल ही गए हैं। इनसे किसी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। एक बरस में स्कूलों में शायद 200 दिनों की पढ़ाई का टारगेट रखा जाता है, जो शायद कहीं भी पूरा नहीं होता। कॉलेजों में 125 दिन सालाना पढ़ाई का टारगेट रहता है, और वह भी कभी पूरा नहीं होता। कॉलेजों के बारे में कहा जाता है कि उनमें 15 अगस्त से पहले क्लास शुरू नहीं होती, और 26 जनवरी के बाद चलती नहीं। झंडे से झंडे तक चलने वाली क्लासेज के 125 दिन पूरे होने की बात अमल में नहीं आती। इसलिए बहुत अधिक फिक्र करने की जरूरत नहीं है। सबसे बड़ी जरूरत है स्कूल-कॉलेज में क्लासरूम में बच्चों की भीड़ और धक्का-मुक्की की नौबत को टालने की। इसके लिए कुछ राज्यों ने जून तक के लिए स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए हैं, बाकी राज्यों को भी मई तक के लिए तो बंद कर ही देना चाहिए। देश की करीब एक चौथाई आबादी स्कूल-कॉलेज से कोरोना लेकर आएगी तो हफ्ते भर में ही पूरा देश खतरे में आ जाएगा। 

अब सवाल यह है कि पढ़ाई के हर्जाने को तो बाद में पूरा कर लिया जायेगा, अभी बच्चे क्या करें? आज देश के अधिकतर घरों में टीवी हैं, और कम से कम सरकारी दूरदर्शन जैसे दर्जनों टीवी चैनल मुफ्त में भी हैं। केंद्र और राज्य सरकारों को टीवी पर सुबह से रात तक अलग-अलग क्लास के बच्चों के लिए पढाई का इंतजाम करना चाहिए। दूरदर्शन के बहुत से चैनल हैं, और उनमें क्षेत्रीय भाषों में भी पढ़ाई करवाई जा सकती है, और हिंदी-इंग्लिश में भी। हो सकता है कि चुनिंदा शिक्षक, अच्छे स्टूडियो से साफ-साफ बोलकर स्कूल से बेहतर भी पढ़ा सकें। इस पर तुरंत काम शुरू करना चाहिए। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य अपने मोबाइल एप्लीकेशन बनाकर भी पढ़ाई शुरू कर चुके हैं, टीवी का इस्तेमाल भी जुड़ सकता है।

केंद्र और राज्य सरकारें, टीवी पर लोगों के सामान्य ज्ञान, व्यक्तित्व विकास, इंटरव्यू देने की तकनीक, स्पोकन इंग्लिश जैसी चीजों को भी शुरू कर सकती है, आज टीवी और इंटरनेट के साथ मोबाइल फोन हिंदुस्तान में दुनिया का सबसे बड़ा क्लासरूम बना सकते हैं। इस पर केंद्र सरकार को जानकारों से बात करके काम शुरू करना चाहिए, बिना देर किए। इसके अलावा यह भी समझने की जरूरत है कि दुनिया के विकसित देशों में सिर्फ क्लासरूम की पढ़ाई को सब कुछ नहीं माना जाता। योरप के विकसित देशों में तो स्कूल के बाद और कॉलेज के पहले एक साल बच्चे बिना पढ़ाई के रहते हैं, वे घूमते-फिरते हैं, जिंदगी की हकीकत को देखते-सीखते हैं। हिंदुस्तान में भी कुछ महीनों के बाद एक ऐसी नौबत सामने आने वाली है जब दसियों करोड़ लोग बेरोजगार रहेंगे, उनके सामने खाने की भी दिक्कत रहेगी, और ऐसे वक्त स्कूल की बड़ी कक्षाओं और कॉलेज के बच्चों को कुछ महीनों के लिए आबादी के ऐसे मुसीबतजदा तबके की मदद में लगाने की एक योजना भी बनानी चाहिए। एनसीसी या एनएसएस जैसे संगठनों से जुड़े छात्र-छात्राओं को साल में कुछ दिन ऐसा करना भी पड़ता है, और उन्हें अधिक संगठित, अधिक व्यवस्थित रूप से, बिना खतरे में पड़े ऐसे काम में लगाना उनकी पढ़ाई के मुकाबले अधिक काम का हो सकता है। लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले हमने जबलपुर से अमरीका जाकर बसे एक ऐसे स्कूल बच्चे के बारे में छापा था जिसने वहां की अस्पताल में कुछ हफ्ते सेवा कार्य करके, मरीजों के स्ट्रेचर और व्हीलचेयर का भी काम करके राष्ट्रपति का प्रशंसापत्र पाया था। आज कोरोना के बाद के युग के पुनर्निर्माण में बच्चों की भागीदारी के बारे में देश-प्रदेश को सोचना चाहिए जिससे वे एक बेहतर नागरिक भी बनें, और क्लासरूम ही सब कुछ है, इस आतंक से भी बाहर निकलें।
-सुनील कुमार


11-Apr-2020

आज ट्विटर पर भारत सरकार का शुरू किया गया एक पेज देखने मिला जिसमें देश में तैर रही अफवाहों का खंडन किया गया है। वैसे तो देश में कुछ ऐसी गंभीर और ईमानदार वेबसाइटें हैं जो कि सोशल मीडिया और मीडिया में तैरते झूठ पकड़कर उनकी जांच करके भंडाफोड़ करती हैं, कई बड़े प्रकाशन समूहों ने भी फैक्टचेक के लिए ऐसी बातें शुरू की हैं। लेकिन बहुत से बड़े टीवी चैनल और बड़े अखबार ऐसे हैं जो खुलकर, पूरी नंगाई से, नफरत पर सवार झूठ को सच बताते हुए चारों तरफ आग लगाने पर आमादा हैं, और उसके लिए ओवरटाइम कर रहे हैं। हालत यह हो गई है कि केंद्र और कई राज्य सरकारों के बहुत ही बड़े वकालती ऐसे मेनस्ट्रीम मीडिया संस्थान हैं जो कि अपने-अपने राज्य की पुलिस से नोटिस भी पा रहे हैं, सरकार कह रही है कि उनकी खबर झूठी है, लेकिन वे उस खबर को हटाते ही दूसरी नफरती खबर फैला दे रहे हैं। सरकार जिस तरह किसी एक संगठन को प्रतिबंधित करती है, और अगले ही दिन दूसरे नाम से उसी संगठन का काम शुरू हो जाता है, वैसा ही झूठी खबरों के साथ भी हो रहा है, फेक खबरें तो इनसे अलग हैं ही, जो कि कोई झूठा सोर्स बताकर फैलाई जाती हैं। 

ऐसे में कुछ पत्रकार रात-दिन मेहनत करके सोशल मीडिया पर, अखबारों में, और दूसरी जगहों पर देख-देखकर सच और झूठ को उजागर करने का काम भी कर रहे हैं। इंटरनेट और वेबसाइटों की मेहरबानी से हर झूठ, हर सच दर्ज भी होते चल रहे हैं। नफरती लोगों की हरकतें भी दर्ज होते चल रही हैं, और जागरूक लोग सोशल मीडिया पर भी नफरतियों को उजागर करते चल रहे हैं। लेकिन जिनके सीने नफरत की आग से धधक रहे हों, जिनके हाथ देश में चल रहीं झूठ की फैक्ट्रियों से ताजा माल हर मिनट पहुँच रहा हो, उन पर काबू पाना डॉन को पकडऩे की तरह ही नामुमकिन है। जब तक मोहब्बत गुलदस्ता सजा पाती है, नफरत जाकर पूरे चमन को नोंचकर लौट आती है। 

एक वक्त जिस तरह लोग कई किस्म की समाजसेवा करते थे, आज डिजिटल-स्वयंसेवकों की जरूरत है जो कि एक नेटवर्क बनाकर झूठ से सामना करने के लिए  एकजुट हो सकें। जैसे कहीं तालाब की गंदगी साफ करने के लिए लोग एक होकर श्रमदान करते हैं, उसी तरह समाज के दिल-दिमाग की गन्दगी दूर करने के लिए भली नीयत वालों को श्रमदान करना होगा। अब चूंकि सड़कों की गंदगी मोदी के प्रशंसक दूर करने का बीड़ा उठा चुके हैं, इसलिए बाकी लोगों को दिल-दिमाग की गन्दगी दूर करने की कसम खानी चाहिए। अब चूँकि मोदी-सरकार भी फेक-न्यूज और झूठी खबरों का खंडन कर रही है, योगी सरकार की पुलिस भी सरकार की पसंदीदा न्यूज एजेंसी की ख़बरों का खंडन कर रही है, तो मोदी-योगी के प्रशंसकों में फेक को बढ़ाना कुछ कम होने की उम्मीद की जा सकती है। लोहा अभी गर्म दिख रहा है, कोरोना ने देश के भीतर एक नया माहौल खड़ा कर दिया है, इस मौके का फायदा उठाना चाहिए। महामारी के कानून के तहत अफवाहों पर जो सबसे कड़ी सजा हो सकती है, वह दिलाने के लिए सुबूत जुटाने में लोगों को मदद करनी चाहिए। 

आज हिन्दुस्तान में डिजिटल कार-सेवा की जरूरत है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों में तो अलग-अलग नामों से कारसेवा होती ही रहती है, इंटरनेट, सोशल मीडिया, और मुख्यधारा के मीडिया से गंदगी दूर करने के लिए डिजिटल-कारसेवकों को एकजुट करने की पहल होनी चाहिए।
-सुनील कुमार


10-Apr-2020

बुरा वक्त लोगों के भीतर के सबसे अच्छे और सबसे बुरे को सामने लेकर धर देने का वक्त भी रहता है। अभी आंध्र-तेलंगाना में अलग-अलग फंस गए मां-बेटे की कहानी सामने आई है कि किस तरह बेटे को लाने के लिए मुस्लिम बुरकापरस्त महिला अपने छोटे से दुपहिए पर 700 किलोमीटर दूर गई, और उतना ही सफर बेटे को लेकर लौटते हुए भी किया। कोई मजदूर अपनी बीवी को साइकिल पर बिठाकर 750 किलोमीटर ले गया। हाथ-पैर सभी पर चलने वाले एक दिव्यांग की कहानी आई है कि किस तरह वह दिल्ली से जमीन पर बैठे चलते हुए मध्यप्रदेश के सागर के पास अपनी बहन के गांव पहुँचा कि उसे कुछ रुपयों की मदद कर सके। ना तो इनमें से किसी ने यह सोचा होगा कि उनके भीतर ऐसी ताकत है, और ना ही आज इन असली कहानियों को पढऩे वालों को यह भरोसा होता है कि सच में किसी ने ऐसा किया होगा। दुनिया की हकीकत यही है कि आग में तपकर ही सोना खरा होता है, ये सारे लोग अब बाकी जिंदगी दुनिया के लिए हौसले की, इरादे की मिसालें बने रहेंगे। कल ही इसी जगह हमने छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल इलाके में काम करते-करते कैंसर से गुजर जाने वाली एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता को सलाम किया था। ये तमाम लोग बहुत साधारण लोग हैं, इसलिए इनकी कहानियां स्कूलों की किताबों में शायद ना आ सकें, लेकिन आज जब बड़े और बच्चे सभी घरों में खाली बैठे हैं, तो यह सही वक्त है कि लोग बहादुरी की ये असली कहानियां आपस में बाँटें। यह भी जरूरी नहीं है कि बड़े लोग ही छोटों को पढ़कर बताएं, पढऩे के लायक बच्चे भी अपने बड़ों को इन्हें सुना सकते हैं, क्योंकि उन बड़ों के पास भी इतनी जिंदगी तो बची ही होगी कि वे भी अपनों के लिए, अनजान लोगों के लिए कुछ कर सकें, और अपने बच्चों के लिए मिसाल बन सकें, उनको भी गर्व का एक मौका दे सकें। 

दिल्ली में काम करने वाले एक पत्रकार, सैकत दत्ता, इन दिनों रात-दिन सरकारी अमले के साथ काम करते हुए सिर्फ लोगों की मदद कर रहे हैं, और जिंदगी का सबसे बड़ा सुकून पा रहे हैं। बिहार के पत्रकार पुष्य मित्र पिछले एक बरस से कभी बाढ़ में बचाव के काम में लगे रहे, जा-जाकर लोगों की मदद की, और चमकी बुखार को लेकर अभी भी कर रहे हैं, समाज के लिए करने के साथ-साथ लगातार लिखते भी हैं, बहुत खूब लिखते हैं, साम्प्रदायिकता पर हमला करते हैं, जिस समाज को कुदरती मुसीबत से बचाने के लिए, बीमारी से बचाने के लिए वे मेहनत करते हैं, उस समाज को नफरत से बचाने का भी उनका हक है। 

बहुत से संगठन हैं जो कि मुसीबत के इस वक्त में भूखों को खाना पहुंचाने में लगे हैं। रायपुर शहर के सीताराम अग्रवाल हैं जो कि कई शहरों की बड़ी सरकारी अस्पतालों के करीब मरीजों के परिजनों के लिए मंगल-भवन चलाते हैं, लोग भी मदद करते हैं लेकिन उन्होंने करोड़ों रूपया अपना भी लगाया हुआ है। आज वे भूखे मजदूरों को खाना पहुंचाने में भी लगे हैं, उनके साथ, उनसे अलग भी बहुत से लोग हैं। 

आज जगह-जगह से डॉक्टर-नर्सों की कहानियां आ रही हैं, कि किस तरह वे जान पर खेलकर, अपनी जान भी देकर मरीजों को बचाने का काम कर रहे हैं। पुलिस के लोगों के वीडियो आ रहे हैं कि किस तरह वे लोग भूखों को खाना खिला रहे हैं, बीमार और गर्भवती को अस्पताल पहुंचा रहे हैं, छत्तीसगढ़ पुलिस की गाडिय़ों में तो अस्पताल की राह पर बच्चों का जन्म भी हो जा रहा है। पुलिस यह सारा काम अपनी जिम्मेदारी से बाहर जाकर कर रही है। 

दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी मुसीबत हो, सिक्खों को हर धर्म के लोगों की मदद करते देखकर भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। हिंदुस्तान में अभी कोरोना का कहर बरपा तो सबसे पहले टाटा ने अपने खुद के पैसों के ट्रस्ट से और अपनी कंपनियों से 1500 करोड़ देने की घोषणा की, अज़ीम प्रेमजी ने भी अपने ट्रस्ट और  अपनी कम्पनियों से ऐसा ही कुछ किया, दूसरी तरफ देश को लूट लेने के लिए बदनाम कंपनियों ने अपनी किसी दावत जितना चिडिय़ा का चुग्गा ही जेब से निकाला। देश को इन तमाम बातों का फर्क एक-दूसरे को बताना चाहिए। 

गाँधी, नेहरू, नेलसन मंडेला, और मदर टेरेसा की कहानियां ही जरूरी नहीं होती हैं, हमारे आसपास भी ऐसी बहुत सी सच्ची कहानियां हैं जिन पर सोचकर हम अपने को बेहतर बना सकते हैं। 
-सुनील कुमार


09-Apr-2020

आज जब शहरी हिंदुस्तान अपनी इमारतों और अपनी कॉलोनियों में रहने वाले डॉक्टरों को भी मार-मारकर निकाल रहा है, कि अस्पताल से लौटते उनके साथ कहीं कॉलोनी में कोरोना ना आ जाये, तब छत्तीसगढ़ के बस्तर के धुर नक्सल इलाके में एक ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ता चल बसी। पुष्पा तिग्गा कैंसर की शिकार थी, और इलाज के साथ-साथ भी वह बस्तर के सुकमा इलाके में गांव-जंगल में साइकिल पर चलते हुए काम करती थी। वह बस्तर की रहने वाली भी नहीं थी, दक्षिण छत्तीसगढ़ का बस्तर, और सैकड़ों किलोमीटर दूर उत्तर छत्तीसगढ़ के सरगुजा की रहने वाली थी पुष्पा तिग्गा। स्वास्थ्य विभाग के सबसे छोटे ओहदों में से एक, उसकी तनख्वाह भी जरा सी रही होगी, और साइकिल पर उन इलाकों में काम जहां नक्सलियों की बिछाई जमीनी सुरंगें बहुत सी मौतों को लिए इंतजार करती हैं। 

पुष्पा सरगुजा के जशपुर जिले के गरीब परिवार की थीं, माँ-बाप मर गए, बर्तन मांजकर पढ़ाई पूरी की, स्वास्थ्य विभाग में नौकरी लगी तो पहली पोस्टिंग बस्तर के सुकमा में हुई, और तब से वे वहीं की होकर रह गईं। इस इलाके में नक्सली भी मारते हैं, और कुदरत भी कई किस्म की बीमारियों से मारती है। कैंसर के बाद भी उन्होंने काम बंद नहीं किया। ऐसे में इलाके के लोग उन्हें ईश्वर मानते थे। कुछ महीने पहले जब राज्य सरकार ने उसकी सेहत के चलते भी उसके किए जा रहे समर्पण के लिए उसका सम्मान किया था, तब भी इस अखबार में हमने उसके बारे में लिखा था, कि जिस बस्तर में ना जाने के लिए, जिस बस्तर से निकलने के लिए सरकारी अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत देते हैं, पुष्पा तिग्गा उसी बस्तर के सबसे खतरनाक नक्सल-इलाके में काम करते रहना चाहती थी। सुकमा जिले की एक ग्राम पंचायत के अधीन वे 12 बरस से काम कर रही थीं, उसी दौरान उन्हें कैंसर निकला। हर महीने कई सौ किलोमीटर दूर राजधानी आकर वे कैंसर का इलाज करवाती रहीं, लेकिन सुकमा के जंगलों में अपना काम जारी रखा। सरकारी अफसर खुद होकर उनका तबादला करने को तैयार थे, लेकिन उन्हें इस इलाके के लोगों से मोह था, और वे यहीं की होकर बंधी रह गईं। रोज 17 किलोमीटर साइकिल पर जाना, उतना ही आना, और काम करना। 

आज सुबह उनकी मौत की खबर के साथ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ठीक ही ट्वीट किया कि छत्तीसगढ़ की फ्लोरेंस नाइटेंगल चल बसी। पुष्पा के जाने पर याद आता है कि इसी बस्तर से बाहर तबादला करवाने के बारे में पिछली रमन सरकार के सुरक्षा सलाहकार के पी एस गिल ने सरकार को लिखा था कि पुलिस के लोग बस्तर से बाहर निकलने के लिए बड़े अफसरों को रिश्वत देते हैं। उस बात को याद करते हुए, बस्तर के सबसे बेबस लोगों की सेवा में 12 बरस लगातार लगी रहने वाली पुष्पा तिग्गा को सलाम!
-सुनील कुमार


08-Apr-2020

केंद्र और राज्य सरकारों ने अलग-अलग फैसले लेकर कड़ाई से कई फैसले लागू किए हैं। अभी मकान मालिकों से कह दिया गया है कि वे किराया मांगने जोर ना डालें। स्कूलों को कह दिया गया है कि वे फीस वसूली ना करें। बाजार के कई किस्म के छोटे-मोटे कर्ज पटाना लोग खुद भी बंद कर देंगे क्योंकि किसी के पास पटाने को कुछ है ही नहीं। लोग मोहल्ले की किराना दुकान का उधार तक नहीं चुका पाएंगे। आज हिंदुस्तान में सरकारी कर्मचारियों के अलावा कोई और भी महफूज बचे हैं ? लेकिन ऐसी हालत में लोगों का होगा क्या? जो लोग किराए पर जिंदा हैं, उनका क्या होगा? अधिकतर स्कूलें कर्मचारियों को तनख्वाह फीस के पैसों से ही देती हैं, वे तनख्वाह कहाँ से लाएंगी? फिर बिना पढ़ाई लोग बच्चों की फीस क्यों देंगे? बिना फीस तनख्वाह कैसे? बिना तनख्वाह टीचर्स का घर कैसे?

कोरोना की जैसी गोल फुटबॉल सरीखी तस्वीर बनाई गई है, वह उस गेंद की तरह ही लुढ़कते चल रहा है। मटरगश्ती शब्द का गोलमटोल मटर, गश्त करने के नाम पर जिस तरह महज चारों तरफ लुढ़क सकता है, वैसे ही कोरोना चारों तरफ लुढ़क रहा है और उसकी चपेट में इतने लोग इतनी किस्म से कुचल रहे हैं, कि सबके जख्मों को देखने में महीनों लग जायेंगे। मजदूर तो फिर भी एक जगह न तो दूसरी जगह मजदूरी कर लेंगे, लेकिन निजी नौकरियों में लगे सफेदपोश कहाँ जायेंगे? वे तो अपने आज के हुनर के काम के अलावा और कुछ जानते भी नहीं हैं, कोई बेहुनर-मजदूरी का काम कर नहीं सकते। ऐसे में आनी वाली मुसीबतें जिन लोगों को कुछ महीनों की लग रही हैं, वे अभी कोरोना की मार को समझ नहीं पा रहे हैं। बरसों तक लोगों को अपने खर्च में कटौती सोच लेनी चाहिए। जिनके पास आज खाली वक्त है और इंटरनेट है, उन्हें दुनिया की 1930 के दशक की मंदी के बारे में पढ़ लेना चाहिए जो कि दस बरस चली थी, औद्योगिक देशों में बेरोजगारी का वह बुरा हाल था कि एक पीढ़ी में जिंदा रहने के लिए बदन बेचना प्रचलित तौर-तरीका हो गया था। अमरीका में अच्छे-खासे नौकरीपेशा लोग कटोरा पकड़कर सरकारी खाने के लिए सड़क किनारे कतार में लगे रहते थे। और बेरोजगारी का मतलब नौकरी ना पाना नहीं था, नौकरी खोना था। 

दुनिया अगर बहुत बुरी मंदी में चली जाएगी, जो कि जाते दिख रही है, तो न सिर्फ गरीबों की मौत होगी, बल्कि उनसे बेहतर हालत वालों की और बुरी मौत होगी क्योंकि वे तो कम्प्यूटरों पर से उठकर कुदाली-फावड़ा भी नहीं पकड़ सकते। लोगों को आने वाला वक्त उतना ही बुरा मानकर खर्च की कटौती की सोचना चाहिए, दुसरे हुनर के बारे में सोचना चाहिए, अपने खुद के काम को बेहतर बनाने के बारे में सोचना चाहिए। कारोबारी के सामने जिंदा रहने की अपनी मजबूरी होगी, इसलिए वे अधिक से आधिक कर्मचारियों को निकलने के बारे में सोचेंगे, और ऐसे में सबसे काबिल लोगों की ही नौकरी बच सकती है। कल ही देश के एक सबसे बड़े मीडिया-हाउस की खबर आई है कि किस तरह उसका एक टीवी चैनल बंद किया जा रहा है, उसके आधे लोगों को दूसरे चैनल में भेजा जा रहा है, और आधे लोगों को निकला जा रहा है जिनमें 50 बरस से अधिक उम्र के लोग ही अधिक हैं। ऐसा हाल पूरे देश में मीडिया में तो होने ही वाला है, बाकी धंधों में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं रहेगी। इसमें से जो बेहतर लोग नौकरी खोएंगे, उनको काम पर कम तनख्वाह पर रखकर लोग अपने कुछ पुराने महंगे पड़ रहे लोगों को काम से निकालेंगे। 

बात कहने और सुनने दोनों में बुरी लगेगी, लेकिन अब मालिक और मैनेजर दोनों ही काम वाले, बेहतर, अधिक उत्पादक, अधिक समर्पित कर्मचारियों को उसी तरह छांटेंगे, जिस तरह कसाई बकरे को टटोलकर देखते हैं कि कितना गोश्त निकल जाएगा! कसाई काटने के लिए अधिक गोश्त देखता है, मालिक-मैनेजर अधिक काम की क्षमता को उसी तरह टटोलेंगे, ना-काटने के लिए! इसलिए तमाम गैरसरकारी नौकरी वालों को अपने को बेहतर बनाने की फिक्र करनी चाहिए, या फिर भूखों  मरने के लिए तैयार रहना चाहिए।
-सुनील कुमार


07-Apr-2020

हिंदुस्तान कोरोना नाम की मुसीबत के बीच अभी कहाँ तक पहुंचा है यह तो पता नहीं, लेकिन लोगों की रोजी-रोटी चलने के लिए अब केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक यह सोच भी चल रही है कि लॉकडाउन को जब भी खत्म किया जाये, कैसे किया जाये? अलग-अलग मुख्यमंत्रियों की सोच अलग-अलग है, ऐसा इसलिए भी होना ही था कि हर राज्य की आज की मुसीबत अलग-अलग किस्म की है, और कल को लेकर उन पर खतरे भी अपने-अपने किस्म के हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री को कल ही लिखा है कि जब भी देश में आवाजाही शुरू हो, सबसे चर्चा करके ही की जाये। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने लॉकडाउन को कुछ या कई हफ्ते बढऩे का सुझाव केंद्र को दिया है, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी कहा है कि 14 अप्रैल के बाद भी लोकडाउन बढ़ाया जा सकता है। केंद्र सरकार ने आज कुछ पेज का एक कागज जारी किया है जिसमें देश के प्रमुख अखबारों के लिखे गए सुझावों के हिस्से दिए गए हैं। हर समझदार सरकार को सरकार के बाहर के लोगों से भी सुझाव लेने चाहिए जो कि कुछ नई सोच भी लेकर आ सकते हैं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 तारीख को देश के तकरीबन सभी विपक्षी दलों से बात करने जा रहे हैं, उन्होंने भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों से बात की भी है। कई लोग हैरान भी हैं, कि कोरोना पर देश के नाम अपने पहले संदेश के 20 दिन बाद अब मोदी यह काम क्यों कर रहे हैं? इसके पहले के हर बड़े फैसले तो उन्होंने बिना राज्यों से चर्चा भी किए कर लिए, विपक्ष तो दूर की बात थी। अब लॉकडाउन ख़त्म होने की तारीख के एक हफ्ता पहले की यह बैठक सभी पार्टियों को कोई बहुत बड़ा मौका तो नहीं देने वाली, लेकिन किसी भी नौबत में उनको जिम्मेदारी में भागीदार जरूर बना देगी। खैर, लोकतंत्र में यह सब तो चलते ही रहता है। यह वक्त कुछ ठोस राय देने का है। बहुत से लोगों से बात करके हालात का अंदाज लगाकर हमें भी कुछ बातें सूझ रही हैं। 

आज देश में कई करोड़ मजदूर अपने काम के शहर छोड़कर किसी तरह अपने गावों तक पहुँच गए हैं, या अभी भी दसियों लाख लोग रास्तों में फंसे हुए हैं। इन सबका उनके गांव लौट जाना ही ठीक है, क्योंकि शहरों में अगले कई महीने उनके लिए अधिक काम नहीं रहने वाले। बाद में जिस मजदूर को रोजगार देने की जरूरत कारखानेदार, कारोबारी को लगेगी, वे खुद ही उनको बुला लेंगे। लेकिन अब अगले कम से कम एक साल न तो सरकार के कोई काम जमीन पर अधिक होंगे, न निजी क्षेत्र के। बहुत सीमित संभावनाएं रहेंगीं, और अपने गांव में तो लोग फिर भी किसी तरह जी लेंगे। इसलिए जब तक शहरी जरूरत खड़ी ना हो जाये, मजदूरों के लिए गांव ही ठीक रहेगा। 

दूसरी बात स्कूल-कॉलेज की है। आज 130 करोड़ आबादी में से 30 करोड़ से अधिक पढऩे वाले हैं। इनमें से अधिकतर एक-एक कमरे में दर्जनों सटकर बैठने वाले बच्चे हैं। 27 करोड़ से अधिक स्कूली बच्चे हैं, जिनमें से अधिकतर दोपहर को स्कूल में सरकारी या निजी खाना खाते हैं। इन स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाने, काम करने वालों को भी जोड़ लें तो देश की करीब एक चौथाई आबादी पढ़ाई से जुड़ी हुई है, और यह पूरा काम भीड़ भरा है। इसलिए स्कूल-कॉलेज जल्द शुरू करने की बात सोचनी भी नहीं चाहिए। ऐसे खतरे में ना पढ़ाई जरूरी है, न इम्तिहान। बच्चों को सामाजिक जिम्मेदारी और सावधानी सिखाने-सीखने का यह सही मौका है।

मजदूरों और छात्र-छात्राओं को अलग रख लें तो राज्य सरकारों पर से कोरोना को फैलने से रोकने का एक बड़ा खतरा कम हो जायेगा। यह एक अलग बात है कि पढ़ाई तो बाद में हो जाएगी, लेकिन मजदूरों के पेट बिना काम नहीं चलेंगे, इसलिए उनके लिए उनके गृहराज्यों में ही उनके गावों में ही इंतजाम करना होगा, जो कि छोटी चुनौती नहीं होंगे। 

कल दिल्ली के मजदूरों के बीच किए गए एक सर्वे पर बनी खबर छपी है कि उनके एक बड़े हिस्से के पास तो अगले वक्त के खाने का इंतजाम भी नहीं है। यह नौबत पूरे देश में रहेगी। देश को, प्रदेश को सारी फिजूलखर्ची रोककर सबसे गरीब लोगों को जिंदा रखने पर ही खर्च करना चाहिए। दिल्ली में राजपथ के इर्द-गिर्द की इमारतों की साज-सज्जा, उस इलाके की खूबसूरती के लिए 20 हजार करोड़ देने का गजट नोटिफिकेशन अभी कोरोना के बीच छपा है, मोदी सरकार को इस निहायत ही गैरजरूरी काम को तुरंत ही खारिज कर देना चाहिए। भूख से जलते पेटों वाले देश में 20 हज़ार करोड़ की बांसुरी बजाना हैवानियत होगी। केंद्र और राज्य सरकारों को तय करना होगा कि कौन-कौन से काम टाले जा सकते हैं, क्योंकि अभी देश में करोड़ों रोजगार और भी जाने वाले हैं। 

सभी सरकारों के सामने आज दोहरी चुनौती है, कोरोना से बचने की भी, और फिर भूख से बचने की भी। कुछ और सलाहें आगे फिर।
-सुनील कुमार


06-Apr-2020

हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग दर्जे की खबरें आ रही हैं। कहीं कोरोना से बहुत मौतें हो रही हैं, तो कहीं कम, कोई राज्य सरकार अच्छा काम कर रही है तो कोई बहुत अच्छा। कहीं पर संदिग्ध मरीजों को तेजी से शिनाख्त किया जा रहा है तो कहीं धीमे-धीमे। कई राज्यों में राज्य-सरकार की लापरवाही से मामले बढ़ गए दिख रहे हैं। और अभी जब हम राज्यों की बात कर रहे हैं, तो केंद्र सरकार की बात नहीं करना चाहते कि उसे कब क्या कर लेना था जो उसने नहीं किया, और कब क्या नहीं करना था जो उसने किया। वह बात आई-गई हो गई, लेकिन आने वाला वक्त अब तक के मुकाबले अधिक बड़ी चुनौती का हो सकता है, शायद होगा ही। और ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य अपनी अब तक की कामयाबी पर आत्ममुग्ध होकर, जूते उतारकर बैठ सकते हैं। अभी बहुत लंबा वक्त ऐसा आने वाला है जो कि बहुत बड़ी चुनौती, बहुत बड़े खतरे को लेकर आते दिख रहा है। 

दुनिया भर के विशेषज्ञों, विश्व स्वास्थ्य संगठन की चेतावनियों के खिलाफ हिंदुस्तान ने अधिक लोगों की जांच से इंकार कर दिया और उन्हीं लोगों की कोरोना-जांच की जिनमें कुछ लक्षण दिख रहे थे। दुनिया का तजुर्बा इसके खिलाफ रहा है। हम उन विशेषज्ञों से अधिक बड़े जानकार नहीं हैं, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों को याद दिलाना चाहते हैं कि कम जांच की वजह से भी कोरोना पॉजिटिव केस कम दिख रहे हो सकते हैं। आज तो दिल्ली की तब्लीगी जमात की मरकज में शामिल लोगों की बिना लक्षणों के भी तेजी से हो रही जाँच की वजह से उनमें कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हैं, लेकिन बाकी लोगों के साथ तो ऐसी जांच नहीं हो रही। हिंदुस्तान की हालत आज बुझे हुए ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठे हुए देश सरीखी है, बारूद के बिनपरखे ढेर पर बैठे देश सरीखी है, जो कोरोनावली के दिए जला रहा है, जीत के फटाके फोड़ रहा है। परंपरागत सामाजिक समझदारी तो यह होती है कि जब तक नवजात शिशु अस्पताल से सही-सलामत घर नहीं आ जाते, किन्नर भी ताली बजाकर बख्शीश माँगने नहीं आते। बीती रात देश ने जिस तरह रौशन जुलूसों के साथ कोरोना पर जीत मनाई है, क्या सचमुच वह जीत हासिल हो चुकी है? अब तक तो यह देश अपने डॉक्टरों-नर्सों को मास्क और दस्ताने भी नहीं दे पाया है, जिसकी वजह से वे कोरोनाग्रास्त हो रहे हैं! यह किस किस्म की जीत है? अपने पर आत्ममुग्ध यह देश अपने लोगों की मौत का सामान बनते जा रहा है, और जश्न के तरीके ईजाद किये जा रहे हैं। 

यह देश, और इसके प्रदेश अब तक कोरोना के खतरों  से अपने को ऊपर मान रहे हैं, हिन्दुस्तानियों का एक तबका यूनेस्को के हवाले से अपने को एक अलग नस्ल साबित करके खुश है कि कोरोना उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मूर्खों को यूनेस्को का काम का दायरा भी नहीं मालूम है। बीती रात से नासा और इसरो के हवाले से हिंदुस्तान का जगमग-जगमग नक्शा फैलाया जा रहा है। 

छत्तीसगढ़ में सरकार दारू दुकानें खोलने का सोच रही है। जिस प्रदेश में बिना पिए लापरवाह मटरगश्ती करते लोगों को लाठी मारकर घर भेजना पड़ रहा है, वहां दारू के नशे में लोगों का क्या हाल होगा? आज की कड़वी हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ में कोरोना के हर मरीज का इलाज या तो केंद्र सरकार के एम्स में हुआ है, या एक निजी बड़े अस्पताल अपोलो में हुआ है। राज्य सरकार का अपना इलाज का ढांचा अब तक किसी मरीज से जूझने की कसौटी पर चढ़ाया भी नहीं गया है। इसलिए किसी बड़ी चुनौती के आने पर छत्तीसगढ़ कितना तैयार है, यह परखना अभी बाकी है। 

जापान सहित बहुत से देशों ने यह देखा है कि कोरोना की घरबंदी से थके हुए, लेकिन उससे बचे हुए लोग, लापरवाह होने लगते हैं। साफ-सफाई की लादी गई नई  आदत भी लोगों को फिजूल लगने लगती है, और लोग सावधानी छोडऩे लगते हैं। न सिर्फ छत्तीसगढ़, बल्कि बहुत से प्रदेशों में अब तक बचे रहने को कामयाबी मान लिया गया है, जबकि अब तक बचे रहना महज संयोग भी हो सकता है। एक तब्लीगी जमात ने आकर कोरोना के आंकड़ों को पहाड़ा पढ़ाना शुरू कर दिया है। अभी हो सकता है कि ऐसे कोई और हादसे आ जाएँ। कल ही महाराष्ट्र में कोई बड़ा हिन्दू जलसा भारी भीड़ के साथ हुआ, कल ही वहां पर एक विधायक के जन्मदिन पर सैकड़ों लोगों की भीड़ टूटी पड़ी थी। अभी पूरे हिंदुस्तान में बड़े पैमाने पर जांच बाकी ही है। 

यह वक्त कामयाबी पर खुश होने, दीया जलाने, दावे करने का नहीं है। यह वक्त आगे के खतरों का अंदाज लगाने का है। अभी तक तो एक बड़ी आबादी घरों में है, बिना जांच के है, काम-धंधे बंद हैं, लेकिन लॉकडाउन खत्म होने के बाद अगर काम शुरू होता है, तो उसके बाद संक्रमण बढऩे के खतरों को देखना होगा और वे असली चुनौती होंगे। आज तो धरती पर प्रदूषण भी कम हो गया है, लेकिन वह हकीकत में कम नहीं हुआ है, महज थम गया है। जब जिंदगी रोज के ढर्रे पर आएगी, वह पल भर में लौट आएगा। आज छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री को चि_ी लिखकर कहा है कि जब भी ट्रेन-प्लेन, सफर, शुरू किए जाएँ, सबसे विचार-विमर्श करके ही किया जाये। मतलब यही है कि उस वक्त और उसके बाद एक बड़ा खतरनाक दौर फिर शुरू होगा, और उसके बाद कुछ हफ्ते ठीक निकल जाने पर ही चैन की सांस लेना ठीक होगा। फिलहाल तो देश की तैयारी का हाल यह है कि इसने अपने डॉक्टरों, नर्सों, और बाकी स्वास्थ्य कर्मचारियों को बिना सुरक्षा-उपकरणों के जानलेवा खतरे में झोंक दिया है। एक सरकारी डॉक्टर की पोस्ट को दस दिन हो गए हैं, कि अब मास्क और दस्ताने उसकी कब्र पर भेज दिए जाएँ। कल रात एक मोदी-प्रशंसक परिवार ने दिए जलाने के साथ एक अपील भी लिखकर तस्वीर पोस्ट की है कि परिवार का डॉक्टर अस्पताल में क्वारंटाइन में रखा गया है क्योंकि वह एक मरीज का इलाज करते हुए खुद भी पॉजिटिव पाया गया, उसके बच्चे ने अपील की है कि उसके डॉक्टर पिता को सुरक्षा उपकरण दिए जाएँ। यह अपील दिया जलाने वाले डॉक्टर-परिवार से आई है!

जो लोग मोर्चा फतह मान रहे हैं, वे जान लें कि देश के बड़े दिग्गज विशेषज्ञों के मुताबिक अभी कोरोना का बढऩा पहाड़ की चोटी पर पहुँचने से कई हफ्ते दूर है। वह वक्त उसके इम्तिहान का होगा, और उसी के लिए देश की तमाम सरकारों को रात-दिन तैयारी करनी चाहिए। 

रॉबर्ट फ्रॉस्ट की लिखी और बच्चन की हिंदी में अनूदित की गई, नेहरू की पसंदीदा पंक्तियाँ याद रखना चाहिए,
अभी कहाँ आराम बदा यह मूक निमंत्रण छलना है,
अरे अभी तो मीलों मुझको, मीलों मुझको चलना है।
-सुनील कुमार


05-Apr-2020

छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके से सुबह-सुबह ही दिल दहलाने वाली खबर आई, एक आदमी ने आधी रात अपनी माँ और तीन बुजुर्ग पड़ोसियों का कत्ल कर दिया, कई बैल और मुर्गे काट डाले। यह सब एक तांत्रिक पूजा के बाद किया बताया जा रहा है। देश में जगह-जगह तांत्रिक पूजा, और बलि के नाम पर कत्ल की कई वारदातें सामने आती हैं, छत्तीसगढ़ में हर महीने ही ऐसा कुछ-ना-कुछ होते ही रहता है। इससे परे महिलाओं को टोनही कहकर मारना भी छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में बहुत बार होता है। इक्कीसवीं सदी चल रही है, इस देश में कहीं जाति के नाम पर, कहीं धर्म के नाम पर, कहीं सगोत्र विवाह करने पर, तो कहीं दूसरी जाति में विवाह करने पर कत्ल किए जाते हैं, और लोग उन्हें इज्जत के लिए किए गए कत्ल भी कहते हैं, ऑनर -किलिंग!

देश में पढ़ाई-लिखाई, राजनीतिक-चेतना, और शहरीकरण के साथ लोगों की सोच में जो वैज्ञानिकता आनी थी, वह आनी तो दूर रही, रही-सही भी बुरी तरह घटती दिख रही है। अब लोग और अधिक कट्टर, धर्मांध, नफरतजीवी होते दिख रहे हैं। वैज्ञानिकता के साथ एक दिक्कत है, जब वह जाती है, तो पूरी तरह से जाती है, और अन्धविश्वास बारात लेकर आता है, डेरा जमा लेता है, घरजमाई होकर बैठ जाता है। आप लोगों से गणेश को दूध पिलवा दें, उनके भीतर की वैज्ञानिकता चल बसती है,  फिर उनसे आगे चलकर दूसरे पाखंड करवाना आसान हो जाता है। हिंदुस्तान में हम देखते हैं कि कुछ ताकतें लगातार बीच-बीच में परखती रहती हैं कि लोगों में सोचने-समझने की ताकत बची हुई तो नहीं है? ऐसा हो तो फिर कोई और पाखंड खड़ा कर दिया जाता है। जैसे कोरोना पॉजिटिव मरीज की बार-बार जाँच करके देख लिया जाता है कि कोरोना चल बसा है या नहीं, उसी तरह हिंदुस्तान में राजनीतिक ताकतें, धर्मांध ताकतें बार-बार देख लेतीं हैं कोई वैज्ञानिकता बच तो नहीं गई है। इसके लिए अन्ना हजारे, श्री-श्रीरविशंकर, बाबा रामदेव, सदगुरु, बलात्कारी आसाराम जैसे कई लिटमस पेपर इस्तेमाल किए जाते हैं। आसाराम जब लोगों को ऐसा पाते हैं कि वे अपनी नाबालिग लड़की को भी ऐसे बाबा के पास छोड़ सकते हैं, तो फिर यह समाज की एक अच्छी परख  हो जाती है कि यह समाज, यह देश अब और अधिक दूर तक बेवकूफ बनाने के लायक फिट है। फिर राम-रहीम नाम का एक और लिटमस पेपर और लोगों से बलात्कार करके, मर्दों को बधिया बनाकर और परख लेता है। ये सारे लोग फिर निर्मल बाबा की तरफ भी देखते रहते हैं कि लोग वहां मोटा भुगतान करके बेवकूफ बनने का सर्टिफिकेट खरीद रहे हैं या नहीं। 

नेहरू ने इस देश में बड़ी कोशिश करके जो वैज्ञानिक सोच विकसित की थी, उसे तबाह करना तो उनकी बेटी ने ही मचान पर टंगे देवरहा बाबा के पाँव तले अपना सर धरकर शुरू कर दिया था, और बाद में बहुत सी पार्टियों ने, बहुत से नेताओं ने यही काम किया. और तो और दिग्विजय सिंह जैसे धर्मान्धता-विरोधी नेता भी आसारामों जैसों के चरणों में बिछते रहे, गलत मिसालें कायम करते रहे। अभी-अभी दिल्ली में मुस्लिमों के एक संगठन ने जिस तरह कोरोना-चेतावनी को अनदेखा करके, खतरे को अनसुना करके पूरे देश पर कोरोना-खतरे को दुगुना कर दिया है, वह वैज्ञानिक सोच पर अन्धविश्वास, धर्मान्धता की जीत रही। 

जब देश की सोच से तर्क निकाल दिए जाएँ, सवाल निकाल दिए जाएँ, तो फिर उस खाली जगह पर अन्धविश्वास, धर्मान्धता तेजी से घुसकर काबिज हो जाते हैं। ऐसे में पहले से जिनकी आस्था अंधविश्वासों पर हो, वे तो अपनी इस सोच को और पुख्ता बना बैठते हैं। इसी सरगुजा में पिछली भाजपा सरकार के गृहमंत्री जिस तरह से एक कम्बल-बाबा के कम्बल में किए जाने वाले इलाज को स्थापित करते रहे, उससे बाकी पाखंडियों को और बाजार मिला। बीती रात सरगुजा में जो इतने क़त्ल हुए, वे उसी किस्म के बाजार की उपज हैं, वे रातों-रात नहीं हुए हैं, वे लंबी मेहनत की फसल की उपज हैं। फिलहाल आज रात दिए जलते देखने की तैयारी करें।
-सुनील कुमार


04-Apr-2020

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कल 5 अप्रैल की रात के लिए तय किया गया रौशनी का जलसा एक खतरा लेकर आया है। देश के बिजली सेक्टर के जानकारों का कहना है कि एकमुश्त अगर देश के लोग घरेलू बत्तियां बंद कर देंगे, तो करीब दस फीसदी खपत एकदम से गिर जाएगी, और फिर 9 मिनट बाद यह खपत एकदम से बढ़ भी जाएगी। इस उतार-चढ़ाव से देश की पॉवर ग्रिड पर इतने बड़े झटके लगेंगे कि देश अँधेरे में डूब सकता है। कल मोदी की घोषणा के बाद देश के बिजली मंत्री पॉवर सेक्टर के अफसरों के साथ बैठे, जिन्होंने फिक्र के बावजूद भरोसा दिलाया है कि वे इस उतर-चढ़ाव को झेल लेंगे, लेकिन कुछ का कहना है कि जनता से यह अपील जरूरी है कि वह सिर्फ रौशनी बंद करे, पंखे, या एसी चलते रहने दें, ताकि खपत एकदम से ना गिरे। कल दिल्ली में हुई इस बैठक से जाहिर है कि मोदी की मुनादी के पहले इस बारे में केंद्र सरकार के भीतर भी तकनीकी विशेषज्ञों से चर्चा नहीं हुई थी। खैर, यही तरीका नोटबंदी का था, यही तरीका देश में लॉकडाउन का था। इसलिए देश को अगले और चार बरस इसी किस्म से मुनादियों के सदमे और उनके नुकसान के लिए तैयार रहना चाहिए। 

फिलहाल फिक्र की बात यह है कि अगर पॉवर ग्रिड को नुकसान हुआ तो क्या होगा? क्या आज देश ऐसे प्रतीकात्मक प्रदर्शनों को खतरों की कीमत पर भी करने की हालत में है? क्या आज देश की, और खुद प्रधानमंत्री की भी यह प्राथमिकता होनी चाहिए कि ऐसे खतरनाक, और निहायत गैरजरूरी, शगल में उलझें? देश भर में बिजली की बुनियादी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, क्या ऐसे खतरनाक प्रदर्शन के पहले राज्यों से चर्चा की गई? देश के 130 करोड़ लोगों को एक साथ दिखाने के लिए यह नुमाइश की जा रही है, और देश के 30 राज्यों को भी साथ नहीं रखा जा रहा? यह सिलसिला खतरे के वक्त और खतरनाक हो जाता है, हो गया है। 

आज हिंदुस्तान की प्राथमिकता आत्मप्रचार से परे की ही होनी चाहिए। चाहे सरकारें हों, चाहे राजनीतिक दल हों। आज जब भूखों के लिए तैयार फूड पैकेट पर किसी नेता की तस्वीर छपती है, उन्हें बांटते हुए नेताओं की तस्वीरें छपतीं हैं, तो लगता है कि क्या प्रचार के बिना, मुसीबत की घडिय़ाँ भी इनसे कटे नहीं कटतीं? लखनऊ के एक शायर का लिखा कल ही हमारे पढऩे में आया है कि, 

'राशन थमा दिया उसे 
सेल्फी के साथ-साथ,
जो मर रहा था भूख से, 
गैरत से मर गया।।'

आज का वक्त अपने को भूलकर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने का है। आज हिंदुस्तान में करोड़ों डॉक्टर, नर्स, पुलिस, सफाई कर्मचारी, बिजली कर्मचारी, जेल और निराश्रित गृह कर्मचारी खतरे झेलकर भी अपना काम कर रहे हैं। उनके चेहरे ढंके हुए हैं। उनके घरवाले फिक्र में हैं। किसी भी तरह की नुमाइश उनका कोई फायदा करने वाली नहीं है। आज देश के करोड़ों मजदूर सड़कों में, दूसरे प्रदेशों में शरणार्थी बने हुए हैं, उनके दिलों पर शहरी घरों की रौशनियों को देखकर क्या गुजरेगी? क्या इन रौशनियों में उनके भूखे पेटों के लिए भी कुछ रहेगा? उनका कोई भी भला शोहरत के किसी शिगूफे से होने वाला नहीं है। इसलिए देश को खतरे में डालकर कोई निहायत गैरजरूरी हरकत ना ही की जाए तो ही बेहतर है।
-सुनील कुमार