राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : दिलचस्प तबादला

Posted Date : 10-Apr-2018

सरकारी बिजली कंपनी में तबादले का एक रोचक मामला सामने आया है। पति बिजली कंपनी में ऊंचे पद पर हैं, तो पत्नी एक सरकारी विभाग में पदस्थ हैं। दोनों एक ही शहर में पदस्थ थे। लेकिन आपसी विवाद के चलते पत्नी ने पति से अलग रहने की ठानी और चुपचाप पति के तबादले की अर्जी बिजली कंपनी के शीर्ष अफसरों को भेज दी। पहले तो पत्नी की अर्जी कुछ दिन तक पड़ी रही, लेकिन बाद में कंपनी के एमडी ने इसे संज्ञान में लिया और पत्नी की सिफारिश मानते हुए पति का तबादला कर दिया। अचानक तबादले से पति भौंचक्क रह गए। वे ठहरे, यूनियन लीडर। उन्होंने कारणों की पड़ताल करवाई तो पता चला कि खुद उनकी पत्नी ने तबादले की सिफारिश की थी। इसके बाद जल्द ही पत्नी का दूसरा आवेदन कंपनी के पास आ गया जिसमें पति का तबादला निरस्त करने का आग्रह किया गया है। पति अपनी यूनियन को लेकर कंपनी के आला अफसरों से मिल रहे हैं और  तबादला वापस उसी स्थान पर करने के लिए दबाव बनाए हुए हैं। लेकिन कंपनी प्रबंधन इतनी जल्दी आवेदन पर निर्णय लेने को तैयार नहीं है। वजह यह है कि जल्दी-जल्दी तबादला करने और निरस्त करने से कामकाज प्रभावित होता है। अधिकारी-कर्मचारी  अनुशासनहीन हो जाते हंै। इससे परे यदि पत्नी ने फिर से अपने पति का तबादला करने के लिए आवेदन भेज दिया तो क्या होगा?
अविभाजित मध्यप्रदेश के समय रायपुर में एक आरटीओ हुआ करते थे, आर्या। आरटीओ की कुर्सी बड़ी मेहनत और बड़े लंबे पंूजीनिवेश से ही उस वक्त भी मिलती थी, और रायपुर को इंदौर के बाद मध्यप्रदेश का दूसरे नंबर का आरटीओ माना जाता था। एक दिन अचानक उनका तबादला हो गया। भागे-भागे भोपाल गए तो पता लगा कि उनकी पत्नी ने जाकर मुख्यमंत्री से मुलाकात करके उनका तबादला करवाया था। लेकिन यह तो उनको मालूम था उनकी सीधी-सादी पत्नी घर पर ही थी और भोपाल गई ही नहीं थी। बाद में पता लगा कि उनके विरोधियों ने किसी और घूंघटधारी महिला को मुख्यमंत्री के सामने पेश करके तबादले की अर्जी दिलवा दी थी। यह शायद उसी वक्त की बात थी जब रायपुर के आरटीओ में आग लगी थी, और सारा भ्रष्टाचार जलकर आरटीओ दफ्तर आग में तपकर निकले सोने सरीखा साफ हो गया था।

दिग्विजय छत्तीसगढ़ काडर में...
मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 70 बरस की उम्र में जिस तरह छह महीने तक नर्मदा की परिक्रमा की और 33सौ किलोमीटर पैदल चले, वह देखने लायक है। देखने लायक इसलिए भी है कि इसमें पूरे वक्त उनकी पत्नी अमृता भी साथ थीं, जो कि आमतौर पर एयरकंडीशंड टीवी स्टूडियो में काम करती आई हैं, और इस पूरे लंबे कड़े सफर में वे गांव, जंगल, नदी पार करती रहीं। जब दिग्विजय छत्तीसगढ़ के करीब अमरकंटक पहुंचे तो छत्तीसगढ़ के सारे के सारे बड़े कांग्रेस नेता जाकर उनसे मिले, और उनका आशीर्वाद भी लिया।
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में दिग्विजय सिंह का आज भी इतना असर है कि अगर यहां की कांग्रेस लीडरशिप उनके हवाले कर दी जाए तो कांग्रेस के तमाम गुट एक होकर कांग्रेस की जीत की संभावना भी ला सकते हैं। आपस में एक-दूसरे से मुकाबला करने वाले, या मनमुटाव वाले भूपेश बघेल, रविन्द्र चौबे, सत्यनारायण शर्मा, चरण दास महंत, टी एस सिंहदेव, ये सारे ही लोग दिग्विजय के खेमे के ही गिने जाते थे, और आज भी वे राज्य अलग हो जाने पर भी पूरी तरह उनके साथ बने हुए हैं। यह एक अलग बात है कि अपने बहुत ही तीखे तेवरों और आक्रामक संघ-विरोध की वजह से दिग्विजय सिंह कांग्रेस पार्टी के भीतर ही एक किनारे पर कर दिए गए हैं। उन्होंने अभी दो दिन पहले यह कहा कि अगर मध्यप्रदेश में कांग्रेस पार्टी को एक करके उसे जिताने का जिम्मा उन्हें दिया जाता है तो वे इस जिम्मेदारी के लिए तैयार हैं, लेकिन वे मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे।
मध्यप्रदेश में कमलनाथ से लेकर राहुल सिंह तक, और ज्योतिरादित्य सिंधिया तक बहुत से लोग दिग्विजय सिंह के विरोधी हैं, वहां की कांग्रेस में वे अलग-थलग और अकेले हैं, लेकिन दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में तकरीबन पूरी कांग्रेस पार्टी उनके साथ है। अगर मुख्यमंत्री नहीं बनना है, तो दिग्विजय सिंह छत्तीसगढ़ में ही कांग्रेस को एक कर सकते हैं, और वे यहां कांग्रेस को जिता भी सकते हैं। यह बात बहुत अटपटी भी नहीं होगी क्योंकि देश में कई नेता दूसरे प्रदेशों में जाकर बड़ी राजनीति करते आए हैं। 
सीएस के सहपाठी
पिछले कुछ साल महत्वहीन कुर्सियों पर रहने के बाद आईएएस हेमंत पहारे की पूछ परख बढ़ी है। पहारे, सीएस अजय सिंह के स्कूल के दिनों के साथी हैं। वे उनके साथ बिलासपुर के गवर्मेंट हाई स्कूल में पढ़ाई कर चुके हैं। दोनों एक ही जिले के रहने वाले हैं। पहले शिकवा-शिकायतों के चलते उन्हें गरियाबंद कलेक्टर के पद से हटाया गया था और फिर एडिशनल कमिश्नर बनाकर बिलासपुर भेजा गया। काफी कोशिशों के बाद उनकी राजधानी में वापसी हुई और फिर उन्हें पीएससी में सचिव बनाया गया। लेकिन पीएससी चेयरमैन के आर पिस्दा के साथ उनकी पटरी नहीं बैठ पाई। उन्हें हटाकर मंत्रालय में संसदीय कार्य एवं जनशिकायत निवारण विभाग दिया गया। जहां उनके पास ज्यादा काम नहीं था। सचिव बनने के बाद काफी दिन तक कोई खास महत्व का विभाग नहीं रहा, पहले उन्हें स्कूल शिक्षा दिया गया था। अजय सिंह के सीएस बनने के बाद ग्रामोद्योग विभाग का प्रभार सौंपा गया। वैसे व्यवहार में पहारे अफसरी से एकदम दूर, भोला छत्तिसगढिय़ा किस्म के हैं और उनसे मिलकर बात करने में गांव के लोग भी डरते नहीं हैं।
(rajpathjanpath@gmail.com)


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