राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : चुनाव सामने खड़ा है और...

Posted Date : 11-Jul-2018

भाजपा के दो दिग्गज नेताओं के रिश्तेदारों ने उनके नाक में दम कर रखा है। विधानसभा चुनाव में तीन-चार महीने बाकी हैं और रिश्तेदारों के कारोबारी झगड़े से दोनों नेताओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। एक के रिश्तेदार पर तो बाजार का करीब साढ़े तीन सौ करोड़ का कर्जा है। कर्जा देने वाले नेताजी के सामने खड़े हो रहे हैं, लेकिन रिश्ता इतना नाजुक है कि नेताजी भी हस्तक्षेप नहीं कर पा रहे हैं। दूसरे नेता का मामला कुछ अलग है। 
उन्होंने अपने रिश्तेदार से करीब सात करोड़ लेकर जमीन में निवेश कर दिए। नोटबंदी और जीएसटी के चलते जमीन का कारोबार बुरी तरह बैठ गया है। नेताजी चुनाव लडऩे की भी तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में वे अपनी अर्थव्यवस्था दुरूस्त करने में जुटे हुए हैं, लेकिन रिश्तेदार ने पैसा वापसी के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। पहले तो समझाने-बुझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बन पाई। दोनों के बीच लेन-देन की खबर बाहर आने लगी, तो कुछ समाज के प्रमुख लोगों ने विवाद को सुलझाने के लिए  हस्तक्षेप भी किया है। मामला कुछ हद तक सुलझ भी गया है, लेकिन कभी कभार सोशल मीडिया के माध्यम से नेताजी के प्रति अलगाव जाहिर कर देते हैं। ऐसे में नेताजी का टेंशन में रहना स्वाभाविक है। 
तुलना शुक्लबंधुओं से लेकर...
छत्तीसगढ़ के पुराने लोगों को श्यामाचरण शुक्ल अक्सर अच्छी बातों के लिए याद आते हैं। एक इंसान के रूप में उनकी बड़ी खूबियां थीं, और उनके छोटे भाई विद्याचरण शुक्ल के तेवर अलग किस्म के थे। दोनों की तुलना करते हुए उस वक्त के लोग कहते थे कि श्यामाचरण बेहतर इंसान हैं, और विद्याचरण बेहतर राजनेता। ऐसी तुलना बहुत से लोगों की होती है, जो कि सार्वजनिक जीवन में रहते हैं। महज बालों, और चेहरे-मोहरे की वजह से तुलना करने वाले प्रियंका गांधी की तुलना इंदिरा गांधी से भी करते रहते हैं। वैसे इससे भी अधिक तुलना आजकल कई नेताओं की चाणक्य से होने लगी है कि आज का कौन सा नेता चाणक्य जैसा है, उसकी टक्कर का है, या उससे बढ़कर है। 
इसी बीच आजकल में विश्वकप फुटबॉल का जो मौसम है वह भी सिर चढ़कर बोल रहा है। और तुलना करने के लिए लोगों ने एक अच्छी लिस्ट सोशल मीडिया पर पोस्ट की है। 
आज इंग्लैंड का क्रोएशिया के साथ विश्व कप फुटबॉल में सेमीफाइनल मैच होने जा रहा है। पिछली बार इंग्लैंड 1990 में सेमीफाइनल में पहुंचा था, और तब से अब तक एक पीढ़ी से अधिक गुजर चुकी है। ऐसे में इंटरनेट पर लोग इस बात का मजाक भी बना रहे हैं कि पिछली बार जब इंग्लैंड सेमीफाइनल में था, तब आज की कौन-कौन सी चीजें नहीं थीं। 
ट्विटर पर ऐसी एक लिस्ट में गिनाया गया है कि आईफोन, फेसबुक, गूगल, अमेजान, एंड्राइड, ट्विटर, इंस्टाग्राम, आईपॉड, याहू यू-ट्यूब, स्नैपचैट, लिंक्डइन, विकिपीडिया, एसएमएस, बजफीड, ब्लैकबेरी, टेसला, स्काईप, उबेर, बिटक्वाइन, फिटबिट, ई-बे, आईपेड, और क्रोएशिया। सेमीफाइनल में इंग्लैंड को आज टक्कर देने वाला क्रोएशिया इंग्लैंड के पिछले सेमीफाइनल के वक्त देश भी नहीं बना था। वह 25 जून 1991 को देश बना है। 

मुंह ही नहीं, कान भी हैं...
प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पी एल पुनिया की कार्यप्रणाली एकदम अलग है। उनके पूर्ववर्ती बी के हरिप्रसाद चुनिंदा नेताओं से मिलते थे और बड़े आयोजनों में ही शिरकत करते थे, लेकिन पुनिया छोटे-बड़े नेताओं से अलग से मेल-मुलाकात में परहेज नहीं करते हैं। यदि कोई छोटा नेता शिकायत करता है, तो वे उसे ध्यान से सुनते हैं और शिकायत की तह तक जाने की कोशिश करते हैं। उनकी कार्यप्रणाली के चलते ही कुछ हद तक कांग्रेस में एकजुटता दिखने लगी है। कुछ दिन पहले वे गांधी उद्यान में मॉर्निंग वॉक के लिए गए, तो उनके पीछे दो पुराने कांग्रेस समर्थक भी हो लिए। दोनों आपसी चर्चा में पुराने कांग्रेसियों को उपेक्षित करने का जिक्र कर रहे थे। आगे-आगे पुनिया उनकी बात सुन रहे थे और तीन चक्कर पूरा होने के बाद रूक गए। 
उन्होंने दोनों का परिचय लिया और पुराने कांग्रेसियों की उपेक्षा पर बात की। इसके बाद दोनों को ऐसे नेताओं की सूची बनाकर देने के लिए कहा। पुनिया ने उनसे कहा कि वे खुद उपेक्षित नेताओं से मिलकर उनकी नाराजगी दूर करेंगे। पुनिया की बात सुनकर दोनों गद्गद् हैं और सूची भी तैयार करने में लगे हैं। 


सरकारी बोर्ड बाजार भाव से खासे अधिक दाम पर लगते हैं, और उसके बाद भी अगर उनमें ऐसी गलतियां रह जाती हैं जिनसे कि आसपास से गुजरते बच्चे भाषा को गलत सीख लें, तो सरकार को इस बारे में सोचना चाहिए। बड़ी संख्या में ऐसे सरकारी बोर्ड दिखते हैं जिनमें हिज्जों की गलतियां रहती हैं। वैसे तो उस इलाके में रहने वाले पढ़े-लिखे लोग भी इन गलतियों को बता सकते हैं, लेकिन एक बार बाहर से छपकर आ गया बोर्ड फिर सुधरे तो कैसे सुधरे? यह हाल गांवों का ही नहीं है, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर ऐसी गलतियों वाले बोर्ड से भरी पड़ी है। तस्वीर / छत्तीसगढ़


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