सरगुजा

महामाया मंदिर चलगली में नगाड़े और खडग़ की होती है अनोखी पूजा
03-Oct-2022 3:42 PM
महामाया मंदिर चलगली में नगाड़े और खडग़ की होती है अनोखी पूजा

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
राजपुर/प्रतापपुर, 3 अक्टूबर।
सरगुजा अंचल के बलरामपुर-रामानुजगंज जिला अंतर्गत शंकरगढ़ विकासखंड के चलगली ग्राम में अंचल की प्रसिद्ध आराध्य देवी मां महामाया विराजमान हैं। इस मंदिर में किसी प्रतिमा या मूर्ति की नहीं बल्कि मां के खडग और नगाड़े की पूजा रिरासत काल से होती चली आ रही है।

यहां की पूजन विधि, इतिहास और किंवदंती पर राज्यपाल पुरस्कृत व्याख्याता अजय कुमार चतुर्वेदी ने राज परिवार के वर्तमान उत्तराधिकारी, पुजारी बैगा, और स्थानीय लोगों से जानकारी लेकर शोध कार्य किया है।
अजय चतुर्वेदी ने बताया कि सरगुजा अंचल में नवरात्रि के समय विभिन्न नामों से देवी की पूजा अर्चना की जाती है। अंबिकापुर मे सरगुजा राज परिवार की कुल देवी और सरगुजा अंचल की आराध्य देवी जगत जननी मां महामाया के नाम से, सूरजपुर जिले के देवीपुर में महामाया और कुदरगढ़ में कुदरगढ़ी देवी के नाम से पूजा होती है। मंदिरों की नगरी प्रतापपुर में मां समलेश्वरी, मां महामाया और मां काली की पूजा होती है। रमकोला में ज्वालामुखी देवी और खोपा ग्राम में खोपा देव के नाम से देवी की पूजा-अर्चना की जाती है।

शंकरगढ़ चलगली के महामाया मंदिर में ‘बडक़ी माई’ के नाम से पूजी जाती देवी हैं। यहां देवी मां का स्वरूप नगाड़े में विराजमान है। इसलिए मंदिर का पुजारी (बैगा) मां के खडग और नगाड़े की पूजा विधि विधान से राज परिवार के तत्कालीन उत्तराधिकारी से करावाता है।

मां महामाया कुलदेवी और आदिवासी अंचल की आराघ्य देवी हैं-
मां महामाया सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर चलगली महामाया मंदिर में राज परिवार की कुलदेवी और आदिवासी अंचल की आराघ्य देवी के रूप में पूजित हैं। यहां प्रत्येक वर्ष क्वार नवरात्रि के अवसर पर पंचमी तिथि को शंकरगढ़ राज परिवार के वर्तमान उत्तराधिकारी के द्वारा विशेष पूजा की जाती है। शंकरगढ़ राज परिवार के वर्तमान उत्तराधिकारी अनुराग सिंह देव ने बताया कि यहां की महामाया हमारी कुलदेवी के रूप में पूजित हैं। इसलिए प्रत्येक क्वांर नवरात्रि की पंचमी को हमारे परिवार के द्वारा विशेष पूजा और नौ कन्याओं को भोज कराया जाता है।

पंचमी को देवी स्वरूप नगाड़े का कलेवर बदलता जाता है-
प्राय: देखा जाता है कि देवी मंदिरों में किसी मूर्ति या प्रतिमा की पूजा होती है। किंतु चलगली के महामाया मंदिर में केवल मां के खडग और नगाड़े की पूजा होती है। इस संबंध में ऐसी मान्यता प्रचलित है कि देवी मां का स्वरूप नगाड़े में विराजमान है, इसलिए नगाड़े और मां की खडग की विशेष पूजा होती है। क्वांर नवरात्रि में प्रतिवर्ष पंचमी की पूजन के दिन सबसे पहले घसिया जात के नगाड़ची के द्वारा देवी स्वरूप नगाड़े का कलेवर बदला जाता है। जिसमें मंदिर का पुजारी बैगा और राजपरिवार के उत्तराधिकारी के साथ परिवार की अपेक्षित लोग शामिल रहते हैं। नगाड़ची के द्वारा कलेवर बदलने के बाद सबसे पहले नगाड़ची के घर पर ही बैगा पूजा करावाता है। इसके बाद पहली बार अपने घर पर ही नगाड़ची डंका बजाता है। और बाजे गाजे के साथ महामाया मंदिर में ला कर देवी स्वरूप नगाड़े को स्थापित कर दिया जाता है। बली पूजा के बाद नगाड़ची द्वारा दूसरी बार नगाड़े को पुन: बजाया जाता है। इस तरह यह नगाड़ा वर्ष में केवल दो बार ही बजाया जाता है।

प्रथम शक्ति पूजा होती है पंचमी को
महामाया मंदिर से कुछ दूरी पर बस्ती के मध्य में देवी स्वरूप एक प्रतिमा की शक्ति पूजा बैगा द्वारा राज परिवार की उत्तराधिकारी से विधि विधान से कराई जाती है। इसके बाद शक्ति स्थल का ध्वज बदल दिया जाता है। बैगा राजेन्द्र सिंह ने बताया कि यह शक्ति पूजा मां के मंदिर का पट खोलने और बलि पूजा की अनुमति के लिए होती है।

शक्ति पूजा स्थल पर पूजन के बाद सभी लोग गाजे - बाजे के साथ महामाया मंदिर आते है। और मंदिर का पट खोला जाता है। नगाड़े और खडग की पूजा अर्चना के बाद पट खेलने की प्रथम बलि दी जाती है। इसके बाद नौ कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर पूजा की जाती है और उन्हें भोज कराया जाता है। फिर आम श्रद्धालुओं के लिए मंदिर खूल जाता है। और पूजा प्रारंभ होती है।

पंचमी के ही दिन ही शाम 5 बजे पट बंद करने के पूर्व एक काले बकरे की बलि दी जाती है। इसके बाद पंचमी के दिन की पूजा बंद हो जाती है। बैगा राजेंद्र सिंह ने बताया कि शक्ति पूजा स्थल पर दूध,जल,अक्षत आदि से पूजा कर बली और पट खोलने की अनुमति मांगी जाती है। इस मंदिर में खैरवार जाति का बैगा ही पूजा कराता है।

पहले बेसरा पाट में थीं मां महामाया देवी -
रियासत काल में चलगली गांव के बेसरा पाट में मां महामाया ‘बडक़ी माई’के नाम से विराजमान थीं। इस संबंध में किंवदंती है कि सरगुजा रियासत के तत्कालीन राजा को स्वप्न में इसी बेसरा पाट पर मां का दर्शन हुआ था। राजा ने अपने दल बल के साथ बेसरा पाट पहुंच कर बडक़ी माई की पूजा अर्चना कर देवी स्वरूप नगाड़े और खडग को लेकर हाथी में सवार होकर अंबिकापुर आ रहे थे। पहाड़ी से नीचे उतरने पर चलगली गांव के मध्य बस्ती में एक पीपल के नीचे हाथी बैठ गया। वहां से मां स्वरूप नगाड़ा और खडग को कोई नहीं हिला पाया।

ग्रामीणों ने राजा को बताया कि ये अंचल की बडक़ी माई हैं। और हम सब की रक्षक देवी हैं। इस गांव को छोडक़र मां कहीं नहीं जाएंगी। अंतत: राजा ने वही स्थापित कर दिया। और प्रत्येक शुभ कार्य के पहले पूजा अर्चन हमेशा करने लगे । मां महामाया की महिमा के संबंध में शंकरगढ़ मनोहरपुर के निवासी रामलखन पैकरा ने बताया कि वर्तमान समय में शंकरगढ़ राज परिवार की कुलदेवी और आदिवासी अंचल की आराध्य देवी के रूप में मां महामाया पूजित हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता है। सभी भक्तों को मन चाहा वरदान मिलता है।

भंडारे और मेले का आयोजन
महामाया मंदिर चलगली में नवरात्रि के समय 9 दिनों तक मेला भरता है। यहां काफी काफी दूर-दूर तक के श्रद्धालु भक्त आते हैं। कुछ श्रद्धालु भक्तों के द्वारा भंडारे का भी आयोजन किया जाता है। अंचल की आराध्य देवी और राज परिवार की कुलदेवी मां महामाया की महिमा अपरंपार है। यहां आकर बेसहारों को सहारा मिलता है।

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