राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : पशोपेश में माननीय
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : पशोपेश में माननीय
08-May-2020

पशोपेश में माननीय

सार्वजनिक जीवन में लोगों से मिलना-जुलना अनिवार्य माना जाता है, लेकिन कोरोना संक्रमण के इस दौर में यह किसी आफत से कम नहीं। लिहाजा, नेता-मंत्री लोगों से मेल-मुलाकात से एकदम से परहेज कर रहे हैं। हालांकि इतने से उनका काम बन नहीं रहा है। संकट के इस समय में लोग मदद के लिए बंगलों तक भी पहुंच रहे हैं। कुछ लोग फोन से लोकेशन ले रहे हैं। ऐसे में नेता-मंत्री भी बदल-बदलकर अपना लोकेशन बता रहे हैं। इससे थोड़ी बहुत राहत जरुर मिल रही है, लेकिन पूरी तरह से नहीं। जैसे-तैसे वीआईपी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं। लोगों की समस्या को सुनना और सुलझाना भी जरुरी है। इस पूरे संक्रमण काल में उनकी दिक्कत यह भी है कि ज्यादातर लोग एक जगह से दूसरी जगह या अपने प्रदेश लौटना चाहते हैं। ऐसे में नेता-मंत्री उनकी मदद नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि प्रवासियों की वापसी नियमों और सावधानी के साथ ही होनी है। फिर भी माननीय कोशिश भी कर रहे हैं। अपने विधानसभा के लोगों की ऐसी ही समस्या के लिए मंत्री बकायदा अफसरों को फोन भी कर रहे हैं, लेकिन अफसरों की भी अपनी मजबूरियां है। चाहकर भी अफसर-मंत्रियों के निर्देश का पालन नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में माननीयों की स्थिति खराब हो रही है। एक तरफ आम लोगों को लगता है कि नेता मिल नहीं रहे हैं और मशक्कत के बाद बात हो भी रही है, तो उनके काम नहीं हो रहे हैं। दूसरी तरफ अधिकारी भी नियम कानून का हवाला देकर काम नहीं कर रहे हैं। कुल मिलाकर माननीय बड़े पशोपेश में हैं कि मिले तो मुश्किल नहीं मिले तो समस्या। लोगों की समस्या को सुलझाए तो परेशानी और न सुलझाए तो बड़ी परेशानी।

मांस-मटन से खुला राज

छत्तीसगढ़ के पत्रकारिता विवि के कुलपति लॉकडाउन के कारण दिल्ली में फंसे हैं, लेकिन उनकी सरकारी गाड़ी लगातार दौड़ रही है। कई बार लोगों को संशय हो जाता है कि कहीं कुलपति महोदय लौट तो नहीं गए हैं। हालांकि ऐसा है नहीं। धीरे-धीरे लोगों ने ध्यान देना बंद कर दिया था। इस बीच विवि के लोगों का माथा उस वक्त ठनका जब कुलपति जी की गाड़ी मांस-मटन की दुकान पर खड़ी देखी गई। दरअसल, कुलपति तो लहसून-प्याज तक नहीं खाते। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि उनकी गाड़ी मांस-मटन की दुकान में क्या करती है। इसके बारे में जानकारी जुटाई गई तो पता चला कि कुलपति जी की गाड़ी दरअसल, विश्वविद्यालय के एक बड़े साहब के जुगाड़ के लिए दौड़ रही है। अब विवि के गलियारे की यह कानाफूसी दिल्ली कुलपति जी तक पहुंच गई। उन्हें जैसे ही पता चला उन्होंने तत्काल दिल्ली से ड्राइवर को फोन करके इंक्वारी की। साथ ही रीडिंग और लॉग बुक के बारे में जानकारी ली। उन्होंने आते ही गाड़ी का लॉगबुक चेक करने के लिए ताकीद किया। इतनी पूछताछ के बाद से तो ड्राइवर सकते में है। दौड़ते-भागते उसने इसकी सूचना बड़े साहब को दी। अब देखना यह है कि मांस-मटन के लिए किस गाड़ी का उपयोग किया जाएगा। हालांकि लॉकडाउन से पहले जब कुलपति की नियुक्ति नहीं हुई थी, तब भी साहब गाडिय़ों का उपयोग करते थे, लेकिन उस समय लोगों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। अब जब मामला धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है, तो इसने नया रंग ले लिया है।

किसानी का क्या होगा?

कोरोना के कारण गांव, गरीब और किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। इस दौर में गांवों में खेती किसानी चौपट हो गई है और मजदूरों को रोजगार नहीं मिल रहा है। हालत यह है कि सभी के सामने रोजी रोटी का संकट हो गया है। हालांकि सरकार का दावा है कि राज्य में किसान और गरीब दोनों की स्थिति अच्छी है। राज्य सरकार मनरेगा में काम उपलब्ध कराने में भी अव्वल रहा है। दूसरी तरफ 25 सौ रुपए समर्थन मूल्य के कारण किसान की आर्थिक स्थिति अच्छी होने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन राज्य के किसानों को अभी भी 25 सौ रुपए का बकाया यानि करीब पौने 7 सौ रुपए मिलने का इंतजार है। सरकार ने मई में किसानों को बकाया राशि देने का मन बनाया है। ऐसे में यह राशि किसानों के लिए काफी उपयोगी साबित होगी, क्योंकि राज्य में साग-भाजी और फलों की फसल तो खरीददार नहीं मिलने के कारण चौपट हो गई है। कोरोना के कारण उत्पन्न स्थिति का असर आने वाले कुछ सालों तक रहने वाला है। आशंका जताई जा रही है कि इस महामारी के बाद नौकरी जाने का खतरा है, लिहाजा लोग गांव की तरफ जा सकते हैं। ऐसे में ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है। यह सोच सही है, लेकिन इसके लिए किसानी को प्रोत्साहित करने की जरुरत है और सरकार को लघु-कुटीर उद्योगों की स्थापना के लिए पहल करनी होगी। अन्यथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चौपट होने में देर नहीं लगेगी। किसानों का मानना है कि धान के कटोरे को बचाए रखने के लिए उपज का एक-एक दाना समर्थन मूल्य पर खरीदने की जरुरत है। क्योंकि सरकार केवल 15 क्विंटल धान समर्थन मूल्य पर खरीद रही है। छत्तीसगढ़ में सरकार सूबे के खेत खलिहानों से ही निकल कर बनी है। किसानों ने बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इसलिए भी बंपर जीत दिलाई, ताकि उसकी फसल का वाजिब मूल्य मिल सके। कोरोना महामारी के बाद फिलहाल तो कोई चुनाव नहीं है। संभव है कि किसानों की तरफ से सरकार का ध्यान हट जाए, जबकि खेती किसानी पर विशेष ध्यान की आवश्यकता है। फिलहाल तो इसके सियासी नफा-नुकसान नहीं है, लेकिन देर करने पर नुकसान ज्यादा हो सकता है, क्योंकि किसान बाजी पलट भी सकते हैं। 15 साल तक सत्ता में रहने के इससे एकदम से दूर हुई बीजेपी इसका दर्द अच्छे से समझ सकती है। लोगों का तो यह भी कहना है कि रमन सिंह को दिल्ली से अनुमति मिल गई होती, तो शायद पार्टी की इतनी दुर्गति नहीं होती। उम्मीद है कि उनको अब यह बात समझ आ गई होगी, लेकिन फिलहाल को समझने की बारी सरकार की है, क्योंकि कहा जाता है कि अब पछताए होत क्या जब चिडिय़ा चुग गई खेत।

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