राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : विद्युत नियामक आयोग और चर्चाएं

Posted Date : 10-Sep-2018

सेवा अवधि पूरा होने के बाद पीएन सिंह को राज्य विद्युत नियामक आयोग के सचिव पद पर संविदा नियुक्ति देने के प्रस्ताव को सदस्य ने खारिज कर दिया। उनकी संविदा नियुक्ति को लेकर सस्पेंस अंत तक कायम रहा। उन्होंने महीनेभर पहले ही चुपचाप आयोग के अध्यक्ष नारायण सिंह से उनका कार्यकाल खत्म होने से पहले अपनी संविदा नियुक्ति बढ़ाने की अनुशंसा ले ली थी। और अपना कार्यकाल खत्म होने के आखिरी दिन इसको सार्वजनिक किया। चूंकि  संविदा नियुक्ति का प्रस्ताव विधि सम्मत नहीं था, इसलिए उन्हें हटाकर आयोग के संचालक को सचिव का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। 
पीएन सिंह अभियंता संघ के अध्यक्ष रहे हैं और बिजली अफसरों पर उनकी पकड़ रही है। नारायण सिंह और पीएन सिंह की जोड़ी उद्योगपतियों में काफी लोकप्रिय रही। हालांकि पीएन सिंह से किसान संघ काफी खफा रहा है। पहले सरकार के लोग पीएन सिंह को काफी महत्व देते थे, लेकिन एक विवादित फैसले के बाद आला अफसरों ने उनसे मुंह मोड़ लिया। सुनते हैं कि आयोग ने राज्य पॉवर कंपनी के जिंदल पॉवर से बिजली खरीद के लिए टैरिफ का अनुमोदन किया था। तीन साल तक तो इसे मान्य किया जाता रहा, लेकिन 2014-15 में अमान्य कर दिया। इस फैसले के बाद जिंदल समूह से 153 करोड़ की रिकवरी निकाली गई। 
इस फैसले को जिंदल समूह ने ट्रिब्यूनल में चुनौती दी, लेकिन वहां उन्हें राहत नहीं मिली। हाल यह है कि पॉवर कंपनी को जिंदल से रिकवरी के लिए कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाना पड़ रहा है। खैर, इस फैसले से न तो सरकार और न ही जिंदल समूह खुश है। सरकार से जुड़े लोगों का कहना है कि तीन साल तक बिजली खरीदी के लिए टैरिफ को पहले तो मान्य किया, बाद में प्रस्ताव निरस्त क्यों कर दिया? यदि गलत था तो पहले ही इस पर आपत्ति करनी चाहिए थी। कहा तो यह भी जाता है कि जब उद्योग समूहों से तालमेल अच्छा रहता था, तो आयोग के लोग उद्योग समूहों के प्रतिनिधियों की महंगी गाडिय़ों में घूमने से परहेज नहीं करते थे। खैर, अब जब पीएन सिंह को आयोग से बेदखल किया गया तो सबने उनसे किनारा कर लिया।  

धमतरी पर सेठ का दावा
कांग्रेस में धमतरी सीट को लेकर उलझन बढ़ गई है। यहां से गुरूमुख सिंह होरा विधायक हैं, लेकिन इस बार उन्हें टिकट के लिए पार्टी के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल से लोहा लेना पड़ रहा है। रामगोपाल की चुनाव लडऩे की हसरत काफी पहले से रही है, लेकिन उनकी जगह टिकट कोई और उड़ा लेते रहे हैं। इस बार उनके हौसले बुलंद हंै। इसकी वजह भी है कि उन्होंने नए पीसीसी दफ्तर राजीव भवन के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। 
राजीव भवन के निर्माण के चलते रामगोपाल की पकड़ दिल्ली दरबार में भी बन गई है। इसके अलावा उनके परिवार के कांग्रेस के एक दिग्गज नेता से कारोबारी संबंध बताए जाते हैं। इससे परे होरा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. चरणदास महंत के करीबी माने जाते हैं, जो कि चुनाव अभियान समिति के मुखिया हैं। सुनते हैं कि जहां-जहां महंत की दिलचस्पी ज्यादा है उन सीटों पर पैनल बन गया है। ऐसे में महंत को होरा समेत अन्य समर्थकों को टिकट दिलाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है। 


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