राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : सारी सिफारिशें किनारे करके...
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : सारी सिफारिशें किनारे करके...
Date : 20-Nov-2019

सारी सिफारिशें किनारे करके...
वैसे तो प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया ने कहा था कि निकाय- पंचायत चुनाव के बाद निगम-आयोगों में नियुक्ति होगी, फिर भी अल्पसंख्यक आयोग में नियुक्ति कर दी गई। महेन्द्र छाबड़ा को आयोग का अध्यक्ष बनाने का फैसला चौंकाने वाला था, क्योंकि इसमें प्रदेशभर के बड़े मुस्लिम-सिख नेताओं की नजर लगी थी। पार्टी के कई राष्ट्रीय नेताओं ने भी अपनी तरफ से अलग-अलग नामों की सिफारिशें की थी। इन सबको दरकिनार कर महेन्द्र छाबड़ा को अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। 

सुनते हैं कि छाबड़ा को अध्यक्ष बनाने में मोहम्मद अकबर की भूमिका अहम रही है। छाबड़ा राजीव भवन में मंत्रियों के मेल-मुलाकात कार्यक्रम के प्रभारी थे और मीडिया विभाग में भी अपनी जिम्मेदारी बाखूबी से निभा रहे थे। ऐसे में अकबर ने उनके नाम का सुझाव दिया, तो सीएम ने फौरन हामी भर दी। आयोग में दो सदस्यों में से एक अनिल जैन की नियुक्ति में भी अकबर की चली है।
 
अनिल, अकबर के कॉलेज के दौर के सहयोगी हैं। जबकि राजनांदगांव के हाफिज खान की नियुक्ति में करूणा शुक्ला का रोल रहा है। हाफिज खान ने विधानसभा चुनाव में राजनांदगांव में करूणा का जमकर प्रचार किया था। और करूणा ने जब उनका नाम आगे किया, तो सीएम ने बिना किन्तु-परन्तु के सदस्य के रूप में नियुक्ति कर दी। दोनों सदस्यों को राज्यमंत्री का दर्जा रहेगा। 

जब सीधा आदमी अड़ जाए...
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी सीधे-सरल माने जाते हैं। मगर कांकेर जिलाध्यक्ष पद पर अपने समर्थक विजय मंडावी को बिठाने के लिए सभी बड़े नेताओं की नाराजगी मोल ले ली। कांकेर में रमन सिंह, रामप्रताप सिंह और पवन साय व धरमलाल कौशिक एकमतेन किसी गैर आदिवासी विशेषकर सामान्य वर्ग से अध्यक्ष बनाने के पक्ष में थे। क्योंकि जिले की सारी विधानसभा सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित है। मौजूदा जिलाध्यक्ष हलधर साहू पिछड़ा वर्ग से रहे हैं, लेकिन वे कोई परिणाम नहीं दे सके। कांकेर जिले में हर चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। 

सुनते हैं कि विक्रम को समझाने की कोशिश की गई, किन्तु वे नहीं माने। अपेक्स बैंक के पूर्व अध्यक्ष महावीर सिंह राठौर के साथ तो उनकी तीखी नोंक-झोंक भी हुई। वे अपनी पसंद का अध्यक्ष बनाने के लिए इतने अड़े थे कि पार्टी को कांकेर का 22 तारीख को होने वाला चुनाव स्थगित करना पड़ा। पार्टी नेताओं को आशंका थी कि विक्रम अपनी पसंद का अध्यक्ष न होने पर पद से इस्तीफा तक दे सकते हैं। ऐसे में पार्टी नेताओं ने फिलहाल चुनाव टालने में समझदारी दिखाई।  (rajpathjanpath@gmail.com)

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