राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : प्रमोशन और पकड़ का रिश्ता

Posted Date : 16-May-2018

हर अफसर को पात्रता के बाद भी समय पर पदोन्नति नहीं मिल पाती। सरकार में अफसर की पकड़ हो, तो पदोन्नति समय से पहले भी हो जाती है। आईएएस में जीएस मिश्रा जैसे कुछ उदाहरण मौजूद हैं। आईपीएस और आईएफएस के भी कई अफसरों को समय से पहले पदोन्नति मिलने के उदाहरण मिलते हैं, लेकिन कुछ अफसर ऐसे भी होते हैं, जो कि पात्र होने के बावजूद अपनी सरलता-सीधेपन के कारण समय पर पदोन्नत नहीं हो पाते। इस कड़ी में 88 बैच के आईपीएस अफसर संजय पिल्ले का नाम चर्चा में हैं।
एडीजी पिल्ले सरल स्वभाव के अफसर माने जाते हैं और महकमे में उनकी साख अच्छी है। उनकी किसी से निजी प्रतिद्वंदिता भी नहीं है। बावजूद इसके पद खाली होने के बाद भी डीजी के पद पर पदोन्नत नहीं हो पा रहे हैं। वजह यह है कि सरकार ने दो और पद बढ़ाने का प्रस्ताव केन्द्र को भेजा था, लेकिन केन्द्र ने राज्य के प्रस्ताव को अमान्य कर दिया। सरकार पिल्ले के ही बैच के आर के विज और मुकेश गुप्ता को भी साथ पदोन्नत करना चाहती थी, लेकिन पद नहीं बढ़ा तो पिल्ले की पदोन्नति भी ठंडे बस्ते में चली गई। इसी से मिलते जुलते आईएफएस अफसरों की पदोन्नति मामले में सरकार का रूख अलग रहा है। 
डेढ़ साल पहले पद खाली होने पर 84 बैच के आईएफएस अफसर मुदित सिंह और के सुब्रमणियम पदोन्नत होकर पीसीसीएफ बन गए, लेकिन इसी बैच के उनसे नीचे के अफसर अरूण द्विवेदी और केसी यादव की पदोन्नति रूकी रही। सालभर बाद पद खाली होने पर द्विवेदी तो पदोन्नत हो गए लेकिन यादव की पदोन्नति अभी भी रूकी हुई है। हालांकि अब पद खाली हो गए हैं और वे भी इस माह के आखिरी में पीसीसीएफबन पाएंगे। छह साल पहले तो एक अलग तरह का उदाहरण देखने को मिला था। तब 81 बैच के विवेक ढांड को एसीएस के पद पर पदोन्नति दी गई, लेकिन उनसे एक साल जूनियर डी एस मिश्रा को भी केन्द्र से अतिरिक्त पद स्वीकृत होने की प्रत्याशा में एसीएस के पद पर पदोन्नति दे दी गई। हालांकि, केन्द्र से  स्वीकृति में विलंब होने के कारण मिश्रा के पदोन्नति ऑर्डर निकलने में तीन माह का समय लग गया। ये अलग बात है कि पिल्ले के पीछे बाकियों की तरह कोई ताकतवर नहीं है। 

गाड़ी न रखना ही ठीक है
बनारस में कल एक बन रहे फ्लाईओवर का एक हिस्सा गिर जाने से जिस तरह डेढ़ दर्जन मौतें हो चुकी हैं, और कुछ और लोग दबे हो सकते हैं, उसे देखकर उन तमाम जगहों पर लोगों को सावधान रहने की जरूरत है जहां पर फ्लाईओवर या किसी और तरह के पुल बन रहे हैं। बनारस में जितनी गाडिय़ां एक साथ इस फ्लाईओवर के एक बीम के नीचे दबी हैं, उसे देखते हुए लोगों को ऐसे बड़े निर्माण के आसपास गाड़ी खड़ी नहीं करनी चाहिए। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में ही कई जगह ट्रांसफॉर्मरों में आग लग रही है, इसलिए उनके आसपास गाड़ी खड़ा करना भी ठीक नहीं है। अभी आंधी-तूफान में देश भर में जगह-जगह बड़े-बड़े पेड़ गिरे, और उनके नीचे कई जगह गाडिय़ां दबीं, उन्हें देखें तो यह साफ है कि आंधी-पानी के मौसम में पेड़ों के नीचे भी गाड़ी नहीं खड़ी करनी है। अब बाकी जगहों पर ट्रैफिक पुलिस ने नो-पार्किंग के बोर्ड इस अंदाज में लगा रखे हैं कि मानो धान रोप दिया हो। इन सब बातों को देखें तो समझ आएगा कि गाड़ी न रखना ही ठीक है, और ऑटो रिक्शा या बस से कहीं आना-जाना सबसे कम खतरनाक है। 
भूपेश के पिता हारे
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल के पिता नंदकुमार बघेल दुर्ग जिले की एक अदालत में सरकारी घास जमीन पर अपने कब्जे का एक मामला कल हार गए, और इसके साथ ही भूपेश-विरोधियों के मन में यह उत्साह जाग गया है कि आने वाले दिनों में उनके परिवार के और भी बहुत से मामले अदालतों में गलत साबित होंगे। ऐसे कुछ लोग कागजों के बंडल ले-लेकर सरकार में कई लोगों तक दौड़ लगा चुके हैं, कागज दे चुके हैं, और अब हैरानी के साथ कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं कि कार्रवाई हो क्यों नहीं रही है? हालांकि जो लोग भूपेश बघेल के परिवार को जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि उनके अपने पिता से संबंध अच्छे नहीं हैं, और सबकी जमीनें अलग-अलग हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


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