राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : बिसेन के बुरे दिन
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : बिसेन के बुरे दिन
Date : 21-Jul-2019

रिंकू खनूजा आत्महत्या प्रकरण में सीएम रमन सिंह के ओएसडी रहे अरूण बिसेन की मुश्किलें बढ़ सकती है। बिसेन से पुलिस एक बार पूछताछ कर चुकी है। जल्द ही उन्हें दोबारा पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है। खास बात यह है कि अरूण बिसेन के बचाव के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। कोई यह नहीं कह रहा है कि बदलापुर की राजनीति हो रही है। अफसर और भाजपा के लोग भी उनसे काफी नाराज रहते थे। वजह यह है कि उनका सीएम सचिवालय में रहते मुलाकातियों-अफसरों से व्यवहार अच्छा नहीं रहा। जिन लोगों के रमन सिंह से अच्छे संबंध थे, वैसे भी बहुत से लोगों के फोन नंबर बिसेन ने अपने हैंडसेट पर ब्लॉक कर रखेे थे।

सरकार जाने के बाद जब उनके खिलाफ शिकायतों पर जांच बिठाई गई, तो लोगों को उनके कारनामों का पता चला। अरूण बिसेन ने एनआरडीए में काम कर रही एक एजेंसी में अपनी पत्नी को नौकरी पर लगवा लिया था। सरकार बदलने के बाद जब नियुक्ति का प्रकरण सुर्खियों में आया, तो खुद रमन सिंह हैरान रह गए। सुनते हैं कि उन्होंने पत्नी को नौकरी पर रखने की जानकारी रमन सिंह को नहीं दी थी। अरूण बिसेन, रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह के सहपाठी रहे हैं और इस वजह से उन्हें सीएम हाऊस में एंट्री मिल गई। देखते ही देखते उनकी हैसियत काफी बढ़ गई। चर्चा है कि रिंकू खनूजा-सीडी कांड की जांच में जुटी पुलिस ने उनसे सीडी देखने के लिए मुंबई जाने और वहां के महंगे पांच सितारा सहारा होटल में रूकने और मानस साहू से संबंधों को लेकर पूछताछ की। 

चर्चा तो यह है कि सीडी से जुड़े किसी भी सवाल का उन्होंने कोई ठोस जवाब नहीं दिया। अरूण बिसेन की संपत्ति की भी जानकारी जुटाई जा रही है। उन्होंने आईआईएम से एजूकेटिव एमबीए किया है, इस पर लाखों खर्च होते हैं। यह राशि कहां से आई, इसकी भी जानकारी जुटाई जा रही है। अभी स्वर्णभूमि में एक बड़े बंगले का पता चला है। कोई इस मामले में अभी कुछ कहने के लिए तैयार नहीं है, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, बिसेन की मुश्किलें बढ़ सकती है। दूसरी तरफ रमन सिंह के एक वक्त सबसे करीबी रहे ओएसडी विक्रम सिसोदिया आखिरी पांच बरसों में ऐसे किनारे कर दिए गए थे कि किसी गलत काम से उनका नाम जुड़ा हुआ मिला ही नहीं है क्योंकि सारे कामों से उन्हें अलग ही रखा गया था। उस वक्त की उपेक्षा आज फायदे की साबित हो रही है क्योंकि सेक्स-सीडी देखने अगर उन्हें भेजा गया होता तो आज वे गवाही देते खड़े रहते।

भाजपा के दिग्गज हावी
सदन में पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, शिवरतन शर्मा, नारायण चंदेल और धर्मजीत सिंह न हों, तो सत्ता पक्ष के लिए मैदान एकदम खाली रहेगा। कम से कम अब तक के दो सत्रों में तो यही दिखा है। सदन में भाजपा के मात्र 14 सदस्य हैं और सत्ता पक्ष के 67। खासकर मानसून सत्र में सत्ता पक्ष के आगे विपक्ष असहाय दिखा। अंडा प्रकरण में जब सत्ता पक्ष सदस्य एक साथ पिल पड़े, तो गुस्साए भाजपा सदस्य विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है यह कहते सदन से बाहर निकलने मजबूर हो गए। 

नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की भूमिका बेहद सीमित रही है। एक-दो मौके पर तो बगल में बैठे रमन सिंह उनके कानों में फुसफुसाते देखे गए, तब कहीं जाकर वे बोलने के लिए खड़े हुए। जोगी सरकार में बृजमोहन अग्रवाल काफी मुखर रहते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं दिखा। इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि बैलाडीला के नंदीराज पर्वत पर खनन को लेकर उनका सवाल लगा था और वे सदन में लेट पहुंचे, जिसके कारण इस पर चर्चा नहीं हो पाई। जबकि इस मामले को लेकर पूरा बस्तर आंदोलित रहा है। विपक्ष के नाम पर चारों ही ज्यादा मुखर रहे हैं। सौरभ सिंह की भी आवाज सुनाई जरूर देती है। अजय ही ज्यादातर मौकों पर विपक्ष को लीड करते नजर आए। महाधिवक्ता प्रकरण पर विपक्ष ने भूपेश कैबिनेट के खिलाफ सदन में निंदा प्रस्ताव लाया। खास बात यह है कि  राज्य बनने के बाद पहली बार कैबिनेट के खिलाफ निंदा प्रस्ताव आया। ये अलग बात है कि प्रस्ताव अग्राह्य हो गया। मगर, अजय, नारायण और शिवरतन कम संख्याबल की कमी के बावजूद अपने संसदीय ज्ञान के बूते सत्ता पक्ष को परेशान करते नजर आए। 

शब्दों के बदलते मायने...
एक समय जब म्युनिसिपल के नलों में कोई पंप लगाकर गैरकानूनी तरीके से उसका पानी खींचते थे, तो उसके खिलाफ जारी नोटिस में टुल्लू पंप लिखा जाता था। अब टुल्लू तो एक ब्रांड था, लेकिन हर चोर पंप को टुल्लू मान लिया गया था। ठीक इसी तरह वनस्पति घी की जगह डालडा शब्द ऐसा चल निकला था कि वह ब्रांड न हो, हर किस्म के घी का नाम है। 

अब यह सेल्फी का युग चल रहा है। हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा देखा जाने वाला कॉमेडी शो देखें, तो उसमें कपिल शर्मा अर्चना पूरन सिंह से सेल्फी लेने को कहते दिखते हैं जबकि वे दूर से महज फोटो लेती हैं जिसमें वे खुद नहीं रहतीं। यानी अपनी किसी भी तरह की तस्वीर हो, खुद लें, या कोई और, उसे सेल्फी कह दिया जाता है। 
बातचीत के कुछ और अटपटे शब्दों को देखें तो डेनिम के कपड़े को लोग जींस कहने लगे हैं। डेनिम के शर्ट को लोग जींस का शर्ट, और डेनिम की जैकेट को जींस का जैकेट कहते हैं। डेनिम का हाल किसी गैरटुल्लू पंप सरीखा हो गया है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया। वक्त के साथ-साथ कुछ शब्द मायने खो बैठते हैं, और कुछ दूसरे शब्द नए मायने पा लेते हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)

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