राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : सदमे से गुजरते बाजार से चंदा

Posted Date : 09-Oct-2018

चुनावी चंदे के लिए नेताओं को काफी पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। नोटबंदी और जीएसटी के सदमे से बाजार अब तक उबर नहीं पाया है। भाजपा के नेताओं को फंड की ज्यादा चिंता नहीं है, लेकिन कांग्रेस और दूसरे दलों के चुनाव तैयारियों में जुटे नेता चंदे के लिए इधर-उधर चक्कर काट रहे हैं। कई नेता अपनी प्रापर्टी निकालने के फेर में है। इन्हीं में से एक नेता तो अपनी प्रापर्टी बेचने के चक्कर में गच्चा भी खा गए। 
हुआ यूं कि करीब चार माह पहले जोगी पार्टी के एक नेता ने भाजपा के ताकतवर नेता से अपनी प्रापर्टी का सौदा तय किया था। जैसे ही जोगी पार्टी के नेता की टिकट घोषित हुई, भाजपा नेता ने उनकी प्रापर्टी की कीमत आधे से भी कम रख दी। चूंकि पहले सिर्फ आपसी बोलचाल में सौदा तय हुआ था, इसलिए जोगी पार्टी के नेता कोई ज्यादा बोलने की स्थिति में नहीं रह गए। भाजपा नेता ने यह कह दिया कि उन्हें खुद चुनाव लडऩे के लिए पैसों की जरूरत है। ऐसे में वे कीमत ज्यादा देने की स्थिति में नहीं है। जोगी पार्टी के नेता ने पहले ही बाजार की हालत को देखते हुए प्रापर्टी की कीमत कम कर रखी थी। अब भाजपा नेता के नए प्रस्ताव को वे स्वीकारने की स्थिति में नहीं रह गए। थक हारकर उन्हें सौदा कैंसल करना पड़ा। 
उनका कोई विकल्प नहीं
पूर्व सांसद अशोक शर्मा को भाजपा ने एक बार फिर चुनाव कंट्रोल रूम का प्रभारी बनाया है। शर्मा को वर्ष-2003 के विधानसभा चुनाव से ही यह जिम्मेदारी मिलती रही है। शर्मा के अलावा पार्टी के कई और भी नेता हैं, जिनका राजनीतिक कद तो ऊंचा है, लेकिन प्रदेश में संगठन के भीतर उनकी जिम्मेदारी नहीं बदली है। इन्हीं में से एक सौदान सिंह भी हैं। सौदान सिंह के पास कई राज्यों का प्रभार है, लेकिन छत्तीसगढ़ में अभी भी वैसी ही भूमिका निभा रहे हैं, जोकि वर्ष-2003 में निभा रहे थे। उस समय सौदान सिंह महामंत्री (संगठन)  के पद पर थे। इसी तरह गृह निर्माण मंडल के दो बार अध्यक्ष रह चुके सुभाष राव के पास अभी भी कार्यालय मंत्री का प्रभार है। यह जिम्मेदारी वे पिछले दो दशक से निभा रहे हैं। पार्टी के कई नेताओं  को लगता है कि इन नेताओं की कार्यक्षमता का कोई मुकाबला नहीं है। इनका विकल्प ये खुद ही हैं। 

शिक्षाकर्मी नेता को टिकट?
शिक्षाकर्मियों के एक बड़े पदाधिकारी ने कांग्रेस से टिकट मांगी है। कांग्रेस के प्रमुख नेता उन्हें प्रत्याशी बनाने के लिए पहले तैयार थे क्योंकि संबंधित क्षेत्र से लडऩे वाले पार्टी के दिग्गज नेता चुनाव हारने के बाद दूसरी जगह से टिकट चाह रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपना इरादा बदल दिया और अब वे पुरानी सीट से चुनाव लडऩा चाहते हैं। पार्टी के कई नेताओं को लगता है कि इस बार भी दिग्गज नेता की संभावना कम है और शिक्षाकर्मी नेता उनसे बेहतर हो सकते हैं। चुनावी बिगुल फूंका जा चुका है। ऐसे में कई जगहों पर बेहतर विकल्प होने के बावजूद अलग-अलग कारणों से पार्टी प्रत्याशी बदलने का जोखिम नहीं उठा पा रही है। 
(rajpathjanpath@gmail.com)

 


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