राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : सरकार और पार्टी की राहत
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : सरकार और पार्टी की राहत
Date : 04-Mar-2020

सरकार और पार्टी की राहत

छत्तीसगढ़ में हाल ही में पड़े आयकर छापों पर कांग्रेस पार्टी और छत्तीसगढ़ सरकार दोनों ने केन्द्र सरकार से जमकर विरोध तो जाहिर किया है कि एक केन्द्रीय सुरक्षा बल, सीआरपीएफ, को साथ लाकर ये छापे डाले गए जो कि देश की संघीय व्यवस्था के खिलाफ है। जो लोग कुछ चुनिंदा टीवी चैनलों पर समाचार देखते हैं, वे अपने समझ के स्तर के मुताबिक इस संघीय ढांचे को संघ यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का ढांचा समझ रहे हैं, और इस बात पर हैरान हो रहे हैं कि मोदी सरकार अगर संघ के ढांचे के मुताबिक काम नहीं करेगी, तो और किस तरह करेगी? लेकिन छापों का दौर खत्म हो जाने के बाद अब सरकार और कांग्रेस पार्टी कम से कम सार्वजनिक रूप से तो राहत की सांस लेते दिख रही हैं क्योंकि छापों में जो नगदी बरामद हुई है, वह बड़ी-बड़ी चर्चाओं में रहने वाले लोगों की बेइज्जती खराब कर रही है। अब इतना बुरा वक्त किसने सोचा था कि महापौर एजाज ढेबर के घर खुद से 25 हजार रूपए मिलेंगे, और उनकी मां के पास से चार लाख रूपए। कांग्रेस पार्टी का कहना है कि जिस मां के चार-पांच कारोबारी बेटे हों, उसके पास इतनी रकम में हैरानी की कोई बात तो है नहीं। आबकारी विभाग के सबसे खास अफसर त्रिपाठी के पास नोटों से भरी आलमारियां मिलने की खबरें फैली थीं, लेकिन ऐसी सारी आलमारियों की हकीकत 60 हजार रूपए तक सिमट गई। रेरा चेयरमैन विवेक ढांड के घर पर करीब तीन लाख रूपए नगद मिले हैं जो कि उनकी और उनकी पत्नी की एक महीने की तनख्वाह से भी कम रकम है। कांग्रेस के एक पार्षद अफरोज अंजुम से छापे में 18 सौ रूपए मिले हैं, और पार्टी ने उन्हें गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाला बताया है। कांग्रेस का यह भी कहना है कि गुरूचरण होरा के घर और दफ्तर से एक करोड़ रूपए से कुछ अधिक रकम मिली है, और वे भाजपा के सदस्य हैं। अब कांग्रेस पार्षद से 18 सौ, और भाजपा सदस्य से एक करोड़ से अधिक! कोई हैरानी नहीं कि ऐसे में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल यह सुझा रहे हैं कि आयकर विभाग को अपना विशेष विमान का खर्च निकालने के लिए भाजपा के लोगों पर ही छापा डालना चाहिए। 

पड़ोस का भी फायदा
छत्तीसगढ़ के कल के बजट में किसानों को धान का बाकी भुगतान करने का इंतजाम कर दिया गया है जिसे मिलाकर उन्हें 25 सौ रूपए के रेट से भुगतान पूरा हो जाएगा। धान खरीदी के समय केन्द्र सरकार के नियमों की वजह से राज्य सरकार समर्थन मूल्य से अधिक दाम नहीं दे पाई, इसलिए फर्क का पैसा अब दिया जाना है। लेकिन राज्य सरकार का कुछ या अधिक नुकसान इसमें भी हो रहा है कि छत्तीसगढ़ से लगे हुए दूसरे राज्यों से सरहद पार करके धान यहां लाया गया, और इस राज्य के अधिक रेट पर बेचा गया। हालांकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कहना है कि कड़ी चौकसी की वजह से ऐसा धान अधिक नहीं आया है, लेकिन उनकी अपनी जानकारी यह है कि राज्य की सरहद के जिलों में फसल कम हुई थी, लेकिन हर किसान प्रति एकड़ 15-15 क्विंटल धान बेच रहे हैं। अब इस अधिकतम सीमा तक धान की बिक्री कम फसल की उपज से तो हो नहीं सकती थी, इसलिए पड़ोसी राज्यों से धान आया ही आया है। 

मुख्यमंत्री का चमकदार जोश
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बजट की शाम अखबारों के संपादकों को नाश्ते पर बुलाया था, और उनका जोश एक लखपति बजट पेश करने वाले मुख्यमंत्री-वित्तमंत्री जैसा था। दूसरी तरफ मीडिया के चेहरों पर झेंप थी क्योंकि पिछले हफ्ते भर में आयकर छापों को लेकर उसकी खबरों के गुब्बारे की हवा निकल गई थी। हवा भरे गुब्बारे जितने बड़े आंकड़ों से घटते हुए हकीकत हवा निकले गुब्बारे के आकार की बच गई थी, और भूपेश बघेल इस नौबत का मजा तो ले रहे थे, लेकिन उन्होंने कोई जुबानी हिसाब-किताब भी चुकता नहीं किया जो कि उनके आम मिजाज से कुछ हटकर था, और वहां से निकलते हुए मीडिया भी राहत की सांस ले रहा था। दरअसल इस बार के आयकर छापों के दौरान और उसके बाद भी आयकर विभाग ने कोई ठोस आंकड़े जारी नहीं किए, और जिन पर छापे पड़े थे, उनसे जब्त नगदी निराशाजनक थी। ऐसे में सरकार के करीबी कहे और समझे जाने वाले इन लोगों के बारे में प्रकाशित और प्रसारित गलत जानकारी और अटकलों ने मीडिया की कमजोरी उजागर कर दी थी।  नौबत यह थी कि जितने सवाल मीडिया कर रहा था, उससे अधिक पैने सवाल मुख्यमंत्री के पास थे, लेकिन वे अपने सवालों की धार को हवा में लहरा नहीं रहे थे। 

भूकंप के पहले की फाल्टलाईन
छत्तीसगढ़ के पंडित सुंदरलाल शर्मा खुले विश्वविद्यालय के पिछली सरकार के नियुक्त कुलपति अब भी जारी रखे गए हैं। और दूसरी तरफ कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में किसी वामपंथी या कम से कम धर्मनिरपेक्ष कुलपति की नियुक्ति का इंतजार किया जा रहा था, उस जगह पर भी संघ परिवार के एक जाने-माने व्यक्ति को कुलपति बना दिया गया। दो दिनों में ऐसी दो नियुक्तियों से छत्तीसगढ़ राजभवन और केन्द्र सरकार के बीच में, भूगोल की भाषा में, फाल्टलाईन उजागर हो गई है, जहां पर धरती के नीचे चट्टानों के खिसकने से किसी दिन भूकंप आ सकता है। कुलपति नियुक्त करने का सारे का सारा अधिकार पिछली सरकार ने राजभवन को दे दिया था, और वह इस सरकार पर बहुत भारी पड़ा है। बाहर आम जनता यह तो नहीं समझती है कि सरकार और राजभवन के अधिकारों में कहां पर सीमा रेखा है, लोग तो यही समझ रहे हैं कि भूपेश सरकार के चलते संघ के दो-दो कुलपति बन गए। राजभवन अगर बीच का कोई रास्ता निकाल पाता, और दोनों पक्षों की बर्दाश्त के लायक नाम तय किए जाते तो ऐसी नौबत नहीं आती कि राज्य सरकार कानून बनाकर राज्यपाल से अधिकार वापिस लेने की सोचने लगती। मौजूदा राज्यपाल अनुसुईया उइके के साथ शुरूआती महीनों के परस्पर-सम्मान के संबंधों के बाद अब राज्य सरकार एक संवैधानिक चुनौती के दौर में खड़ी हो गई है, या कर दी गई है। 

(rajpathjanpath@gmail.com)

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