राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : आखिरी पांच ओवर के चौके-छक्के
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : आखिरी पांच ओवर के चौके-छक्के
Date : 29-Jun-2019

बिलासपुर के आबकारी विभाग के एक बाबू पर पिछली सरकार के वक्त एसीबी का छापा पड़ा था। बाबू वैसे तो आबकारी विभाग के मालिकों का चहेता था, और उसका बड़ा दबदबा था, वह खुलेआम चखना की दुकानें चलाने का हक बेचता था, और सबसे बड़ी बात यह कि एसीबी ने अपने छापे में उसके पास करोड़ों की संपत्ति पकड़ी थी। मामले के सुबूत पुख्ता थे, और उसे अदालत तक ले जाने की तैयारी चल रही थी। इस बीच अभी अचानक एसीबी के मुखिया ने उसकी फाईल बुलवाई, और उसके खिलाफ मामले को खारिज कर दिया। खुद विभाग के लोग यह जानकर हक्का-बक्का रह गए कि यह क्या हो गया? मीडिया के लोगों ने एसीबी के एडीजी से इस बारे में पूछा, तो उन्हें इसका सिर-पैर कुछ नहीं मालूम था। और उनकी जानकारी से परे ऊपर-ऊपर यह फाईल सीधे डीजी तक पहुंची, और वहां इस प्रकरण के खात्मे का निर्णय लिया गया, आनन-फानन आदेश जारी कर दिया गया। इसी आदेश में फाईल की बाकी जानकारी भी है कि अचल संपत्ति के 172 पन्ने, बैंक/डाकघर के 118 पन्ने, एफडी के 23 पन्ने, एलआईसी के 4 पन्ने वगैरह-वगैरह। हालत यह है कि जिन लोगों ने भाजपा सरकार के दौरान बरसों तक ऐसे भ्रष्ट और कमाऊ विभाग पर राज किया, वे लोग अपने खिलाफ बने-बनाए भ्रष्टाचार और अनुपातहीन संपत्ति के मामले से इस तरह छुटकारा पा रहे हैं, और आनन-फानन पा रहे हैं। 

पिछले कुछ समय से एसीबी को लेकर प्रदेश के कमाऊ विभागों में खुली चर्चा है कि सरगुजा और बिलासपुर संभाग के लोगों को बचाने के लिए प्रदीप सिंह नाम का एक एजेंट नियुक्त किया गया है, और बस्तर के लोगों को बचाने के लिए नागेश नाम का। ऐसी चर्चा है कि जिस तरह वन-डे क्रिकेट के आखिरी पांच ओवर में सिर्फ चौके-छक्के मारे जाते हैं, इस दफ्तर में भी आखिरी के महीनों में उसी रफ्तार से रन बन रहे हैं। भाजपा सरकार के समय फंसे हुए सारे भ्रष्ट सरकारी लोग किसी मॉल की सेल की तरह के इस मौसम का फायदा उठा सकते हैं। वैसे जिस हड़बड़ी में डिस्काऊंट पर बेकसूरी के सर्टिफिकेट बेचे जा रहे हैं, वह हड़बड़ी अदालत में हो सकता है कि खड़ी न हो पाए, और कोई जज ऐसे खात्मे को मानने से इंकार कर दे। 

रहस्यमय वीआईपी लिस्टें 
राजधानी नया रायपुर में एक गोल्फ सिटी बनाने के लिए पिछली सरकार के मंत्रिमंडल ने एक ऐसा बड़ा जमीन आबंटन किया था जो चौंकाने वाला था, लेकिन उसकी फाईल पुख्ता बनाई गई थी, इसलिए नई सरकार भी उसमें कुछ कर नहीं पा रही है। लेकिन अगर सरकार इस गोल्फ सिटी में बनाए गए करोड़ों के बंगलों को पाने वाले लोगों की लिस्ट देखे, तो उसमें उस वक्त के अधिकतर ताकतवर अफसरों के नाम मिल जाएंगे, या ऐसे कोई दूसरे नाम मिल जाएंगे जिनके पीछे मालिकाना हक उन्हीं ताकतवर अफसरों का है। इनमें से एक बड़े ताकतवर अफसर को तो भूपेश सरकार ने किनारे कर दिया है, लेकिन लिस्ट खासी लंबी है। यह कुछ उसी किस्म की लिस्ट है जिस तरह चर्चित और विवादास्पद, अब गुजर चुके बिल्डर संजय बाजपेयी की कॉलोनी स्वागत विहार में प्लॉट पाने वाले अफसरों और उनके रिश्तेदारों के नाम थे। वही वजह थी कि वह लिस्ट हमेशा दबी रही, और कभी सामने नहीं आ पाई। सूचना का अधिकार भी इस अड़ंगे को पार करके लिस्ट तक नहीं पहुंच पाया। इसी तरह जहां-जहां सिर्फ अफसरों या जजों के लिए कॉलोनियां बनीं, मंत्रियों और विधायकों के लिए कॉलोनियां बनीं, वहां-वहां तमाम फाईलें, और तमाम लिस्टें जनता की पहुंच से बाहर ही रहीं। 

तीर-कमान, और चेतावनी
बस्तर में हुई अवैध कटाई के पीछे एनएमडीसी है, या कोई और, इसकी जांच का जिम्मा वन विभाग को दिया गया है। जब जांच अफसर ऐसे नक्सल इलाके में पहुंचे, तो उनके पहले दो दिन से वहां वन विभाग के स्थानीय छोटे कर्मचारी जा रहे थे। बस्तर में तैनात एक अफसर ने बताया कि जब बड़े अफसर कटाई देखने पहुंचे, तो कुछ ही देर में तीर-कमान लिए हुए आदिवासियों की टोलियां वहां पहुंचने लगीं, और जांच दल के साथ-साथ कुछ दूरी से चलने लगीं। इसके बाद उन्होंने स्थानीय कर्मचारियों को बुलाकर कहा कि यहां आने से, और अफसरों को लाने से मना किया गया था, उसके बावजूद लेकर आना ठीक नहीं है। उनके तेवर देखते हुए स्थानीय कर्मचारियों ने आगे बढऩा खतरनाक बताया और कहा कि साहब लोग तो लौट जाएंगे, उन्हें तो इसी इलाके में जीना है। कटाई की जांच पूरी नहीं हो पाई, और पूरी टीम को लौटना पड़ा।

(rajpathjanpath@gmail.com)

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