कोरिया

उगते सूर्य को अघ्र्य के साथ संपन्न हुआ छठ महापर्व
11-Nov-2021 6:02 PM (38)
उगते सूर्य को अघ्र्य के साथ संपन्न हुआ छठ महापर्व

घाटों पर उमड़ी भारी भीड़, छठी मईया के लोकगीत गूंजते रहे

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बैकुंठपुर (कोरिया) 11 नवम्बर।
उगते सूर्य को अघ्र्य देने के साथ ही छठ महापर्व का समापन हो गया। जिला मुख्यालय बैकुण्ठपुर, शिवपुर चरचा, पटना, कटकोना, मनेंद्रगढ चिरमिरी सहित अन्य स्थानों पर भक्तिभाव के साथ छठ पर्व मनाया गया। इस अवसर पर जमकर पटाखें और अतिशबाजी भी की गई। इसके बाद सुबह से घर घर प्रसाद वितरण किया गया।

गुरूवार को छठ व्रती महिलाओं द्वारा उगते सूर्य को दूसरा अघ्र्य दिया गया। इसके साथ ही चार दिवसीय छठ महापर्व का समापन हो गया। गत  8 नवंबर को नहाय खाय से शुरू हुई सूर्य षष्ठी महापर्व को लेकर घर घर में भक्तभाव का महौल बना हुआ था। पर्व के चलते बाजारों में भी पहल पहल बनी हुई थी। बुधवार को अपरान्ह बाद शहर के विभिन्न छठ घाट के लिए व्रति महिलाएॅ पूजन सामग्री सूप,दौरी में ले कर समूह के साथ चले। इस दौरान कई परिजन भी पूजा सामग्री सिर में ढोकर घाट तक पहुंचे जहां पहुंच कर जल में उतरकर डूबते हुए सूर्य को पहला अघ्र्य दिया गया। इसके बाद लगभग सभी घाटों से व्रती महिलाएं व उनके परिजन घर लौट गये और रात भर छठी मईया के ध्यान में लगे रहे और दूसरे दिन तडक़े ही अपने अपने घरों में छठ व्रति फिर से सूर्य को दूसरा अघ्र्य देने के लिए पूजा सामग्री लेकर छठी मईया के गीत गाते हुए निकल पड़े और देखते ही देखते विभिन्न छठ घाटों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ गयी।

इस अवसर पर प्रत्येक घाट पर छठी मईया के सुमधुर गीत भी गूंजते रहे और सूर्य के निकलने का इंतजार करते रहे। जैसे ही सूर्य क्षितिज पर दिखाई दिया छठ व्रती महिलाओं द्वारा जल में उतरकर विधि विधान के साथ पूजा अर्चना की और फिर दूसरा अघ्र्य सूर्य को दिया गया और अपने परिवार की सुख समृद्धि की कामना की। इसके साथ ही चार दिवसीय छठ महापर्व का समापन हो गया। इस अवसर पर सभी घाटों में  उल्लास व भक्तिभाव का वातावरण देखा गया।

छठ घाट पर चाय व गर्म पानी की व्यवस्था
प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी शहर के राम मंदिर छठ घाट पर भव्यता के साथ छठ पर्व मनाया गया। इस अवसर पर कुछ श्रद्धालुओं द्वारा बिस्कुट चाय व गर्म पानी की नि:शुल्क व्यवस्था की गयी थी। जिसका लाभ लोगों के द्वारा उठाया गया। इसी तरह शिवपुर चरचा के छठ घाटों पर भी इस तरह की व्यवस्था श्रद्धालुओं द्वारा की गयी थी।
 

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