राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : बाबूलाल अग्रवाल की लंबी कहानी

Posted Date : 13-May-2018

जबरिया रिटायर किए गए आईएएस अफसर बी एल अग्रवाल के जज्बे की हर कोई दाद दे रहा है। बीएल के जबरिया रिटायरमेंट के आदेश को न सिर्फ कैट ने खारिज कर दिया बल्कि हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ रिश्वत की पेशकश के मामले की सीबीआई जांच पर रोक लगा दी है। भाप्रसे के वर्ष-88 बैच के प्रमुख सचिव स्तर के अफसर बी एल अग्रवाल का प्रशासनिक करियर झंझावतों में घिरा रहा है। 

राज्य बनने के बाद लोक आयोग में किसी आईएएस अफसर के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला सबसे पहले दर्ज हुआ था, तो वे बीएल अग्रवाल ही थे। महिला बाल विकास सचिव रहते उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का प्रकरण दर्ज हुआ था, लेकिन जल्द ही उन्हें क्लीन चिट मिल गई। बाद में उनके स्वास्थ्य महकमा संभालने के बाद विभाग में  कई स्कैन्डल हुए और सीबीआई ने पहली दफा राज्य की अनुशंसा के बिना ही उनके विभाग में भ्रष्टाचार के प्रकरणों की जांच पड़ताल शुरू की। लेकिन बीएल अग्रवाल पर आंच नहीं आई। इनकम टैक्स ने भी उनके यहां छापेमारी की, लेकिन एक ट्रिब्यूनल तक जाकर वे अपने पक्ष में ऐसा आदेश लेकर आए कि उनका कोई बाल-बांका नहीं हुआ। अलबत्ता उनके चक्कर में सीए सहित कई लोग चपेट में आ गए। एक जगह जरूर बैंक में जमा रकम के मामले की जांच सीबीआई कर रही थी, उस पर भी हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। 
बीएल अग्रवाल कानून के गहरे जानकार माने जाते हैं। स्वास्थ्य सचिव के पद रहते उन पर भ्रष्टाचार के छींटे पडऩे के बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई की और मेरिट में लॉ की डिग्री हासिल की। उनकी कानून की पढ़ाई अब उन पर लगे दाग मिटाने के काम आ रही है। सत्ता हो या विपक्ष, हर जगह उनकी घुसपैठ रही है। वे अपार संपर्कों के लिए जाने जाते हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा उनके मुंहबोले मामा है, तो डॉ. चरणदास महंत से भी उनकी अच्छी छनती है। जब वे दुर्ग जिले के कलेक्टर थे तो वहां मंत्री और मंत्री स्तर के आधा दर्जन लोग थे, और वे सब अग्रवाल के भैया थे। सरकार में तो वैसे भी उनके पैरोकारों की कमी नहीं है। कुछ लोग उनकी तुलना अजीत जोगी से भी करते हंै जिनके खिलाफ कोई भी जांच प्रमाणित नहीं हो पाती है। कुल मिलाकर बी एल अब तक जांच एंजेसियों को छकाने में कामयाब रहे हैं। और जब तक सुनील कुमार मुख्य सचिव रहे, तब तक बी एल अग्रवाल सचिव से प्रमुख सचिव नहीं बन पाए थे, लेकिन उनके जाने के बाद उन्होंने तमाम मामलों के चलते हुए भी वह प्रमोशन हासिल कर ही लिया था।


कर्नाटक के बाद अब छत्तीसगढ़ पर फोकस
कर्नाटक चुनाव निपट जाने से अब छत्तीसगढ़ देश के मीडिया की खुर्दबीन के नीचे रहेगा। भाजपा के 3 राज्य चुनाव में जाने वाले हैं, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान। अब नेशनल मीडिया के पास कर्नाटक का शपथ ग्रहण का मुद्दा भी नहीं है, क्योंकि वह तो उनका बेंगलुरू दफ्तर ही निपटा देगा। 
अब उनके पास इन तीन राज्यों का चुनाव तक का कवरेज ही सबसे बड़ा काम है, और पिछले चुनावों में इस राज्य में काम कर चुके अखबारों और चैनलों के तजुर्बेकार लोग अब फिर यहां फोन करना शुरू कर चुके हैं और जल्द ही उनका पहला दौरा लगने लगेगा। इससे नफा और नुकसान दोनों ही राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी को हो सकता है। बाहरी लोगों के विश्लेषण से खामियां ज्यादा अच्छी तरह सामने आ सकती हैं, और राज्य सरकार इस कार्यकाल के आखिरी कुछ महीनों में भी थोड़ा बहुत सुधार कर सकती है, जमीनी सुधार न भी हो, तो भी इमेज की मरम्मत तो हो ही सकती है। आने वाले महीने राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया के छत्तीसगढ़ पर अधिक फोकस के होंगे, और इसीलिए जनसंपर्क विभाग ने भी संचालक के पद पर जमीन से जुड़े एक अफसर को नियुक्त किया है। जिन लोगों ने बारीकी से न देखा हो, उन्हें यह समझना होगा कि मुख्यमंत्री सचिवालय में सरगुजा के अनुभव वाले एक अफसर को अभी लाया गया है, और बस्तर के लंबे अनुभव वाले अफसर को जनसंपर्क में। सरकार की तैयारी में भी विपक्ष के मुकाबले कोई कमी नहीं है।
(rajpathjanpath@gmail.com)


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