राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : महंत पर रहस्य बरकरार

Posted Date : 08-Aug-2018

पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. चरण दास महंत विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे या नहीं, इस पर सस्पेंस कायम है। उन्होंने सक्ती से चुनाव लडऩे की इच्छा जताई थी, लेकिन उन्होंने मंगलवार को आखिरी तारीख तक आवेदन नहीं किया। कहा जा रहा है कि पार्टी हाईकमान उन्हें विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ाना चाहती है। वे चुनाव अभियान समिति के मुखिया हैं और प्रदेश की सभी 90 सीटों पर प्रचार की रणनीति बनाने की जिम्मेदारी उन पर है। 
सुनते हैं कि सक्ती में विरोधियों की सक्रियता को देखते हुए ऐन वक्त में टिकट के लिए आवेदन करने का इरादा बदल दिया। सक्ती में पूर्व मंत्री राजा सुरेन्द्र बहादुर सिंह और पूर्व जिला पंचायत सदस्य देवेन्द्र अग्निहोत्री पहले ही उनके खिलाफ कमर कस कर तैयार बैठे थे। वैसे भी, पार्टी ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है कि जो टिकट के लिए आवेदन करेगा, उसे ही प्रत्याशी बनाया जाएगा। कांग्रेस का इतिहास बताता है कि पार्टी ने प्रत्याशी किसी और को घोषित किया था और बी-फार्म किसी दूसरे के नाम जारी हो गया। बी-फार्म के लफड़े के चलते मोहम्मद अकबर को एक बार पार्टी का चुनाव चिन्ह नहीं मिल पाया और हार गए। बी-फार्म में गड़बड़ी की वजह से भूपेश बघेल पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी बन गए थे और फिर बाद में विधायक बने। उस समय बी-फार्म पर पार्टी की लिस्ट के मुताबिक नाम अनंत राम वर्मा का रहना था, लेकिन फार्म भूपेश बघेल के नाम से आ गया और वही प्रत्याशी बन गए, और आज प्रदेश में पार्टी के आसमान पर हैं। 
इससे परे डॉ. महंत खुद मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री थे। तब सोनिया गांधी जांजगीर-चांपा के दौरे पर आई थी। उन्होंने डॉ. महंत को लोकसभा चुनाव की तैयारी करने कह दिया। इसके बाद डॉ. महंत मंत्री पद छोड़कर सांसद बने। उनके समर्थकों को भरोसा है कि आखिरी वक्त में पार्टी उनके नाम का ऐलान कर सकती है। लेकिन कुछ लोगों को यह भरोसा भी है कि अगर वे विधानसभा का चुनाव नहीं भी लड़ते हैं, तो भी मुख्यमंत्री बनने की नौबत आने पर ऐसी कोई शर्त तो रहती नहीं है कि विधायक रहना जरूरी है। जब अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने, तो वे विधायक नहीं थे। रमन सिंह जब राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री बने तो वे भी विधायक नहीं थे और पार्टी अध्यक्ष होने के नाते प्रदेश में प्रचार के जिम्मेदार थे।
फरमाईशी कार्यक्रम
प्रदेश में आईपीएस अफसरों के तबादले हुए हैं। चर्चा है कि इन तबादलों में नेताओं की राय को भी तवज्जो दी गई। राजनांदगांव से प्रशांत अग्रवाल को पहले पीएचक्यू में पोस्टिंग दी गई थी। हफ्तेभर के भीतर उन्हें बलौदाबाजार-भाटापारा एसपी बनाया गया। सुनते हैं कि विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल की पसंद पर उन्हें अपेक्षाकृत छोटे जिले में लाया गया। जबकि यहां  आरएन दास को दो साल नहीं हुए थे। दास ने नक्सल मोर्चे में अच्छा काम किया था। प्रशांत भी काबिल पुलिस अफसर माने जाते हैं। इसी तरह बेमेतरा में हेतराम मनहर को एसपी बनाए जाने के पीछे पर्यटन मंत्री दयालदास बघेल की भूमिका बताई जा रही है। मनहर पहले भी बेमेतरा में एसपी रह चुके हैं। खैर, चुनावी साल में अफसरों की पोस्टिंग में स्थानीय बड़े नेताओं की राय को महत्व दिया जाता रहा है। rajpathjanpath@gmail.com


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