राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : विदेश प्रवास का एक पुराना किस्सा
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : विदेश प्रवास का एक पुराना किस्सा
Date : 11-Jul-2019

आईएफएस अफसर एसएस बजाज को बिना अनुमति के विदेश यात्रा करने पर नोटिस थमा दिया गया। बजाज खुद के खर्चे पर सिंगापुर गए थे। उन्होंने लौटने के बाद विभाग को इसकी सूचना दी। बिना अनुमति के विदेश यात्रा को सर्विस रूल का उल्लंघन माना गया। वैसे बजाज अकेले अफसर नहीं हैं, जिन्हें इस तरह का नोटिस मिला है। पिछली सरकार में तो बड़ी संख्या में अफसर विदेश गए, लेकिन कई ने अनुमति तक नहीं ली। 

ऐसे अफसरों में आईएएस अफसर आर प्रसन्ना का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। प्रसन्ना भी अनुमति लिए बिना विदेश गए थे। लौटकर आने के बाद अनुमति के लिए आवेदन दिया। उन्हें तत्कालीन सीएस ने  जमकर फटकार लगाई थी। नोटिस भी जारी किया गया था। लेकिन अफसरों की विदेश यात्राओं को लेकर पिछली सरकार काफी उदार रही है और इस तरह के प्रकरणों पर चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता था। मगर, सरकार बदलने के बाद अफसरों की यात्राओं पर तिरछी निगाह है। संकेत साफ है कि इस तरह के प्रकरणों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। 

लोगों को आज के सूचना आयुक्त एम.के. राऊत का बरसों पहले का वह मामला याद है जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने उन्हें लंदन में घूमते हुए अचानक ही आमने-सामने देखा, तब पता लगा कि राऊत विदेश में हैं। इस घटना को लेकर एक किस्सा फैला था, जो सच था या नहीं वह पता नहीं। रमन सिंह अपने साथ गए अफसरों के साथ लंदन में मैडम त्रुसां की प्रतिमाओं की गैलरी देखने गए थे, और वहां उनके ओएसडी विक्रम सिसोदिया ने चौंकते हुए उन्हें कहा- देखिए सर यहां तो राऊत साहब की भी प्रतिमा लगाई गई है। 

दरअसल राऊत किसी प्रतिमा को देखते हुए खड़े थे, और उसी वक्त छत्तीसगढ़ से पहुंची टीम भी वहीं थी। इसके बाद उन्हें यह जवाब देने में खासी मुश्किल हुई कि वे निजी प्रवास पर भी बिना इजाजत कैसे विदेश चले गए थे जिसके लिए इजाजत जरूरी है।

संपत्ति की तरह पासपोर्ट...
राज्य सरकार जिस तरह अपने सारे अफसरों-कर्मचारियों से हर बरस संपत्ति का ब्यौरा लेती है, उसी तरह हर बरस उनके परिवारों के इन्हीं लोगों के पासपोर्ट की कॉपी भी लेनी चाहिए कि घर का कौन-कौन आश्रित सदस्य या जीवनसाथी विदेश होकर आए हैं। अभी तो हालत यह है कि छोटे-छोटे से अफसर भी खरीदी के लिए चीन, और मस्ती के लिए बैंकाक इसी तरह जाते-आते हैं जैसे मुंबई-दिल्ली गए हों। पासपोर्ट की जांच हो जाए, तो सैकड़ों लोग सस्पेंड होंगे जिन्होंने विदेश यात्रा के बाद भी सरकार से कोई इजाजत नहीं ली है।

राज्य सरकार में यह चर्चा आम रहती है कि जिन अफसरों को विदेश यात्रा की इजाजत देनी होती है, वे इसी बात पर कुढ़ते रहते हैं कि वे यहीं बैठे हैं, और दूसरे लोग विदेश जा रहे हैं, इसलिए कई बार समय रहते इजाजत दी नहीं जाती है, हवाई टिकट आखिरी वक्त पर बहुत महंगी हो जाती है। जब विश्वरंजन डीजीपी थे, और अमरीका के बर्कले विश्वविद्यालय में उन्हें एक सेमिनार में नक्सल हालात पर बोलने के लिए आमंत्रित किया था, तो सरकार पर कोई आर्थिक बोझ नहीं आ रहा था क्योंकि अमरीकी विश्वविद्यालय पूरा खर्च उठा रहा था। लेकिन इसके बावजूद उनकी फाईल आखिरी वक्त पर मुख्य सचिव से बड़ी मुश्किल से मंजूर हुई थी, और महंगी टिकट लेकर उन्हें जाना पड़ा था।

सरकार बदली तो पार्किंग छिनी...
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बीच बसे हुए महंत घासीदास संग्रहालय का चेहरा वक्त के साथ बदलते रहता है। पन्द्रह बरस भाजपा की सरकार रही, तो एक सबसे ताकतवर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के छोटे भाई योगेश अग्रवाल छत्तीसगढ़ी फिल्मों को लेकर संग्रहालय के पूरे कैम्पस पर हावी रहे, और फिल्म से जुड़े लोगों की होली भी इस सरकारी संग्रहालय के कैम्पस में होती रही। फिर कुछ दूसरे लोगों की ताकत काम आई तो इस कैम्पस का बहुत बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ी रेस्त्रां, गढ़कलेवा, के नाम पर दे दिया गया, और किसी को समझ नहीं आया कि शहर का यह सबसे बड़ा खुला रेस्त्रां सरकारी पार्किंग सहित कैसे किसी के कब्जे में आ गया। अब सरकार बदली तो वहां कुछ दूसरे लोगों की मर्जी काम आ रही है, और गढ़कलेवा को मिली हुई बहुत बड़ी पार्किंग बैरियर लगाकर बंद कर दी गई, और वहां तक जाने के लिए अब हाईवे का ही रास्ता बचा है। सत्ता की मेहरबानी से चलने वाले काम-धंधे इसी तरह कभी ऊपर उठते हैं, कभी नीचे आते हैं। वैसे इसी संग्रहालय से सरकार का संस्कृति विभाग काम करते आया है जिसमें मर्जी के कलाकारों को छांट-छांटकर उपकृत करने के आरोप लगते रहे हैं, और कमीशनखोरी के भी। कुल मिलाकर बात यह दिखती है कि सरकार का दखल न तो कारोबार में रहना चाहिए, और न ही कला में। 

आखिरी वक्त निकल जाने के बाद
आखिरी वक्त पर मंजूरी की बात करें, तो राज्य सरकार के तबादले के मौसम का अटपटापन सामने आता है। अब जब जुलाई शुरू हो गई है, और पूरे प्रदेश में स्कूल-कॉलेज के दाखिले खत्म हो रहे हैं, स्कूलों में पढ़ाई शुरू हो चुकी है तब सरकारी अमले के तबादले शुरू हो रहे हैं, और ये तबादले अगस्त के महीने तक चलने वाले हैं। ऐसे में जाहिर है कि शहर बदलने की वजह से बच्चों के स्कूल-कॉलेज भी बदलेंगे, स्कूल यूनीफॉर्म भी बदलेगी, किताबें भी बदल जाएंगी, और बारिश के वक्त एक शहर से दूसरे शहर आते-जाते सामान भी भीगकर बर्बाद होने का खतरा रहेगा। लेकिन जो काम सरकार वित्त वर्ष समाप्त होने के बाद बिना किसी दिक्कत कर सकती थी, और गर्मियों में लोग शहर बदल सकते थे, उसे स्कूल-कॉलेज शुरू होने के बाद किया जा रहा है। सरकार को स्कूलों का वक्त तय करना हो, गर्मी या दीवाली की छुट्टी तय करनी हो, इन सबमें ऐसी ही बेरहमी दिखाई जाती है। पता नहीं क्यों कर्मचारियों और अधिकारियों के संगठन भी सरकार के सामने इस दिक्कत के खिलाफ क्यों नहीं बोलते हैं।
(rajpathjanpath@gmail.com)

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