राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : बंद कमरों की बातचीत...

Posted Date : 09-Jul-2018

भाजपा की राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पाण्डेय की कुछ दिनों पहले खैरागढ़ में सिद्धार्थ सिंह के साथ मुलाकात की राजनीतिक हल्कों में जमकर चर्चा है। सिद्धार्थ सिंह सीएम के करीबी रिश्तेदार हैं। उनके पुत्र विक्रांत सिंह नगर पालिका अध्यक्ष रह चुके हैं। विक्रांत, खैरागढ़ सीट से भाजपा टिकट के दावेदार भी हैं। कहा जा रहा है कि विक्रांत भी अपने पिता की सरोज के साथ बैठक के दौरान मौजूद थे। पार्टी नेता इसे सामान्य मेल-मुलाकात बता रहे हैं, लेकिन हल्ला यह है कि सरोज की वैशाली नगर सीट को लेकर काफी दिलचस्पी है। चर्चा है कि वे अपने भाई राकेश पाण्डेय को वैशाली नगर से टिकट दिलाना चाह रही हैं। वैसे सरोज की भाभी भी भिलाई सीट से चुनाव लडऩे की इच्छा जता चुकी है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों से यह साफ हो गया है कि भिलाई विधानसभा सीट से विधायक प्रेम प्रकाश पाण्डेय की सीट बदलना नामुमकिन है। खुद पीएम ने भिलाई प्रवास के दौरान प्रेमप्रकाश को खास तवज्जो दी थी। खैर, पार्टी के भीतर यह चर्चा है कि सरोज चाहती हैं कि खुद सीएम राकेश को टिकट देने की सिफारिश करे। यदि ऐसा होता है तो राकेश की टिकट तय हो जाएगी। सीएम को इसके लिए तैयार करने का जिम्मा सरोज ने सिद्धार्थ सिंह को दिया है और वे विक्रांत को युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह दिलाने के लिए प्रयास करेंगी। दोनों की मुलाकात को लेकर जितने मुंह, उतनी बातें हो रही है, लेकिन टिकट को लेकर जिस तरह पार्टी में हलचल है उससे कई प्रमुख नेता इसे सच भी मान रहे हैं। लेकिन बंद कमरों की बातचीत जब छनकर बाहर आती है, तो कई बार उसमें से सच का बहुत सा हिस्सा छन्नी में रह जाता है, और कई अनकही बातें जुड़ भी जाती हैं। इसलिए राजनीति में इन बातों का वजन इस आशंका को ध्यान में रखते हुए ही तौलना चाहिए। कहने वाले यहां तक कहते हैं कि सरोज पाण्डेय के लिए संसद मंजिल नहीं, महज एक रास्ता है जिससे वे मुख्यमंत्री निवास तक पहुंचना चाहती हैं।

बिना कड़वाहट के मुकाबले
अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के साथ ही चौथे विधानसभा का आखिरी सत्र खत्म हो गया। सत्र के पहले दिन दिवंगत पूर्व मंत्री हेमचंद यादव, केयूर भूषण और विक्रम भगत को श्रद्धांजलि दी गई। विशेषकर हेमचंद की कमी सदस्यों को काफी खली। क्योंकि सदन में मौजूद ज्यादातर सदस्यों से उनका नाता था। हेमचंद के चिरपरिचित प्रतिद्वंदी अरूण वोरा ने भी उनके साथ अपने संबंधों को याद किया। 
अरूण वोरा और हेमचंद, एक-दूसरे के खिलाफ पांच चुनाव लड़ चुके हैं। जिसमें तीन बार हेमचंद और दो बार अरूण की जीत हुई। राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के बावजूद शायद ही ऐसा कभी हुआ हो, जब दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ व्यक्तिगत हमले किए हों। अरूण वोरा ने एक कदम आगे जाकर सदन में दुर्ग विश्वविद्यालय का नामकरण हेमचंद यादव के नाम पर करने के लिए सीएम को धन्यवाद भी दिया। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भाजपा का ही एक खेमा विवि का नामकरण हेमचंद के नाम पर करने पर असहज हो गया था। चूंकि प्रेमप्रकाश पाण्डेय और बृजमोहन अग्रवाल के प्रयासों के चलते सीएम ने अचानक इसकी घोषणा कर दी, तो हेमचंद के विरोधियों को चुप रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया था। 

(rajpathjanpath@gmail.com)


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